न्यूनतम वेतन अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और हमारी आपराधिक चुप्‍पी

सुरजीत श्यामल
ख़बर Published On :


सुप्रीम कोर्ट ने देश के मजदूरों के न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत एक फैसला दिया है जिसके तहत कोर्ट ने कहा है कि न्यूनतम मज़दूरी के निर्धारण/संशोधन के लिए जारी की गई अधिसूचना में अनुभव के आधार पर अकुशल कर्मचारी को अर्धकुशल और अर्धकुशल और अकुशल बताने का अधिकार सरकार को नहीं हैं. कोर्ट ने यह फैसला हरियाणा सरकार के लेबर डिपार्टमेंट द्वारा जारी नोटिफिकेशन पर दिया है.

हरियाणा के श्रम विभाग ने न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम की धारा 5 के तहत जारी अधिसूचना के तहत श्रमिकों की निम्नलिखित श्रेणियों की चर्चा की है : अकुशल कर्मचारी जिनके पास पाँच साल का अनुभव है, उन्हें अर्ध-कुशल और ‘A’ श्रेणी में माना जाएगा; अर्ध-कुशल ‘A’ श्रेणी में तीन साल का अनुभव लेने के बाद कर्मचारी को ‘B’ श्रेणी का अर्ध-कुशल माना जाएगा और कुशल ‘A’ श्रेणी में तीन साल का अनुभव लेने वालों को ‘B’ श्रेणी का कुशल माना जाएगा.

हरियाणा सरकार के श्रम विभाग द्वारा जारी न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत नोटिफिकेशन को नियोक्ता संगठन के तरफ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी गई मगर हाईकोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया जिसके बाद उक्त नियोक्ता संघठन ने डबल बेंच में याचिका लगाईं जिसको भी हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने माननीय सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

इस केस की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने इस बारे में कहा, “इस तरह का श्रेणीकरण और एक श्रेणी के कर्मचारी को दूसरे श्रेणी का मानना नियोक्ता और कर्मचारी के बीच हुए क़रार और ख़िलाफ़ है और सरकार केअधिकार क्षेत्र के बाहर की चीज़ है”.

इसके साथ पीठ ने यह भी कहा कि सभी प्रशिक्षुओं को इस अधिसूचना में शामिल नहीं किया जा सकता, हालाँकि उसने ऐसे प्रशिक्षुओं के लिए निर्धारित न्यूनतम मज़दूरी को उचित बताया जिन्हें ईनाम के लिए नियुक्ति मिली है. पीठ ने कहा कि ऐसे प्रशिक्षु जिन्हें मज़दूरी नहीं मिलती है, उन्हें इस अधिसूचना में शामिल नहीं किया जा सकता है. पीठ ने यह भी कहा कि अधिनियम के अनुसार सरकार को प्रशिक्षण की अवधि या प्रशिक्षण के बारे में कोई नियम निर्धारण का कोई अधिकार नहीं है.

इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि ‘कर्मचारी’ ठेकेदारों द्वारा नियुक्त किए गए कामगारों को अधिनियम के अधीन लायेंगे.

29 अप्रैल 2019 को पीठ ने अपील को स्वीकार करते हुए कहा-

  • अधिसूचना में मज़दूरी को भत्ते में बाँटने की इजाज़त नहीं है;
  • सिक्योरिटी इन्स्पेक्टर/सिक्योरिटी ऑफ़िसर/सिक्योरिटी सुपरवाइज़र को इस अधिसूचना में शामिल नहीं किया जा सकता;
  • जिन प्रशिक्षुओं को नियुक्ति दी गई है पर उन्हें किसी तरह के लाभ का कोई भुगतान नहीं किया जा रहा है तो उसे इस अधिसूचना काहिस्सा नहीं बनाया जा सकता;
  • अकुशल कर्मचारियों को अनुभव के आधार पर अर्धकुशल बताना नियमविरुद्ध है;
  • प्रशिक्षण की अवधि को एक साल निर्धारित करना सरकार के अधिकार के बाहर है.

इसको देखें तो जो भी आर्डर दिया गया हैं वह न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत दिया गया हो, मगर हर हाल में मजदूर विरोधी फैसला है. आज चाहे वर्कर 20 साल से काम कर रहा हो या कोई फ्रेशर वर्कर हो, सभी को एकसमान न्यूनतम वेतन ही दिया जाता है. विगत कई वर्षों से काम कर रहे वर्करों के अनुभव और किसी फ्रेशर वर्कर का अनुभव कभी भी बराबर नहीं हो सकता. जब एक पुलिस में भर्ती हुआ सिपाही अनुभव के आधार पर दरोगा और डीएसपी बन सकता हैं तो एक न्यूनतम वेतन पर जीने वाले वर्करों के साथ इस तरह की नाइंसाफी किसलिए जज साहब?

अब भले ही सुप्रीम कोर्ट के मजदूरों के पक्ष में 26 अक्टूबर 2016 के समान काम का समान वेतन का फैसला भले ही न लागू हो पाया हो, मगर उक्त मजदूर विरोधी फैसला एक दो तीन में लागू होगा. सोसाइटी में बिना न्यूनतम वेतन के काम करने वाले सिक्योरिटी गार्ड की तरह अब फैक्ट्री, कंपनी आदि में काम करने वाले सिक्योरिटी गार्ड का दोहन होगा. इसके जिम्म्मेवार हम भी तो हैं- हम, हमारी चुप्पी, हमारी अनदेखी.


लेखक वर्कर वॉयस से जुड़े हैं