चुनाव चर्चा: खट्टर की मनोहर कहानियों के अगले मोड़ पर खड़ा मध्यावधि चुनाव!

पिछली बार निर्वाचित विधायको में खुद दुष्यंत चौटाला और उनकी माता नैना चौटाला भी हैं। बस वही माँ-बेटा अब खट्टर सरकार के साथ रह गये लगते हैं। जजपा के बाकी सभी विधायक इन माँ और बेटा को छोड़ आंदोलनरत किसानों के साथ लग लिये बताये जाते हैं। हाँलाकि जजपा के किसी भी विधायक ने विधानसभा की सदस्य्ता से औपचारिक रूप से इस्तीफा अभी तक नहीं दिया है. 

दिल्ली बोर्डर के सभी केंद्रो पर 25 नवम्बर से पंजाब ही नहीं विभिन्न सूबो खास कर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ( एनसीआर ) के सीमावर्ती   राज्यो के बूढे , जवान, बच्चे, औरतों समेत लख- लख किसानो के अभूतपूर्व विशाल जमावड़े के असर से हरियाणा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा ) की गठबंधनी मनोहर लाल खट्टर सरकार का तख्त गिरा भले न हो, बुरी तरह हिल ज़रूर गया है। खट्टर सरकार का ताज-तख्त गिर जाने की स्थिति में इस कृषि-प्रधान राज्य में मध्यावधि चुनाव कराने की ज़रूरत पड़ेगी।

मोदी सरकार के बनाये तीन कृषि कानून की वापसी की मांग को लेकर अपने कम से कम एक सौ एक साथी किसानो की कड़ाके की ठंड और अन्य कारणों से अमानवीय हालात में मौत हो जाने के दुखदाई असर ने हरियाणा की सियासत में एक तरह से ‘छायावादी जादू’ कर दिया है। इस जादू की भनक गोदी मीडिया ने  पिछ्ले मंगलवार को मीडिया विजिल के इसी चुनाव चर्चा कॉलम के छप जाने के बाद देनी शुरु की है। हम आज के अंक में उसके बाद के सियासी दांव पेंच का जायजा लेंगे. 

खट्टर जी की इस करीब दो बरस पुरानी गठबंधन सरकार को उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की कुल 10 विधायकों की जननायक जनता पार्टी (जजपा) के समर्थन का हाजिर भाव निस्तेज हो गया है।जजपा का गठन चौटाला कुनबा के एक हिस्से ने पिछले विधानसभा चुनाव के ऐन पहले पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के इंडियन नैश्नल लोकदल (इनेलो) को तोड़ कर किया था। पिछले चुनाव में चौटाला कुनबा के छह उम्मीदवार अलग-अलग पार्टी के टिकट पर जीते थे।

पिछली बार निर्वाचित विधायको में खुद दुष्यंत चौटाला और उनकी माता नैना चौटाला भी हैं। बस वही माँ-बेटा अब खट्टर सरकार के साथ रह गये लगते हैं। जजपा के बाकी सभी विधायक इन माँ और बेटा को छोड़ आंदोलनरत किसानों के साथ लग लिये बताये जाते हैं। हाँलाकि जजपा के किसी भी विधायक ने विधानसभा की सदस्य्ता से औपचारिक रूप से इस्तीफा अभी तक नहीं दिया है. 

राज्य की 14 वीं विधानसभा के अक्तूबर 2019 में हुए पिछले चुनाव में खट्टर जी और मोदी जी की भाजपा की हार के बावजूद उसकी खिचड़ी सरकार का गठन  जजपा से मिले समर्थन की बदौलत ही सम्भव हो सका था। गोदी मीडिया ने मोदी जी की सरकार और पार्टी के केंद्रीय सत्ता और धन बल की बदौलत खट्टर जी की जोड़-तोड़ से बनायी नई सरकार में उपमुखयमंत्री पद के लिये नैना जी का ही नाम आगे किया था। वही भाजपा की सूबाई सियासत में आंतरिक अंतर्विरोधों के कारण पहली पसंद भी थीं। बताया जाता है कि खुद नैना जी ने यह सुझाव अस्वीकार कर अपने बेटा को डिप्टी सीएम की कुर्सी के लिये आगे कर दिया. 

हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के नेता रह चुके इनेलो के प्रधान महासचिव और अभी सदन में उसके एकमात्र विधायक अभय सिंह चौटाला ने किसानों की मांग के समर्थन में सदन से ‘समयबद्ध सशर्त इस्तीफा’ पहले ही  दे दिया है। हम पिछले अंक में उसकी विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। 

हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे दिवंगत देवीलाल के पौत्र और ओम प्रकाश चौटाला के पुत्र अभय सिंह चौटाला ने सिरसा में किसानों के बीच पहुँचकर विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा के लिये विधानसभा अध्यक्ष को जो त्यागपत्र भेजा था, उसमें साफ लिखा था कि गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 2021 तक कृषि कानून वापस नहीं लेने की दशा में उनका इस्तीफा स्वत: स्वीकार कर लिया जाये। त्यागपत्र पर अभय चौटाला के हस्ताक्षर के साथ 11 जनवरी की तारीख है।

दुष्यंत चौटाला दिवंगत पूर्व उप प्रधान मंत्री देवीलाल के प्रपौत्र हैं। भाजपा-जजपा गठबंधन सरकार में बिजली मंत्री रणजीत चौटाला और मंत्री का दर्जा हासिल किये हुये एक बोर्ड के चेयरमैन आदित्य चौटाला तथा कांग्रेस विधायक अमित सिहाग भी देवीलाल परिवार से हैं। 

पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला नौकरी भर्ती घोटाले में 10 साल की अदालती सजा के कारण जेल में हैं। उन्हें उनके पिता देवीलाल ने केंद्र में 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में उपप्रधानमंत्री बनने के ऐन पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री की अपनी कुर्सी सौंपी थी। 

हरियाणा में सत्तापक्ष के सोमवीर सांगवान समेत कुछ विधायकों के भी इस्तीफे देने की सुगबुगाहट है। कुछ ने राज्य सरकार के बोर्ड एवं निगमों के लाभकारी चेयरमैन पद छोड़ दिये हैं। महम के निर्दलीय विधायक बलराज कुंडू ने भी खट्टर सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी है।

राज्य में 90 सदस्यों की विधान सभा के 21 अक्टूबर 2019 को हुए पिछले चुनाव भाजपा को बहुमत नहीं मिला था पर वह सबसे बड़ी पार्टी थी. भाजपा ने 47 सीटें जीती थी। भाजपा ने जजपा से चुनाव परिणाम बाद साँठ-गाँठ कर और सत्ता का स्वाद चखने का लोभ देकर सात निर्दलीयों का समर्थन जुटा लिया।  खट्टर जी ने 27 अक्टूबर 2019 को दूसरी बाद अपनी सरकार बना ली थी।

1966 में पंजाब सूबा के गैर-सिख बहुल इलाकों को मिलाकर  अलग हरियाणा राज्य का गठन किया गया था। पंजाब के साथ-साथ हरियाणा की भी राजधानी चंडीगढ़ है, जो प्रशासनिक रूप से केंद्र -शासित प्रदेश है। हरियाणा की आबादी में करीब 50 फीसदी सनातनी हिन्दू जाट, सिख जाट और दलित समुदाय के लोग हैं। राज्य के करीब 80 जातीय समुदायों में से 63 अनुसूचित जातियों अथवा अन्य पिछड़े वर्ग के रूप में अधिसूचित हैं। करीब 26 प्रतिशत ओबीसी में यादव अथवा अहीर, सैनी, गूजर आदि शामिल हैं. राज्य में करीब 30 फीसदी आबादी जाट समुदाय की है। इसमें सनातनी हिन्दू ही नहीं, बिश्नोई जाट, सिख जाट और मुस्लिम जाट भी हैं। अनुसूचित जनजातियों, ईसाईयों की तादाद  नगण्य है। मुस्लिम करीब 7 फीसदी माने जाते है। प्रदेश की 90 में से 17 विधान सभा सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं। 2014 के चुनाव में अधिकतर जाट भाजपा की तरफ खिसक गये थे।

5 मई 1954 को पैदा हुए गैर -जाट खट्टर जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक रह चुके हैं। वह राज्य के 10 वें और भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं। वह पहली बार 26 अक्टूबर 2014 को मुख्यमंत्री बने थे।  वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर बहुमत मिल गया था। इसके परिणामस्वरुप राज्य में कांग्रेस का 10 बरस का राज खत्म हो गया। खट्टर जी करनाल से विधायक हैं पर वह किसानों के आंदोलन के कारण अपने निर्वाचन क्षेत्र में भी कोई सभा नहीं कर पा रहे हैं। सूबाई सियासत में खट्टर जी के विरोधी भाजपा में भी कम नहीं हैं।

दिल्ली को भौगोलिक रूप से कई तरफ से घेरे हुए हरियाणा में मौजूदा स्थिति में किसानों आंदोलन के कारण कोई भाजपा नेता जनसभा करने में असमर्थ है। ऐसे में खट्टर सरकार कब तक टिक सकेगी, शायद मोदी जी भी नहीं कह सकते।

*मीडिया हल्कों में सीपी के नाम से मशहूर चंद्र प्रकाश झा 40 बरस से पत्रकारिता में हैं और 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण के साथ-साथ महत्वपूर्ण तस्वीरें भी जनता के सामने लाने का अनुभव रखते हैं। 

 

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