नहीं रहे मंगलेश जी…….. !

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2020 का क़हर जारी है। आधुनिक हिंदी कविता के श्रेष्ठ कवियों में शुमार और वरिष्ठ पत्रकार मंगलेश डबराल का आज शाम दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। दुनिया पर क़हर बनकर टूटे कोरोना ने हिंदी कविता के आकाश को सूना कर दिया। मंगलेश डबराल को साहित्य अकादमी सम्मान भी मिला था।

कुछ दिन पहले कोरोना से संक्रमित पाये जाने के बाद उन्हें गाज़ियाबाद के वसुंधरा स्थित एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ। तीन दिन पहले उन्हें एम्स में शिफ़्ट किया गया लेकिन शायद स्थिति तब तक काफ़ी बिगड़ चुकी थी। उनकी किडनी भी प्रभावित हो गयी थी और आज शाम पाँच बजे के करीब उन्हें डायलसिस के लिए ले जाया गया जिस दौरान उन्हें दो बार दिल का दौरा पड़ा। क़रीब 7 बजकर 20 मिनट पर उन्होंने अंतिम साँस ली।

मंगलेश डबराल का जन्म 14 मई 1948 को टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड के काफलपानी गांव में हुआ था। उन्होंने पत्रकारिता में लंबी पारी खेली। इलाहाबाद में अमृत प्रभात और दिल्ली में जनसत्ता को उन्होंने अपने रहते साहित्य और विचार का ज़रूरी अख़बार बनाया था। वे कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं से भी जुड़े रहे।

मंगलेश डबराल के पाँच काव्य संग्रह प्रकाशित हैं- ‘पहाड़ पर लालटेन’, ‘घर का रास्ता’, ‘हम जो देखते हैं’, ‘आवाज भी एक जगह है’ और ‘नये युग में शत्रु’, इसके अतिरिक्त इनके दो गद्य संग्रह ‘लेखक की रोटी’ और ‘कवि का अकेलापन’ के साथ ही एक यात्रावृत्त ‘एक बार आयोवा’ भी प्रकाशित हो चुके हैं। वे प्रसिद्ध अनुवादक भी थे। हाल ही में आये अरुंधति रॉय के उपन्यास ‘मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैपीनेस’ का ‘अपार ख़ुशी का घराना’ शीर्षक से उनका अनुवाद बहुत चर्चित हुआ। वे अपनी पारदर्शी भाषा और संवेदना की गहनता के लिए ख़ासतौर पर पहचाने जाते
थे।

मंगलेश डबराल उन चुनिंंदा साहित्यकारों में थे जिन्होंने अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता को कभी नेपथ्य में नहीं रखा। वे प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के साथ ही नहीं जुड़े रहे, शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध चलने वाले हर संघर्ष में  सड़क पर उतरकर प्रतिवाद करना भी ज़रूरी समझते थे। क्रांतिकारी वामपंथी राजनीति का खुलकर समर्थन करने वाले मंगलेश जी जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी थे।

23 नवंबर को उन्होंने अपने बुखार को लेकर फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी थी। अद्भुत गद्य का यह नमूना पाठकों को दिया गया उनका अंतिम उपहार साबित हुआ-

बुखार की दुनिया भी बहुत अजीब है. वह यथार्थ से शुरू होती है और सीधे स्वप्न में चली जाती है. वह आपको इस तरह झपोडती है जैसे एक तीखी-तेज़ हवा आहिस्ते से पतझड़ में पेड़ के पत्तों को गिरा रही हो: वह पत्ते गिराती है और उनके गिरने का पता नहीं चलता. जब भी बुखार आता है, मैं अपने बचपन में चला जाता हूँ. हर बदलते मौसम के साथ बुखार भी बदलता था: बारिश है तो बुखार आ जाता था, धूप अपने साथ देह के बढे हुए तापमान को ले आती और जब बर्फ गिरती तो माँ के मुंह से यह ज़रूर निकलता, ‘अरे भाई, बर्फ गिरने लगी है , अब इसे ज़रूर बुखार आएगा.’ एक बार सर्दियों में मेरा बुखार इतना तेज़ हो गया कि पड़ोस की एक चाची ने कहा, ‘अरे च्छोरा, तेरा बदन तो इतना गर्म है कि मैं उस पर रोटी सेंक लूं!’ चाची को सुनकर लोग हंस देते और मेरा बुखार भी हल्का होने लगता. उधर, मेरे पिता मुझे अपनी बनायी बुखार की कारगर दवा ज्वरांकुश देते जिसका कडवापन लगभग असह्य था. वह गिलोय की गोली थी., लेकिन पता नहीं क्या-क्या पुट देकर इस तरह बनाई जाती थी कि और भी ज़हर बन जाती और बुखार उसके आगे टिक नहीं पाता था. एक बार गांव में बुखार लगभग महामारी की तरह फैलने लगा तो पिता ने मरीजों को ज्वरांकुश देकर ही उसे पराजित किया. अपनी ज्वरांकुश और हाजमा चूर्ण पर उन्हें बहुत नाज़ था जिसकी परंपरा मेरे दादाजी या उनसे भी पहले से चली आती थी. पिता कहते थे कि जडी-बूटियों को घोटते वक़्त असल चीज़ यह है कि उन्हें कौन सा पुट –दूध, शहद, घी, अदरक, पारा, चांदी , सोने का–दिया जाता है. उसके अनुसार उसकी तासीर और इस्तेमाल बदल जाते हैं. बहरहाल, जब मेरा बुखार उतरने लगता तो मुझे उसकी आहट सुनायी देती. वह सरसरा कर उतर रहा है, बहुत आहिस्ते, जैसे सांप अपनी केंचुल उतारता है. केंचुल उतंरने के बाद लगता शरीर बहुत हल्का हो गया है और आने वाले बुखारों को झेलने में समर्थ है. बुखार के बाद त्वचा में एक अजीब पतलापन आ जाता था और हाथ की शिराओं का नीला रंग उभर आता जिसे देर तक देखना अच्छा लगता.

मंगलेश जी मीडिया विजिल के साथ शुरू से जुड़े रहे। वे मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य भी थे। उनका प्यारभरा मार्गदर्शन यादों की वादियों में हमेशा ज़िंदा रहेगा।

मंगलेश जी को नमन। हार्दिक श्रद्धांजलि।