यंत्र सभ्यता का विकल्प खोजे बगैर अंग्रेजी को हटाने की बात निरर्थक है: प्रसन्ना

मीडिया विजिल मीडिया विजिल
आयोजन Published On :


बनारस में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन के पचास साल पूरे होने पर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पाणिनी भवन में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसका उदघाटन कन्नड़ रंगमंच के प्रमुख हस्ताक्षर श्री प्रसन्ना ने किया। “अंग्रेजी हटाओ,भारतीय भाषा बचाओ” सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रसन्ना ने कहा कि अंग्रेजी व्यापारी भाषा है, यह यंत्र सभ्यता से जुड़ी है।

“यंत्र सभ्यता के बारे में हमारी जो समझ है उस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। इसका विकल्प खोजे बिना अंग्रेजी को हटाने की बात निरर्थक है। इस कारण मैं हाथ से काम करने वालों के साथ जुड़ा हूँ।” यह बातें प्रसन्ना ने कहीं। प्रसन्ना पिछले दिनों हस्तशिल्प पर जीएसटी लगाए जाने के खिलाफ़ अनशन पर बैठे थे और उनके आंदोलन कोई तमाम लेखकों कलाकारों ने अपना समर्थन दिया था। सम्मेलन में प्रसन्ना ने कहा कि संस्कृति के साथ भाषा को जोड़ना होगा और गांधीजी से रचनात्मक कार्यों से सीख लेनी होगी।

रंगकर्मी प्रसन्‍ना के कर अवज्ञा सत्‍याग्रह को देश भर के जन आंदोलनों ने दिया समर्थन

शिक्षाविद प्रोफेसर अनिल सदगोपाल ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार का पांच हजार अंग्रेजी के प्राइमरी स्कूल खोलने का आदेश बेहद खतरनाक है। इस आदेश का असली मकसद स्कूलों का निजीकरण है। समाजशास्त्री प्रोफेसर आनंद कुमार ने भारतीय भाषा आंदोलन को आजादी के आंदोलन से जोड़ते हुए कहा कि हमें निराशा से घबराने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के बाद के पचास वर्षों में दक्षिण तथा पूर्वोत्तर भारत मे हिंदी की स्वीकार्यता बढी है।

भाषा संग्रामी श्याम रुद्र पाठक ने कहा कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में अंग्रेजी का माध्यम व अनिवार्यता नहीं है तथा चयन के बाद राज्य की भाषा उन्हें सिखाई जाती है। यही व्यवस्था सभी नीचे की परीक्षाओं में होनी चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भाषाविद जोगा सिंह विर्क ने कहा कि अंग्रेजी के प्रयोग से पांच गुना समय तथा लाखों करोड़ रुपए स्वाहा हो रहे हैं।

‘अंग्रेज़ी हटाओ आंदोलन’ के बनारस गोलीकांड की स्‍वर्ण जयंती पर सुगबुगाहट

सम्मेलन के दूसरे सत्र में नौ महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित हुए तथा उत्तर प्रदेश सरकार के निर्णय के विरुद्ध धरना प्रदर्शन का निश्चय किया गया। सम्मेलन में देश भर में चल रहे भाषाई आंदोलनों को समन्वित करने का फैसला लिया गया। सम्मेलन में मुख्यतः विजयनारायण, डॉ स्वाति, सुरेंद्र प्रताप, महेश विक्रम, राधेश्याम सिंह, लोलार्क द्विवेदी, योगेन्द्र नारायण, चौधरी राजेन्द्र, नीता चौबे, विजेंदर मीणा, लक्ष्मण मौर्य, सुनील सहस्रबुद्धे, शिवेंद्र मौर्य आदि ने विचार व्यक्त किए। संचालन अफलातून ने किया।


Related