पहला पन्ना: मुख्य चुनाव आयुक्त ‘आउट’ हो गए पर अपने दो पैमाने दिखा गए! 

आज जब हिन्दी का नया साल शुरू हो रहा है तो यह खबर भले छोटी है पर महत्वपूर्ण है कि भक्ति और भाजपामय देश के प्रधानमंत्री के चुनाव क्षेत्र वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में एनएसयूआई लगातार दूसरे साल सभी सात सीटें जीत गई है। 2018 और 2019 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अध्यक्ष का पद जीता था। ज्यादा विस्तार में जाने की बजाय आपको यह भी बताऊं कि मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल बीच चुनाव खत्म हो गया है। वे ‘आउट’ हो गए। चुनाव का आगे का काम नए चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा देखेंगे। इधर भारतीय टीके की कमी हुई और उधर रूसी टीके, ‘स्पूतनिक’ की खबर आज अखबारों में प्रमुखता से छप गई। भारतीय कंपनियां उत्पादन बढ़ाने के लिए पैसे मांग रही हैं तो विदेशी टीके को मंजूरी की प्रक्रिया अखबारों में छपना संयोग और प्रयोग दोनों है। जाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ने ममता बनर्जी पर तो प्रतिबंध लगाया है लेकिन प्रधानमंत्री के वैसे ही भाषण पर कुछ नहीं किया। सेवा विस्तार इसीलिए नहीं मिला या प्रावधान ही नहीं है, अखबारों ने नहीं बताया है। इस तरह, चुनाव शुरू किसी ने कराया, कई राज्यों का तो पूरा भी करा दिया पर चुनाव परिणाम नए चुनाव अधिकारी से सुनने की तैयारी कीजिए। 

चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी पर 24 घंटे का प्रतिबंध लगाया – यह खबर आज सभी अखबारों में प्रमुखता से है। अधपन्ने वाले दोनों अखबारों में अधपन्ने पर, इंडियन एक्सप्रेस में तीन कॉलम में तीन लाइन के शीर्षक, हिन्दू में तीन कॉलम में एक लाइन के शीर्षक के साथ और द टेलीग्राफ में दो कॉलम में तीन लाइन का शीर्षक है। इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में टीएमसी का पक्ष भी लगाकर संतुलित होने का प्रयास किया है। टेलीग्राफ ने शीर्षक से बताया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल पूरा हो गया और जाते-जाते ममता बनर्जी पर प्रतिबंध लगा गए। इस तरह, आप समझ सकते हैं कि अखबारों ने भले ममता बनर्जी पर प्रतिबंध की खबर को महत्व दिया है पर जो खबर है वह रह गई। मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल एक राज्य का चुनाव करवाते हुए बीच में खत्म हो गया। उन्हें कुछ दिन का सेवा विस्तार नहीं मिला या वे कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव पूर्ण नहीं करा पाए अथवा हम समय के बेहद पाबंद हैं। इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। चुनाव महीने भर से घिसट रहा है और इसके साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ही आउट हो गए यह खबर नहीं है। मुझे नहीं लगता ऐसा पहले कभी हुआ होगा। हुआ भी हो तो यह संयोग या प्रयोग महत्वपूर्ण है लेकिन अखबारों की अपनी प्राथमिकताएं हैं अपनी पसंद। इंडियन एक्सप्रेस ने तस्वीर और उसके कैप्शन के जरिए यह सूचना दी है। ममता बनर्जी पर प्रतिबंध की खबर के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के रिटायर होने की खबर फोटो कैप्शन के रूप में देने का यह खास संपादकीय अंदाज है। 

अखबारों में ममता बनर्जी पर प्रतिबंध के दो कारण बताए गए हैं। पहला केंद्रीय बलों के खिलाफ उनके आरोप और दूसरा अल्पसंख्यकों से उनकी अपील। इसमें उन्होंने यह कहा बताते हैं कि वे अपने वोट न बंटने दें। यहां यह बताना जरूरी है कि सुरक्षा बलों के खिलाफ बोलने के लिए ममता बनर्जी के खिलाफ कार्रवाई हुई जबकि उसके पक्ष में यह समर्थन में बोलने के लिए भाजपा नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। आज भी इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार भाजपा नेता ने केंद्रीय बलों द्वारा चार नहीं आठ लोगों को मारे जाने की वकालत की है। हत्या का ऐसा समर्थन खुलेआम बगैर चुनाव के भी नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन स्थिति यह है कि विरोध करने पर कार्रवाई हो रही है और समर्थन करने पर सन्नाटा है। अखबारों में यह सूचना है पर खबर नहीं। 

 

नवभारत टाइम्स की खबर 

मुसलमानों के वोट नहीं बंटने देने की ममता बनर्जी की अपील पर तो कार्रवाई हो गई लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कह चुके हैं, सारे हिन्दू एक हों, हम कहते तो मिलता नोटिस। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है, आदरणीय दीदी, जिस मुस्लिम बैंक को आप अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती थीं, आपके हाथ से वह निकल गया है। नवभारत टाइम्स में इस खबर के साथ यह भी छपा था, केंद्रीय बल तृणमूल वोटरों को डराकर एक पार्टी के पक्ष में वोट डालने के लिए कह रहे हैं। चुनाव आयोग मूक दर्शक है। बाद में जो हुआ उससे ममता बनर्जी का कहना सही साबित हो रहा है फिर भी कार्रवाई सिर्फ ममता बनर्जी के खिलाफ हो रही है। इस मामले में प्रधानमंत्री तो छोड़िए, भाजपा के किसी नेता के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई और पहले हुई थी तो उसमें अगले ही दिन ढील दे दी गई। ऐसे में कुछ ढंका-छिपा नहीं है लेकिन अखबारों का अपना अंदाज है। 

 

 

द टेलीग्राफ में आज पहले पन्ने की मुख्य खबर है, चयन आयोग (अपना काम खुद चुन लेने वाला आयोग) ने सीतलकुची को निराश किया। स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर इसमें बताया गया है कि (पूर्व) चुनाव आयुक्त के दो पैमाने रहे। दिनहाटा में भाजपा नेता की मौत के मामले में चुनाव आयोग ने जांच के आदेश दिए और विशेष पुलिस पर्यवेक्षक भेजा। शनिवार को सीतलकुची में हमारे गांव के चार युवक मारे गए पर चुनाव आयोग का कोई प्रतिनिधि नहीं आया। चुनाव आयोग के पक्षपात के विवरण इस खबर में भरे पड़े हैं। दूसरी तरफ इस मामले में मौके से रिपोर्टिंग कोई और अखबार नहीं कर रहा है, कम से कम पहले पन्ने पर। ऐसे में एक जैसे भाषण के लिए ममता बनर्जी के खिलाफ कार्रवाई हुई प्रधानमंत्री को छोड़ दिया गया यह खबर ही नहीं है। 

आज के अखबारों में रूसी टीका, ‘स्पूतनिक’ की खबर है। सबसे पहले टीका और सबसे पहले सबसे ज्यादा लोगों का टीकाकरण जैसी कृत्रिम होड़ में विदेशी टीकों की चर्चा अखबारों में कम ही होनी थी। यह प्रचारकों की योजना भी हो सकती है पर यह तथ्य है कि भारतीय टीके बन गए, लग गए, कम पड़ने लगे तो विदेशी टीके की खबर छप गई। आम आदमी आज इस खबर के छपने का कारण भी नहीं समझ पाएगा। बताने की जरूरत तो है ही नहीं। कुल मिलाकर, पहले भारतीय टीकों का प्रचार हुआ और अब विदेशी टीकों का प्रचार शुरू है। इसे आप मीडिया की देशभक्ति कह सकते हैं लेकिन टीका लगवाकर जो लोग मर गए उन्हें अगर विदेशी टीकों की जानकारी होती तो वे शायद बच जाते और इस तरह मरने वालों को आप इस देशभक्ति पर शहीद होना कह सकते हैं। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि भारत जैसे देश को सामने खड़ी आपदा से निपटने की बजाय टीके के फेर में पड़ने की जरूरत ही नहीं थी लेकिन सरकार की प्राथमिकताएं अलग रहीं और मीडिया आंख मूंद कर सरकार का समर्थन करता रहा। भारतीय टीके कम पड़ सकते हैं यह सोचा ही नहीं गया और आप कह सकते हैं कि कम तब पड़े जब टीका लगाने का रिकार्ड बन गया। मरने वालों को छोड़कर हम रिकार्ड बना रहे हैं पर यह भी सूचना ही है, खबर नहीं। 

इन खबरों के बीच द हिन्दू में आज एक महत्वपूर्ण खबर है, महामारी के डर से सेनसेक्स और रुपया गिरा, मुद्रास्फीति बढ़ी। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में कुंभ की खबर है जो हिन्दू में नहीं है। इसी तरह हिन्दू में एक और खबर है जो दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी। चार कॉलम का इसका शीर्षक है, सबसे तेज वृद्धि में हरियाणा ने रात का कर्फ्यू लगाया। कुछ दिन पहले 11 राज्यों में कोरोना का असर ज्यादा होने की खबर छपी थी। तब मैंने बताया था कि ज्यादातर राज्य भाजपा शासित नहीं थे और जो भाजपा शासित थे वे कुछ ही दिन पहले विधायक खरीद कर या दूसरे तरीके से कांग्रेस से ‘मुक्त’ कराए गए थे। सिर्फ हरियाणा के उस सूची में होने का कारण समझ में नहीं आया था। अब लगता है कि वास्तव में हरियाणा की स्थिति खराब है लेकिन खबरें आप देख लीजिए महाराष्ट्र और दिल्ली की ही ज्यादा हैं। 

एक तरफ कुम्भ और चुनाव रैलियों में कोरोना नियमों से लगभग छूट है लेकिन दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में लोगों की संख्या सीमित रखने की सरकारी कोशिश के खिलाफ हाईकोर्ट ने आदेश दिया है। खबर छोटी सी जरूर छपी है लेकिन कुम्भ की खबरों के मुकाबले उसकी कोई हैसियत नहीं लग रही है। इसी तरह बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सभी 32 अभियुक्तों को बरी करने वाले जज, सुरेन्द्र कुमार यादव को लोकायुक्त बनाया गया है। यह सब भ्रष्टाचार खत्म करने के बाद नए हिन्दी वर्ष की नई खबरें हैं। 

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

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