चुनाव चर्चा: तेज़ हुआ चुनावी तीर-तुक्कों का दौर 


2018 के बाद से जिन नौ राज्यों में चुनाव हुए हैं उनमें से त्रिपुरा को छोड़ शेष सभी में भाजपा की हार हुई है।




चंद्र प्रकाश झा 

17 वीं लोकसभा चुनाव के लिए माह भर से ज्यादा अवधि में सात चरणों का मतदान 11 अप्रैल को शुरू होने के पहले ही उनके परिणामों को लेकर पेशेवर पोल्स्टरों, राजनीतिज्ञों और धुरंधर पत्रकारों-टीकाकारों तक के पूर्वानुमान में तेजी आने लगी है।

एनडीटीवी के एक ब्लॉग पर एक आलेख में यहाँ तक कह दिया गया कि भारत के राष्ट्रपति द्वारा चुनाव के बाद मौजूदा प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को ही नई सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने की संभावना है क्योंकि उनकी भारतीय जनता पार्टी के नई लोक सभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने की उम्मीद है।

इस आलेख की तर्ज़ पर एक टीकाकार ने फरमाया कि अगर भाजपा, सबसे बड़ी पार्टी होती है और बहुमत विपक्षी दलों का होता है तो भी राष्ट्रपति कोविन्द मोदीजी को ही नई सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे। उस हालत में अगर विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई तो उच्चतम न्यायालय भी राष्ट्रपति के ही निर्णय का अनुमोदन करेगा।  टीकाकार ने गोआ और मणिपुर के पिछले विधान सभा चुनाव के बाद की स्थिति का उल्लेख करते हुए यह भी फरमाया कि ऐसे में मोदी जी को अपनी अल्पमत सरकार के स्थायित्व के लिए आवश्यक संख्या में विपक्षी लोक सभा सदस्यों का ‘ जुगाड़ ‘ करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। ऐसे में मोदी जी को नई सरकार बनाने से रोकने के लिए जरुरी है कि भाजपा के जीतने वाले लोकसभा सदस्यों की कुल संख्या 80 से नीचे ही रहे। और यह तभी संभव होगा जब इस चुनाव में कोई मोदी -विरोधी लहर हो।

बहरहाल, कुछ अन्य टीकाकारों का सांख्यिकी के हवाले से कहना है कि  2014 के पिछले चुनाव में मोदी लहर होने के बावजूद भाजपा ने तमिलनाडू , केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, ओड़िसा और पश्चिम बंगाल की कुल 193 सीटों में से 21 ही जीती थी।  इनमें से भी 17 कर्नाटक की थी  जहां अब कांग्रेस एवं पूर्व प्रधानमन्त्री एच.डी.देवेगौड़ा के नेतृत्व वाले जनता दल-सेकुलर की कांग्रेस के साथ गठबंधन की सरकार है।  इस गठबंधन का वोट शेयर 56 प्रतिशत है।  इस चुनाव में कोई मोदी लहर नज़र नहीं आती और भाजपा का इन राज्यों में तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्ना द्रमुक को छोड़ कहीं किसी से गठबंधन नहीं है।  अन्नाद्रमुक का भी विभाजन हो गया है और उसके कोई भी सीट जीतने की संभावना नहीं लगती है।  ऐसे में इन सात राज्यों की कुल 193 सीटों में से भाजपा को पांच से 10 सीटें ही मिल सकती हैं।

उत्तर प्रदेश में 80 लोक सभा सीटें हैं जहां 2014 के पिछले चुनाव में  सभी प्रमुख विपक्षी दलों के अलग-अलग चुनाव लड़ने से भाजपा ने 71 जीत ली थी।  इस बार के चुनाव में वहाँ पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल का महागठबंधन है जिसका कुल वोट शेयर 44 प्रतिशत है।  पिछली बार मोदी लहर होने के बावजूद भाजपा का वोट शेयर 42 प्रतिशत ही था।  इस बार उसे 20 से 25 सीटें ही मिल सकती हैं। इस  महागठबंधन में अगर कांग्रेस भी शामिल होती तो फिर भाजपा को एक भी सीट मिलनी मुश्किल थी।

पिछले वर्ष के लगभग आखिर में जिन पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव हुए थे उनमें से कांग्रेस की जीती राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुल 60 लोक सभा सीटें है।  ऐसे में भाजपा को इन तीनों राज्यों में 30 से अधिक सीटें मिलनी मुश्किल है।  उपरोक्त राज्यों की कुल 333 सीटों में से भाजपा को 65 से अधिक सीटें मिलनी मुश्किल नज़र आती है।  अब अन्य राज्यों की कुल 207 सीटें ही रह जाती है।  इनमें से भाजपा 206 जीते, तभी उसे नई लोक सभा में स्पष्ट बहुमत हासिल करने के लिए आवश्यक 271 सीटें मिल सकती है।  ऐसा होना लगभग असंभव लगता है।  भाजपा को इन 207 सीटों में से न्यूनतम 70 और अधिकतम 135 सीटें मिल सकती हैं

हम आज के अंक में राजस्थान की संक्षिप्त चर्चा करेंगे जहाँ  2014 के पिछले लोक सभा चुनाव में  सभी 25 सीटें तब राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने जीती थी।  लेकिन बाद में  अलवर और अजमेर की दो लोक सभा सीटों पर उपचुनाव में कांग्रेस की जीत हुई थी। आम चुनाव में  भाजपा को 54.53 प्रतिशत, कांग्रेस को 32. 59 प्रतिशत, बहुजन समाज पार्टी को 2.17 प्रतिशत , अन्य दलों को 4.27 प्रतिशत और निर्दलीयों को 6. 44 प्रतिशत मत मिले थे।  मीडिया की ख़बरों के मुताबिक़ चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ हमला तेज कर दिया है। पार्टी के नेता एवं राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि मोदी जी के  2014 के पहले वाले भाषण चला दें तो कांग्रेस को प्रचार की जरूरत नहीं होगी।  उनका कहना है कि मोदी जी ने जिस तरह का व्यवहार विपक्ष और संवैधानिक संस्थाओं के साथ किया उससे यही लगता है कि देश और संविधान खतरे में है। उन्होंने  करोड़ो रुपए प्रचार में फूंक दिए।

भाजपा की  कोशिश है कि युद्धोन्माद को लोकसभा चुनाव तक बनाए रखा जाए। पिछले चुनाव में 4 करोड़ 28 लाख मतदाता थे जिनमें से करीब 48 हज़ार मतदान केंद्रों पर 63 प्रतिशत से कुछ अधिक ने वोट डाले थे।  इस बार कुल 4 करोड़ 86 लाख मतदाता हैं जिनमें से 2.32 करोड़ महिला और 231 ‘थर्ड जेंडर’ भी शामिल है। इस बार 51965 मतदान केंद्रों  की स्थापना की जाएगी। राजस्थान में चौथे चरण में 13 सीटों के लिए 29 अप्रैल को और  पांचवें चरण में 12 लोकसभा सीटों के लिए 6 मई को मतदान होगा।

गौरतलब है कि 2014 के पिछले लोक सभा चुनाव के बाद से 25 राज्यों में विधान सभा चुनाव हुए हैं।  भाजपा इनमें से 15 में हारी है जिनमें उसके शासित पंजाब, कर्नाटक, मध्य प्रदेश , राजस्थान और छत्तीसगढ़ शामिल हैं। बिहार में वह हार जाने के बाद राजनीतिक तिकड़म से नितीश कुमार सरकार से राष्ट्रीय जनता दल को हटा कर सत्ता में भागीदार बन सकी। गुजरात में उसे बड़ी मुश्किल से सात सीटों के अंतर से बहुमत मिला।   गोआ और मणिपुर में भी वह तिकड़म और राज्य पालों की मदद से सत्ता में आ सकी। वर्ष 2018 के बाद से जिन नौ राज्यों में चुनाव हुए हैं उनमें से त्रिपुरा को छोड़ शेष सभी में भाजपा की हार हुई है।  देखना यह है कि मतगणना के पहले सात चरणों का मतदान होने तक चुनाव परिणामों को लेकर क़यास कितने बदलते हैं।

(मीडिया विजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है।)