CPC@100: चीन साम्राज्यवादी है या नहीं?

"अमेरिकी प्रोफेसरों ली झोंगजिन और डेविड कोट्ज ने कहा है कि चीन के पूंजीपतियों के अंदर भी वैसा साम्राज्यवादी रूझान है, जैसा किसी देश के पूंजीपतियों में होता है। लेकिन उनके इस रूझान को चीन सरकार नियंत्रित कर देती है। चीनी आर्थिक व्यवस्था में बड़े बैंक सरकार के स्वामित्व में हैं। वे शेयर होल्डर्स के प्रति नहीं, बल्कि चीन की जनता के प्रति जवाबदेह हैं। प्रमुख उद्योग सरकारी कंपनियों के स्वामित्व में हैं, जिन्हें पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भारी विनियमन के बीच काम करना पड़ता है।"

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल- 8

 

जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपनी शताब्दी मनाने की तैयारियों में जुटी है, तब बाकी दुनिया के लिए दिलचस्पी का विषय यही समझना है कि आखिर चीन ने अपनी ऐसी हैसियत कैसे बनाई? सीपीसी ने कैसे एक जर्जर देश को वापस खड़ा किया? इस दौरान उसने क्या प्रयोग किए? उन प्रयोगों के सकारात्मक और नकारात्मक परिणाम कैसे रहे हैं? वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र रंजन इस विषय पर मीडिया विजिल के लिए एक विशेष शृंखला लिख रहे हैं। पेश है इसकी  आठवीं कड़ी-संपादक

 

ब्रिटेन की लेबर पार्टी समर्थक वेबसाइट counterfire.org पर एक लेख में वामपंथी लेखक ड्रैगान प्लावसिच ने कुछ समय पहले कहा कि चीन उस रास्ते पर चलने का सिर्फ एक ताजा उदाहरण है, जिस पर ब्रिटेन, जर्मनी और अमेरिका ने चलते हुए वैश्विक व्यापार और निवेश के अवसरों को अपनी राष्ट्रीय सीमा से बाहर तक फैलाया। वे प्रतिस्पर्धा के जिस तर्क से प्रेरित हुए थे, वह उससे गुणात्मक रूप से अलग नहीं था, जिससे आज चीन प्रेरित हो रहा है। प्रतिस्पर्धा लगातार आविष्कार की मांग करती है। इस प्रक्रिया में उत्पादन में मानव श्रम की भूमिका लगातार घटती जाती है। इससे मुनाफे की दर गिरती जाती है। पूंजीपति इसकी भरपाई नए बाजार पर कब्जा करके और उत्पादन लागत को घटा कर करते हैं। यही आर्थिक इंजन साम्राज्यवाद के केंद्र में रहता है। स्पष्ट है प्लावसिच यह कहा कि चीन आज एक साम्राज्यवादी देश है। ऐसी राय पश्चिमी देशों के ज्यादातर वामपंथी हलकों की है। इसी समझ के आधार पर उन्होंने “Neither Washington nor Beijing” (न तो अमेरिका के साथ, न चीन के साथ) का नारा गढ़ा है।

लेकिन वेस्टर्न लेफ्ट के विश्लेषण के साथ दिक्कत यह रही है कि उसने अपने विमर्श में पश्चिमी साम्राज्यवाद को बहुत पहले गौण कर दिया था। ऐसा करके उसने अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की आज के विश्व में भूमिका को स्वाभाविक रूप से अग्रणी मान लिया। इस तरह इराक या लीबिया पर हमले जैसे मामलों में कभी कभार विरोध जताने के अलावा उसने पश्चिमी साम्राज्यवाद की रोजमर्रा के स्तर पर क्या भूमिका है, इस सवाल से ध्यान हटा लिया। ये कहानी पहले विश्व युद्ध के समय से लेकर आज तक जारी है। इसी समझ के आधार पर पहले विश्व युद्ध के समय कई देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपनी-अपनी सरकारों का समर्थन किया। जबकि मार्क्सवाद नजरिए से साम्राज्यवाद के सबसे प्रमुख व्याख्याकार व्लादीमीर लेनिन ने उस युद्ध को बाजार पर नियंत्रण के लिए साम्राज्यवादी ताकतों का आपसी युद्ध माना था। लेनिन ने साम्राज्यवाद को पूंजीवाद की उच्चतम अवस्था (Highest Stage) बताया था। उन्होंने कहा था कि साम्राज्यवाद की सबसे संक्षिप्त परिभाषा यही हो सकती है कि यह पूंजीवाद की मोनोपॉली (एकाधिकार) वाली अवस्था है। उन्होंने कहा था कि किसी व्यवस्था के साम्राज्यवाद मे तब्दील होने के लिए उसमें निम्नलिखित पांच विशेषताएं होनी चाहिएः

 

* पूंजीवादी उत्पादन की मुख्य शाखाएं उस स्तर तक पहुंचे, जब मुनाफा देने वाले कारोबार सिर्फ वही बचें, जिनमें विशाल मात्रा में पूंजी का केंद्रीयकरण इस रूप में हो कि वह मोनोपॉली का रूप ले ले।

* वित्तीय कुलीनतंत्र का उदय हो- खास कर बैंकों का जो अर्थव्यवस्था का इंजन बन जाएं।

* आर्थिक वृद्धि (growth) के लिए पूंजी का निर्यात (पूंजी का निवेश) अहम हो जाए।

* अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोनोपॉली वाले पूंजीपतियों के संघ बनें, जो दुनिया को आपस में बांट लें।

* पूंजीवादी ताकतें दुनिया को पूरी तरह आपस में बांट लें। इस रूप में वे दुनिया भर के बाजारों और संसाधनों को एक पूंजीवादी विश्व व्यवस्था में एकीकृत कर लें।

 

पहले विश्व युद्ध के समय ऐसी ही स्थिति बन गई थी। उसके बाद भी पूंजीवादी ताकतों ने दुनिया का बँटवारा किया, लेकिन इस बीच सोवियत संघ का उदय हो चुका था। सोवियत संघ और आगे चल कर उसके नेतृत्व वाला समाजवादी खेमा पश्चिमी साम्राज्यवाद के विरुद्ध के एक बड़ी धुरी के रूप में उभरा। उसके उदय से दुनिया भर में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों को बल मिला। इन आंदोलनों के दौरान और उनकी सफलता के बाद नव-स्वतंत्र देशों के आर्थिक निर्माण में समाजवादी खेमे का सक्रिय सहयोग उस दौर के इतिहास में स्पष्ट रूप से दर्ज है।

जिस समय लेनिन ने साम्राज्यवाद की व्याख्या की थी, उस समय चीन खुद साम्राज्यवादी शोषण का शिकार था। 1949 तक वह ऐसे शोषण का केंद्र बना रहा। अक्टूबर 1949 की चीनी क्रांति की एक बड़ी उपलब्धि यही रही कि उससे पश्चिमी साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की जड़ों को हिलाने में मदद मिली। तब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हासिल हुई जीत का स्वागत साम्राज्यवाद के खिलाफ शोषित दुनिया की महान विजय के रूप किया गया था। तब से साल 2000 तक चीन अपने निर्माण और अपनी गरीबी एवं पिछड़ेपन की समस्या से निपटने में लगा रहा। ऐसा सिर्फ पिछले 20 वर्षों में हुआ है, जब चीन की अर्थव्यवस्था ने लगातार ऊंची विकास दर हासिल की और चीन एक बड़ी आर्थिक और तकनीकी (technological) शक्ति के रूप में उभरा। इस बीच वहां की उत्पादक शक्तियां उन्नत अवस्था में पहुँची हैं, और उनके साथ ही न सिर्फ पूंजीपति बल्कि मोनोपॉली पूंजीपति भी अस्तित्व में आए हैं। चीन ने विदेशों में जो प्रत्यक्ष निवेश किए हैं, वह भी अब काफी ठोस रूप ले चुका है। यह निवेश कुछ यूरोपीय देशों से भी अधिक हो चुका है। लेकिन अगर प्रति व्यक्ति जीडीपी की तुलना में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को देखें, तो यह आज भी एक प्रतिशत से कम है। इस रूप में अमेरिका तो दूर, वह जापान, आयरलैंड, स्वीडन, नीदरलैंड्स और यहां तक कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से भी चीन अभी पीछे है।

राजनीतिक विश्लेषक स्टीफन गोवान्स ने कहा है कि साम्राज्यवाद आर्थिक हितों से प्रेरित होकर दूसरे देशों पर वर्चस्व कायम करने की प्रक्रिया है। इस सिलसिले में यह विश्लेषण का मुद्दा है कि आज चीन का दुनिया के कितने देशों पर घोषित या अघोषित वर्चस्व है? पश्चिमी विमर्श में चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को ऐसा ही वर्चस्व कायम करने की कोशिश के रूप में चित्रित किया जाता है। इस प्रोजेक्ट के क्रम में चीन के कर्ज के जाल में देशों के फंसने की चर्चा लंबे समय तक रही। लेकिन हाल में खुद एक अमेरिकी पत्रिका (द अटलांटिक) ने अपनी शोध कथा से इस निष्कर्ष पर पहुंची कि कर्ज के जाल (डेट ट्रैप) की तमाम बातें निराधार हैं। जांबिया जैसे देशों का जो अनुभव है, वह कर्ज के जाल की कहानी की पुष्टि नहीं करता। ये बात खुद पश्चिमी टीवी चैनल- फ्रांस-24 की पर चली चर्चाओं में सामने आई है। ग्रीस के पूर्व वित्त मंत्री यानिस वारोफाकिस ने चीन सरकार से अपनी बातचीत के अनुभव के आधार पर कहा है कि उन्हें कभी ये महसूस नहीं हुआ कि चीन के निवेश या आर्थिक मदद का उद्देश्य ग्रीस पर वर्चस्व कायम करना है। किताब –हैज चाइना वॉन- के लेखक और सिंगापुर के जाने-माने राजनयिक किशोर महबुबानी की भी यही राय रही है कि कम से कम अब तक चीन ने जो आर्थिक संबंध बनाए हैं, उनका स्वरूप वैसा नहीं है, जैसा पश्चिमी मीडिया में चित्रित किया जाता है। बल्कि उसका ऐसा न होना ही वजह है, जिससे इतनी बड़ी संख्या एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश चीन की योजनाओं का हिस्सा बने हैं।

ब्रिटिश लेफ्ट के प्रमुख अखबार- द मॉर्निंग स्टार- में लिखे एक विश्लेषण में उसके विश्लेषक कार्लोस मार्तिनेज ने लिखा कि जब दुनिया पहले से साम्राज्यवादी ताकतों ने बांट रखी हो, तब कोई नया देश तभी साम्राज्यवादी बन सकता है, जब वह किसी देश से वहां मौजूद साम्राज्यवादी देश को खदेड़ दे। लेकिन अभी तक ऐसा कोई युद्ध नहीं हुआ है, जिसमें चीन ने किसी देश को खदेड़ दिया हो। मशहूर बुद्धिजीवी और भाषाविद् नोम चोम्स्की वैसे चीन के अंदर नागरिक स्वतंत्रताओं के अभाव के कारण चीन के कड़े आलोचक रहे हैं। लेकिन साम्राज्यवाद के मुद्दे पर उन्होंने कहा है- जब अमेरिका के दुनिया में लगभग 800 सैनिक अड्डे हैं, तब किसी देश की सरकार पर हमला करना और वहां की सरकार को उखाड़ फेंकना या वहां आतंकवादी गतिविधि चलाना संभव नहीं है। अपने बड़े सैन्य बजट के बावजूद चीन ऐसा करने में सक्षम नहीं हुआ है।

दरअसल, चीनी साम्राज्यवाद की सारी चर्चा तब शुरू हुई, जब चीन ने जाने या अनजाने में hide strength, bide time की नीति छोड़ दी। पिछले दस साल में हुआ यह है कि वह अपनी ताकत को जताने लगा है। पास-पड़ोस के देशों के साथ आपसी संबंधों से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक में वह अब झुक कर चलने की नीति का पालन नहीं करता। अचानक हुए इस बदलाव ने सबका ध्यान खींचा है। चूंकि इस बीच चीन के अंदर पूंजीवादी विकास भी तेजी से हुआ है, तो उससे चीनी साम्राज्यवाद की कहानी विश्वसनीय लगने लगी है। बहरहाल, जैसाकि ऊपर हमने देखा, चीनी साम्राज्यवाद के लिए दुनिया खाली नहीं है। चीन के विदेशी निवेश को जगह इसलिए मिली है कि उसने उन देशों को इसके लिए चुना, जिन्हें पश्चिमी पूंजीपति मुनाफा देने योग्य बाजार नहीं समझते हैं। उसकी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना इसलिए आगे बढ़ी, क्योंकि एक तो उसने इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिहाज से अत्यंत पिछड़े देशों को प्राथमिकता दी और दूसरे इसके लिए या कर्ज देने के लिए वैसी शर्तें नहीं रखीं, जैसी पश्चिमी देश रखते हैँ। मसलन, श्रम या जलवायु मानदंडों का पालन या एक खास ढंग की अंदरूनी राजनीतिक व्यवस्था अपनाना।

किताब Is China Imperialist? Economy, State and Insertion in the Global System के लेखक अमेरिकी प्रोफेसरों ली झोंगजिन और डेविड कोट्ज ने कहा है कि चीन के पूंजीपतियों के अंदर भी वैसा साम्राज्यवादी रूझान है, जैसा किसी देश के पूंजीपतियों में होता है। लेकिन उनके इस रूझान को चीन सरकार नियंत्रित कर देती है। चीनी आर्थिक व्यवस्था में बड़े बैंक सरकार के स्वामित्व में हैं। वे शेयर होल्डर्स के प्रति नहीं, बल्कि चीन की जनता के प्रति जवाबदेह हैं। प्रमुख उद्योग सरकारी कंपनियों के स्वामित्व में हैं, जिन्हें पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भारी विनियमन के बीच काम करना पड़ता है। सीपीसी में पूंजीपतियों का भी प्रतिनिधित्व है, लेकिन इस बात के कोई साक्ष्य नहीं हैं कि पूंजीपति सीपीसी को नियंत्रित या निर्देशित करते हैँ। इसलिए चीनी अर्थव्यवस्था की दिशा उस तरह साम्राज्यवाद की तरफ नहीं खिंचती, जैसाकि ब्रिटेन या अमेरिका या जापान की अर्थव्यवस्थाओं में होता है। फिर चीन पहले से मौजूद साम्राज्यवादी ताकतों से प्रत्य़क्ष सैनिक टकराव के बिना अपना अनौपचारिक साम्राज्यवाद कायम करने की स्थिति में भी नहीं है।

इसके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज चीन और पश्चिमी देशो के बीच टकराव की स्थितियां बढ़ती जा रही हैं। इस सिलसिले में एक बात ध्यान खींचती है। वह अमेरिकी शासक वर्ग में मौजूद वो आम सहमति है, जिसके तहत वहां की सरकार उस देश को शत्रु देश घोषित कर देती है, जो अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती दे। पिछले कुछ वर्षों से अमेरिकी सरकार ने अघोषित रूप से यही किया हुआ है। अब इसमें कोई शक नहीं है कि चीन ने इस वर्चस्व को चुनौती दी है। ये चुनौती सैनिक क्षेत्र में कम, आर्थिक क्षेत्र में ज्यादा है। लेकिन इसकी वजह दोनों देशों की पॉलिटिकल इकॉनमी और वहां राज्य-व्यवस्था उभरे मॉडल हैं। पिछले 40 साल में अमेरिका और पश्चिमी देशों ने बेरोक निजीकरण और पूंजी के भूमंडलीकरण को प्रोत्साहित कर अपने हाथ कमजोर कर लिए हैँ। जबकि चीन सरकार ने पब्लिक सेक्टर, पंचवर्षीय योजना के जरिए विकास की नीति, और अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप को कायम रख कर अपनी ताकत न सिर्फ बरकरार रखी है, बल्कि उसमें इजाफा किया है।

आज जब अमेरिका और उसके साथी देश चीन के ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ की शिकायत करते हैं, तो दरअसल वे सिस्टम के इस मॉडल की ही बात करते हैं। वे चाहते हैं कि चीन इसे तोड़ दे। यानी वह मार्केट सोशलिज्म की बात करना छोड़ मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था को अपना ले। अगर गौर से देखा जाए, तो आज उभरे टकराव का असल कारण यही है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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