बनारस में मतदान चालू है। गर्मी बहुत है। अभी धीमी गति के समाचार की तरह मतदान हो रहा है। दिन के 11 बजे तक बमुश्किल 11 फीसदी मतदान रिकॉर्ड किया गया है। भाजपा के प्रत्याशी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने कांग्रेसी अजय राय और गठबंधन प्रत्याशी शालिनी यादव की चुनौती है। भारत प्रभात पार्टी से लेखक अमरेश मिश्र सहित दो दर्जन और उम्मीदवार किस्मत आज़मा रहे हैं। इन सब से अलग एक और प्रत्याशी यहां ख़ड़ा है जो अदृश्य है। दिखाई नहीं देता, लेकिन मार ज़ोर की करता है। उसका नाम है उपर्युक्त में से कोई नहीं यानी नोटा।
बनारस में इस बार नोटा का अंडरकरेंट है। मोदी की जीत यहां तय मानी जा रही है लेकिन नोटा में उछाल की अच्छी-खासी संभावना है। पिछली बार बनारस में केवल 2000 लोगों ने नोटा का बटन दबाया था। इस बार यहां नोटा संघ बना है। नोटा के समर्थन में बाकायदे अभियान चलाया गया है। अभियान चलाने वाले और कोई नहीं, खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के पुराने नेता हैं जो मोदी से फिरंट हो चुके हैं।
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने रामराज्य परिषद से अपने उम्मीदवारों को परचा भरवाया था जो निरस्त कर दिया गया। उसके बाद उन्होंने नोटा का अभियान छेड़ा। इसके समानांतर भाजपा के कुछ पुराने नेताओं ने भी नोटा का प्रचार करना शुरू किया। संघ के चार दशक पुराने एक कार्यकर्ता कृष्ण कुमार शर्मा ने बताया, ‘’कम से कम दो लाख नोटा गिरवाने का लक्ष्य है।‘’
दो लाख नोटा अकल्पनीय बात है लेकिन नामुमकिन नहीं। दरअसल, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर निर्माण का मुद्दा चुनाव में उस तरह से खड़ा नहीं हो सका है जैसा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सोचा था। उनके प्रत्याशी श्री भगवान अगर खड़े होते तो इसी मसले पर वे चुनाव लड़ते लेकिन उनका परचा खारिज किए जाने के बाद नोटा के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता था।
शर्मा कहते हैं, ‘’मोदीजी ने तो मंदिर और घर तुड़वाए। बाकी लोगों ने क्या किया? क्या कभी कांग्रेस और सपा-बसपा ने इस मसले पर अपनी आवाज़ उठायी?’’
उनके मुताबिक बनारस में नोटा का अपना सांकेतिक महत्व है और नोटा पर वही लोग बटन दबाएंगे जिन्होंने पिछली बार मोदी को वोट दिया था। ‘’मोदीजी की जीत का मार्जिन जितना कम होगा और नोटा जितना ज्यादा होगा उतना तगड़ा संदेश जाएगा कि बनारस के लोगों ने अपने सांसद को नकार दिया। इस बहाने देश में एक चर्चा शुरू होगी।‘’
ध्यान देने की बात ये है कि नोटा पर वोट देने की बात ज्यादातर वे लोग कर रहे हैं जो भाजपा के परंपरागत वोटर रहे हैं। इनमें सबसे अव्वल आरएसएस के लोग हैं, उसके बाद खुद भाजपा के पुराने पदाधिकारी और नेता, फिर कुछ व्यवसायी और दुकानदार हैं जिन्हें जीएसटी से काफी नुकसान हुआ है। भाजपा विरोधी जो वोट हैं वे स्पष्ट रूप से कांग्रेस के अजय राय के पक्ष में गोलबंद हो गए हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या मुसलमानों की है।
अभी कुछ दिन पहले ऑटो रिक्शा वेलफेयर असोसिएशन के लोगों ने मोमबत्ती की लौ पर हाथ रखकर शपथ ली थी कि बनारस के डेढ़ लाख ऑटो और रिक्शा चालक नोटा का प्रयोग करेंगे। उनकी शिकायत है कि उनके पक्ष में किसी ने आवाज़ नहीं उठायी।
चार दिन पहले चंदौली में कायस्थ बुद्धिजीवी समाज के आह्वान पर कायस्थ बिरादरी के लोगों ने मतदान का बहिष्कार करने की घोषणा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में की थी। उनकी शिकायत थी कि उनके समाज से आने वाले पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की उपेक्षा की गई है।
सतह के नीचे चल रही इन हलचलों को अगर वाकई जनता ने गंभीरता से लिया तो कोई दो राय नहीं कि पिछली बार के मुकाबले इस बार के आम चुनाव में बनारस में नोटा बटन दबाने वालों की संख्या में कम से कम दस गुना वृद्धि होगी।
नोटा को लेकर जो अभियान चलाया गया है उससे भाजपा पर्याप्त सचेत है। बीते 15 मई को हुए प्रियंका गांधी के रोड शो के अस्सी चौराहे से गुज़रने के ठीक बाद भाजपा की टोपी और मफलर लगाए कुछ नौजवानों ने ठीक चौराहे पर एक खाली बैनर टांग दिया और लोगों से उस पर दस्तखत करने का आह्वान करने लगे।
पूछे जाने पर एक युवक ने बताया, ‘’हम लोग इस बात का दस्तखत करवा रहे हैं कि लोग वोट के अपने अधिकार का प्रयोग करेंगे।‘’ यह पूछने पर कि वे तो भाजपा के कार्यकर्ता हैं, तो क्या यह दस्तखत अभियान भाजपा के वोटरों के लिए है, वे मुस्कराने लगे।
शहर में पिछले हफ्ते कई मतदाता जागरूकता अभियान चलाए गए हैं। ऐसा अभियान चलाने वाले या तो भाजपा के लोग रहे या कांग्रेस के। नोटा के पक्ष में अभियान चलाने वाले चूंकि भाजपा के वोटर हैं, इसलिए माना जा रहा है कि शहर में अगर 20,000 लोगों ने भी नोटा का बटन दबाया तो मोदी की जीत के मार्जिन में इतनी कमी तो आ ही जाएगी।