बीजेपी सरकार बनने के बाद उड़ीसा में बढ़ा उल्पसंख्यकों पर अत्याचार



अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विविधता के लिए मशङूर उड़ीसा हाल के वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं से जूझ रहा है। जून 2024 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार बनने के बाद से राज्य में सांप्रदायिक दंगे और मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ गई हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री मोहन चरण मजही ने विधानसभा में बताया कि जून 2024 से फरवरी 2026 तक राज्य में 54 सांप्रदायिक दंगे और 7 मॉब लिंचिंग की घटनाएं दर्ज की गई हैं। बांग्लाभाषी मुसलमानों को रोहिंग्या और बांग्लादेशी बताकर पीटने की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक़ बालासोर जिले में सबसे ज्यादा 24 दंगे हुए, जबकि खुरदा जिले में 16 हुए। इन घटनाओं में लगभग 300 लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन आधे से कम मामलों में ही चार्जशीट दाखिल की गई। विपक्षी दल इसे बीजेपी की पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार का नतीजा बता रहे हैं, जबकि सरकार का कहना है कि वे शांति बनाए रखने के लिए कदम उठा रही है। इ

बीजेपी सरकार बनने के बाद से ओडिशा में सांप्रदायिक घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि बालासोर, भद्रक, कटक और अन्य जिलों में दंगे हुए हैं। उदाहरण के लिए, कटक में दुर्गा पूजा विसर्जन के दौरान हिंसा भड़की, जिसमें विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के सदस्य शामिल थे। इससे तीन दिन का कर्फ्यू लगाना पड़ा और इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं।  इसी तरह, बालासोर में ईद पर पशु बलि के विरोध में दंगे हुए, जिसमें 10 लोग घायल हुए। कई घटनाओं में बंगाली भाषी मुसलमानों को निशाना बनाया गया, उन्हें बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर पीटा गया। मॉब लिंचिंग के मामलों में गौ तस्करी के शक में हमले हुए, जैसे कि शेख मकंदर की हत्या।  अधिकारियों का कहना है कि कुछ मामले रिपोर्ट नहीं होते, खासकर जब पीड़ित दिहाड़ी मजदूर होते हैं।

आँकड़े बताते हैं कि बीजेडी सरकार के दौरान ऐसी घटनाएं कम थीं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, 2021 में 10, 2023 में 44 (चुनाव पूर्व वर्ष), 2025 में 15, 2018 में 9 और 2019 में शून्य सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज हुईं।  बीजेपी सरकार के आने के बाद 20 महीनों में ही 54 दंगे हो चुके हैं। विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी की राजनीति हिंदुत्व की राजनीति के तहत सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है। 

एक्स प्लेटफॉर्म पर कई यूजर्स ने कहा कि नवीन पटनायक के शासन में ओडिशा शांत था, लेकिन बीजेपी के आने से हिंसा बढ़ी।  हालांकि, बीजेपी का कहना है कि वे शांति समितियां बना रही हैं, इंटेलिजेंस मजबूत कर रही हैं और दोषियों पर सख्त कार्रवाई कर रही हैं। मुख्यमंत्री मजही ने विधानसभा में कहा कि स्थानीय प्रशासन समुदायों के बीच समन्वय बढ़ा रहा है।  फिर भी, आलोचक कहते हैं कि बीजेपी की सत्ता में आने से दक्षिणपंथी संगठनों को बढ़ावा मिला है, जिससे हिंसा बढ़ी। ओडिशा में पहली बार बीजेपी की पूर्ण बहुमत सरकार है, और यह बदलाव सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने का एक कारक लगता है, क्योंकि पहले गठबंधन सरकारों में संतुलन था।

ओडिशा में धार्मिक हिंसा की जड़ें गहरी हैं, जो 1990 के दशक से शुरू हुईं, ख़ासतौर पर हिंदुत्व की राजनीतिक के उग्र होने के साथ। 2007-2008 में कंधमाल जिले में ईसाईयों पर बड़े पैमाने पर हमले हुए, जिसमें 100 लोग मारे गए, 20,000 घायल हुए और 50,000 विस्थापित।  यह हिंसा हिंदू नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद भड़की, हालांकि माओवादियों ने इसकी जिम्मेदारी ली थी। कंधमाल में कंधा आदिवासी और पाना दलितों के बीच तनाव था, जो धर्मांतरण के मुद्दे पर उभरा। 1999 में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों को जिंदा जला दिया गया।  इससे पहले 1986, 1994 और 2001 में भी दंगे हुए। ओडिशा पहला राज्य था जिसने 1967 में धर्मांतरण विरोधी कानून बनाया, जो ईसाई मिशनरियों के खिलाफ इस्तेमाल होता रहा।  हिंदूमुस्लिम दंगे भी हुए, जैसे 1964 में राउरकेला, कलकत्ता और जमशेदपुर में, जो व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता से जुड़े थे।  हाल के वर्षों में धार्मिक जुलूसों और सोशल मीडिया पोस्ट से हिंसा भड़की, जैसे 2023 में संबलपुर में।  ओडिशा की आबादी में आदिवासी और दलित बड़ी संख्या में हैं, और धर्मांतरण, गौ रक्षा जैसे मुद्दे तनाव पैदा करते हैं।

ये सच है कि नवीन पटनायक के 24 साल के शासन में ओडिशा अपेक्षाकृत शांत रहा। उन्होंने समावेशी राजनीति अपनाई, जिसमें मुसलमानों और ईसाईयों को शामिल किया। बीजेडी ने बंगाली प्रवासियों को बसने दिया, हालांकि बीजेपी इसे अवैध प्रवासन कहती है।  2008 की कंधमाल हिंसा के बाद बीजेडी ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ा, जिससे हिंसा पर अंकुश लगा। पटनायक ने शांति और सद्भाव पर जोर दिया, जैसे कि हाल में उन्होंने बीजेपी सरकार पर आरोप लगाया कि ओडिशा की पहचान शांति है, लेकिन अब हिंसा बढ़ रही है।  बीजेडी सरकार के दौरान एनसीआरबी डेटा से साफ है कि दंगे कम थे। उन्होंने पुलिस और प्रशासन को सख्त निर्देश दिए, जिससे ओडिशा कोजंगल राजसे बचाया। हालांकि, आलोचक कहते हैं कि बीजेडी ने हिंदुत्व संगठनों को पूरी तरह रोक नहीं पाया, लेकिन कुल मिलाकर उनकी नीति ने सद्भाव बनाए रखा।

ज़ाहिर है कि बीजेपी सरकार के आने से घटनाएं बढ़ी हैं। यह पूर्ण बहुमत वाली सरकार का नतीजा हो सकता है, जहां दक्षिणपंथी तत्वों को बढ़ावा मिला। सरकार को शांति समितियां, बेहतर इंटेलिजेंस और सख्त कानून लागू करने की जरूरत है। समाज को भी मिलकर सद्भाव बनाना चाहिए, क्योंकि हिंसा से कोई फायदा नहीं होता। लेकिन शायद यह बीजेपी की राजनीति को सुहाता नहीं है। ध्रुवीकरण ही उसकी राजनीतिक पूँजी है।


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