पेट की आग में जल कर मर गयी सीतापुर की रोहिणी! एक दीया उसके लिए भी, महन्त जी…

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दिवाली के अगले दिन आतिशबाज़ी से पैदा हुए धुएं के नुकसान पर जब पूरा देश सिर खपा रहा था, आठवें दरजे की एक लड़की सरकारी अस्पताल में चुपचाप गुज़र गयी। पेट की आग से मजबूर होकर रोहिणी ने बीते 10 अक्टूबर को खुद को आग लगा ली थी। अठारह दिन तक वह घुटती और जलती रही, लेकिन धुआं बर्न वार्ड से निकलकर दिल्ली तो क्या लखनऊ तक भी नहीं पहुंचा। घटना उत्तर प्रदेश की राजधानी से महज दो घंटे की दूरी पर स्थित सीतापुर जिले की है।  

सोमवार की शाम सात बजे के आसपास रोहिणी की मौत हुई। वह 70 फीसदी जली हुई थी। मौत के वक्त उसके पिता राकेश पास में ही थे। उनके पास मोबाइल फोन नहीं है। दस दिन पहले तक घर में अनाज भी नहीं था। रोहिणी के परिवार की फ़ाकाकशी की कहानी दैनिक हिंदुस्तान में छप चुकी है। इस ख़बर ने घर के बाकी सदस्यों को भुखमरी का शिकार होने से बचा लिया, लेकिन रोहिणी नहीं रही।

देर रात किसी और के माध्यम से मीडियाविजिल के साथ हुई बातचीत में बेसुध राकेश ने यह तक नहीं पूछा कि कौन बोल रहा है। बस इतना बताया कि बेटी की लाश मॉर्चुरी में रख दी गयी है। फिलहाल कोई चिकित्सक अस्पताल में मौजूद नहीं है। शायद मंगलवार को दिन में लाश को घर ले जाने दिया जाए। राकेश के मुताबिक रोहिणी की हालत दिवाली के दिन तक ठीक थी। अचानक रात बारह बजे से हालत बिगड़ी और उसे उलटी दस्त शुरू हो गए। इसके बाद सरकारी दवा काम नहीं आयी।

सीतापुर के विकास खंड सकरन स्थित मजलिसपुर गांव में छप्पर डालकर रहने वाले भूमिहीन मजदूर राकेश की बेटी अगराशी के सरकारी पूर्व माध्यमिक स्कूल में पढ़ती थी। घटना 10 अक्टूबर की है जब वह स्कूल से लौटी। घर में सिर्फ एक रोटी रखी थी। रोहिणी को तेज़ भूख लगी थी। उसने छोटे भाई से कहा कि आधी आधी रोटी खा लेते हैं। भाई ने बात नहीं मानी। उसके छोटे भाई ने पूरी रोटी खा ली।

पेट की आग बुझाने का कोई और रास्ता नहीं दिखा तो रोहिणी ने मिट्टी का तेल डालकर खुद को आग लगा ली। उस वक्त उसकी मां अपनी जेठानी के घर गयी हुई थी। आनन फानन में लोग जल चुकी बच्ची को लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए। वहां से उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया।

जाली के भीतर रोहिणी और उसके माता पिता, अस्पताल से घर वापस लाने के बाद की तस्वीर

जिला अस्पताल में उसे भर्ती तो किया गया, लेकिन बाद में माता−पिता उसे लेकर घर आ गए क्योंकि उनके पास दवाइयों के पैसे नहीं थे। दूसरे, बच्ची के साथ अस्पताल में रहने पर मजदूरी छूट रही थी जिसके चलते दूसरे बच्चों को भी भूखा रहना पड़ रहा था।

बच्ची को वापस लाए जाने के बाद एक स्थानीय यूट्यूब चैनल ने रोहिणी, उसकी मां और पड़ोसी से बात की थी जिसमें यह सामने आया कि सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने दवा बाहर से खरीद कर लाने को लिखा था। रोहिणी की मां कहती हैं कि पैसे नहीं थे, इसलिए बेटी को वापस ले आए।

सीतापुर के दैनिक हिंदुस्तान में इसकी ख़बर छपने के बाद प्रशासन हरकत में आया। एसडीएम लहरपुर ने रोहिणी को इलाज के लिए दोबारा जिला अस्पताल भिजवाया। प्रशासन की ओर से कुछ राशन भी राकेश के घर पहुंच गया था, राकेश ने इसकी पुष्टि की।

इस बीच कांग्रेस के स्थानीय नेता आशीष गुप्ता भी राकेश के घर पहुंचे थे। इसके अलावा और किसी नेता या प्रशासन के नुमाइंदे के वहां जाने की ख़बर नहीं मिली।

राशन और कामधाम के बारे में पूछने पर मीडियाविजिल को राकेश ने फोन पर बताया, “अबहीं त राशन है, एक लरिका हमरे संगे है अस्पताल में। काम धाम कुछ नाही है साहेब। अब का होई, पता नाही।”

दिवाली पर अयोध्या में सरकार बहादुर ने साढ़े पांच लाख दीये जलाकर गिनीज़ बुक में दर्ज अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया। उधर भुखमरी पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ रही है। 2015 से 2018 के बीच उत्तर प्रदेश में भूख से 16 मौतें दर्ज की गयी थीं। पिछले साल कुशीनगर में भुखमरी से मौत के मामले सामने आए थे। अब यह ट्रेंड बदल रहा है। लोग भुखमरी के कारण खुदकुशी पर आमादा हो गए हैं।

उत्तर प्रदेश में भूख के कारण खुदकुशी का इस साल सामने आया यह दूसरा मामला है। इसके पहले कासगंज के बिलग्राम में एक आदमी भुखमरी के कगार पर पहुंचने के बाद फांसी से लटक गया था। वह खबर स्थानीय मीडिया में भी नहीं चली थी।

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मीडियाविजिल ने उसे अकेले कवर किया था, जिसके बाद मामला मानवाधिकार जन निगरानी समिति के माध्यम से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंच सका और परिवार को सरकारी मदद मिली।

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सीतापुर में अब तक सरकारी इमदाद नहीं पहुंची है। रोहिणी की लाश मुर्दाघर में पड़ी है। बाप राकेश बेहाल है। अपने बाकी दोनों बच्चों को भूख से बचाने का उसके पास विकल्प नहीं है। हाल में लड़कियों के सशक्तीकरण के लिए एक योजना शुरू करने वाले यूपी के मुख्यमंत्री एक दीया रोहिणी के नाम का जलाएंगे? क्या उसके घर जाकर यह सुनिश्चित करेंगे कि भूख से अपनी देह को आग में झोंकने का मामला अब कहीं भी दुहराया न जाए?


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