मीना भाभी: तुम सा मिला न कोय!

डॉ. पंकज श्रीवास्तव डॉ. पंकज श्रीवास्तव
संस्मरण Published On :


बड़े शौक़ से सुन रहा था ज़माना

हमीं सो गये दास्ताँ कहते-कहते…

पिछले दिनों समकालीन जनमत में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुए मीना राय के आत्मकथात्मक संस्मरण ‘समर न जीते कोय’ ने हर पढ़ने वाले के दिल में खास जगह बनायी थी। यह एक महिला के संघर्ष और संकल्प की अद्भुत दास्तान थी। हौसला देने वाली दास्तान। लेकिन 21नवंबर की सुबह इस अनोखे दास्तानगो ने मंच ही नहीं, दुनिया को भी अलविदा कह दिया।

मीना राय यानी समकालीन जनमत की प्रबंध संपादक और सीपीआईएमएल के वरिष्ठ नेता कॉमरेड रामजी राय की जीवनसाथी। समता और अंकुर की माँ और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ रहे या पढ़कर निकल चुके सैकड़ों लोगों की प्यारी मीना भाभी।

21 नवंबर को नोएडा में ही था। सुबह मोबाइल पर दीपू राय का नाम चमका तो कुछ अस्वाभाविक तो लगा लेकिन ऐसी अनहोनी की आशंका नहीं थी। दीपू ने अचानक जैसे बम फोड़ते हुए बताया कि मीना बुआ नहीं रहीं। इस ख़बर पर यक़ीन करना मुश्किल था। पता चला कि उन्हें अचानक ब्रेन हैमरेज हुआ और बचाने की तमाम कोशिशें नाकाम हो गयीं। इस ख़बर ने दिमाग़ को सुन्न कर दिया था। काफ़ी देर बाद के.के.पांडेय को फोन किया जो बुरी तरह बिलख रहे थे। रामजी भाई, समता और अंकुर का नंबर डायल करने की हिम्मत नहीं पड़ी।

22 नवंबर की सुबह हम  267, पुराना कटरा, इलाहाबाद के उसी मकान के सामने खड़े थे जो पूरे छात्रजीवन में हमारा स्थायी पता था। चालीस साल में पहली बार इस मकान के सामने एक शामियाना तना देख रहा था। सफ़ेद रंग का ये शामियाना, एक आशियाने के अचानक उजड़ जाने की मुनादी कर रहा था। वाक़ई इस घर का नूर चला गया था, और इसका ग़म पूरे मुहल्ले ही नहीं, इलाहाबाद के हर उस शख्स के दिल में पसरा था जो एक बेहतर दुनिया की लड़ाई से किसी न किसी रूप से जुड़ा रहा है।

मीना भाभी का अंतिम विदाई देने दूर-दूर से लोग जुटे थे। सबके पास उनसे जुड़ा किस्सा था जिसमें उनकी हिम्मत, मेहनत और चुनौतियों से पार पाने की उनकी जिजीविषा दर्ज थी। मीना भाभी कुछ समय पहले ही रिटायर हुई थीं और पता चला था कि समकालीन जनमत के प्रकाशन में पूरी तरह जुट गयी थीं। हर सभा-समारोह में किताबों के स्टॉल पर उनका मुस्कराता हुआ चेहरा नज़रा आता था। जिस स्कूल में उन्होंने पढ़ाने की शुरुआत की थी वहीं से प्रधानाध्यापिका होकर रिटायर हुई थीं। अब आराम का समय था, लेकिन उनकी योजनाओं में फिलहाल इसके लिए कोई जगह नहीं थी।

कटरा से फूलों से सजी मोटर पर जब लाल सलाम के नारों के साथ मीना भाभी की अंतिम यात्रा शुरु हुई तो बीते लगभग चार दशक पहले का मंजर आँखों के सामने घूम रहा था। यह शवयात्रा विश्विद्यालय छात्रसंघ भवन के सामने से होते हुए स्वराज भवन के सामने 171, कर्नल गंज यानी आइसा और सीपीआईएमएल के दफ्तर पहुँची थी। हमारा पूरा छात्रजीवन इन्हीं तीन पड़ावों के बीच झूलता रहा था। मीना भाभी एक अनिवार्य उपस्थिति की तरह हर जगह मौजूद थीं।

ठीक से याद नहीं, लेकिन शायद 1985 की बात है जब मीना भाभी को गरमी की एक दोपहर इलाहाबाद कचहरी के पास पहली बार देखा था। वे स्कूल से पढ़ाकर वापस आ रही थीं। उनकी साइकिल पर पीछे समता और आगे डलिया में अंकुर बैठे थे। किसी साथी ने परिचय कराया था रामजी राय की पत्नी के रूप में। पहली ही मुलाकात में मन उनके प्रति सम्मान से भर उठा था जो समय के साथ बढ़ता ही गया। वे प्रगतिशील छात्र संगठन (पीएसओ) की चमक के दिन थे जो आगे चलकर आइसा बना। यह संगठन सीपीआईएम से जुड़ा था जो तब एक भूमिगत पार्टी थी। खुले फ्रंट के रूप में इंडियन पीपुल्स फ्रंट बन चुका था और देश भर के जनवादी और प्रगतिशील लोगों को आकर्षित कर रहा था।

विश्वविद्यालय जाने के कुछ दिन बाद ही हम इस संगठन और इसकी सांस्कृतिक इकाई ‘दस्ता’ से जुड़ गये थे। रामजी राय पीएसओ और दस्ता के संस्थापकों में थे। अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक अभिरुचि और समझदारी की वजह से वे अलग ही आकर्षण का केंद्र थे। स्वाभाविक था कि हम लोग उन्हें घेरे रहते थे। पता ही नहीं चला कि कब उनका घर हम लोगों का अड्डा बन गया। किसी परिवार के लिए घर का यूँ सार्वजनिक स्थान जैसा बन जाने से जो दिक्कतें हो सकती हैं, वे सब होती थीं, लेकिन मीना भाभी ने शायद ही कभी उफ की हो। पार्टी और आंदोलन से जुड़े लोग उनके परिवार की तरह थे जिनके लिए घर के दरवाज़े हमेशा खुले रहते थे। मध्यवर्गीय जीवन के बीच ऐसे दृश्य अब असंभव लगते हैं।

वैसे तो इलाहाबाद में पार्टी के कई और नेता भी थे, लेकिन उनके घरों में औपचारिकताओं के दायरे में ही बैठा जा सकता था। जबकि मीना भाभी के घर बेहिचक जाया जा सकता था। यह घर विश्वविद्यालय से इतर भी एक पाठशाला की तरह थी जिसने पीढ़ियों को दीक्षित किया। इन दिनों इलाहाबाद के सीएमपी कालेज में पढ़ा रहे पूर्व आइसा नेता प्रेमशंकर ने मीना भाभी की तुलना ठीक ही गोर्की के उपन्यास में आयी माँ से की है। मीना भाभी शादी के बाद गाँव से निकलकर इलाहाबाद आयीं थीं। वे होलटाइमर पति के लिए ‘घर’ बनाने और परिवार सम्हालने में ही नहीं जुटीं, खुद भी आंदोलन का हिस्सा बनकर आगे बढ़ती रहीं। नौकरी की व्यस्तताओं के बावजूद आइसा, आईपीएफ या सीपीआईएमल के राज्य या राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में जाने का रास्ता निकाल ही लेती थीं। स्टडी सर्किल, जुलूस, सेमिनार हर जगह मीना भाभी को देखा जा सकता था।

याद आता है कि बीए सेकेंड इयर में हमने घर छोड़ दिया था। रायबरेली में था जब खबर मिली कि दस्ता को चंडीगढ़ में एक नाट्य समारोह में शामिल होने जाना है। इसे प्रख्यात क्रांतिकारी नाटककर गुरुशरण सिंह आयोजित कर रहे थे। लेकिन जब पिता जी ने इजाज़त देने से इंकार कर दिया तो घर से अपना सारा सामान लेकर इलाहाबाद जाने वाली बस में बैठ गया था। अधकचरी समझ को यही लग रहा था कि सामंतवाद को तोड़ दिया है। माँ के पर्स में एक पता छोड़ आया था। वो पता मीना भाभी के घर का था। इसी पते के सहारे दूसरे दिन पिता इलाहाबाद पहुँच गये थे। उन्हें आता देख हम एक तख्त के नीचे छिप गये थे और बाद मे बिना चूँ-चपड़ किये पिता के साथ वापस रायबरेली चले गये थे। इलाहाबाद लौटने पर इसे लेकर खूब हँसी-मज़ाक होता था। मीना भाभी भी खूब रस लेकर इस किस्से को सुनाती थीं।

इलाहाबाद में हम कई मोहल्लों मे रहे पर जो पता घर में छोड़कर आये थे धीरे-धीरे वही इलाहाबाद में डाक का हमारा स्थायी पता हो गया। विश्वविद्यालय से लेकर यूजीसी तक के हर दस्तावेज़ में यही दर्ज है। सांस्कृतिक इकाई के बाद आइसा के मोर्चे पर तैनाती हुई। संगठन ने छात्रसंघ का चुनाव भी लड़ाया। पर सारी सक्रियता के केंद्र में यह घर ही रहा जिसके केंद्र में मीना भाभी थीं। यह हमारे जैसे तमाम साथियों का शरण्य था जो उन धूप भरे दिन में छाँव देता था। यह घर से दूर एक घर था।

जुलाई 1991 में माँ की मृत्यु हुई तो उनके अवशेष लेकर परिवार के लोग इलाहाबाद पहुँचे थे। आइसा दफ्तर में भी थोड़ी देर रुके थे। मीना भाभी ने वहाँ जब गले से लगाकर सांत्वना दी तो लगा कि कोई माँ अपने बच्चे के आँसू पोछ रही है। उनके प्रति ये भाव हमेशा बना रहा। यह बात उनसे मिलने पर अभिवादन को लेकर उलझन मे दिखती थी। के.के.पांडेय कई बार मज़ाक करते थे कि ‘सोचते क्या हो, पैर छू लो!‘ और हम छू लेते थे जबकि कॉमरेडों के बीच ऐसा कोई रिवाज नही था।

आमतौर पर माना जाता है कि इस तरह के आंदोलन में निजी रिश्तों की कोई गुंजाइश नहीं होती। जब तक आप साथ हैं तभी तक हैं। लेकिन इस घर से जुड़ा अनुभव अलग रहा है। यहाँ से जुड़े लोग न जाने कहाँ-कहाँ हैं। लेकिन विश्वविद्यालय छोड़ने के दशकों बाद भी उनका इस घर से एक जीवंत रिश्ता बना रहा।

22 नवंबर को उनसे आखिरी मुलाकात करने जब पहुँचा तो घर के अंदर उनकी अर्थी तैयार हो रही थी। उनके चेहरे की ओर देखा तो रहा नहीं गया। एक बार फिर उनके पैरों में सिर नवा दिया। लगा जैसे दूसरी बार अपनी माँ को अंतिम विदाई दे रहा हूँ।

 

यह संस्मरण जनचौक में छप चुका है।