सरकारी मनमानियों पर चुप रहने और नागरिकों को परेशान करने वालों पर कल देशद्रोह का मुकदमा चला तो?

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
ओप-एड Published On :


परसेप्शन बनाने के खेल में खबरों का हाल देखिये 

 ऐसे युवा सवाल पूछने से ही नहीं, सवाल पूछे जाने से भी डरेंगे 

 

टाइम्स ऑफ इंडिया में आज पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में एक खबर है, अदालती कार्यवाही को रिकार्ड करने की आरोपी लॉ इंटर्न को जमानत। अंग्रेजी में जो शीर्षक है उसका अनुवाद करते हुए मैंने लिखा था, अदालती कार्यवाही का वीडियो बनाने वाली लॉ इंटर्न को जमानत। बाद में देखा कि अंग्रेजी में कुछ और था सो उस अनुसार सुधार दिया क्योंकि अनुवाद में इतनी आजादी नहीं ली जा सकती है। लेकिन अगर मैं खबर लिख रहा होता या इस खबर को पढ़कर भी मुझे यही लग रहा है कि 23 साल की लॉ इंटर्न वीडियो बना रही होगी, कार्यवाही को रिकार्ड नहीं कर रही होगी। आप कहेंगे कि दोनों एक ही बात है लेकिन कानून के नजरिए ये अलग है और मैं चाहता हूं कि कानून का पालन करने वाले ऐसे मालमे को उसी नजरिए से देखें जैसे देखा जाना चाहिए हर किसी को फंसाने की मंशा नहीं होनी चाहिए। लेकिन देश में आज हो क्या रहा है। आइए, कुछ उदाहरण देखते हैं।  

इस संबंध में कल (22 मार्च 2023 को) रामनाथ गोयनका पत्रकारिता समारोह के मुख्य अतिथि, मुख्य न्यायाधीश  न्यायमूर्ति धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ थे। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए इंडियन एक्सप्रेस के राज कमल झा ने आज की स्थिति का उल्लेख इन शब्दों में किया, “… जब एक रिपोर्टर को उस कानून के तहत गिरफ्तार किया जाता है जो आतंकवादियों के लिए है, जब दूसरे को सवाल पूछने के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता है, जब विश्वविद्यालय के शिक्षक को कार्टून साझा करने के लिए उठा लिया जाता है, कॉलेज छात्र को कुछ बोलने के लिए, फिल्म अभिनेता को टिप्पणी करने के लिए और जब किसी खबर का खंडन पुलिस की एफआईआर के रूप में आता है तो हम नॉर्थस्टार की ओर देखते हैं उसके मार्गदर्शक प्रकाश के लिए …. “। कहने की जरूरत नहीं है कि मकसद परेशान करना न हो, पुलिस को मनमानी की छूट न हो तो किसी पत्रकार को यूएपीए में बंद करने की जरूरत ही नहीं है। 

कायदे से तो ऐसा होगा नहीं कि यूएपीए का कोई अभियुक्त या अपराधी रिपोर्टिंग पर निकले तभी उसके प्रतिबंधित संगठनों से संपर्क का पता चले (ऐसा होता है तो एजेंसियों का निकम्मापन है जिसके लिए कोई कार्रवाई नहीं होती)। और अगर पता चलता है तो उसे अपना काम करने की छूट देते हुए उस पर नजर रखा जा सकता है न कि उसे बंद कर दिया जाए और ऐसी व्यवस्था कर दी जाये कि दो साल जेल में रखने के बाद, जमानत होने पर वह छूट न पाए। नागरिकों की आजादी सुनश्चित करना सरकार का काम है उसे जेल में बंद करना नहीं। बंद करना अपवाद होना चाहिए जबकि आजाद रहना अपवाद हो गया है। उसी तरह कार्टून शेयर करने अपने विचार रखने के लिए या टूल किट साझा करने के लिए भी गिरफ्तार करने और फिर छूट जाने देने का कोई मतलब नहीं है। किसी के अपराधी होने के शक में उसे गिरफ्तार करके बाद में छोड़ने से अच्छा है कि सबूत इकट्ठा करके तब पकड़ा जाए जब उसे सजा हो सके। 

अभी जो हो रहा है उसका असर आज के युवाओं पर पड़ेगा जो हमारे भविष्य हैं और हम डरे हुए लोगों का देश बना रहे हैं। यह ऐसे लोगों का देश बनता लग रहा है जो सवाल पूछने से ही नहीं, सवाल पूछे जाने से भी डरेंगे। मुझे लगता है कि ऐसी स्थिति बनाने वाले, इसे संरक्षण देने वाले, इसका विरोध नहीं करने वाले और इसे आम जनता के सामने न लाने वाले–भिन्न पेश के लोग अगर अपना काम नहीं कर रहे हैं तो सब के सब देश के दुश्मन हैं। अभी तक स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल लोगों को पेंशन मिलती रही है। बिहार में जो लोग जयप्रकाश आंदोलन में शामिल थे उन्हें भी सरकार सम्मान राशि देती है। तो क्या यह संभव नहीं है कि इस समय की सरकार जो नागरिकों को डरा रही है, बिला वजह परेशान कर रही है, लोगों को अपना काम नहीं करने दे रही है उसके जाने के बाद जो सरकार आए वह इसका सहयोग करने वालों या अपना काम न करने वालों के खिलाफ कार्रवाई न करे। 

अभी तक नेताओं में मिलीभगत होती थी और वे एक दूसरे के खिलाफ नहीं होते थे। नरेन्द्र मोदी ने हर किसी को देशद्रोही बनाने की जो नई शुरुआत की है उसमें मुझे ताज्जुब नहीं होगा कि इनके बाद वाली सरकार अभी के देशद्रोहियों की पहचान कर सजा देने लगे। जहां तक आज की खबर का सवाल है, बिना पढ़े मैं यह समझ सकता हूं (या मान रहा हूं) कि लड़की लॉ इंटर्न है तो अदालत में मौजूद होगी, कोई गवाही या जिरह या जज साब की टिप्पणी उसे दिलचस्प लगी होगी और उसने फोन से रिकार्ड कर लिया होगा या रिकार्ड करना शुरू कर दिया होगा। यह कम दिलचस्प है कि स्नातक होने के बावजूद उसे इस महत्वपूर्ण कानून की जानकारी नहीं थी। वेसे इसमें अब सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का रिकार्ड सार्वजनिक होने से भी भ्रम हुआ हो सकता है। 

बेशक यह अपराध है लेकिन अपराध तब होता जब वह साजिशन तैयारी के साथ छिपकर रिकार्ड कर रही होती। हालांकि तब भी बगैर पुष्टि के उसपर इस तरह कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी। उसका अपराध डांटकर, समझा कर छोड़ दिए जाने लायक था। क्योंकि उसका इरादा या मकसद आपराधिक नहीं था। उसने अनजाने में एक गलती की जो अपराध है। हत्या और हत्या की कोशिश दो अलग मामले हैं भले हत्यारे को पता नहीं होता या कोई तरीका नहीं है कि उसकी कोशिश कामयाब होगी। इसी तरह आत्महत्या की कोशिश असफल हो तभी सजा दी जा सकती है, सफल होने पर कानून अपराधी का कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। मैं मोटा-मोटी यह बात कह रहा हूं, मरने के बाद बीमा या पेंशन के लाभ नहीं मिलें तो वह तकनीकी मामला है। 

खबर है कि अदालत की कार्यवाही को कथित रूप से रिकार्ड करने के लिए उसे परेशान किया गया और बाद में प्रतिबंधित पीएफआई की सदस्य होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। यह आरोप लगाते हुए कि वह इंदौर में मौजूद ‘सांप्रदायिक उन्माद’ के कारण जमानत की अर्जी नहीं दे पा रही थी और चूंकि स्थानीय बार उसका बहिष्कार कर रहा था, उसने अपनी महिला अधिवक्ता के साथ जमानत के लिए शीर्ष अदालत का रुख किया। दिलचस्प यह है कि अदालत में सरकार की ओर से उनके इस आरोप का खंडन किया गया और मुद्दा सांप्रदायिक तनाव, सुनवाई न होने, वकील न मिलने जैसा बन गया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी अपने नजरिये में यही कहा है कि किसी को भी कानूनी सहायता मिलनी चाहिए और सुप्रीम कोर्ट ने राहत दी यह सही है। पर मेरा मामला दूसरा है – मेरा कहना है कि यह मामला दर्ज करने और गिरफ्तारी का डर दिखाने का मामला ही नहीं है। डांट कर, चेतावनी देकर छोड़ दिया जाना चाहिए था। 

मैं नहीं जानता अदालत में ऐसी व्यवस्था है कि नहीं पर यह स्थिति आनी ही नहीं चाहिए कि किसी लॉ इंटर्न को कैरियर की शुरुआत में ही कानून का डर हो जाए या उसमें डर बैठा दिया जाए। दूसरी ओर, इन दिनों जब शेल कंपनी के जरिए विदेशी या काला पैसा अदानी की कंपनी में निवेश करने और मनी लांडरिंग के मामलों की जांच नहीं हो रही है। मांग करने के बावजूद मामले को टालने के लिए भिन्न उपाय किए जा रहे हैं तब विदेशी चंदा लेने के मामलों की जांच की जा रही है क्योंकि इनमें आकाश पटेल, हर्ष मंदर और राणा अयूब जैसे लोगों को फंसाया जा सकता है। जबकि इसमें कोई अपराध नहीं है – सरकारी नियमों की अवमानना या उनके पालन में  चूक का मामला है और इन पैसों से ये लोग समाज सेवा ही करते हैं उनका अपना स्वार्थ नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों बहुत अलग किस्म के अपराध हैं। कार्रवाई किसमें ज्यादा जरूरी है यह बताने की जरूरत नहीं है और यह भी नहीं कि सरकार अभियान क्या चला रही थी। 

जाहिर है कि सरकार की प्राथमिकत बिल्कुल अलग नजर आ रही है। हालांकि, सरकार जब मनीष सिसोदिया पर भ्रष्ट होने और शराब नीति बदलकर पैसे कमाने के आरोप लगा रही तो क्या यह संभावना नहीं है कि मनीष ने पैसे विदेश में लिए हों और अदानी की कंपनी में लगा दिए गए हों। ऐसा केंद्र सरकार का मंत्री भी कर सकता है और अदानी मामले की जांच नहीं होने का कारण यह भी माना जा रहा है लेकिन मनीष के खिलाफ सबूत ढूंढ़ने के लिए अदानी समूह की भी जांच होनी चाहिए। पर वह नहीं होगा क्योंकि सरकार के ललिए मनीष को फंसाने से ज्यादा जरूरी है अदानी को बचाना। मनीष तो वैसे भी जेल में हैं और अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि सत्येन्द्र जैन के मामले में जज जमानत देने को तैयार हो तो बदल दिया गया है। जेल के वीडियो लीक कर बदनाम करने के मामले तो रहे ही हैं। 

ऐसे में चिन्ताजनक यह भी है कि टाइम्स ऑफ इंडिया की यह खबर आज दूसरे अखबारों में प्रमुखता से नहीं है और किसी ने इसे जनहित के मामले में यह जबरन अभियुक्त बना दी गई लॉ इंटर्न के अभिभावकों के नजरिये से प्रस्तुत नहीं किया है। आज जो खबरें हैं उनमें द हिन्दू का लीड मुझे सबसे अटपटा लगा। शीर्षक है, कोविड-19 महामारी अभी खत्म नहीं हुई है, प्रधानमंत्री ने चेताया। मेरा मानना है कि कोविड जब शिखर पर था, कोई व्यवस्था नहीं थी, लोग मर रहे थे, तो सरकार समर्थक कहते थे – टीबी, पोलियो खत्म नहीं हुआ। कोविड कैसे खत्म हो जाएगा। और महामारी है तो सरकार क्या करे, या कर तो रही है। अब जब कोविड ना उस तेजी से फैल रहा है, ना परेशान कर रहा है और ना लोग मर रहे हैं, सबसे बड़ी बात लोग मरने के लिए तैयार भी हो चुके हैं। मरना सीख गए हैं। जो बीमा करवा सकते थे करवा चुके हैं, टीका लगवा चुके हैं। तो अब चेतावनी किस काम की? 

राहुल गांधी ने जब चेतावनी दी थी, संभल जाने के लिए कहा था, तो पप्पू है। अब तो देशद्रोही भी! इसे कहते हैं, खेल प्रचारकों का। अलग चाल चरित्र वालों की ट्रोल सेना का कमाल। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर अधपन्ने पर सिंगल कॉलम में है। द टेलीग्राफ में भी लगभग नहीं है पर इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर दो कॉलम में प्रधानमंत्री की फोटो के साथ है। परसेप्शन बनाने की इन्हीं कोशिशों के तहत प्रधानमंत्री को अगर काम करते दिखाया जा रहा है तो यह नहीं बताया गया है (पहले पन्ने पर) कि दिल्ली शहर में कल अचानक ढेरों पोस्टर लग गए जिनपर लिखा था, मोदी हटाओ देश बचाओ। और सरकार इसे पहले की सरकारों की तरह नजरअंदाज करने या बर्दाश्त करने की जगह दिल्ली पुलिस से हटवा रही थी। वैसे ही जैसे कर्नाटक में 40 प्रतिशत वाले पोस्टर के मामले में हुआ था लेकिन अदानी के मामले में सरकार से पूछे जाने वाले सवालों की संख्या 100 से ज्यादा हो गई है और अखबारों ने नहीं के बराबर छापा है जबकि सरकार ने एक का भी जवाब नहीं दिया है। यह खबर द टेलीग्राफ में आज पहले पन्ने पर है। मेरे किसी और अखबार में नहीं है।    

अखबार ने लिखा है कि कांग्रेस ने अपने, “हम अडानी के हैं कौन” सीरिज में प्रधानमंत्री से 100 सवाल पूछ लिए हैं और भारत में किसी भी विवाद में 100 सवालों का आंकड़ा नहीं पहुंचा है। दूसरी ओर, कांग्रेस इस प्रचार से परेशान लगती है कि सुप्रीम कोर्ट कि विशेषज्ञ समिति की जांच के बावजूद  जेपीसी की जांच की मांग क्यों की जा रही है। कांग्रेस ने इसपर पहले भी स्पष्टीकरण दिया था। द टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार इसमें कहा गया था कि अमित शाह ने 17 मार्च 2023 को एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि अडानी समूह से संबंधित किसी भी गलत काम के सबूत के साथ कोई भी इसे शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र है। यह समिति 2 मार्च को बनाई गई थी।

कांग्रेस संचार प्रमुख जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री से पूछा है: “आपके करीबी राजनीतिक सहयोगी और गृह मंत्री भारत के लोगों को गुमराह क्यों कर रहे हैं? विशेषज्ञ समिति के काम की सीमा और दायरे को गलत तरीके से पेश करके, क्या आप दोनों इसे ढंकने का आधार तैयार कर रहे हैं?” जयराम रमेश ने आगे कहा: “विशेषज्ञ समिति के दायरे में आपके (प्रधानमंत्री) खिलाफ मुख्य आरोप शामिल नहीं है: कि आपने किसी भी कीमत पर अपने करीबी और फाइनेंसर गौतम अडानी को अमीर बनाने की कोशिश की है; आपने नियामकों और जांच एजेंसियों पर अपने साथियों के घोर गलत काम पर आंख मूंदने के लिए दबाव डाला है।” इन कामों में शेल कंपनियों के माध्यम से मनी-लॉन्ड्रिंग और चीनी नागरिकों के साथ संदिग्ध संबंध, अन्य बातों के अलावा, चीन और पाकिस्तान-संबद्ध उत्तर कोरिया के साथ अवैध व्यापार आदि शामिल हैं।

 

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।