मुख्यधारा की पत्रकारिता और संबद्ध क्षेत्रों में दो दशक का अनुभव रखने वाली प्रीति नागराज मैसूर में रहती हैं। राजनीति, संस्कृति, साहित्य और थिएटर इनके प्रिय विषय हैं। प्रीति कई चुनाव कवर कर चुकी हैं और कर्नाटक के सामाजिक-सांस्कृतिक व राजनीतिक इतिहास में दक्ष हैं। इन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स, दि न्यूज़ मिनट और स्क्रोल के लिए स्वतंत्र लेखन किया है और दि न्यू इंडियन एक्सप्रेस, सीएनबीसी टीवी 18, इंटेल इंडिया और डेकन हेराल्ड में काम कर चुकी हैं। वे कन्नड़ में भी लिखती हैं और प्रजावाणी की लोकप्रिय स्तंभकार हैं। मीडियाविजिल के लिए ”ग्राउंड ज़ीरो कर्नाटक” नाम के इस विशेष कॉलम में वे कर्नाटक चुनाव की विविध नज़रिये से कवरेज करेंगी और नई सरकार बनने तक पाठकों को चुनावी घटनाक्रम से अवगत कराती रहेंगी। आज प्रस्तुत है इस कड़ी की तीसरी स्टोरी- संपादक
प्रीति नागराज
चुनाव आचार संहिता के मद्देनज़र गुरुवार की शाम कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार की अवधि समाप्त हो गई। अब इस राज्य की जनता अपनी अगली सरकार चुनने के लिए कल मतदान करेगी। आज पार्टियां केवल दरवाज़े-दरवाज़े जाकर प्रचार कर रही हैं। कोई भी सार्वजनिक प्रचार कार्यक्रम करने की मनाही है। राज्य की 223 सीटों के लिए प्रतिनिधि चुने जाने हैं। बंगलुरु के जयनगर में चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी प्रत्याशी जयकुमार की मौत के चलते वहां मतदान नहीं होगा। मतों की गिनती 15 मई को होनी है और नतीजे दोपहर होते-होते साफ़ हो जाएंगे।
इस बार का कर्नाटक चुनाव देश भर के आकर्षण का केंद्र रहा। इसके कई कारण थे। कुछ कारण तो बेहद स्वाभाविक और सहज हैं। मसलन, लोगों की निगाह इस बात पर है कि क्या कर्नाटक का चुनाव नरेंद्र मोदी और अमित शाह के चुनावी अश्वमेध पर कोई लगाम लगा पाएगा या नहीं, जो एक के बाद एक राज्यों में बीजेपी की सरकारें बनाने में कामयाब होते जा रहे हैं। साथ ही एक कारण यह भी नत्थी है कि क्या कांग्रेस सिद्धरामैया की अगुवाई में दक्षिण का अपना पुराना किला अपने पास कायम रख पाएगी या नहीं।
बीजेपी का चुनाव प्रचार सबसे ज्यादा आक्रामक रहा है। शुरुआत में तय हुआ था कि नरेंद्र मोदी केवल सात रैलियां करेंगे लेकिन उन्होंने अंत आते-आते कुल 21 रैलियां कर डालीं। प्रचार के आखिरी दिन तक मोदी रैली करते रहे तो इसकी बड़ी वजह यह थी कि बीएस येदियुरप्पा के कार्यकाल में बीजेपी की भ्रष्ट छवि मतदाताओं के मन में जम चुकी थी जिसे निकालना ज़रूरी था। इन सभी रैलियों में मोदी ने सत्ताधारी दल पर अपनी विशिष्ट शैली में सीधा हमला किया। बाकी काम अमित शाह ने कर डाला। शाह पिछले कुछ महीनों से कर्नाटक में डेरा डाले हुए हैं। वे स्थानीय टीमों से मिलकर विभिन्न इलाकों में रणनीतियां बनाने में लगे हुए थे।
जहां तक कांग्रेस की बात है, रैलियां राहुल गांधी ने भी कीं लेकिन अपने विनम्र स्वर से लोगों में अपील पैदा की। क्या वे कामयाब रहे? एक अर्थ में कह सकते हैं कि हां, चूंकि उनकी भंगिमा मोटे तौर पर दक्षिण भारत के अनुकूल रही जो अनाक्रामक, विनम्र और मौन है। जहां विरोधी पर हमला किए बगैर अपनी बात रखी जाती है। रोजगार और पूंजी निर्माण के मामले में दक्षिणी राज्य अपेक्षया ज्यादा प्रगतिशील और कम जातिवादी रहे हैं।
चुनावों पर सबसे ज्यादा असर डालने वाले प्रभावशाली समुदायों में एक कुरुबा से आने वाले सिद्धरामैया पर मोदी ने जिन शब्दों और भाषा के सहारे हमला किया, उसे मतदाताओं ने गले नहीं लगाया। बाकी के समुदाय भी इसे ठीक नहीं मानते। कांग्रेस के प्रति इन मतदाताओं और समुदायों का चाहे जैसा रुख़ हो, लेकिन सियासी समझदारी और ज़मीनी जुड़ाव के मामले में सिद्धरामैया की शख्सियत पर यह हमला उन्हें नागवार गुज़रा है। अपशब्दों और भ्रष्टाचार के आरोपों के सहारे चुनाव प्रचार करने वाले येदियुरप्पा खुद भ्रष्श्टाचार के चलते जेल हो आए हैं। लिहाजा उनके प्रचार ने बीजेपी के भीतर की दरारों को खोल कर रख दिया।
जनता दल सेकुलर (जेडीएस) कुल मिलाकर पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की पारिवारिक पार्टी बनकर रह गई है जिसमें उनके बेटे, बहुएं और पौत्र बचे हैं। इन्हें कुछ सीटें आ सकती हैं जो सत्ता की कुर्सी संभालने वाले के लिए कुशन का काम करेंगी। यह तय है कि जेडीएस इस चुनाव में इसी भूमिका के लिए खुद को तैयार भी पा रहा है।
मोदी और शाह ने इस चुनाव प्रचार में कवियों, लेखकों से लेकर ईश्वर तक का आह्वान किया। दूसरी ओर सिद्धरामैया पर विभाजनकारी राजनीति करने का आरोप लगाया। वे लगातार एक मुद्दे से दूसरे मुद्दे पर उछलते नज़र आए। एक मौके पर तो कर्नाटक के मतदाताओं को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त आदि के नाम भी सुनने को मिले जिनका इस राज्य से कोई लेना-देना नहीं है। इसका सीधा सा मतलब यह बनता है कि 2019 में होने वाली बड़ी जंग के लिए यह चुनाव एक भूमिका तैयार करने का काम करेगा।
सिद्धरामैया ने कहीं तो बीजेपी के आरोपों का जवाब दिया लेकिन कुछ जगहों पर वे बिलकुल शांत नज़र आए। वे चामुंडेश्वरी और बदामी से लड़ रहे हैं। उनके बेटे डॉ. यतीन्द्र वरुणा से लड़ रहे हैं। उन्होंने लोकप्रिय किसान नेता पुट्टनैया के अमेरिका-रिटर्न बेटे दर्शन पुट्टनैया को भी समर्थन दिया है जिन्हें मेलकोट से स्वराज इंडिया पार्टी ने इकलौता टिकट दिया है। दर्शन इस चुनाव में सबसे दर्शनीय प्रत्याशियों में एक माने जा सकते हैं जिनका कई देशों में प्रौद्योगिकी का कारोबार है लेकिन हाल ही में जिन्हें अपने पिता की मौत के बाद देश लौटना पड़ा है। पुट्टनैया सर्वाधिक लोकप्रिय किसान नेता हैं जिन्हें जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त था।
इस बार कर्नाटक के चुनाव में सबसे ज्यादा तजुर्बेदार प्रत्याशी सिद्धरामैया हैं जो अपने समकालीनों पर भी भारी हैं। राज्य का 14 बार बजट पेश कर चुके सिद्धरामैया ने चुनावों की तैयारी काफी पहले से शुरू कर दी थी। उन्होंने कन्नडिगा पहचान पर अपना जनाधार विकसित किया है। इस बार चुनाव से पहले उन्होंने लिंगायत समुदाय को एक अलग धर्म के बतौर पहचान देने की सिफारिश की थी। लंबे समय से इस समुदाय के लोग इसकी मांग कर रहे थे।
यह कारक निर्णायक साबित हो सकता है चूंकि बीजेपी के मुख्यमंत्री प्रत्याशी इसी समुदाय से आते हैं। इस लिहाज से सिद्धरामैया ने मुद्दे की हवा ही निकाल दी है। इसके अलावा सिद्धरामैया ने मोदी के ऊपर 100 करोड़ का मानहानि का मुकदमा कर दिया है। इसका चुनाव पर कितना असर पड़ेगा, यह तो बाद में ही समझ आएगा।
इसके अलावा, अल्पसंख्यक समूहों, लिंगायत मठों और अभिनेता प्रकाश राज ने भी परोक्ष तरीके से कांग्रेस पर ही दांव खेला है। इनका मुद्दा बेहद साधारण रहा है- सांप्रदायिक राजनीति के चलते बीजेपी को राज्य से भगाओ।
इस बीच बीजेपी के सदस्यों द्वारा किराये पर लिए गए एक मकान से बरामद 10,000 वोटर आइडी ने पार्टी की छवि को तगड़ा नुकसान पहुंचा दिया है। अफ़वाहें तो यह भी थीं कि बदामी के बीजेपी प्रत्याशी श्रीरामुलु ने बीजेपी के भीतर मौजूद खनन माफिया गिरोह के लंबित मामलों को निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज के साथ 150 करोड़ के ‘सौदे’ की बात की थी। एक और बड़ा झटका बीजेपी को राजाजीनगर क्षेत्र के प्रतिष्ठित नेता सुरेश कुमार की बेटी डॉ. दिशा के संबंध में उड़ी अफ़वाहों से लगा कि पुलिस ने उससे पैसे बांटने के आरोपों को लेकर पूछताछ की है।
चुनाव प्रचार कवर कर रहे पत्रकारों की मानें तो कुछ दलों को पैसे बांटने में कोई दिक्कत नहीं हुई है जबकि कुछ के खिलाफ़ इतनी जबरदस्त सख्ती है कि वे पैसे तक पहुंच ही नहीं बना पा रहे। पूरे राज्य से हालांकि काफी मात्रा में नकदी ज़ब्त की गई है। इसका असर मतदाताओं पर होगा या नहीं, यह भी 15 को ही समझ आएगा।
इस बीच गुजरात से विधायक जिग्नेश मेवाणी, डॉ. कफ़ील खान और मानवाधिकार कार्यकर्ता नदीम खान ने गुरुवार को बंगलुरु में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के अपने-अपने राज्यों में बीजेपी की कारस्तानियां गिनवाईं। इन्होंने तकरीबन सीधे स्वर में कहा कि ”बीजेपी को वोट न दें”। इनका कहना था कि कर्नाटक को मोदी-योगी छाप विकास नहीं चाहिए। इन्होंने बताया कि यूपी में दलितों और अल्पसंख्यकों को व्यवस्थित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है।
केवल चार दिन बाद 15 मई को साफ़ हो जाएगा कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा और समूचे भारत को साथ ही इस बात का अंदाज़ा भी लग जाएगा कि 2019 का लोकसभा चुनाव कैसा रहने वाला है। फिलहाल, कर्नाटक इस बात से खुश है कि देश की निगाह उसके ऊपर है।
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