हेडलाइन मैनेजमेंट का शीघ्रपतन: एक्सप्रेस और TOI में टपका एक ही शीर्षक!

द टेलीग्राफ में यह खबर लीड नहीं है (अखबार ने अर्नब गोस्वामी के लीक चैट पर पुलवमा की खबर को लीड बनाया है)। टीकाकरण से संबंधित पहले पन्ने की दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, “पहले दिन टीका लगाए जाने वाले लोगों की संख्या 43 प्रतिशत कम रही।” द हिन्दू में भी यह खबर छह कॉलम में लीड ही है। शीर्षक है, “प्रधानमंत्री ने कहा, टीके सुरक्षित हैं, अफवाहों पर ध्यान न दें।” हिन्दुस्तान टाइम्स ने और सब से आगे निकलकर इसे बैनर बनाया है। शीर्षक भी अगले चरण वाला है,  टीका लग गया, सुरक्षित। कहने की जरूरत नहीं है कि कोई 135 करोड़ की आबादी में अभी एक लाख 91 हजार लोगों को ही टीका लगा है और यह कल के लक्ष्य से 43 प्रतिशत कम है, जैसा द टेलीग्राफ ने बताया है। 

इसमें कोई शक नहीं है कि कोरोना का टीका लगाने में भारत में जल्दबाजी की जा रही है और इसके नुकसान चाहे न हों, फायदा कोई नहीं होने वाला है। विदेश से आया यह संक्रमण जब फैलने से नहीं रोका जा सका तो आगे क्या रोका जाएगा। अगर भारत में अभी तक टीबी, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों को नहीं रोका जा सका है तो कोरोना को क्यों और किसलिए रोका जा रहा है – यह सब समझे-समझाये बगैर टीका लगाने के अपने मकसद हैं और मैं इसे हेडलाइन मैनेजमेंट कहता हूं। हालांकि, इसमें पैसे ज्यादा खर्च किए जा रहे हैं। भले ही पैसा पीएम केयर्स का हो या भारत सरकार का। 

जो भी हो, हेडलाइन मैनेजमेंट का आलम यह है कि आज इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर छह कॉलम में लीड है और शीर्षक एक ही है, ‘इंजेक्टिंग होप’ यानी उम्मीद की सुई लगाना। द टेलीग्राफ में यह खबर लीड नहीं है (अखबार ने अर्नब गोस्वामी के लीक चैट पर पुलवमा की खबर को लीड बनाया है)। टीकाकरण से संबंधित पहले पन्ने की दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, “पहले दिन टीका लगाए जाने वाले लोगों की संख्या 43 प्रतिशत कम रही।” द हिन्दू में भी यह खबर छह कॉलम में लीड ही है। शीर्षक है, “प्रधानमंत्री ने कहा, टीके सुरक्षित हैं, अफवाहों पर ध्यान न दें।” हिन्दुस्तान टाइम्स ने और सब से आगे निकलकर इसे बैनर बनाया है। शीर्षक भी अगले चरण वाला है,  टीका लग गया, सुरक्षित। कहने की जरूरत नहीं है कि कोई 135 करोड़ की आबादी में अभी एक लाख 91 हजार लोगों को ही टीका लगा है और यह कल के लक्ष्य से 43 प्रतिशत कम है, जैसा द टेलीग्राफ ने बताया है। 

प्रचारकों का काम अलग होता है। और यह अर्नब के चैट से भी पता चल रहा है जिसे कल टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने पर नहीं छापा था। छापा तो टेलीग्राफ ने भी नहीं था पर वहांँ आज है। टीकाकरण की शुरुआत बेशक बड़ी खबर है लेकिन खबरों को देखने का नजरिया एक हो जाए यह उससे भी बड़ी खबर है। और यह पांच-छह साल से चल रहे हेडलाइन मैनेजमेंट का ही असर है। आइए, आज देखें टीकाकरण से संबंधित और क्या खबरें हैं। निश्चित रूप से टेलीग्राफ और द हिन्दू की तरह उन्हें भी शीर्षक बनाया जा सकता है पर शीर्षक तो छोड़िए जब घटनाएँ वोट बटोरने के लिए घटने लगें और मीडिया प्रचारक की मुद्रा में डटा हो तो ऐसा होगा ही। उदाहरण के लिए, इंडियन एक्सप्रेस में ही खबर है कि एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया के साथ सफाई कर्मचारियों को सबसे पहले टीका लगाया गया। मंत्री कह रहे थे कि गोबर से बचा जा सकता है और टीका एम्स के सफाई कर्मचारियों को सबसे पहले लगे, यह कोई साधारण विडंबना नहीं है। 

इस पर कोई खबर, चर्चा या विश्लेषण नहीं सुनाई पड़ता है कि जो बीमारी पिछले साल मार्च तक कुछ नहीं थी अचानक आखिर में खतरनाक हो गई। जून-जुलाई तक पूरी तरह गंभीर रही फिर कम होने लगी और उद्योग जगत ने जब नये मानकों को मानने से लगभग मना कर दिया तो बीमारी कम (खतरनाक) होने लगी। मामले कम ज्यादा बताने की खबरें भी आईं। रेलवे कोच में मरीजों को रखने, वेंटीलेटर खरीदने के लिए ऑर्डर देने जैसी  तैयारियां भी हुईं और बिना टीका इन सबके बगैर काम चल गया। अगर आप इन घटनाओं घोषणाओं तैयारियों को समग्र रूप में देखें तो साफ है कि सब राम भरोसे अटकल पच्चू है लेकिन बोलने का साहस बहुत कम लोगों में है। हालांकि, वह अलग मुद्दा है। उसपर फिर कभी। आज हिन्दू में खबर है कि टीका लगवाने वालों से एक फॉर्म भरवाया जा रहा है जिसमें क्लिनिकल ट्रायल मोड में दवा लेने के लिए सहमति ली जा रही है। गंभीर प्रतिकूल घटना के लिए क्षतिपूर्ति कंपनी देगी बशर्ते यह साबित हो कि यह वैक्सीन से संबंधित है। कहने की जरूरत नहीं है कि टीका लग गया, सुरक्षित हो गये कहने की बजाए ऐसी बहुत सी खबरें दबा दी गई हैं।

आज इंडियन एक्सप्रेस में लीड के साथ ही एक और खबर है, “प्रधानमंत्री ने ‘निराशा में उम्मीद’ के लिए वैज्ञानिकों की प्रशंसा की, कहा सतर्क बने रहें।” आप जानते हैं कि देश में कोरोना आया तो प्रधानमंत्री ने कहा था कि इससे 21 दिन में जीत लिया जाएगा। फिर ताली-थाली बजवा रहे थे और अब वैज्ञानिकों की तारीफ कर रहे हैं। निश्चित रूप से यह काम देर से किया गया है (हालांकि, पीएम केयर्स से इसके लिए पैसे दिए गए थे) पर पहले का रुख ‘निराशा में उम्मीद’ का नहीं था। पहले के प्रधानमंत्रियों से ऐसे विरोधाभास पर सवाल किए जाते थे। अब के प्रधानमंत्री मीडिया से बात नहीं करते हैं तो एक खबर इस पर होनी चाहिए थी, हो सकती थी, जो पहले पन्ने पर नहीं है। अब लोग ‘मन की बात” का इंतजार करते हैं। इसके अलावा, इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में यह तो बताया है कि 1.91 लाख लोगों को टीका लग गया पर यह नहीं बताया है कि ये लक्ष्य से 43 प्रतिशत कम है। उल्टे केंद्रीय स्वास्थ्यमंत्री का दावा है कि यह अभियान सफल रहा और टीका लगाने के बाद किसी जटिलता की कोई खबर नहीं है। 

जो टीका वर्षों-वर्षों प्रभावशाली रहने के लिए लगाया जा रहा है उसका कुप्रभाव एक दिन में नहीं दिखा तो यह खबर नहीं है। फिर भी, देश के स्वास्थ्यमंत्री दावा करें और वे चिकित्सक भी हैं तो यह खबर है ही। वैसे भी, कोई अखबार अपने पाठकों को क्या बताएगा यही संपादक को तय करना होता है। संपादक प्रचारक हो सकता है। इसीलिए मैं अभी तक नहीं जानता कि टीका लगवा लेने के बाद आप कितने साल के लिए सुरक्षित हो जायेंगे, मास्क लगाने से मुक्ति मिल जाएगी कि नहीं और अगर यह इतना ही बढ़िया है तो उन मंत्रियों को पहले क्यों नहीं लगाया जा रहा है जिनकी उम्र ज्यादा है और जिनका जीना देश के लिए जरूरी है। और कई इस या अन्य बीमारियों से पहले ही मौत के मुंह में जा चुके हैं। बिहार चुनाव के समय राज्य में टीका लगाने की घोषणा की गई थी। उसके बारे में भी कुछ पता नहीं चला है। ढूँढ़ रहा हूँ। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है। हालांकि, पहले पन्ने पर ही बताया गया है कि अंदर के पन्नों पर भी इससे संबंधित खबरें हैं। 

हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक भ्रमित करने वाला है। टीका लगाने से सुरक्षित हो जाने का दावा मुझे थोड़ी जल्दबाजी लग रही है। एक्सप्रेस ने पहले टीका लगवाने वालों में एम्स के निदेशक की तस्वीर छापी है तो हिन्दुस्तान टाइम्स ने टीका लगवाते और भी लोगों की तस्वीर के साथ एम्स के निदेशक की भी छापी है। इसका कोई कैप्शन नहीं है और उसके नीचे की खबर का शीर्षक है, मनीष कुमार ने दिल्ली में सबसे पहले टीका लगवाया। मुझे लगा मनीष कुमार कोई सरकारी अधिकारी स्वास्थ्य सचिव या कोई ऐसे ही बड़े अफसर होंगे पर पता चला कि मनीष कुमार 34 साल के किसी सफाई कर्मचारी का नाम है। मुद्दा यह है कि अफसर-नेता टीका क्यों नहीं लगवा रहे हैं और स्वास्थ्य कर्मियों पर लगाकर (अगर) प्रयोग किया जा रहा है तो सफाई कर्मचारियों को क्यों खतरे में डाला जा रहा है। हम पहले पढ़ चुके हैं कि हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री से लेकर एक महिला पत्रकार की तबीयत खराब हो चुकी है। सफाई कर्मचारी – स्वास्थ्य कर्मी नहीं होते। उन्हें बख्श दिया जाना चाहिए था। वह इसलिए भी कि जब 60 किसानों की मौत पर कोई प्रतिक्रिया नहीं है तो किसानों के बीमार होने पर कौन पूछेगा। 

हिन्दुस्तान टाइम्स में ही खबर है कि भारत बायोटेक का टीका लगाए जाने पर दिल्ली और तमिलनाडु के अस्पतालों में चिकित्सकों ने चिन्ता जताई क्योंकि इसे इमरजेंसी ऑथराइजेशन ही मिला है। राम मनोहर लोहिया अस्पताल के चिकित्सकों ने मांग की है कि ऑक्सफोर्ड आस्ट्रा जेनेका का टीका लगाया जाए। यह खबर पर्याप्त चिन्ताजनक है लेकिन आज अखबार भी राजा का बाजा बजाते लग रहे हैं। द हिन्दू ने वैक्सीन को सुरक्षित बताने वाले प्रधानमंत्री के दावे को शीर्षक बनाया है और उपशीर्षक है, एम्स प्रमुख, नीति आयोग के सदस्य और सीरम इंस्टीट्यूट के सीईओ पहले दिन टीका लगवाने वालों में हैं। कोई दो लाख लोगों को पहले दिन टीका लगे और उनमें नाम गिनाने वाले सिर्फ तीन लोग हों तो बाकी क्यों नहीं हैं, यह भी खबर है। खासकर प्रधानमंत्री अगर सबको प्रेरित प्रोत्साहित कर रहे हैं, उनकी भूमिका बताई-दिखाई जा रही है तो उन्हें आगे बढ़कर टीका लगवाना चाहिए या नहीं लगवाने का कारण बताना चाहिए। लेकिन अखबारों में पहले पन्ने पर ऐसा कुछ नहीं है। ना ही किसी अखबार ने टीका लगवाने का लाभ बताया है कि अब मनीष कुमार या एम्स प्रमुख बिना मास्क घूमेंगे आप भी बिना मास्क घूमना चाहते हैं तो टीका लगवाने के लिए तैयार रहें।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

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