‘गुपकर गैंग’ के सामने औंधे मुँह गिरी बीजेपी ने मीडिया के सहारे जीत का नगाड़ा बजवा दिया!

कृष्ण प्रताप सिंह कृष्ण प्रताप सिंह
काॅलम Published On :


भले ही अब बीजेपी ‘पार्टी विद डिफरेंस’ नहीं रह गई हो लेकिन उसके पास कई ऐसे हुनर अब भी हैं, जो उसकी विरोधी पार्टियों को नहीं आते। यहां हम उसके बिना चुनाव जीते खरीद-फरोख्त कर सरकारें बना लेने या विपक्षी दलों की सरकारें गिरा देने वाले हुनर की बात नहीं कर रहे। इधर उसने अपनी चुनावी हारों को भी जीत बताकर उनका जश्न मनाने की जो नयी कला विकसित कर ली है, उसके संदर्भ में दूसरी पार्टियां  से उसकी तुलना कर रहे हैं। वे बेचारी चुनाव हार जाती हैं तो हार के लिए जिम्मेदार उनके नेता उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते, मुंँह छिपाते या एक दूसरे पर ठीकरे फोड़ते थक जाते हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी कतई ऐसा नहीं करती। कहने लग जाती है कि वह हारी कहाँ हैं और अगले ही पल अपने ‘महापराक्रमी’ महानायक के गुन गाती हुई हार को जीत बताने लग जाती है।

जम्मू कश्मीर में जिला विकास परिषदों के चुनाव नतीजे के बाद उसका रुख इस कला का ताज़ा प्रदर्शन है। वह जश्न मनाने में जुट गयी है कि इस चुनाव में वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। यों, इस ‘उभरने’ के ढोल का पोल यह है कि उसके मुकाबले चुनाव लड़ रही राज्य की पार्टियां गुपकार घोषणापत्र गठबंधन बनाकर मुकाबले में उतरी थीं। इस कारण उन्होंने अकेली भाजपा के मुकाबले अलग-अलग अपेक्षाकृत कम सीटों पर चुनाव लड़ा। ऐसे में उनका अलग-अलग भाजपा से कम सीटें जीतना स्वाभाविक है-उनको मिले वोटों की संख्या और प्रतिशत का भाजपा से कम होना भी।

वैसे, इस गठबंधन ने भाजपा द्वारा सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग की अपनी सहूलियत के भरपूर इस्तेमाल के बीच नरेन्द्र मोदी सरकार की रीति-नीति की घोर आलोचना करते हुए उसे जिस तरह पीछे छोड़ा है, उसके मद्देनजर उसका सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना न कोई उपलब्धि है और न इससे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश ही निकलता है। खासकर, जब जिला विकास परिषदों की 280 सीटों में तीन को छोड़ उसकी सभी सीटें जम्मू से ही हैं, जहां उसका पुराना आधार रहा है। कुल बीस जिला विकास परिषदों में से जिन छः-डोडा, उधमपुर, कठुआ, जम्मू, रियासी और सांबा-में उसे बहुमत मिला है, वे भी उसके इसी पुराने आधारक्षेत्र में हैं। यह भी देखने की बात है कि गुपकर गठबंधन ने जम्मू में भी तमाम सीटें जीती हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जम्मू की 37 में से 25 सीटें जीती थीं और कश्मीर घाटी में उसका खाता भी नहीं खुला था। इस बार फर्क इतना ही पड़ा है कि उसने घाटी में भी तीन सीटें जीत ली हैं। उसका समर्थक मीडिया इस अंदाज में  बीजेपी की घाटी में एंट्री बता रहा है, जैसे इससे पहले उसकी एंट्री बैन रही हो। सच तो यह है कि पिछले साल मोदी सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 व 335ए को समाप्त करते हुए इस सर्वाधिक संवेदनशील सीमावर्ती राज्य का विशेष राज्य तो क्या पूर्ण राज्य तक का दर्जा छीन लिया और उसे दो केन्द्र-शासित प्रदेशों में बांटकर सारी राजनीतिक गतिविधियां को बैन कर डाला था। इस बैन के दौरान जहां राज्य में बीजेपी को सरकारी पार्टी के तौर पर अपनी गतिविधियों के लिए किसी इजाजत की जरूरत नहीं थी, जबकि किसी और पार्टी को किसी गतिविधि की कतई इजाजत नहीं थी।

अब बीजेपी कह रही है कि जो नतीजे आये हैं, वे अलगाववाद पर उसके राष्ट्रवाद की जीत दर्शाते हैं जबकि मतदाताओं ने ज्यादातर सीटें उन्हीं दलों की झोली में डाल दी हैं, जिन्हें वह बार-बार अलगाववादी कहती रही, यहां तक कि ‘गुपकार गैंग’ भी और जो मुखर होकर अनुच्छेद 370 के समापन और राज्य का दर्जा छीनने व दो केन्द्रशासित प्रदेशों में उसके बंटवारे की आलोचना करते रहे हैं। वह जब भी खुद को इस आईने के सामने करेगी, उसे दिखेगा कि वह खुद भी अपनी जरूरत के अनुसार अलगाववादियों को गले लगाने का इतिहास बना चुकी है। लेकिन अभी तो उसे जैसे भी बने, इन नतीजों को, मोदी सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर के लोगों को विश्वास में लिए बिना उनके भविष्य की सुरक्षा व विकास के नाम पर उठाये गये अप्रिय कदमों के पक्ष में सिद्ध करना है, जबकि इन नतीजों ने कश्मीरियों का दिल जीत लेने के उसके बहुप्रचारित दावे को औधे मुंह गिरा दिया है और उसे कुछ खास हाथ नहीं आने दिया है। वह ज्यदा से ज्यष्दा यही दावा करने की हकदार है कि उसने अपनी पुरानी जमीन नहीं खोई है।

ऐसे में बेहतर होता कि गरजने-चमकने की भाषा में बात करने के बजाय वह जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के उन बयानों पर गौर फरमाती, जिनमें उन्होंने कहा है कि भाजपा ने इस चुनाव को संविधान के अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति के खात्मे से जोड़कर नाहक अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना दिया था। अब लोगों ने उसे अपना फैसला सुना दिया है, जो यकीनन, उन लोगों के पक्ष में है, जो मनमाने कदमों के बजाय लोकतंत्र में भरोसा करते हैं। क्या उम्मीद की जाए कि भाजपा न सही, देश की सरकार इस जनादेश के निहितार्थों को नेकनीयती से समझेगी?

बीजेपी ने ऐसा ही कुछ बिहार नतीजों के बाद भी किया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की, जिनके चेहरे को बीजेपी चुनावों में अपनी जीत की गारंटी मानती रही है, जी-तोड़ कोशिशों के बावजूद राज्य के मतदाताओं ने उसे ‘सबसे बड़ी पार्टी’ नहीं बनाया। प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय जनता दल के बाद नम्बर दो पर छोड़ दिया। उसके गठबंधन सहयोगी जनता दल यूनाइटेड की तो दुर्गति ही कर डाली। वह भी तब, जब बीजेपी कह रही थी कि राज्य में उसके गठबंधन के ‘बेहद तजुर्बेकार’ मुख्यमंत्री के सामने कोई चुनौती ही नहीं है। इस चुनाव में उसने पिछली बार के मुकाबले कुछ ज्यादा विधानसभा सीटें जरूर जीतीं, लेकिन उस बढ़त में इतनी नैतिक चमक नहीं आई कि वह बिहार में पहली बार ‘अपना मुख्यमंत्री’ बना पाती। स्वतंत्र प्रेक्षक कहते हैं कि उसका प्रतिद्वंद्वी महागठबंधन हारकर भी जीत गया, क्योंकि उसने साम्प्रदायिक विभाजन के उसके मुद्दों के बरक्स पूरे चुनाव अभियान में जन-मुद्दों को आगे रखा। लेकिन भाजपा ने बिना देर किये उस जीत का जश्न मनाना आरंभ कर दिया, जो सच पूछिये तो उसे हासिल ही नहीं हुई थी।


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