बंगाल विधानसभा चुनाव में धार्मिक फंडामेंटलिज़्म की दस्तक!

राम मानो, उनकी पूजा करो, लेकिन राम को राजनीति से अलग रखो।वरना राम फिर भगवान नहीं राजनीतिक अस्त्र बन जाएँगे।अफसोस की बात है भाजपा के प्रचार से देस में यही हो रहा है। राम को उपासना के प्रतीक की बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रतीक बना दिया गया है।उल्लेखनीय है ‘जय श्री राम’ का नारा, मूलतः 1971के बंगलादेश मुक्ति संग्राम में उठे ‘जय बांग्ला’ की नक़ल करके गढ़ा गया।उसके पहले भारत में जय श्री राम का नारा कोई नहीं बोलता था।

बंगाल विधानसभा चुनाव में धार्मिक फंडामेंटलिज्म दाखिल हो चुका है।इसे प्रतिष्ठित करने का श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है। बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में चुनाव प्रचार ख़त्म होने के बाद पीएम नरेन्द्र मोदी ने बंगलादेश जाकर वहाँ पर मटुआ सम्प्रदाय के मंदिर में पूजा-अर्चना करके जो विज़ुअल संप्रेषित किए वे बताते हैं कि मोदी ने विधानसभा चुनाव में धर्म का इस्तेमाल किया है।चुनाव में धर्म का इस्तेमाल,धर्म विशेष के मानने वालों पर हमले या उनकी हिमायत,धार्मिक प्रतीकों और भगवान का इस्तेमाल सीधे धार्मिक फंडामेंटलिज्म है।भाजपा की रैलियों में जय श्री राम का नारा बार बार लग रहा है।भाजपा के नेता-कार्यकर्ता प्रचार में इसका प्रयोग कर रहे हैं।इससे धार्मिक तत्ववाद मज़बूत होगा और लोकतंत्र कमजोर होगा।

राम मानो, उनकी पूजा करो, लेकिन राम को राजनीति से अलग रखो।वरना राम फिर भगवान नहीं राजनीतिक अस्त्र बन जाएँगे।अफसोस की बात है भाजपा के प्रचार से देस में यही हो रहा है। राम को उपासना के प्रतीक की बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रतीक बना दिया गया है।उल्लेखनीय है ‘जय श्री राम’ का नारा, मूलतः 1971के बंगलादेश मुक्ति संग्राम में उठे ‘जय बांग्ला’ की नक़ल करके गढ़ा गया।उसके पहले भारत में जय श्री राम का नारा कोई नहीं बोलता था।

धार्मिक फंडामेंटलिज्म धर्म के सभी क़िस्म के वैचारिक और आचार-व्यवहारगत अंतरों को ख़त्म करके राजनीतिक लामबंदी और राजनीतिक विचार विशेष में रूपांतरित कर देता है।सच्चाई यह है मटुआ सम्प्रदाय के लोग ‘सनातन हिंदू धर्म’ से लड़कर,उसके आचार-धर्मशास्त्र को अस्वीकार करके अपने धर्म का प्रचार करते रहे हैं।उन्होंने ‘सनातन हिंदू धर्म’ को आचरण में अस्वीकार किया है। जबकि मोदी -आरएसएस ‘सनातन हिन्दू धर्म’ की हिमायत करते हैं।दिलचस्प है उन्होंने राम को भी सनातन हिंदू धर्म का अंग बना दिया है जबकि भक्ति आंदोलन के कवियों और संतों ने सनातन हिंदू धर्म से संघर्ष करते हुए राम की भक्ति का प्रचार किया, उस प्रचार के आदर्श कवि है गोस्वामी तुलसीदास।उनके पहले बाल्मीकि ने राम को जिस तरह निर्मित किया और उनके जिस रूप की वकालत की उसका सनातन हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन धार्मिक फंडामेंटलिज्म इन सब अंतरों को मानने और जानने की बजाय धर्म और राम के राजनीतिक इस्तेमाल पर ज़ोर देता है.बांग्ला में जिस रामायण का चलन है वहाँ जयश्रीराम का नारा नहीं है, बाल्मीकिदास और तुलसीदास के लेखन में यह नारा नहीं है। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से धार्मिक फंडामेंटलिज्म बंगाल में दाखिल हो रहा है।

धार्मिक फंडामेंटलिज्म का एक अन्य पहलू है भाषायी अभिव्यक्ति में उर्दू के शब्दों का विरोध। यह काम अपने तरीक़े से भाजपा के उम्मीदवार कर रहे हैं।बांग्ला भाषा में हिन्दी-उर्दू आदि भाषाओं के शब्दों का जमकर प्रयोग होता है।शुभकामना व्यक्त करने के लिए मुबारकवाद पदबंध का इस्तेमाल होता है। लेकिन संघियों को मुबारकबाद कहने पर आपत्ति है। धार्मिक फंडामेंटलिज्म का एक छोर सीएए को लागू करने से भी जुड़ा है।नए नागरिकता क़ानून का बंगाल की जनता एकमत से विरोध करती रही है।बंगाल विधानसभा ने उसके खिलाफ प्रस्ताव पास किया है, इसके बावजूद भाजपा सीएए को लागू करने पर ज़ोर दे रही है। यही वो परिदृश्य है जो बंगाल में धार्मिक फंडामेंटलिज्म को हवा दे रहा है।बंगाल की जनता की ज़िम्मेदारी है कि वह धार्मिक फंडामेंटलिज्म को एकजुट भाव से खारिज करे और भाजपा को हराए।

 

प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी  विभाग के पूर्व अध्यक्ष और चर्चित मीडिया विशेषज्ञ  हैं।

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