असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के आंतरिक पलायन पर देश में इतनी चुप्पी क्यों है

मोनू 28 मार्च की रात ही अपने किराये के मकान से निकला था सिविल लाइंस बस अड्डे की ओर जिससे उसे कोई बस या गाड़ी मिल सके और वह अपने गांव महोबा जा सके. पिछली 24 तारीख़ से जब टोटल लॉकडाउन किया गया तब से मोनू को उसका मकान मालिक लगातार कमरा ख़ाली करने का दबाव बना रहा था. मोनू इलाहाबाद में मजदूरी का काम करता है. दो साल पहले वह गांव से यहां आया था ताकि वह कुछ पैसे कमा सके जिससे उसका परिवार चल सके. लेकिन पिछले दस दिनों से उसे न कोई काम मिला है और न ही पैसे.

उसकी रोज़ की जद्दोजहद यही रहती थी कि कैसे वह अपने गांव पहुंच सके. यहां न तो उसके खाने का इंतज़ाम है और न ही रहने का. पिछले दो दिनों से लगातार बस अड्डे पर पड़े रहने और कोई इंतज़ाम न होने से निराश होकर मोनू पैदल ही अपने गांव की ओर निकल पड़ा. ये कहानी सिर्फ़ मोनू की नहीं है पूरे देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अपने घर गांव से दूर बड़े शहरों में दो जून की रोटी कमाने के लिए मज़दूरी करने आते हैं. आज जब पूरे देश में कोरोना वायरस महामारी से बचाव के लिये लॉकडाउन किया गया है तो इन लोगों की ज़िंदगी पर भी लॉकडाउन लग गया है. लाखों लोग दिल्ली, मुम्बई और तमाम शहरों से पलायन को मजबूर हैं.

इलाहाबाद में कई ऐसे चौराहे हैं जहां रोज़ सुबह कई मज़दूर इकट्ठे होते हैं और रोज़ाना के मज़दूरी के कामों के लिए लोग यहां से आकर उन्हें मनमानी मज़दूरी पर ले जाते हैं. इन चौराहों को लेबर चौराहे के नाम से जाना जाता है. इन चौराहों पर रोज़ सुबह हज़ारों मज़दूरों की भीड़ लगती है और जैसा मंडियों में मोल-भाव होता है वैसे ही मज़दूरों के श्रम का मोलभाव यहां रोज़ होता है. महत्वपूर्ण बात यह है कि इन मज़दूरों की कमाई या रोज़गार स्थायी नहीं होता है. जिस दिन काम मिल गया उस दिन थोड़े पैसे भी मिल जाते हैं लेकिन कई कई दिन उन्हें कोई काम नहीं मिलता. सरकार के पास इन मज़दूरों का न तो कोई आंकड़ा है और न ही कोई रिकॉर्ड. ये मज़दूर कहां से आये हैं इन्हें कितनी मज़दूरी मिलती है और ये क्या काम करते हैं इस बारे में सरकार के पास कोई जवाब नहीं है.

पिछले तीन दिनों से दिल्ली के आनन्द विहार इलाक़े से मज़दूरों की विचलित कर देने वाली तस्वीरें आ रही हैं. बच्चे, महिलाएं, पुरुष साइकिल रिक्शा और तमाम सामान लेकर पैदल उत्तर प्रदेश, बिहार सहित तमाम राज्यों की ओर जा रहे हैं. कौन हैं ये लोग? कहां जा रहे हैं ये? आख़िर क्यों इन लोगों को शहर छोड़कर गांवों की ओर पलायन करना पड़ रहा है? क्या कोरोना से ज़्यादा इन्हें किसी और चीज़ से डर लग रहा है जो ये लोग पैदल ही हज़ारों किलोमीटर के सफ़र पर निकल चुके हैं.

इन सवालों के जवाब में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रवक्ता अंकित पाठक कहते हैं कि सरकार ने बहुत जल्दबाज़ीमें एक ऐसा फ़ैसला लिया है जिसकी भारी क़ीमत देश को चुकानी पड़ सकती है. उनका कहना है कि देश में निर्माण क्षेत्र में काम करनेवाले तमाम ठेका मज़दूरों और डेली वर्कर्स के लिए सरकार ने लॉकडाउन के पहले अगर कोई इंतज़ाम किया होता तो आज ये नौबत न आती कि उन्हें पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलना पड़ता. असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों का एक दर्द ये भी है कि उनका न तो कोई यूनियन हैऔर न ही कोई ऐसा संगठन जो उनके लिए कोई आवाज़ उठा सके.

सरकार के कदम को वो बिल्कुल लापरवाही भरा बताते हैं, जिसमें न तो सरकार ने कोई पूर्व तैयारी की और न ही कोई गाइडलाइन जारी की. सरकार की कोई भी तैयारी डाक्यूमेंटेड नहीं थी, जिससे हर क्षेत्र के लोगों के नुक़सान का ब्यौरा सरकार के पास नहीं है. सरकार के पास अभी भी इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कोई तैयारी नहीं है क्योंकि सरकार ने ये फ़ैसला लेने से पहले कोई तैयारी नहीं की. अब सरकारें सिर्फ़ एक दूसरे पर आरोप लगा रही हैं. मज़दूर सरकार, राज्य मशीनरी से निराश होकर अपने पुरुषार्थ के भरोसे निकल पड़ेहैं अपने गंतव्य की ओर.

ये सोचने वाली बात है कि आख़िर सरकार के पास लॉकडाउन के लिये क्या सच में कोई ठोस तैयारी नहीं थी? अचानक से ही लाखों दिहाड़ी मज़दूर इस तरह सड़कों पर आ जाएंगे इसकी कोई तैयारी सरकार के पास नहीं थी. तो क्या प्रधानमंत्री जी ने बिना जाने समझे बिना कोई गाइडलाइन बनाये सीधा जनता से सम्बोधन कर देते हैं ओर बाद में उनकी ग़लतियों का भुगतान देश की आम जनता को भुगतना पड़ता है. उनकी माफ़ी से तो यही जान पड़ता है.

इस महामारी ने स्पष्ट तौर पर पूरी दुनिया में नवउदारवादी नीतियों के दुष्प्रभाव और उनसे उत्पन्न असमानता को पूरी तरह से उजागर कर दिया है. देश में साफ़ साफ़ अमीरी ग़रीबी की खाई को देखा जा सकता है. स्वास्थ्य सुविधाओं का आलम ये है कि जिसके पास पैसा होगा वो ज़िन्दा रहेगा अच्छा इलाज पाएगा, उचित पोषण पाएगा और जिसके पास पैसे नहीं होंगे वो बुनियादी सुविधाओं के अभाव में ही मर जाएगा.

लॉकडाउन के दौरान देश में एक ऐसी आबादी भी थी जो इसको इंज्वाय कर रही थी. वो अपने किचन में नई नई डिश ट्राय कर रही थी. अपने बगीचे में नये पौधे लगा रही थी, सोशल मीडिया पर नई नई गतिविधियों से एक दूसरे का मनोरंजन कर रही थी और भारत सरकार की बहुउद्देशीय परियोजना रामायण और महाभारत के सुखद प्रसारण को देखकर तथाकथित रामराज्य के आगमन पर घंटे, घड़ियाल, ताली, शंख पीट रही थी. वहीं एक ओर ऐसी आबादी है जो किरायेदारों के दबाव में मकान छोड़ने को मजबूर है. दो जून की रोटी न मिल पाने पर पैदल ही शहर छोड़ने को मजबूर है.

ये नवउदारवाद ही है जिसने भयंकर रूप से पूंजीगत असमानता को जन्म दिया है. पूरी दुनिया में ही इन नीतियों के ख़िलाफ़ पिछले कई सालों से भयंकर रूप से जनआंदोलन तेज हुए हैं. चाहे वह चिली हो या इराक़ हो या बोलिविया या फ़्रांस ही क्यों न हो, हर जगह मज़दूरों ने शोषण के ख़िलाफ़ आन्दोलन तेज किया है.

लेकिन भारत में जब एक बहुसंख्यकवादी सरकार का एक ऐसा फ़ैसला आता है जिससे लाखों लोग सड़क पर आ जाते हैं तो कोई विरोध का स्वर क्यों नहीं फूटता? मज़दूरों की इस हालत पर न तो कोई किसी विपक्षी पार्टी ने सरकार को घेरा और न ही कोई मजदूर संगठन खुलकर सरकार की बखिया उधेड़ता नज़र आया. कोई भी ये न कह सका कि सरकार ने अगर इस बाबत पूरी तैयारी की होती और एक गाइडलाइन के साथ प्रेस कान्फ्रेंस की होती तो शायद ये स्थिति न बनती.

क्या कोई भी श्रम क़ानून या मानवाधिकार क़ानून इन मज़दूरों के लिए नहीं बचा है जिसकी मदद से ले सकें. दरअसल पूरी दुनिया में ही नवउदारवाद लगातार मज़दूरों के अधिकार और शक्तियों को कम कर रहा है और ज़्यादा से ज़्यादा असंगठित क्षेत्र में उन्हें धकेल रहा है. वर्तमान भाजपा सरकार ने तो इस दिशा में बड़ी तेज़ी से काम किया है.

“मजदूरों को उद्योगपतियों या प्रबंधन के शोषण से बचाए, इस क्रम में मजदूरों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए ट्रेड यूनियन कागठन किया गया. ट्रेड यूनियन के गठन का मकसद था औद्योगिक अमन-चैन को कायम रखना. कामगारों की मांगों, शिकायतों आदि को प्रबंधन के समक्ष ट्रेड यूनियन के माध्यम से रखा जाता था. प्रबंधन और मजदूरों के बीच असंतोष पनपने पर उसका समाधान ट्रेड यूनियननिकाला करते थे. ट्रेड यूनियन मजदूर और प्रबंधन के बीच संवाद कायम करने का काम करते थे. बैठकें होती थीं, जिनमें सरकार, मज़दूरों के प्रतिनिधि और कंपनी के नुमाइंदे रहते थे, लेकिन मोदी सरकार आने के बाद इस व्यवस्था को ख़त्म कर दिया गया है. ईज़ ऑफ़ बिज़नेस के तहत विदेशी पूंजी को देश में लाना है और देश में भी पूंजीपतियों को बढ़ावा देना है तो ट्रेड यूनियन का एक्टिविज़म नहीं चलेगा. इस कारण ट्रेड यूनियनों को कमज़ोर किया जा रहा है”

भारत में पहली ट्रेड यूनियन 1918 में बनी और इसके बाद 1926 में तत्कालीन ऐसी यूनियनों के लिए इंडियन ट्रेड यूनियन्स एक्ट बनाया गया. इस क़ानून के तहत यूनियनों का पंजीकरण करना आवश्यक हो गया और इस बात की भी निगरानी करना संभव हो गया कि यूनियन अपने पास जमा धन का सही इस्तेमाल करे. इसके ज़रिए केवल कामगारों के समूह ही नहीं बल्कि कर्मचारियों के समूह भी ट्रेड यूनियन कहला सकते थे.

मज़दूर संगठनों का कहना है कि देश में जितनी पब्लिक सेक्टर इकाइयां हैं उनमें लोगों के टैक्स का पैसा है और भाजपा सरकार इसके लिए पुरज़ोर कोशिश करती रही है कि कैसे उन्हें निजी हाथों में सौंप दिया जाये.

श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश के 33 फीसदी मजदूर ऐसे हैं जिन्हें न्यूनतम मजदूरी कानून का फायदा नहीं मिलता और बेहद कम मजदूरी मिलती है. आर्थिक सर्वेक्षण 2019 के अनुसार देश में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की संख्या 93 प्रतिशत है. श्रम मंत्रालय की 2015 की रिपोर्ट में कहा गया था कि कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र में काम करने वाले 82 फीसदी मजदूरों के पास नौकरी के नाम पर सिर्फ़ यही है.

श्रम क़ानूनों का लाभ केवल संगठित क्षेत्र तक ही सीमित है. मौजूदा वक़्त में ज़्यादातर श्रम क़ानून केवल संगठित क्षेत्र पर ही लागू होते हैं जबकि संगठित क्षेत्र में केवल 8 से 9 प्रतिशत कर्मचारी ही काम करते हैं. इसका मतलब अधिकांश कामगार असंगठित क्षेत्र से आते हैं. समस्या ये है कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों के पास सीमित अधिकार होता है और उन्हें ज़्यादा दिक्कत का सामना करना पड़ता है.

पलायन कर रहे इन मज़दूरों की सामाजिक स्थिति का आकलन भी बहुत ज़रूरी है. गांवों से माइग्रेट कर बड़े शहरों में सफ़ाई, ठेका मज़दूर, ड्राइवर, मोची और तमाम छोटे मोटे काम कर शहरों को चलाने वाले ये लोग ज़्यादातर तथाकथित निम्न जातियों से आते हैं. भारत में अभी भी भूमिहीनों की एक बड़ी तादाद भी इसी वर्ग से आती है जो दूसरों के खेत में आधा बंटैया पर काम करते हैं. सरकार किसान क्रेडिट कार्ड भी उसी को देती है जिसके पास ज़मीन होती है.

झारखंड के एक गांव से एक रसूखदार व्यक्ति लगभग 50 आदिवासियों को शहर ले जाकर ठेके पर उनसे काम करवाते हैं और पैसा मिलने पर अपना कमीशन लेकर बाक़ी उन्हें देते हैं. ज़्यादातर गांवों का यही हाल है जहां से मज़दूरों की सप्लाई होती है. सरकार के पास इस तरह के मज़दूरों का कोई रिकॉर्ड नहीं है.

सरकार ने मज़दूरों के लिये वित्तीय सहायता की घोषणा तो कर दी है पर यक्ष प्रश्न यही है कि इन मज़दूरों का आंकड़ा कितना है सरकार के पास जो वह इनकी मदद कर पाएगी. सरकारों की लापरवाही और नाकामी से अगर शहरों से गांव वापस लौटने लगा तो क्या शहर जीवित रह पाएंगे, ये अपने आप में एक गंभीर सवाल है जिस पर हमें सोचना चाहिए.


देवेश मिश्र IIMC में पत्रकारिता के छात्र हैं.

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