कोरोना ‘काल’ : निष्क्रिय सरकार ने लोगों की परवाह नहीं की !

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क्या हमें कोई फ़र्क़ पड़ता है?

ख़ैर, सवाल यह है कि क्या सरकार को कोई परवाह है? चूंकि,आपका काम आपके शब्दों से ज़्यादा बोलता है, इसलिए इस सवाल का स्पष्ट जवाब है- नहीं। जी..हां, आपने बिलकुल ठीक सुना है! सरकार को कोई परवाह नहीं है. मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं? आइये, नज़र डालते हैं कुछ कड़वी सच्चाइयों पर; और हां, मैं आपको पहले ही बता देना चाहता हूं कि यहां दिया गया सभी डेटा सरकार की वेबसाइटों से ही लिया गया है।

1. स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध अपडेटों की जानकारी खंगालने पर पता चलता है कि 25 जनवरी, 2020 को हुए अपडेट के बाद 9 मार्च, 2020 तक, इस दौरान कोई भी अपडेट नहीं किया गया था। यह कुल 45 दिनों का दौर था। इससे पता चलता है कि सरकार पूरे फरवरी महीने में सोती रही, जब कोविड-19 पूरी दुनिया में कहर ढा रहा था। आख़िर स्वास्थ्य मंत्रालय उस वक़्त क्या कर रहा था? जानकारी के लिए बता दूं कि भारत में कोविड-19 से संक्रमण का पहला मामला 30 जनवरी को दर्ज़ किया जा चुका था। इस पहले मामले के सामने आ चुकने के बाद सरकार ने वास्तव में किया क्या? कुछ भी नहीं! क्यों? क्योंकि उसकी प्राथमिकता कहीं और संचालित थीं। फरवरी में सरकार दिल्ली चुनाव में व्यस्त थी। उसके बाद ट्रंप का शो चला, फिर मध्य प्रदेश में सरकार गिराने में व्यस्त हो गये (यह वह समय था जब कोरोना के ख़तरे ने देश को चारो तरफ़ से घेर लिया था, लेकिन वेंटीलेटर या दूसरी ज़रूरी मेडिकल व्यवस्थाओं की जगह विधायकों का जुगाड़ किया जा रहा था) ।वास्तव में सरकार का रवैया इतना गड़बड़ था कि स्वास्थ्य मंत्री ने 13 मार्च को ट्वीट किया कि भारत में कोरोना का कोई प्रकोप नहीं है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 11 मार्च को ही घोषित कर दिया था कि कोविड-19 एक वैश्विक महामारी है। सरकार तो 23 मार्च तक संसद का सत्र चलाती रही, जबकि कई सांसदों ने संसद जारी रखने पर आपत्ति जतायी थी, लेकिन सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी।

2. जो दूसरा सवाल मेरे मन में उठता है, वह यात्रा प्रतिबंधों से जुड़ा हुआ है। भारत में पहला मामला 30 जनवरी को दर्ज़ किया जा चुका था। सरकार फरवरी के दूसरे हफ़्ते से ही भारत आने वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को अग्रिम सूचना जारी करके बंद कर सकती थी, ताकि लोगों को उसके अनुसार तैयार होने का पर्याप्त मौका भी मिल जाता। 22 मार्च को सरकार ने जो किया, वह बहुत बेहतर तरीके से 15 फरवरी को ही किया जा सकता था। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को बंद करने में इतना वक़्त क्यों लगा, यह रहस्य का विषय है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के आगमन पर उनकी ठीक से स्क्रीनिंग क्यों नहीं की गयी, या कहें कि कोई भी जांच क्यों नहीं हुई?

3. तीसरा सवाल मेरे मन में दौड़ता है कि क्या हमारे पास टेस्ट करने की पर्याप्त सुविधाएं हैं? कड़वी सच्चाई है कि 130 करोड़ लोगों के देश में, क्या आपको मालूम है कि कितने सरकारी लैब ऐसे थे जिनमें कोविड-19 के परीक्षण की सुविधाएं उपलब्ध थीं? ऐसे कुल लैबों की संख्या है 126। जी..हां, आपने बिलकुल ठीक सुना, 126! इस हिसाब से 1 करोड़ की आबादी पर 1 लैब आता है, जिसकी प्रति दिन की क्षमता अधिक से अधिक लगभग 50 लोगों की है। क्या हमने फरवरी महीने में अपनी क्षमता बढ़ाने की कोई कोशिश की? नहीं। क्या तब निजी लैबों को टेस्ट करने की मान्यता दी गयी? नहीं। निजी लैबों को मान्यता दी गयी मार्च के अंत में जाकर। ऐसा क्यों हुआ आख़िर? असल में तो, शुरुआत में किट बनाने की अनुमति भी एक गुजराती कंपनी को ही बस दी गयी थी। भले 22 अन्य ने भी इसके लिए आवेदन किया हुआ था। संयोग से इस कंपनी द्वारा बनाये गये किट भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा अस्वीकार कर दिये गये थे।

4. चौथा सवाल, क्या हमारे पास डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के लिए पर्याप्त सुरक्षित गियर (उपकरण) हैं? दुख की बात है कि इसका जवाब भी ‘न’ ही है। यहां तक कि ऐसे उपकरणों के निर्माताओं को इन उपकरणों को 19 मार्च, 2020 तक निर्यात करने दिया गया। डॉक्टरों के बीच मौजूदा नाराज़गी इन वस्तुओं की कमी की वजह से ही है। मेरा सवाल है कि क्या सरकार सो रही थी? क्या उसे पता नहीं था कि कोविड-19 से इस लड़ाई में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को सुरक्षा उपकरणों की ज़रूरत पड़ेगी? क्या इस चूक के लिए जवाबदेही तय की जायेगी?

5. अब कोविड-19 के मरीजों को अस्पतालों में रखने की क्षमता और उनके इलाज जैसे स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे के सबसे अहम पहलुओं पर आते हैं। जुलाई, 2019 तक के आंकड़ों के अनुसार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (जो बिलकुल काम के नहीं हैं, और केवल कागज़ पर ही अस्पताल कहे जा सकते हैं) को मिलाकर भी 44.4% हॉस्पिटल बेड की कमी है। जी..हां, 44.4 फीसदी सामान्य बेड की कमी हैं, और हां, उपलब्ध बेडों में से आईसीयू बेड 0.1% से भी कम हैं। क्या हमने इन सुविधाओं को बढ़ाने के लिए कुछ किया? जवाब फिर वही है, कुछ नहीं किया। बल्कि, इस साल के बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के मद में आवंटित प्रतिशत पिछले बजट से भी कम है. लेकिन, बस फ़र्ज़ी प्राथमिकताओं में लगे रहो। सब चंगा सी!

6. एक बार फिर से लॉकडाउन पर आते हैं। ऊपर बताये गये ज़रूरी व सामयिक कदम उठाने में विफल होने के बाद, सरकार घबरा गयी और उसने आनन-फानन में बिना किसी तैयारी के 24 मार्च को रात 8 बजे लॉकडाउन की घोषणा कर दी, जिससे अवाम भी घबरा गयी। परिणामस्वरूप, हमने बड़े शहरों से प्रवासी मज़दूरों का व्यापक पैमाने पर पलायन देखा। भूख के डर से लाखों मज़दूर सैंकड़ों किलोमीटर दूर स्थित अपने घरों की ओर पैदल ही चल पड़े। इससे सामाजिक दूरी का विपरीत प्रभाव दिखायी दिया। हमारे मस्तिष्क में आनंद विहार और लाल कुंआ में फंसे हज़ारों मज़दूरों की तस्वीरें अभी भी ताज़ा हैं।

7. एक और कदम सरकार उठा सकती थी। लेकिन समय रहते उसने मॉल, सिनेमा हॉल, धार्मिक स्थलों, धार्मिक रैलियों/जुलूसों आदि सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध नहीं लगाया। अगर यही उपाय फरवरी के मध्य तक कर लिए जाते, तो निज़ामुद्दीन मरकज़ जैसे प्रकरण होते ही नहीं। निज़ामुद्दीन मरकज़ का मामला कोई अकेली घटना नहीं थी, उसी समय देश में कई धार्मिक सभाएं चल रही थीं। बल्कि, जब प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन की घोषणा की थी, तिरुपति में श्रद्धालु फंस गये थे और उन्हें बाद में निकालना पड़ा था। इसी तरह, वैष्णो देवी और हरिद्वार में भी लोग फंसे हुए थे और उन्हें बाद में निकाला गया था। यहां तक कि देश का संसद भी 23 मार्च तक जारी रहा।

8. मेरा आख़िरी सवाल राज्यों को दिये गये फंड में असमानता बरतने से जुड़ा हुआ है। इस मामले में भी राजनीति खेली गयी और विपक्ष द्वारा शासित प्रदेशों को कम मदद दी गयी। इसके अलावा, इस सरकार की प्राथमिकता सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को मंज़ूरी देनी थी, जिसकी लागत है 20,000 करोड़ रुपये। इस फंड का इस्तेमाल कोविड-19 से लड़ने की क्षमता बढ़ाने और देश की अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने में किया जा सकता था। रेज़िडेंट डॉक्टरों के कई समूह लगातार सरकार से सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने का निवेदन कर रहे हैं, लेकिन लगता है कि सरकार की कान में जूं तक नहीं रेंग रही। अब केंद्र सरकार ने एक और आदेश दे दिया है, जो कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई को हानि पहुंचा सकता है। केंद्र सरकार के आदेशानुसार अब राज्य सरकारें सुरक्षा उपकरण सीधे नहीं खरीद सकतीं। केवल केंद्र सरकार इन्हें खरीद सकती है, और वही राज्य सरकारों को वितरित कर सकती है। महामारी के बीच, ऐसे बेतुके विचार किसके मन में आये, यह एक रहस्य ही है।

हमारी सरकार की यह सारी सुस्ती/निष्क्रियता क्या दर्शाती है? यह केवल एक ही बात की ओर इशारा करती है कि उसे किसी की कोई परवाह नहीं!

 


(ये आलेख एक डॉक्टर का है जो नाम नहीं देना चाहते। वैसे भी, खुलेआम विराध करने वालों के लिए यह दौर ख़तरनाक हो चला है। )