महा-शिवरात्रि: स्त्री के चयन के अधिकार और सह-अस्तित्व का उद्घोष!

पार्वती प्रेम के इतिहास की आदि विद्रोही हैं। पर्वतराज हिमवान की बेटी पार्वती एक ऐसे व्यक्ति से विवाह करने के लिए तप करती है जो सामाजिक कसौटी के लिहाज से कहीं से भी उसके योग्य नहीं हैं। लेकिन वह अडिग है। ग़ौर से देखें तो पार्वती, जाति, वर्ग, संप्रदाय, सभी बंधनों को लाँघकर शिव से विवाह करना चाहती हैं। मलंग और भिखारी जैसे शिव से विवाह करके लिए वे तमाम प्रलोभनों को ठुकराती हैं। यहाँ तक कि विष्णु जैसे 'सद्गुणों के धाम' से भी विवाह में भी वह रुचि नहीं दिखातीं, क्योंकि 'मन तो कहीं और रमा' है।

महाशिवरात्रि पर शहर-शहर निकलने वाली शिव बरातों और सजे-धजे शिवालों की धूम में एक ऐसी कथा खोई हुई है जो आधुनिक समाज के लिए बड़े काम की है। न सिर्फ़ शिव-पार्वती विवाह बल्कि शिव परिवार में दर्ज सहअस्तित्व का भाव एक ऐसा आदर्श है जिससे विमुख होने की बड़ी क़ीमत समाज को चुकानी पड़ी है। शिव-विवाह, स्त्री के चयन के अधिकार की उद्घोषणा है।

पार्वती प्रेम के इतिहास की आदि विद्रोही हैं। पर्वतराज हिमवान की बेटी पार्वती एक ऐसे व्यक्ति से विवाह करने के लिए तप करती है जो सामाजिक कसौटी के लिहाज से कहीं से भी उसके योग्य नहीं हैं। लेकिन वह अडिग है। ग़ौर से देखें तो पार्वती, जाति, वर्ग, संप्रदाय, सभी बंधनों को लाँघकर शिव से विवाह करना चाहती हैं। मलंग और भिखारी जैसे शिव से विवाह करके लिए वे तमाम प्रलोभनों को ठुकराती हैं। यहाँ तक कि विष्णु जैसे ‘सद्गुणों के धाम’ से भी विवाह में भी वह रुचि नहीं दिखातीं, क्योंकि ‘मन तो कहीं और रमा’ है।

तुलसीकृत रामचरित मानस के बालकांड में इसका सुंदर वर्णन है। ऋषिगण पार्वती के शिव प्रेम की परीक्षा लेने के लिए विष्णु से शादी कराने का प्रलोभन देते हैं। पार्वती जवाब देती हैं-

महादेव अवगुन भवन, बिष्नु सकल गुन धाम
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।

(माना कि महादेव अवगुणों की खान हैं और विष्णु समस्त सद्गुणों के धाम हैं, पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसी से काम है।)

पार्वती को शिव और विवाह के भविष्य को लेकर तरह-तरह से डराया जाता है, लेकिन वे ज़रा भी नहीं डिगतीं। परिवार के लिए उनका यह फ़ैसला शोक का विषय है लेकिन उनके कठोर संकल्प के आगे सब लाचार हो जाते हैं। विवाह की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं।

विस्तार में न जाकर अब ज़रा बरात का हाल देखें। एक राजकुमारी से विवाह करने जा रहे शिव बरात का हाल जब नगर के बालक देखते हैं कहते हैं-

तन छार ब्याल कपाल भूषण नगन जटिल भयंकरा।
सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा।।
जो जिअत रहिहि बरात देखत पुण्य बड़ तेहि कर सही।
देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही।।

(दूल्हे के शरीर पर राख लगी है, साँप और कपाल के गहने हैं। वह नंगा, जटाधारी और भयंकर है। उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं। जो बरात को देखकर जीता बचेगा, सचमुच उसके बड़े ही पुण्य हैं और वही पार्वती विवाह देखेगा। लड़कों ने घर-घर यही बात कही।)

स्पष्ट है कि शिव और पार्वती, दोनों की पृष्ठभूमि अलग है, पर मन रम गया है। परिवार भी विधाता की इच्छा मानकर रोते-कलपते ही इस रिश्ते को स्वीकार करता है। माँ मैना का करुण क्रंदन किसी का भी मन व्यथित कर सकता है। लेकिन पार्वती को विदा करते हुए वे एक ऐसी बात कहती हैं जिसमें स्त्री जीवन का सारा मर्म छिपा है, कम से कम इस कथा की रचना करने वालों के समय का सच तो यही था।

कत विधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।
भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसुमय बिचारी।।

(विधाता ने जगत में स्त्री जाति को क्यों पैदा किया। पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता। प्रेम में विकल लेकिन उचित समय न जानकर धीरज धर लिया।)

हिंदी के अनन्य कवि गोरख पांडेय अपने लेख ‘सुख के बारे में’ की शुरूआत इसी सूत्र से करते हैं। पराधीन सुखी नहीं हो सकता, इसका अर्थ है कि सुख स्वाधीनता में है। सुख की पहली शर्त स्वाधीन होना है। स्त्री के संदर्भ में तो ख़ासतौर पर।

बहरहाल, कुल के बाहर हुए इस विवाह में आगे की कथा स्वाधीनता और सहकार की है।

शिव परिवार का चित्र   ग़ौर से देखिये। पार्वती शिव के पैर दबाते हुए शैया पर नहीं हैं, बल्कि उनके बराबर बैठी हुई हैं। हिमालय की कंदरा में यानी प्रकृति की गोद में यह परिवार बसा है। पूरे चित्र को ग़ौर से देखने पर मनुष्य, प्रकृति और पशु जगत के सहअस्तित्व का संदेश साफ़ दिखता है। शिव के गले में साँप है और साँप को खाने वाला मोर कार्तिकेय की सवारी है। वहीँ पार्वती की सवारी शेर है तो शिव का नंदी बैल। शेर और बैल साथ हैं। गणेश की सवारी चूहा है जिसे साँप खाता है जो शिव के गले में पड़ा है। यानी सामान्य जीवन में एक दूसरे को भोजन बनाने वाले ‘शिव परिवार’ में सहकारी भाव से बैठे हैं।

कहते हैं कि शिव अनार्य देवता हैं। आर्यों के आगमन के पूर्व भारत के मूल निवासियों के बीच उनकी पूजा प्रचलित थी। शिव लिंग की पूजा प्रजनन प्रक्रिया को पूजने की आदिम समझ का ही प्रतीक है। ख़ैर, अकादमिक जगत में इन चीज़ों पर बहस होती रहती हैं। सवाल तो उस संदेश का है जो मौजूदा समय में किसी वैक्सीन की तरह है-

स्त्री को बिना जाति-धर्म-नस्ल की बाधा के पति चुनने का अधिकार, और प्रकृति, मनुष्य और पशु जगत में सहकार!

काश लव में जिहाद ढूंढने वाले इस विकट समय में  इस धर्म-कथा का मर्म समझा जा सकता। सहअस्तित्व मनुष्यता ही नहीं इस पृथ्वी ग्रह को बचाने की भी शर्त हैं। अंग्रेज़ी में कहें तो CO-EXISTENCE OR NO EXISTENCE.

 

लेखक मीडिया विजिल के संस्थापक संपादक हैं।

 

 

 

 

 

 

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