उमर ख़ालिद की ज़मानत न होने पर अमेरिकी मानवाधिकार संगठनों ने निंदा की

Mediavigil Desk
माइनॉरटीज़ मैटर Published On :


दिल्ली हिंसा मामले मे पाँच साल से जेल में बंद उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत न होने का मुद्दा अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींच रहा है। अमेरिका के कई मानवाधिकार संगठनो  ने अफ़सोस जताया कि बिना अपराध प्रमाणित हुए ये नौजवान जवानी के तमाम साल जेल के पीछे बिताने को मजबूर हैं। यहाँ तक कि इतने वर्षों में पुलिस चार्जशीट तक दायर नहीं कर सकी है। ऐसे में ज़मानत दिया जाना किसी भारत के सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों के हिसाब से भी ज़रूरी था। सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि बेल नियम है जबकि जेल अपवाद।

मानवाधिकार के क्षेत्र में सक्रिय इंयन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (आईएएमसी) ने इस फैसले पर गहरा असंतोष जताया है। काउंसिल ने हैरानी जतायी कि कोर्ट ने इन दोनों से एक और साल तक जमानत मांगने का अधिकार भी छीन लिया, जबकि ये दोनों व्यक्ति पहले से ही पांच साल से बिना मुकदमे के जेल में बंद हैं। आईएएमसी के अध्यक्ष मोहम्मद जवाद ने कह, “उमर खालिद और शरजील इमाम का एकमात्र गुनाह यह था कि उन्होंने माना कि मुसलमान भी किसी अन्य समूह की तरह ही भारतीय हैं।  पांच साल बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार उन्हें इस बात की सजा दे रही है कि उन्होंने भारतीय संविधान के बहुलवादी मूल्यों को त्यागने से इनकार कर दिया। यह बहुत शर्मनाक है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी स्वतंत्रता और न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को कुर्बान कर मोदी सरकार के नागरिक समाज पर दबाव को वैध ठहरा रहा है।

उमर खालिद और शरजील इमाम को 2020 में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) के तहत गिरफ़्तार किया गया है जो भारत का सख्त आतंकवाद विरोधी कानून है। ये गिरफ्तारी तब हुई जब वे नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों में छात्र नेता के रूप में उभरे थे। सीएए एक ऐसा कानून है जो मुसलमानों को तेजी से नागरिकता पाने के अधिकार से बाहर रखता है। इन दोनों पर उस साल दिल्ली में हुई हिंसा भड़काने का आरोप लगाया गया, जिसमें 50 से ज्यादा लोग मारे गए थे, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम थे।हालांकि इस बात के तमाम प्रमाण हैं कि हिंसा के मुख्य जिम्मेदार हिंदूत्ववादी नेताओं द्वारा उकसाई गयी कट्टरपंथी भीड़ थी। ये भीड़ बीजेपी से जुड़े इन नेताओं की हिंसक बातों से उत्साहित हुई थी – न कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के भाषणों से। इसके बावजूद भारतीय न्याय व्यवस्था ने यह मान रखा है कि खालिद और इमाम ने हिंसा में “मुख्य और निर्णायक भूमिका” निभाई थी। उमर खालिद तो घटना के समय दिल्ली में भी नहीं था।

ऐसे फ़ैसलों से भारत की छवि पर काफी बुरा असर पड़ सहा है। अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) कई सालों से खालिद और इमाम को फ्रैंक आर. वुल्फ धार्मिक स्वतंत्रता पीड़ितों की सूची में रखता है। इस सूची में उन कैदियों के नाम होते हैं जो अपनी धार्मिक पहचान के कारण या कमजोर धार्मिक अल्पसंख्यकों के हक में बोलने के कारण जेल में डाले गए हैं।खालिद को विशेष रूप से दुनिया भर में अंतरात्मा का कैदी माना जाता है। कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने उनकी रिहाई की मांग की है, जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और इंटरनेशनल कमिटी ऑफ जूरिस्ट्स। न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने खालिद को एक व्यक्तिगत पत्र लिखा था, जिसे हाल ही में खालिद की साथी ने सोशल मीडिया पर साझा किया।

पिछले सप्ताह अमेरिकी कांग्रेस के आठ सदस्यों ने – जिम मैकगवर्न और जेमी रास्किन के नेतृत्व में – भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा को पत्र लिखकर अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार खालिद की रिहाई की मांग की।पत्र में कहा गया: “उमर खालिद को यूएपीए के तहत 5 साल से जमानत के बिना हिरासत में रखा गया है। स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह कानून कानून के सामने समानता, न्याय प्रक्रिया और उचित अनुपात के अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन कर सकता है। भारत को व्यक्तियों को उचित समय में मुकदमा देने या रिहा करने और दोषी साबित होने तक निर्दोष मानने के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।”


Related