सीपी कमेंट्री: गाँधी और हम भारत के लोग !

महात्मा गांधी (02 अक्टूबर 1869 – 30 जनवरी1948) भारत के संविधान में प्रयुक्त पदबंध ‘हम भारत के लोग’ के लिये ही नहीं, पूरी दुनिया के वास्ते ‘सत्य’ के मेटाफर भी बन चुके हैं. मेटाफर को हिंदी में रूपक या उपमा समझ सकते हैं. हमने ही नहीं बहुत सारे लोगो ने हाड़-मांस के ऐसे इंसान, गांधी को कभी नहीं देखा. फिर भी हम उन्हे रोज देखते हैं. 


नोटबंदी

भारत में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा 8 नवम्बर 2016 को की गई नोटबंदी के पहले तक सबसे कम मूल्य के एक रुपये से लेकर बीस रुपये, पचास रुपये, एक सौ रुपये और अधिकतम 500 रुपये तक के करेन्सी नोटो के ‘मुखपृष्ठ’ के मध्य में  और धातु के कई स्वरूप के प्रचलित सिक्को के ‘हेड’ कहे जाने वाले भाग पर भी गांधी की ही छवि अंकित है. क्योइस ‘क्यों’ का उत्तर हीकम से कम हम भारतीय लोगों के लिये महात्मा गांधी को सत्य का सर्वनाम मान लेने के ठोस कारण हैं. 

मोदी जी द्वारा की गई नोटबंदी के बाद 500 रुपये के करेंसी नोट तो अवैध घोषित कर दिये गये. लेकिन उनकी जगह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी 1000 रुपये और 2000 रुपये के बिल्कुल नये मुद्रित करेंसी नोट पर भी गांधी की ही छ्वि कमोबेश बनी रही. 

 

नोटबंदी के कहर से आक्रोषित लोगो के बीच एक चुटकुला चला. और ऐसे कुछेक कार्टून भी सामने आये जिसमें मोदी जी को ये कहते बताया या दर्शाया गया : 

बापू, थक गये हो पुराने जमाने के इन करेंसी नोट को ढोते ढोते. अब आराम करो. अब न्यू इंडिया है. आपकी जगह हम हैं न

 

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो सका. मोदी राज में निकले करेंसी नोट पर गांधी की जगह मोदी जी की छवि अंकित करने का राजकीय दुहसाहस कोई नहीं कर सका. छल-कपट और हर तरह की चाटुकारिता पर नैतिकता भारी पड गई. सम्भव है कि मोदी जी की भक्त-मंडली दम-खम से ये कहे कि ‘खांग्रेसी, वामी, रैबीज कुमार, खुजलीवाल’ जैसी क्या बेसिर पैर की बात कही गई है मीडिया विजिल के इस कालम में. वे आगे और पूछेंगे तो हम जवाब भी दे देंगे. 

बहरहाल, सेकयूलर भारत में गांधी की जगह हिंदू राष्ट्र के महानायक मान लिये गये मोदी जी को प्रतिष्ठापित करने की कोशिश अभी भी चल ही रही हैं. आतंकी पाले में होने के गम्भीर आरोप से घिरी उनकी ही भारतीय जनता पार्टी की सांसद प्रज्ञा ठाकुर जब-तब गांधी के अदालत से दोष सिद्ध हत्यारे नाथूराम गोड्से का जयकारा लगा देती हैं. और मोदी जी लोगो को दिखाने के लिये उनको ‘दिल से कभी माफ नहीं करने’ के अपने ट्वीट के बावजूद अपने सांसद के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते हैं.

विनायक सावरकर हिंदू राष्ट्र के पैरोकार थे. उन्होने अंग्रेज हुकुमत को कई बार लिखित माफीनामा देकर अंड्मान निकोबार द्वीप समूह के सेल्युलर जेल के कुख्यात ‘काला पानी’ कारावास की सजा से छूटने के बाद स्वतंत्रता संग्रामियों का बिल्कुल साथ नहीं देने का वचन-नामा भी दिया. उनको इसके एवज में ब्रिटिश हुक्मरानी से पुरस्कार स्वरूप पेंशन मिली. वह गांधी हत्या कांड में अभियुक्त भी थे. वे तत्काल स्पष्ट सबूत नहीं जुट पाने के कारण ‘संदेह के लाभ’  में छूट गये. बाद में जीवनलाल कपूर कमीशन ने साफ़ कहा कि गाँधी की हत्या के पीछे नि:संदेह सावरकर थे. गांधी की हत्या से पहले उनको दशानन दर्शाकर मारने के लिये निशाना साधने का रेखाचित्र सावरकर के हल्के की एक मराठी पत्रिका में छपा थी. गांधी से अपनी घृणा के लिये चर्चित सावरकर नागपुर में जिस घर में ठहरते थे उसी घर से गोड्से को गान्धी की हत्या करने के लिये रिवाल्वर देने का संदेह है. गांधी की हत्या के अगले ही दिन नागपुर के एक अंग्रेजी अखबार में इस सम्बंध में गिरफ्तारी की खबर पुलिस हवाले से छपी थी. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता देवेंद्र फड्णवीस के कुछ समय पहले के एक ट्वीट में दावा किया गया कि सावरकर, नागपुर जाने पर जिस घर में ठहरते थे वह सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश शरद बोवडे के परिवार का हैं. 

 

जाहिर है कि एक तरफ गांधी से घृणा फैलाने का अभियान चल रहा है तो दूसरी तरफ गोड्से और सावरकर का स्तुतिगान भी चल रहा है. और ये अभियान मोदी जी की पार्टी के नेता ही चला रहे हैं. 

 

सत्य बल से बडा कोई बल नही 

देश भर के लोगो के बीच जो बात पहले से कायम थी उसमें और बल आ गया कि बाहुबल, धनबल और सत्ताबल से कंही अधिक बड़़ा सत्य बल और नैतिक बल है.  

गाँधी जी ने 1942 में कहा था: अगर आपको लगता है कि यह मौहाल जैसा होना चाहिए वैसा नही है तो उस माहौल को छोड़ कर भागिए मत. बल्कि उस माहौल में संघर्ष कीजिए.  निर्भय बनकर संघर्ष कीजिए. सिविल नाफरमानी के लिए तैयार होइये. 

आज महात्मा गाँधीजी की 150 वीं जयंती पर हमें व्यवस्था द्वारा बनाए भय के माहौल में निर्भय बनकर खड़े रहने की और भी ज्यादा दरकार है.




सीपी
नाम से चर्चित चंद्रप्रकाश झा,यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से रिटायर होने के बाद तीन बरस से अपने गांव में खेती-बाडी करने और स्कूल चलाने के साथ ही स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन भी कर रहे हैं. उन्होने भारत की आज़ादी , चुनाव अर्थनीति , यूएनआई का इतिहास आदि विषय पर कई किताबे लिखी हैं.वह मीडिया विजिल के अलहदा चुनाव चर्चा के स्तम्भकार हैं. वह क्रांतिकारी कामरेड शिव वर्मा मीडिया पुरस्कार की संस्थापक कम्पनी पीपुल्स मिशन के अवैतनिक प्रबंध निदेशक भी हैं, जिसकी कोरोना- कोविड 19 पर अंग्रेजी–हिंदी में पांच किताबों का सेट शीघ्र प्रकाश्य है. मीडिया विजिल के लिये उनकी यदा-कदा सीपी कमेंट्री विभिन्न मुद्दो की उन बातो पर है जो गोदी मीडिया नहीं बताती है. उनका ‘चुनाव चर्चा’ कालम भी अलग से बरकरार रहेगा.

 



 

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