आज के हिंदी/अंग्रेजी अख़बारों के संपादकीय:30 मार्च ,2018

जनसत्ता

परीक्षा पर प्रश्न
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं के दौरान इस बार जिस तरह से परचे लीक हुए, उससे तो लग रहा है कि हमारी शिक्षा प्रणाली के परीक्षा तंत्र का भट्ठा बैठ चुका है। परचे लीक होने की घटनाओं से सीबीएसई की साख सवालों के घेरे में आ गई है। परीक्षा की शुचिता और निष्पक्षता को लेकर जो सवाल उठे हैं, उनका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। ऐसे में बच्चे कितना भी अच्छा क्यों न करें, उनके मन में जो डर और संदेह बैठ जाता है, वह दूर नहीं किया जा सकता। परचे लीक होने की पहली घटना 13 मार्च को सामने आई थी, जब बारहवीं का रसायन विज्ञान का परचा लीक हुआ। तब बोर्ड ने कोई ध्यान नहीं दिया। इसके दो दिन बाद ही 15 मार्च को बारहवीं का ही अकाउंटेंसी का परचा लीक हो गया। इसे भी बोर्ड ने महज अफवाह देकर पल्ला झाड़ लिया। फिर 21 मार्च को बारहवीं का गणित का परचा वायरल हो गया, तब बोर्ड ने कहा कि यह पिछले साल का पेपर था। लेकिन जब 26 मार्च को बारहवीं का अर्थशास्त्र और 28 मार्च को दसवीं का गणित का परचा लीक हुआ, तो बोर्ड की आंख खुली। तत्काल दोबारा परीक्षा कराने का फैसला किया गया।

एक पखवाड़े के दौरान जिस तरह से परचे लीक होने की घटनाएं और अफवाहें चलतीं रहीं, उसने सीबीएसई की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। आखिर क्यों नहीं समय रहते बोर्ड चेता और सतर्कता बरती। इसमें कोई दोराय नहीं कि प्रश्नपत्र जिस कड़ी सुरक्षा में रखे रहते हैं और लाए-ले जाए जाते हैं, उन्हें लीक कर पाना आसान नहीं है। पर सवाल उठता है कि सुरक्षा में ऐसी चूक कहां रह गई कि परचे किसी व्यक्ति या गिरोह के हाथ लग गए? यह गंभीर जांच का विषय है। सीबीएसई की साख पुख्ता परीक्षा तंत्र के दम पर ही बनी है। बोर्ड इंजीनियरिंग और मेडिकल में दाखिले के लिए नीट जैसी परीक्षाओं के अलावा नेट और जवाहर नवोदय विद्यालय में दाखिले के लिए भी प्रवेश परीक्षाएं कराता है। बोर्ड का मजबूत सुरक्षा तंत्र है। फिर भी अगर परचे लीक होते हैं तो जाहिर है खामी इसी तंत्र के भीतर कहीं होगी, जिसका पता लागाया जाना चाहिए।

परचे लीक होने का सबसे ज्यादा खमियाजा उन लाखों बच्चों को भुगतना पड़ रहा है जो अपना भविष्य बनाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहे हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि परचा लीक होने पर उन्हें किस मानसिक यातना से गुजरना पड़ा है। ऐसे में कई बार परेशान होकर बच्चे गलत कदम उठाने को मजबूर हो सकते हैं। परीक्षाओं को पूरी तरह चाक-चौबंद कैसे बनाया जाए, बोर्ड के लिए यह गंभीर चुनौती है। हालांकि मानव संसाधन विकास मंत्री ने अब परीक्षा केंद्रों को इलेक्ट्रॉनिक कोड-युक्त पेपर देने की व्यवस्था लागू करने की बात कही है। ये परचे केंद्र पर आधे घंटे पहले ही पहुंचेंगे और इनका प्रिंट बच्चों को दिया जाएगा। इसमें कोई शक नहीं कि यह व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित होगी। फिर भी इसकी सुरक्षा की क्या गारंटी होगी, इस बारे में फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता। यह साइबर अपराध का जमाना है। कर्मचारी चयन आयोग की आॅनलाइन परीक्षा में जिस तरह का घोटाला सामने आया है वह आंखें खोल देने वाला है। परीक्षा तंत्र में सेंध लगाने वालों को जल्दी से जल्दी पकड़ा जाना चाहिए।


हिंदुस्तान

महाराजा की नई उड़ान

किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी प्रतिष्ठान के लाभ का मामला अब नए जमाने का सच है। वैश्वीकरण ने वृहत्तर सामाजिक दायित्व और व्यापक हित व सरोकारों के तर्क को बहुत पीछे कर दिया है। इसीलिए गाहे-बगाहे संस्थाओं के निजीकरण की बात भी आती रहती है, विरोध के स्वर भी बने रहते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एअर इंडिया के साथ भी कुछ ऐसा ही है। लंबे समय से हां-ना में उलझी इसकी किस्मत आखिर तय होने को है। भारी घाटे में डूबी एअर इंडिया के विनिवेश की सैद्धांतिक मंजूरी तो कैबिनेट पहले ही दे चुकी थी और नीति आयोग ने भी पूर्ण निजीकरण का सुझाव दिया था। अब सरकार 470 अरब के कर्ज में डूबी इस कंपनी की 76 फीसदी हिस्सेदारी बेचने जा रही है। यानी इसे घाटे से उबारने की सारी कोशिशें नाकाम रही हैं।भारतीय आकाश के निजी एयरलाइन्स के लिए इस्तेमाल की राह तो 1994 में एयर कॉरपोरेशन ऐक्ट के खात्मे और एअर इंडिया व इंडियन एयरलाइन्स की मोनोपोली खत्म होने के साथ ही खुल गई थी। सच तो यह है कि उसी वक्त इसे स्पद्र्धी बनाने की कोशिशें शुरू हो जानी चाहिए थीं, लेकिन न तो सरकारें कभी गंभीर हुईं, न एयरलाइन्स प्रबंधन और इसके कर्मचारी ही चेते। बात राष्ट्रीय हित, व्यापक हित, राजनीतिक हित-अहित और बेलआउट पैकेजों में ही उलझी रही। एयरलाइन्स की जरूरतें हमेशा बढ़ा-चढ़ाकर देखी गईं, लेकिन विमानन क्षेत्र में कूद चुकी तमाम नई कंपनियों और उनके घोर व्यावसायिक दृष्टिकोण के बरअक्स उनके साथ स्पर्धा में उतरकर चुनौती स्वीकार करने के तौर-तरीकों पर कभी नहीं सोचा गया। इस मामले पर गठित संसदीय समिति ने भी पिछले साल यह तो कहा कि कंपनी के विनिवेश का यह सही समय नहीं है, इसे घाटे से उबारने के लिए पांच साल और देने के सुझाव के साथ कर्ज माफी का भी इशारा किया, लेकिन इसे बाजार की दौड़ में सफल होने की कोई राह उसने भी नहीं सुझाई। सार्वजनिक क्षेत्र की एकमात्र विमानन कंपनी एअर इंडिया और स्वागत की अदबी मुद्रा में खड़ा इसका कलात्मक शुभंकर ‘महाराजा’ राष्ट्रीय गर्व के प्रतीक रहे हैं और बेहतर होता कि इसे बचाने के विकल्पों पर ध्यान दिया जाता। किसी भी देश की अपनी एयरलाइन्स का होना हमेशा गर्व का विषय रहा है और तमाम देशों में यह व्यवस्था व्यावसायिकता की सारी आपाधापी के बावजूद बखूबी चल रही है। ये एअर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स ही थीं, जो किसी आपदा या अस्थिरताओं के दौर में मजबूती से काम करती नजर आईं। जाहिर है, इसके घाटे में वे या उस दौर के तमाम खर्च भी शामिल ही होंगे, क्योंकि सरकारें तो ऐसे बकाया आसानी से दिया नहीं करतीं। ऐसे में, क्या जरूरी नहीं है कि इस मामले में महज कारोबारी नजरिया न अपनाकर सम्यक विचार किया जाता। जनता की गाढ़ी कमाई को भारी-भरकम घाटे में फंसना कहीं से भी समझदारी नहीं है। घाटा भी रातोंरात इस हद तक नहीं पहुंचा है, बल्कि इसने लंबे समय से अपने भारी होते जाने के संकेत दे दिए थे। यह कहीं न कहीं सरकारों और उसके जिम्मेदार तंत्र की बड़ी विफलता का मामला भी है। एक बार ठहरकर सोचने की जरूरत तो है ही कि अगर इसके संचालन और प्रबंधन-कौशल पर पहले ही नजर रखी गई होती, तंत्र को जवाबदेह बनाया गया होता, तो शायद हालात इतने बुरे न होते।


अमर उजाला

अतीत से सबक नहीं
रामनवमी के जुलूस को लेकर पश्चिम बंगाल और बिहार में सांप्रदायिक हिंसा, पत्थरबाजी और आगजनी की जो घटनाएं घटी हैं, वे न केवल बेहद चिंतनीय हैं, बल्कि ये कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर संबंधित राज्य सरकारों की नाकामी के बारे में भी बताती हैं। पश्चिम बंगाल में रामनवमी के जुलूस के दौरान, जिस तरह अविश्वास का माहौल बन गया, उसकी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ऐसे जुलूस निकालने की आलोचना तो की, पर आसनसोल, रानीगंज, पुरुलिया, मुर्शिदाबाद और बर्द्धमान को हिंसा की चपेट में आने से नहीं रोक सकीं। सरकार की यह विफलता तब और अक्षम्य है, जब ऐसे अवसर पर वहां से अमूमन हिंसा फैलने की खबरें आती हैं। हिंसाग्रस्त इलाकों में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को तैनात करने का फैसला बहत विलंब से लिया गया, जो बताता है कि सरकार ने पिछली घटनाओं से सबक नहीं सीखा। राज्य की पिछली वाम मोर्चे की सरकार ज्यादातर मामलों में बेशक फिसड्डी थी, पर सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने का उसका रिकॉर्ड शानदार था। अभी स्थिति यह है कि आसनसोल में दो मौतें हो चुकी हैं, रानीगंज में पुलिस उपायुक्त पत्थरबाजी में घायल हुए हैं और कई जगह एहतियात के तौर पर इंटरनेट सेवा बंद करनी पड़ी है। ममता बनर्जी ने केंद्रीय सुरक्षा बल भेजने की केंद्र सरकार की पेशकश ठुकरा तो दी है, लेकिन इसके बाद हिंसाग्रस्त इलाकों में कानून-व्यवस्था बहाल करने की ज्यादा बड़ी चुनौती उनके सामने है। केंद्र सरकार ने राज्य की हालत पर ममता सरकार से रिपोर्ट भी मांगी है। अलबत्ता ठीक इसी समय बिहार में भी कम से कम सात जिले सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में हैं। इसकी शुरुआत इसी महीने भागलपुर के नाथनगर में एक जुलूस निकालने से हुई थी, लेकिन रामनवमी के दौरान मुंगेर, औरंगाबाद, कैमूर, गया, सीवान, समस्तीपुर और नवादा भी इसकी चपेट में आ गए। वहां अनेक लोग घायल हुए हैं और व्यापक आगजनी भी हुई है। हिंसा की जांच के लिए बिहार पुलिस ने दो विशेष टीम गठित की है. पर खुद केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारी भी हैरान हैं कि केंद्र ने पश्चिम बंगाल की तर्ज पर बिहार से इस संदर्भ में कोई रिपोर्ट नहीं मांगी है। इसके बावजूद कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर सूबे को पटरी पर लाना नीतीश कुमार के लिए के लिए चुनौती तो है ही।


राजस्थान पत्रिका

हवा हुए संकल्प
भारत में पैसे की कमी नहीं है। प्राचीन काल में ही नहीं, आज भी देश सोने की चिड़िया है और कल भी रहेगा। चिंता उन प्रयासों को लेकर है जो जानेअनजाने देश को कंगाली की ओर ले जा रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा प्रयास जनता के धन की बर्बादी का है। केन्द्र हो या राज्यों की सरकारें अथवा फिर नगरपालिका या ग्राम पंचायतें, सभी के आज की तारीख में बड़े-बड़े बजट बनते हैं। अगर ये बजट पूरी तरह जन सुविधाओं पर खर्च होने लग जाएं तो कोई बड़ी बात नहीं कि देश अगले दस-पन्द्रह वर्षों में गरीबी के अभिशाप से मुक्त हो जाए। लेकिन वस्तुस्थिति बहुत विपरीत है। आज से करीब तीन दशक पहले देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि मैं दिल्ली से एक रुपया देता हूं और गांव तक पहुंचते-पहुंचते वह पन्द्रह पैसे रह जाता है। तब भारतीय जनता पार्टी सहित विपक्ष के तमाम नेताओं ने उनका खूब मजाक उड़ाया और भ्रष्टाचार नहीं रोक पाने के लिए उन्हें जमकर कोसा। पर इन तीन दशकों में क्या हुआ? हालात आज भी जस के तस हैं। जब भी किसी राज्य में चुनाव होते हैं, विपक्षी पार्टियां वहां सत्तारूढ़ दल को कोसने लग जाती हैं। गुजरात के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को कोसा तो अब कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा, कांग्रेस को कोस रही है। भ्रष्टाचार किस-किस तरीके से होता है या हो सकता है, इसका ताजा उदाहरण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कार्यालय की वह जानकारी है जिसमें कहा गया है कि एक साल में वहां आने वाले 3.34 करोड़ की चाय पी गए? आखिर कहां जाकर रुकेगा हमारा भ्रष्टाचार करने का संकल्प। रुकेगा भी या इसी रफ्तार से बढ़ता रहेगा।
आज देश में ज्यादातर नागरिकों की जो मानसिकता होती जा रही है, उसमें सब इस बुराई को मिटाना तो चाहते हैं लेकिन अपने आप को उससे अलग रखकर। यानी मैं तो सारे पाप करूं और बाकी बचा देश धर्मात्मा हो जाए। इसी मानसिकता के चलते भ्रष्टाचार रोकने वाली देश की तमाम संस्थाएं भ्रष्ट हो गई। आज तो भ्रष्टाचार को मिटाने वाली एजेंसियों के लोग भी खुद की जेब भरकर लौट आते हैं। अब जबकि लेखाकार की टीम के आने की खबर से गड़बड़ी पर पसीने छूटने वाला वक्त भी हवा हो गया है, तब जरूरत कानूनों से कहीं अधिक हर नागरिक के अपने संकल्प की है। कानून का असर हमारे सामने है। अब एक बार ईमानदारी के संकल्प को भी आजमा सकते हैं।


दैनिक भास्कर

पेपर लीक होने से शिक्षा बोर्ड की साख को लगा बट्‌टा
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के परचे लीक होने से न सिर्फ देश की इस प्रतिष्ठित संस्था की साख को बट्‌टा लगा है बल्कि लाखों छात्रों और अभिभावकों को धक्का भी लगा है। सीबीएसई आईआईटी-जेईई और मेडिकल से संबंधित नीट जैसी विश्वस्तरीय परीक्षा का भी संचालन करता है, इसलिए उन परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों के मन में भी संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। संदेह का यह संदेश देश से बाहर भी जाएगा और दुनिया में हमारी शिक्षण संस्थाओं की पहले से कमजोर साख और कमजोर होगी। मौके की नजाकत को भांपते हुए सरकार ने जांच का आदेश दे दिया है और दिल्ली पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए उन कोचिंग वालों को हिरासत में लिया है जिन पर संदेह है। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस से युवाओं और अभिभावकों को आश्वस्त करने की कोशिश भी की है और राहुल गांधी के उस ट्वीट का जवाब भी दिया है, जिसमें कहा गया था कि इस सरकार में हर चीज लीक हो रही है। चौकसी और जैसे को तैसा वाली इस प्रतिक्रिया के बावजूद स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की कंबाइन्ड ग्रेजुएट लेवल परीक्षा में परचा लीक होने की घटना के बाद सीबीएसई की दसवीं और बारहवीं कक्षा के क्रमशः गणित और अर्थशास्त्र के परचे लीक होने से अपने भविष्य को लेकर आशंकित युवाओं के भीतर निराशा पैदा होती है। मामला दो विषयों के परचा लीक होने तक समाप्त नहीं होता। कई परीक्षार्थियों का कहना था कि दो नहीं सभी परचे लीक हुए हैं और सभी की परीक्षाएं फिर से होनी चाहिए। अगर लीक होने वाले प्रश्नपत्रों की संख्या बढ़ती है तो छात्रों को उन तमाम परीक्षाओं में दिक्कत पेश आएगी जो सीबीएसई के साथ ही जुड़ी होती हैं। सरकार को यह भी देखना होगा कि पेपर लीक होने का केंद्र दिल्ली ही क्यों रहता है? अगर उसके तार देश के अन्य राज्यों से जुड़े हुए हैं तो उन्हें भी खोज निकालना होगा। हालांकि, परचे लीक करने वाले व्यापमं घोटाले की जिस तरह से जांच हुई है उससे हमारी जांच एजेंसियां भी पक्षपाती नज़र आती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्याय, निष्पक्षता और कानून के समक्ष समानता बहुत जरूरी है। सरकार को उन्हें मुन्ना भाइयों से बचाकर हर हाल में सुनिश्चित करना होगा।


दैनिक जागरण

दलित हित के नाम पर

एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नारेबाजी की सस्ती राजनीति के तहत जो माहौल बनाया गया उसका ही यह नतीजा है कि सरकार को इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने के लिए राजी होना पड़ा। कहना कठिन है कि पुनर्विचार याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट किस निष्कर्ष पर पहुंचता है, लेकिन यह अच्छा नहीं हुआ कि राजनीतिक दलों ने पूरे प्रकरण को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के बजाय अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थो को पूरा करने के इरादे से एक ऐसे कानून में सुधार पर हंगामा खड़ा कर दिया जिसका दुरुपयोग हो रहा था और जो दलितों की भलाई के बजाय उनका अहित करने के साथ-साथ समाज में वैमनस्य फैलाने का कारण बन रहा था। समझना कठिन है कि सुप्रीम कोर्ट की इस व्यवस्था को एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने वाला कैसे करार दिया गया कि बिना जांच गिरफ्तारी नहीं होगी। क्या न्याय का तकाजा यह नहीं कहता कि किसी मामले में किसी की गिरफ्तारी प्रथमदृष्टया प्रमाण मिलने के बाद ही की जानी चाहिए? इसी तरह आखिर अभियुक्त को जमानत के अधिकार से वंचित करना न्यायसंगत कैसे कहा जा सकता है? एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था देकर विधि के शासन के अनुरूप ही कदम उठाया था कि गिरफ्तारी से पहले आरोपों की जांच होगी और सरकारी कर्मचारी के मामले में किसी वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति से गिरफ्तारी होगी। उसने जमानत की गुंजाइश भी बनाई थी, क्योंकि यह देखने में आ रहा था कि झूठे मामलों में फंसाए गए लोग भी जेल में पड़े रहते थे। 1सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पहले इस रूप में प्रचारित किया गया कि एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने का काम कर दिया गया और फिर सरकार पर यह तोहमत मढ़ी जाने लगी कि यह काम उसकी ढिलाई से हुआ। इसी के साथ यह मसला एक राजनीतिक हथियार बन गया और दलित हितैषी होने का दिखावा करने के क्रम में यह जानते हुए भी राष्ट्रपति के यहां गुहार तक लगाई गई कि वह इसमें कुछ नहीं कर सकते। चूंकि एक-दूसरे से आगे दिखने की होड़ मची इसलिए इस मामले में विपक्षी सांसदों की तरह चिंतित दिखने के लिए सत्तापक्ष के सांसद भी सक्रिय हो गए। यह सहज ही समझा जा सकता है कि राजनीतिक नुकसान होने के भय से सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार दायर करने में ही अपनी भलाई समझी। क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकता है कि जब एससी-एसटी एक्ट की तरह अन्य ऐसे दमनकारी कानूनों में भी सुधार की कोशिश होनी चाहिए थी जिनका दुरुपयोग किसी से बदला लेने अथवा परेशान करने के लिए किया जाता है तब दलित-आदिवासी हित के नाम पर ऐसा वातावरण बनाया गया जैसे देश आज भी तीन दशक पहले जैसी स्थिति में है जब एससी-एसटी एक्ट का निर्माण हुआ था। क्या इसे सही कहा जा सकता है? राजनीतिक दल खुद को दलितों और आदिवासियों को रक्षक बताने के लिए चाहे जैसे दावे करें, तथ्य यही है कि एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा था और उसके चलते इन समुदायों के युवक-युवतियों को नौकरी देने से बचने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही थी।


प्रभात खबर

व्यवस्था बेहतर हो
‘फिर से परीक्षा होती भी है, तो इस बात की क्या गारंटी है कि हमारे साथ ऐसा दोबारा नहीं होगा?’ ये शब्द हैं दसवीं की एक छात्रा के. यह सवाल न सिर्फ केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से है, बल्कि परीक्षाएं संचालित करनेवाली देश की हर संस्था से है. यह सवाल केंद्र और राज्य की सरकारों से भी है, जिनके अधीन ये संस्थाएं काम करती हैं.  सीबीएसई की दसवीं और बारहवीं कक्षा के पर्चे लीक होने की यह घटना पहली बार नहीं हुई है. विभिन्न स्कूली परीक्षाओं और चयन परीक्षाओं में पर्चे बाहर आने की शिकायतें पहले भी आयी हैं. इसके साथ अन्य तरह की धांधलियों को जोड़ दें, तो यह स्पष्ट है कि हमारे शैक्षणिक तंत्र में संगठित भ्रष्टाचार और कदाचार का माहौल है.  इसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है, जो प्रतिस्पर्धा के दौर में नींद-चैन खोकर अपने सफल भविष्य के सपने संजोये परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. उनकी इस कोशिश में उनके अभिभावक और शिक्षक भी तनाव झेलते हैं. यह भी सोचा जाये कि शैक्षणिक भ्रष्टाचार का कैसा मनोवैज्ञानिक असर इन बच्चों पर पड़ेगा? सीबीएसई परीक्षाओं की केंद्रीय संस्था है और स्कूली परीक्षाओं के अलावा अन्य कुछ अहम परीक्षाओं का संचालन भी इसके जिम्मे है. इसकी कार्यशैली और उम्दा रिकॉर्ड राज्यस्तरीय बोर्डों के लिए मानक हैं. सीबीएसई के पूर्व अध्यक्ष अशोक गांगुली ने रेखांकित किया है कि बोर्ड की कामयाबी ने उसके भीतर आत्मतुष्टि, लापरवाही और अहंकार की नकारात्मक भावनाएं भी पैदा की हैं. एनसीईआरटी के निदेशक रहे ख्यात शिक्षाविद कृष्ण कुमार का मानना है कि बोर्ड के प्रशासनिक ढांचे और उसकी कार्यशैली सुधार की राह में बड़ी बाधा हैं. शिक्षा व्यवस्था में माफिया गिरोहों की घुसपैठ बहुत समय से है.  पर्चे लीक होने और धांधली के मामलों से बोर्ड को सीख लेनी चाहिए थी. उम्मीद है कि लाखों छात्रों की परेशानी को हमारे नीति-निर्धारक और शैक्षणिक प्रशासक गंभीरता से समझने की कोशिश करेंगे और व्यवस्थागत खामियों को ठीक करने के लिए ठोस कदम उठायेंगे. इस संबंध में यह भी चिंताजनक है कि शिक्षा माफिया के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई करने में बहुत कमी रही है.  यह नहीं भूलना चाहिए कि अभिभावक बच्चों की शिक्षा पर बहुत खर्च करते हैं तथा छात्र भी अच्छे अंक लाने के दबाव में होते हैं. असफल होने या कम अंक आने पर या फिर ऐसी आशंका से छात्र अवसाद से भी पीड़ित होते हैं, जिसकी भयावह परिणति आत्महत्या के रूप में भी होती है. माफिया या संस्थागत लापरवाही के कारण परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में आती है.  तात्कालिक तौर पर इस मामले की त्वरित जांच कर दोषियों को सजा देने के साथ खामियों का ठीक से आकलन कर उन्हें दूर करने के प्रयास हों, ताकि फिर संकट की ऐसी स्थिति पैदा नहीं हो. नागरिकों को भी सरकार और संस्थाओं पर सुधार के लिए दबाव बनाये रखना होगा.


देशबंधु

किसका बेड़ा पार करेंगे रामजी
संविधान निर्माता और देश के पहले कानून मंत्री बाबा अंबेडकर का नाम आधिकारिक रूप से बदलकर डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर हो जाएगा। दरअसल राज्यपाल राम नाइक की सलाह के बाद योगी सरकार ने ये फैसला लिया है। श्री नाइक ने बाबा साहेब के नाम में रामजी जुड़वाने के लिए 2017 से ही एक अभियान चलाया था। उन्होंने नाम में बदलाव के लिए उस दस्तावेज का भी हवाला दिया था, जिसमें भीमराव अंबेडकर के हस्ताक्षरों में रामजी नाम शामिल था।
महाराष्ट्र में बेटे के नाम के साथ पिता के नाम को जोड़ने का रिवाज है। इसलिए भीमराव अंबेडकर के नाम के साथ रामजी जोड़ा गया। सवाल उठाया जा सकता है कि अगर बाबा साहेब के पिता का नाम रामजी न होकर गणपत, सुरेश, महेश कुछ भी होता, क्या तब भी उनके नाम में पिता का नाम जोड़नेे के लिए ऐसा अभियान चलाया जाता? और अब जबकि उत्तर प्रदेश में बाबा साहेब के नाम में रामजी जुड़ गया है, क्या उससे कुछ बदलने वाला है? क्या इससे लोगों को खासकर सवर्णों को भीमराव अंबेडकर की महत्ता, उनका जीवन दर्शन, उनका संघर्ष समझ में आएगा? क्या इससे उनकी मूर्तियों पर होने वाले हमले रुक जाएंगे? और सबसे बड़ा सवाल, जिन दलितों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए, जिनके हक के लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया, क्या इस नाम परिवर्तन से दलितों की स्थिति सुधर जाएगी? नाम बदलना तो सरकारी, प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन दलितों की स्थिति बदलना सामाजिक प्रक्रिया है, जिसमें काफी कठिनाई है। तो क्या यह मान लिया जाए कि योगी सरकार ने समाज को बदलने की जगह नाम बदलने का एक आसान रास्ता चुना है।
बाबा साहेब का नाम कोई पहली बार नहीं बदला है। उनके पिता को रामजी नाम के बावजूद अपने उपनाम सकपाल के कारण भेदभाव सहना पड़ा था। दरअसल सकपाल उपनाम महार जाति का है, जिसे लोग अछूत और निचली जाति मानते थे। अपनी जाति के कारण बाबा साहेब को सामाजिक दुराव का सामना करना पड़ता था और सवर्णों से कहीं अधिक प्रतिभाशाली होने के बावजूद स्कूल में कक्षा के अन्दर बैठने की इजाजत नहीं थी। प्यास लगे तो पानी और पानी के बर्तन को छूने की इजाजत नहीं थी। इसलिए उनके पिता ने सकपाल की जगह अपने पैतृक गांव अंबाडवे के आधार पर उनका उपनाम अंबाडवेकर स्कूल में दर्ज कराया। एक ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव आंबेडकर को बाबासाहब से विशेष स्नेह था। इस स्नेह के चलते ही उन्होंने उनके नाम से ‘अंबाडवेकर’ हटाकर अपना उपनाम ‘आंबेडकर’ जोड़ दिया।
सकपाल से आंबेडकर तक के इस परिवर्तन के बावजूद बाबा साहेब की सामाजिक स्थिति में कोई फर्क नहींआया और आखिरकार उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया। 1956 में डा. अंबेडकर की मृत्यु हुई, तब से अब तक 62 बरस बीत गए, लेकिन देश में दलितों की स्थिति दयनीय ही बनी हुर्र्ई है। और देश के आगे बढ़ने या 21वीं सदी के आने से भी उनकी स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। समाज में धर्म और जाति की बेड़ियां और मजबूत होती जा रही हैं। तिस पर चुनावों में धर्म का सिक्का चलता देख, राजनीतिक दल इन बेड़ियों को और मजबूत करने में लगे हैं। डा. अंबेडकर के नाम में रामजी शामिल करना भी चुनावी पैंतरा ही नजर आता है।
भाजपा और दक्षिणपंथी संगठन किसी भी तरह से अयोध्या में राम मंदिर बनवाना चाहते हैं। अब जब तक उनकी यह महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो रही, तब तक वे राम के नाम को भुनाने में लगे हैं। संयोग से डा.अंबेडकर के नाम में रामजी जोड़ने का मौका उनके हाथ लग गया है। अब शायद वे दलितों को यह संदेश देना चाहते हों कि तुम्हारे मसीहा के नाम में भी हमने रामजी जोड़ दिया है, अब तुम भी राम की शरण में आओ, यानी भाजपा की शरण में आ जाओ। पर दलित भी जन्नत की हकीकत को जानते हैं। रामजी करेंगे बेड़ा पार, ऐसी बातें भी सवणोंं के लिए ही आरक्षित हैं। दलितों को तो समाज में बराबरी का दर्जा पाने के लिए और न जाने कितनी सदियों तक इंतजार करना होगा।


 

The Hindu

Testing Exams

he Central Board of Secondary Education faces a serious erosion of credibility with the leak of its annual examination question papers on Economics for Class 12 and Mathematics for Class 10. Thousands of students are naturally frustrated that their best shot at these papers has come to nought; they must now make another strenuous effort in a re-examination. Clearly, the Ministry of Human Resource Development failed to assign top priority to secrecy and integrity of the process, considering that its standard operating procedure was easily breached, and the questions were circulated on instant messaging platforms. Yet, the problem is not new. State board question papers have been leaked in the past. When the HRD Ministry was asked in the Lok Sabha three years ago what it intended to do to secure the CBSE Class 12 and 10 examinations, Smriti Irani, who was the Minister then, asserted the inviolability of the process, since the question papers were sealed and stored in secret places and released to authorised officials with a window of only a few hours. In addition, the board has dedicated secrecy officers for each region. But the protocol has failed, and HRD Minister Prakash Javadekar should conduct a thorough inquiry to get at the truth and initiate remedial steps without delay. One of the options is to institute a National Testing Agency, although it was originally supposed to take charge of entrance examinations in the first phase. State school boards also need help to reform systems.

A major leak such as the one that has hit the CBSE raises a question often debated in academic circles: is a high-stakes test the best option? To some sociologists, the use of a quantitative indicator with rising importance for social decision-making makes it more vulnerable to corruption pressures, and distorts and undermines the very processes it is intended to monitor. That seems to be an apt description of what has taken place. Today, what is needed is a credible testing method to assess a student’s aptitude and learning. But the answer may lie not in one all-important examination, but in multiple assessments that achieve the same goal. Such an approach will end the scramble for high scores in a definitive board examination, and the exam stress that the government has been trying to alleviate. It will also limit the fallout of a leak. These and other options need to be debated by academic experts. More immediately, the CBSE has to restore faith in its processes. The board went into denial mode when the leaks were first reported, but subsequently decided to acknowledge the problem and ordered a fresh examination in the two subjects. In the current scheme, the annual exercise is all-important to students. Everything should be done to inspire total confidence in the board examinations.


 Indian Express

Failing The Test

A vast majority of the over 20 lakh students who will have to re-take their CBSE examination are, in essence, collateral damage to the central education board’s shameful failure in conducting a fool-proof test. That the human resource development ministry-affiliated body was unable to prevent a leak of the Class 10 Mathematics paper and Class 12 Economics paper is bad enough. What made matters worse was the seeming lack of contrition and introspection that was due from an organisation that had failed massively in providing a level-playing field to students — its primary function.

The rationale behind the Board examinations is simple: A centralised test is meant to minimise biases arising from region, circumstances — economic and otherwise, and schools inflating marks for their own students. The CBSE has seemed unsure of this mandate in the past: It had made Class 10 exams optional in 2010 in favour of Continuous and Comprehensive Evaluation, only to revoke the decision eight years later. The justification for the flip-flop remains wanting. Now, a question paper leak puts paid to any benefits of the high-pressure exam for the majority of students who did not cheat. Rather than apologising unconditionally, the Board initially issued a generic, almost casual statement, ordering students to sit through their exam again to “uphold the sanctity” of the process and in the “interest of fairness to students”. In fact, when reports of the leak first surfaced, the CBSE had issued a denial. The insipid bureaucratic jargon betrays a simple fact: The CBSE does not seem to realise that by failing to prevent a leak, and making students sit through an exam (twice) for no fault of their own, “sanctity” and “fairness” have already been compromised.

In the wake of protests and uproar by students, teachers and the community at large demanding that the re-exams be scrapped, the HRD ministry has promised strict action against the culprits. The Delhi police has already raided several properties in the course of its investigation. But the moral culpability of a crime, especially one with deep consequences for lakhs of young people, does not lie with the criminals alone. First, the HRD ministry and the CBSE must issue an apology for the anguish and uncertainty its negligence has caused for students, and parents. Second, the source of the leak must be punished. Finally, those responsible within the Board and government for ensuring the inviolability of examinations must be held accountable. It is regularly pointed out that pressure of examinations takes an undue psychological toll on students. The prime minister himself counselled students via a video conference in February. By its incompetence in conducting a fair examination, the government-affiliated CBSE has only added to the burden of students.


Times Of India

CBSE Fails

Because of leaked question papers, CBSE has declared that students will have to retake the Class XII Economics exam held on Monday and the Class X Math exam held on Wednesday. Beyond being a huge embarrassment for the authorities, this is unconscionably traumatic for students across the country – particularly in a year in which the compulsory Class X board exam was brought back. As for the Class XII retest, it may have a domino effect on several other competitive exams and college entrances. Many students claim that exam papers for other subjects too have been leaked this year. All of this casts a big shadow over the CBSE exam process – affecting 28 lakh students.

A copy of the leaked Class X Maths paper was reportedly delivered to the office of the CBSE chairperson a day before the exam. Usually, separate question papers are set for Delhi, the rest of India, schools outside India, and there’s also a reserve. Had this procedure been followed, the leaked paper could have been replaced with the reserve paper, preventing the scandal of test and retest. But this year all the zones were given one common question paper against the usual norm, reducing room to mitigate the leak. It’s a classic illustration of the dangers of over-centralised education.

While a criminal syndicate is suspected of carrying out the leaks, the issue of accountability at CBSE can’t be whitewashed. True, scamsters make the most of modern technology. From ‘remote’ cheating in the online exam for the staff selection commission (SSC) to the Cambridge Analytica case, this is of course a really widespread challenge today. But for that very reason, protecting data calls for sophisticated security measures. CBSE’s board exams may determine the future of India’s children, but it failed to rise to the challenge.

This is a young country but its leadership does a terrible job of addressing youth issues. From the Vyapam scam in Madhya Pradesh to various school state boards, criminal gangs that guarantee results have mushroomed. But authorities are only able to nab small fry, emboldening masterminds to continue operations. The need of the hour is higher conviction of scamsters, greater accountability of institutions like CBSE, and of course better exam security. Otherwise students will lose faith in the exam system, not to mention that everything in education should not hang on exams in the first place.


 The Telegraph

Killed Off

A country where people are pulled in different directions by the law on the one hand, and the tentacles of power operating through caste, clan or community identities on the other, a decisive court ruling is of overwhelming importance.

The impact of the Supreme Court ‘ s directions on honour killings has been made more powerful by its consistency with earlier rulings — on privacy as a right, on Hadiya ‘ s return to her husband, and on passive euthanasia. In each, individual liberty, guaranteed by the Constitution, has been given primacy. Most important, the latest judgment has attacked a so- called traditional crime at the root. The court was responding to the petition of a non- governmental organization against honour killings. The demand for ‘ purity ‘ in marriages and relationships seems to give Indian society, especially rural society in certain regions, the licence to kill. In matters of clan, kin, caste and community, local authoritarian structures such as khap panchayats and similar groups of elders are empowered, through society ‘ s compliance, to judge, and then ‘ execute ‘ people wishing to marry outside their caste or community or within their gotra . Women accused of premarital or extramarital relationships, or survivors of rape, sometimes even those asking for divorce or doing anything at all that seems remotely out of the way can be ‘ punished ‘ in the same way. Law has nothing to do with this. The ‘ elders ‘ are supposed to be carrying out the strictures of the ‘ scriptures ‘ , which, evidently, do not baulk at murder. By stating that no one can interfere with the decision of two consenting adults to marry, and by elucidating the steps that district authorities and the police must take to prevent the crime and protect its targets, the court has aimed to make this exercise of illicit power and the perpetuation of murder impossible.

The states have been made accountable for the elimination of the crime. But only rigorous implementation of the court ‘ s instructions will make this possible. Blind belief, on the basis of which khap panchayats have opposed the ruling, is not only difficult to uproot, but is also too widespread in society for local law- enforcers to be always above it. Honour killings are often disguised as murder for some other reason, which makes recording difficult. What is accepted as ‘ natural ‘ by society is invisible, even if everyone knows about it. The ruling has made the crime indisputably visible; governments have no excuse to let it continue.


New Indian Express

CBSE and its ostrich like attitude

The Central Board of Secondary Education examination paper leak that has affected lakhs of students across the country and abroad has come as a rude shock to not only the students but also to their parents. The shoddy manner in which the CBSE has conducted itself is not only shocking but highly condemnable. When reports came in Monday of a possible paper leak of the Class XII economics paper, the standard response was of a denial. Prior to the alleged economics paper leak, there were also reports of the Class XII accountancy paper being leaked.

In both cases, even as the students were writing the exam, the paper was doing the rounds on social media and WhatsApp. But instead of conducting a probe there was only denial. Even when the CBSE announced its decision to conduct a re-examination of the economics and mathematics papers, the board refused to admit that the papers had leaked. Instead it said it was taking the step “taking cognizance of certain happenings in the conduct of examinations in order to uphold the sanctity of the board examination and in the interest of fairness to students”.

This ostrich-like approach not only does nothing to restore its credibility but also reveals a stubborn attempt to brush such an important development under the carpet.Human Resources Development Minister Prakash Javadekar’s statement that even he spent a sleepless night as a parent will do little to assure the students because paper leaks seem to have become the norm. Before the CBSE exam paper leak there was the Staff Selection Commission paper leak. The SSC exams are conducted for recruitment into Central government services. The affected SSC hopefuls are still protesting even though the government has ordered an investigation by the CBI. This only shows that the students have little faith in the government and the systems that are in place. The least that the government can do is to take action against some officials because in both cases the leak could not have taken place without official connivance.

 

 

 

 

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