अख़बारनामा: ‘शिकारी’ रंधावा की गिरफ़्तारी का अर्धसत्य और ‘मुर्ग़े की खाल’ बरामद कराती रिपोर्टिंग


रांधवा की गिरफ्तारी के बहाने आज खबरों की खबर


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संजय कुमार सिंह

आज एक खबर की खबर। इस स्पष्टीकरण के साथ कि मैं ज्योति रांधवा को निजी तौर पर नहीं जानता, कभी नहीं मिला और उनके किसी करीबी से भी मेरी कभी कोई मुलाकात या उनके बारे में कोई चर्चा नहीं है। आज मैं जिन खबरों की चर्चा कर रहा हूं उन्हें लिखने वालों को भी नहीं जानता, किसी से कभी नहीं मिला सिर्फ खबर और विशुद्ध रिपोर्टिंग की बात कर रहा हूं। आप कह सकते हैं कि मैं एक शिकारी या आरोपी के पक्ष में खड़ा दिख रहा हूं पर मैं रिपोर्टिंग की विवेचना कर रहा हूं। आज मशहूर गॉल्फर ज्योति रांधवा की गिरफ्तारी की खबर सभी अखबारों में प्रमुखता से है। “मशहूर गॉल्फर ज्योति रांधवा शिकार के आरोप में गिरफ्तार” शीर्षक भरोसेमंद नहीं है। इसके साथ यह सूचना होनी ही चाहिए कि उन्होंने किस प्रतिबंधित जीव को गोली मारी, मारा गया जानवर बरामद हुआ या नहीं या कोई गवाह है कि नहीं। इसके बिना खबर अधूरी है, अविश्वसनीय है।

मेरे पसंदीदा अखबार, द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पेज पर सिंगल कॉलम में है। और मेरी समझ से यहां शीर्षक सही है। “गॉल्फर हेल्ड फॉर अटेम्प्ट टू पोच” यानी शिकार की कोशिश में गॉल्फर गिरफ्तार। पीयूष श्रीवास्तव की बाईलाइन वाली खबर इस प्रकार है, “पुलिस ने कहा कि गॉल्फर ज्योति रांधवा को बुधवार को उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व में संरक्षित जानवरों को डराने और शिकार करने की कोशिश में गिरफ्तार किया गया। वन अधिकारी ने कहा कि इस बात के कोई सूबत नहीं हैं कि गॉल्फर ने किसी संरक्षित जानवर को गोली मारी है पर यह आरोप कि जंगल के अंदर उनकी राइफल से गोली चलाई गई, उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए पर्याप्त है। अगर सजा हुई तो उन्हें छह साल जेल में रहना पड़ेगा।”

एक मजिस्ट्रेट ने बाद में रांधवा और उनके साथी, एक पूर्व नेवी कप्तान को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। पुलिस ने कहा कि .22 बोर की राइफल और कई जिन्दा कारतूस उनके कब्जे से बरामद हुए हैं। (इसके बाद विस्तृत खबर पेज चार पर है।) बीच में शिकार स्थल या गिरफ्तारी के संबंध में जानकारी है पर पहले पेज की अंतिम सूचना उपरोक्त ही है। इससे नहीं लगता कि रांधवा ने कुछ गलत किया है। लाइसेंसी राइफल या जिन्दा कारतूस बरामद होना शिकार करना नहीं है। ऊपर स्पष्ट किया गया है कि गोली चलाने का आरोप ही कार्रवाई के लिए पर्याप्त है। यह आम पाठक को बताया नहीं जाएगा तो कैसे समझेगा और कल को बरी हो जाएं तो पाठक समझेगा कि सही फैसला नहीं हुआ या कुछ गड़बड़ है।

टेलीग्राफ में चौथे पन्ने पर तीन कॉलम की फोटो के साथ चार कॉलम का शीर्षक है, “वापसी में गॉल्फर गिरफ्तार”। इस खबर में रांधवा और उनके साथी का पूरा परिचय है। इसमें उनकी वैवाहिक स्थिति, साथ के दूसरे लोगों का विवरण, 10 साल का लड़का और रांधवा के फार्म हाउस का केयरटेकर भी था। खबर में यह भी लिखा है कि इस बात की पुष्टि हो नहीं हो सकी कि लड़का उनकी पहली पत्नी चित्रांग्दा सिंह से उनका बेटा जोरावर है कि नहीं। वन अधिकारी ने केयर टेकर और लड़के को फार्म हाउस पर छोड़ दिया। दंपति 2014 में अलग हो गए थे और गिरफ्तारी लखनऊ से 130 किलोमीटर उत्तर बहराइच जिले में हुई। वे रात भर जंगल में रहने के बाद लौट रहे थे तो उनकी गाड़ी को फॉरेस्ट रेंजर और कुछ गार्ड्स ने रुकवाया।

इस बात पर विवाद हो सकता है कि हिन्दी के फटीचर अखबार जब विज्ञापन से भरे रहते हैं तो बगैर विज्ञापन वाले टेलीग्राफ को इतना विस्तार देने या सही सूचना देने पर समय और श्रम खर्च करने की जरूरत है कि नहीं। लेकिन इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता है पत्रकार आईआईएमसी का हो या माखन लाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय का पढ़ा, बिना अनुभव और खबरों की सही समझ के ऐसी खबर नहीं लिख सकता है। खबर में डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर, जीपी सिंह के हवाले से लिखा है, “इन लोगों के पास एक पुरानी जंगली सुअर की खाल, कुछ बायनोकुलर (दूरबीन), रेंज फाइंडर और 60 जिन्दा कारतूस भी बरामद हुए हैं। हथियार रांधवा के नाम पर पंजीकृत है।” अंग्रेजी में लिखी इस खबर में ‘ओल्ड’ का मतलब मैंने पुराना समझा है वह बूढ़े सुअर की खाल भी हो सकता है। हालांकि इसकी संभावना कम है।

अखबार ने एक अन्य अनाम वन अधिकारी के हवाले से लिखा है, “इस बात का कोई सबूत नहीं है कि 46 साल के रांधवा जो गुड़गांव में रहते हैं और अक्सर अपने मित्रों के साथ यहां अपने फार्म हाउस में आते रहते हैं, ने किसी संरक्षित जानवर को मारा है। पर हमारे पास इस बात के सबूत हैं कि उनकी राइफल से गोली चली है और यह जमानत मिलने से पहले उन्हें जेल में रखने के लिए पर्याप्त है। उन्होंने (रांधवा) कहा है कि वे निर्दोष हैं और माफी मांगने के लिए तैयार हैं। इस पर वरिष्ठ अधिकारी निर्णय करेंगे। अखबार ने यह खबर पीटीआई की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ छापी है। गौरतलब है कि गिरफ्तारी कल सुबह हुई थी और अखबारों के लिए खबरें अमूमन देर शाम तक फाइल की जाती हैं। ऐसे में जल्दबाजी का कोई मामला नहीं था। इसलिए, आइए देखें दूसरे अखबारों में क्या है।

हिन्दुस्तान टाइम्स ने पहले पेज पर सिंगल कॉलम में शरीक रईस सिद्दीक की बहराइच डेटलाइन की खबर में कहा है कि एक सांभर और एक जंगली मुर्गे की खाल बरामद हुई है। सांभर का तो ठीक है, मुर्गे की खाल मुझे तो नहीं समझ में आ रही है। अगर आरोप यह हो कि मुर्गा मार कर खा लिया गया तो खाल संभाल कर रखने का मकसद गिरफ्तार होना ही हो सकता है। इस खबर का विस्तार अंदर के पन्ने पर है और पांच कॉलम के शीर्षक में सांभर की खाल जब्त होने का जिक्र है।

इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर तीन कॉलम में यह खबर नई दिल्ली डेटलाइन से छापी है और जय मजूमदार की बाईलाइन है। शीर्षक है, उत्तर प्रदेश के टाइगर रिजर्व में शिकार के लिए गॉल्फर रांधवा को जेल। यह खबर तथ्यात्मक रूप से सही है और शीर्षक पढ़कर यह जानने की इच्छा नहीं होती है कि उनके पास क्या मिला, कौन गवाह है, आरोप सही है कि नहीं आदि। क्योंकि जेल हो गई मतलब पहली नजर में अपराध हुआ है। यह अलग बात है कि अगर आप यहां इस खबर को पढ़ रहे हैं समझ सकते हैं कि जेल क्यों हुई है। मेरा यही मानना है कि खबर ऐसे लिखी जाए कि उससे सवाल न उठे (अगर मकसद यही न हो)।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने मुंबई संस्करण में पहले पेज पर तीन कॉलम में यह खबर छापी है। दिल्ली में पहले पेज पर नहीं दिखी। इसलिए मुंबई वाले की ही बात करता हूं। शीर्षक है, “उत्तर प्रदेश के दुधवा में शिकार के आरोप में गॉल्फर ज्योति रांधवा गिरफ्तार”। यह खबर कतर्नियाघाट / बरेली डेटलाइन से है और दो संवाददाताओं की बाईलाइन है। यहां भी शीर्षक गड़बड़ है। अगर मजिस्ट्रेट ने जेल भेज दिया है तो जेल लिखा जाना चाहिए था या फिर शीर्षक में ही बताया जाना चाहिए था कि मारा गया जानवर बरामद हुआ या नहीं अथवा कोई गवाह है कि नहीं।

हिन्दी अखबारों में दैनिक भास्कर में यह खबर पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, “दुधवा टाइगर रिजर्व में शिकार के आरोप में गॉल्फर ज्योति रांधवा गिरफ्तार”। इंट्रो है, शूटर महेश भी साथ में अरेस्ट, दोनों को 14 दिन के लिए जेल भेजा। इसमें तीन खाली कारतूस, सुअर और सांभर की खाल, जंगली मुर्गे भी बरामद होने की सूचना है।

दैनिक जागरण में इस खबर का शीर्षक है, अवैध शिकार करते गॉल्फर ज्योति रांधवा गिरफ्तार। यह शीर्षक भी गड़बड़ है। ‘करते’ का मतलब हुआ मौके पर रंगे हाथ गिरफ्तार किया जाना। उसमें वन कर्मी गवाह होते और मामला बहुत साफ होता। इस मामले में पहले की खबरों में ऐसा नहीं कहा गया है। शिकार किए गए बरामद जानवरों के मामले में तथ्यों का अंतर भी गौरतलाब है। आज मैं उसपर बात नहीं कर रहा।

नवोदय टाइम्स ने पहले पन्ने पर ‘भाषा’ की खबर एक कॉलम में छापी है। शीर्षक है, “गॉल्फर ज्योति रांधवा शिकार के आरोप में गिरफ्तार”। अमर उजाला में भी यह खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। शीर्षक है, “कतर्नियाघाट में शिकार करते गॉल्फर ज्योति रांधवा गिरफ्तार”। हिन्दुस्तान ने पहले पन्ने पर दो कॉलम में खबर छापी है। शीर्षक वही है, “गॉल्फर रांधवा अवैध शिकार में गिरफ्तार”। नवभारत टाइम्स में भी यह खबर पहले पेज पर है। शीर्षक है, “टाइगर रिजर्व के पास शिकार में गॉल्फर रांधवा गिरफ्तार”।

यहां गौरतलब है कि सबसे सही जान पड़ने वाली टेलीग्राफ की रिपोर्ट में कोई जानवर बरामद होने की खबर नहीं है और अलग से इसकी पुष्टि भी है। दूसरी ओर, लगभग अन्य सभी खबरों में कुछेक जानवर बरामद होने की खबर है। और यही खबर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, मामले का आधार है। अगर टेलीग्राफ की खबर को गलत मान लें तो भी बाकी अखबारों में बरामद जानवरों का विवरण एक क्यों नहीं है? या ऐसा आभास क्यों नहीं होता है कि इनलोगों ने कई जानवर मारे थे और सही गिनती संभव नहीं है। असल में, सारा मामला ब्रीफिंग का है।

आजकल की रिपोर्टिंग इसी पर आधारित होती है। रिपोर्टर ने जो सुना लिख दिया। अस्पष्ट था तो अस्पष्ट ही। जबकि उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए था। हमलोग रिपोर्टर से आवश्यक जानकारी देने के लिए कहते थे। अब ऐसा नहीं होता। रिपोर्टर की योग्यता क्षमता के आधार पर डेस्क वालों को पता होता है कि खबर में क्या ब्रीफिंग है और क्या उसके परिश्रम का नतीजा। डेस्क का काम है कि ब्रीफिंग वाले को कम ले रिपोर्टिर के परिश्रम वाली जानकारी को क्रॉस चेक कर ले। अगर डेस्क ने अपना काम सही किया होता तो दोनों गिरफ्तार लोगों के विस्तृत विवरण अंग्रेजी अखबारों में एक से हैं। वो छंट जाते। लगता है तैयारी करके गिरफ्तार किया गया है। कारण चाहे जो हो।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। जनसत्ता में रहते हुए लंबे समय तक सबकी ख़बर लेते रहे और सबको ख़बर देते रहे। )


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