हेडलाइन मैनेजमेंट: विपक्ष के 26 दल के मुकाबले सत्तारूढ़ दल के 38 दल!

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
मीडिया Published On :


आज इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ नवोदय टाइम्स में विपक्षी एकता की बैठक एक तरह से प्रकाशित हुई है। मुख्य खबर विपक्ष एकजुट हो रहा है तो उसके साथ सत्तारूढ़ राजग की बैठक में 38 दल शामिल होंगे – छपी है। जाहिर है यह, तथाकथित निष्पक्ष और संतुलित पत्रकारिता का एक रूप है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर में अंदर बताया गया है कि कांग्रेस के साथ 26 दल हैं और साथ में प्रकाशित भाजपा की खबर में 38 दल शीर्षक में ही हैं। दोनों समूहों में एक का मकसद सत्तारूढ़ दल को लोकतांत्रिक तरीके से चुनावों में हराना है तो दूसरा येनकेन प्रकारेण सत्ता में बने रहना चाहता है। पर खबरों से यह उद्देश्य गायब है और चुनाव को भी क्रिकेट के खेल की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। 

द टेलीग्राफ ने बैंगलोर में विपक्षी दलों की इस बैठक की खबर का शीर्षक दिया है, लंबी यात्रा का एक पहला कदम। निश्चित रूप से यह एक नजरिया है पर खबर भी यही है। हमेशा खबर यह नहीं हो सकती है कि विपक्ष ने 26 दलों की बैठक की तो सत्तारूढ़ दल की बैठक में 38 दल आयेंगे। जब शीर्षक ऐसा होगा तो जाहिर है, खबर की यह बात दब जाएगी कि 38 दलों में वो भी हैं या ज्यादा हैं अथवा कम हैं जो दूसरे दलों में तोड़-फोड़ कर भाजपा के साथ आये हैं या रहने को मजबूर हैं या किये गये हैं। यह सब बताना तथ्यों को प्रस्तुत करना है और इसके लिए तथ्य होने भी चाहिए। विज्ञप्ति से बनी खबर अलग होती ही है। 

वंशवाद का विरोध तो ठीक है पर खुद सुपात्र की जगह सुपुत्र को बैठाया ही गया है और 50 साल में जो ‘सुपात्र’ मिला उसकी योग्यता व प्रदर्शन के बारे में अब किसी को बताने की जरूरत नहीं है तो यह पत्रकारिता और प्रचारकों के प्रदर्शन का रूप है। आज इंडियन एक्सप्रेस के अलावा यह खबर इस तरह हिन्दुस्तान टाइम्स में भी छपी है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू में दोनों ही खबरें पहले पन्ने पर इतनी प्रमुखता से नहीं हैं। नवोदय टाइम्स ने भी यही किया है – ऊपर विपक्ष का संदेश और नीचे 38 दलों की बैठक। यहां ‘नए साथियों’ के नाम भी प्रमुखता से दिये गए हैं और इससे 38 दलों की पोल खुलती है पर अंग्रेजी के अखबारों में ऐसा नहीं है। 

नए साथियों के नाम से आप समझ जाएंगे कि ये दल नाम के लिए ही हैं और इनके नाम भी बताते हैं कि यह मूल दल से अलग हुआ गुट है। इनमें शिवसेना का शिन्दे गुट और एनसीपी का अजित पवार गुट शामिल है। आप जानते हैं कि महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनी रहे इसके लिए इन दोनों दलों में तोड़फोड़ करवाई गई है या की गई है। चुनाव से पहले सत्तारूढ़ दल से भिड़ने की विपक्ष की कोशिश और प्रस्तुति के इस अंदाज के साथ एक और बात महत्वपर्ण है और वह है सरकार के खिलाफ खबरों को महत्व नहीं देना। पूरी तरह गोल कर देना या कहीं कोने में साधारण शीर्षक से छाप देना। 

आज मणिपुर की एक खबर उदाहरण है। आप जानते हैं कि वहां लंबे समय तक हिंसा होती रही और सरकार उसे रोक पाने में नाकाम रही। और तो और प्रधानमंत्री ने उसपर कुछ कहा भी नहीं है और पूरा मामला 2002 के गुजरात जैसा लगने लगा है। पर अखबारों में उसकी खबरें आमतौर पर नहीं रहती हैं। इसमें कोर्ट की खबरें भी शामिल हैं। द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर प्रकाशित एक खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर सरकार को नेट प्रतिबंध पर राहत देने से मना कर दिया। खबर के अनुसार मणिपुर में इंटरनेट 75 दिनों से बंद है और इसके बारे में कहा जा चुका है कि आज के समय में इंटरनेट बंद करना, ‘मानवाधिकार उल्लंघन से कम कुछ नहीं है’। 

ऐसे में मणिपुर हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि राज्य सरकार अलग-अलग मामलों के आधार पर इंटरनेट कनेक्शन मुहैया कराने की व्यवहार्यता का पता लगाये। राज्य के विधि अधिकारी ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में व्यावहारिक दिक्कतों का हवाला दिया तो अदालत ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि राज्य सरकार की शिकायतों के बारे में हाईकोर्ट को बतायें। जाहिर है, सरकार ने उन लोगों का भी इंटरनेट बंद कर रखा है जिनका हिंसा से कोई लेना-देना नहीं है। अदालत ने कहा है कि अगर सबको इंटरनेट की सुविधा नहीं दी जा सकती है तो उन्हें दी जाए जिन्हें नहीं देने का कोई कारण नहीं है। अब सरकार व्यावहारिक दिक्कतों का हवाला दे रही है लेकिन जनता की दिक्कतों के बारे में कौन सोचेगा और उसे राहत कौन दिलायेगा। फिर भी खबर नहीं छपेगी और राज्य सरकार मनमानी करने के लिए लगभग आजाद है। 

इतने समय में अपराधियों पर नियंत्रण हो जाना चाहिए था, उनकी पहचान कर उनपर कार्रवाई होनी चाहिए थी न कि उनके डर से इंटरनेट बंद रखकर आम लोगों को जरूरी सुविधा से वंचित रखा जाना चाहिए। यही नहीं, अगर इंटरनेट का उपयोग अपराध के लिए होगा तो अपराधी पकड़े भी जा सकेंगे उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिये था या उन्हें गिरफ्तार करने के लिए इंटरनेट चलने देना चाहिए था। पर सरकार ने सबसे आसान उपाय चुना और जवाब तो नहीं ही है। मीडिया फिर भी सवाल नहीं कर रहा है। उल्टे खबर भी नहीं छाप रहा है। 

इसी तरह, आज इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है, आशंकाओं के बीच सरकार ने सर्वेक्षणों के व्यवहार की समीक्षा के लिए एक पैनल बनाया। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार मानती है कि सर्वेक्षण परिणाम सामान्य नहीं है और उसकी समीक्षा होनी चाहिए। आप जानते हैं कि सरकार (और प्रधानमंत्री) की तारीफ करने वाले सभी सर्वेक्षणों, संस्थाओं और लोगों को महत्वपूर्ण व साख वाला बता दिया जाता है पर खिलाफ नतीजा हो तो एजेंसी बुरी, आंकड़े गलत सर्वेक्षण ठीक नहीं आदि की आड़ ली जाती है। अच्छी और नामी संस्थाएं इस लपेटे में आ चुकी हैं और नामालूम सी संस्थाओं को खूब प्रचार मिला है। पर मुद्दा यह नहीं है। 

मुद्दा यह है कि एक तरफ तो सरकार को सर्वेक्षणों की समीक्षा की जरूरत लग रही है दूसरी तरफ आज ही द हिन्दू ने पहले पन्ने पर नीति आयोग की रिपोर्ट के आधार पर खबर छापी है कि 13.5 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकाला गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि नीति आयोग की इस रिपोर्ट को मान लेना चाहिए पर जो आंकड़ें हैं ही नहीं और जिन्हें पीआईबी की नई बनी फैक्ट चेक इकाई से गलत कहलवाने की तैयारी और योजना है वह किस लिये? जनता जानती है कि 2014 के बाद से आंकड़ों का कैसा अकाल रहा है और आरटीआई कानून के तहत कौन सी जानकारियां और सूचनाएं नहीं दी गई हैं। यहां तक कि जानकारी देने के आदेश को लागू करने की अपील पर जुर्माना भी लगाया गया है। और इसीलिए ऐसी व्यवस्था है कि हत्यारे, अपराधी और बलात्कारी तो छूट जा रहे हैं लेकिन सभी चोरों के नाम मोदी क्यों हैं पूछने के लिए राहुल गांधी की संसद की सदस्यता चली गई। 

शेल कंपनियां बंद कराने का इतना प्रचार किया गया और यह पता नहीं चला कि अडानी की कंपनियों में 20,000 करोड़ रुपये के निवेश किसके हैं। स्थिति यह हो गई है कि जेबकतरों पर तो कार्रवाई हो रही है पर लुटेरे बच जा रहे हैं या सरकार में शामिल कर लिये गये हैं। दूसरी ओर, तमाम अपराधियों का पता नहीं चला और छूट गए सो अलग। यही नहीं, मंत्रियों को भी जांच चलने तक जमानत नहीं मिल रही है और जांच है कि पूरी ही नहीं हो रही है ना सबूत सार्वजनिक किये जा रहे हैं। सरकार निष्पक्ष होने का दावा तो कर ही रही है ईडी के निदेशक को गैर कानूनी विस्तार देकर अकेला सब पर भारी होने का दावा व प्रचार भी चल रहा है। एक तरफ तमाम भ्रष्टाचारियों के साथ मिलकर सरकार बनाई जा रही है तो दूसरी तरफ विरोधी या विपक्षी सूचनाओं को रोकने की कोशिशें खुलेआम जारी हैं।       

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।