अख़बारनामा: छुट्टी के दिन खबरों का खेल, नोटा पर भ्रम फैलाने वाली सूचना

संजय कुमार सिंह


बुधवार को दीवाली थी इस कारण आज अखबार नहीं आए हैं। सोशल मीडिया पर आज एक ‘खबर’ ने ध्यान खींचा। इसके मुताबिक चुनाव आयोग ने नियमों में संशोधन कर नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) के तहत पड़ने वाले वोट को वैध कर दिया है और चुनाव रद्द करने का प्रावधान किया है। इसके अनुसार नोटा को मिले वोटों की संख्या दूसरे नंबर पर रहेगी तो सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार विजयी नहीं घोषित किया जाएगा बल्कि चुनाव रद्द कर दिया जाएगा। इससे भिन्न राजनीतिक दल ‘अच्छे’ उम्मीदवार देने के लिए मजबूर होंगे। नोटा की शुरुआत यह बताने के लिए की गई थी कि मतदाता किसी चुनाव क्षेत्र में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों में से किसी को भी पसंद नहीं करते हैं। पर उसके तहत पड़े वोट अवैध माने जाते हैं और उनकी गिनती से जीतने हारने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन किसी चुनाव क्षेत्र में मुकाबला कांटे का हो और सब लोग मिलकर नोटा का प्रचार करें तो नतीजा पलट सकता है। मुमकिन है, हार-जीत का अंतर नोटा से कम हो। इस तरह नोटा का प्रचार कोई भी कर सकता है और मतदाताओं को बरगलाया जा सकता है।

इन दिनों यह कोशिश चल रही है। ऐसे में आज की “खबर” तर्कसंगत सुधार और पुरानी मांग पूरी होने जैसी लगती है। दूसरी ओर, पिछले काफी समय से यह चर्चा चल रही है और मतदाताओं को प्रेरित किया जा रहा है कि वे नोटा का बटन दबाएं। ऐसे में यह खबर महत्वपूर्ण है। मैंने गूगल सर्च किया, कहीं कोई खबर नहीं। चुनाव आयोग के साइट पर ऐसी कोई सूचना नहीं और नोटा से संबंधित नियम वैसे ही हैं जैसे पहले थे। जाहिर है, अफवाह है तो कोई आधार या कारण होगा। पता चला कि इंडियन एक्सप्रेस की साइट पर कल की तारीख (7 नवबंर 2018) से एक खबर है, जिसका शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, “नोटा को ज्यादातर वोट मिले तो चुनाव फिर होगा, महाराष्ट्र चुनाव आयोग ने कहा।” उपशीर्षक है, “नोटा की शुरुआत के समय से ही अधिकार कार्यकर्ता और गैर सरकारी संगठन मांग करते रहे हैं कि मतदाताओं के सशक्तिकरण के लिए नोटा को विजयी बनाने का विकल्प होना चाहिए।”

कहने की जरूरत नहीं है कि यह खबर महाराष्ट्र चुनाव आयोग के हवाले से है और सोशल मीडिया पर अभी से इस तरह की सूचना का असर मतदाताओं पर रह सकता है। खासकर तब जब बाद में इसका खंडन नहीं हो और यह विशेष तौर से नहीं बताया जाए कि यह खबर लोकसभा चुनाव के लिए नहीं थी। लोकसभा चुनाव में क्या होगा यह अभी तय नहीं है और इस आधार पर नोटा को वोट देने वाले निश्चित रूप से गलतफहमी के शिकार होंगे और इसका लाभ एक खास राजनीतिक दल को मिलने की संभावना है। ऐसी ही एक खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया के साइट पर भी है। इसका शीर्षक है, “नोटा को अधिकतम वोट मिले तो नए सिरे से चुनाव : महाराष्ट्र चुनाव आयोग”।

असल में गड़बड़ इस खबर में है। इसके मुताबिक, महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग ने मंगलवार को एलान किया (आज वीरवार है, बुधवार को दीवाली थी पर अखबार आए थे और आज नहीं आए हैं, यह खबर वेबसाइट पर आज है) कि किसी विधानसभा क्षेत्र में अगर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को सबसे ज्यादा वोट नोटा विकल्प के लिए मिलते हैं तो चुनाव लड़ने वाले किसी भी उम्मीदवार को विजयी नहीं घोषित किया जाएगा, दोबारा चुनाव होंगे। यह नियम महाराष्ट्र के अहमदनगर और धुले नगर निगम चुनाव में लागू होगा जो 9 दिसंबर को होने हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि 9 दिसंबर को होने वाले नगर निगम के चुनाव की बात हो रही है और खबर की शुरुआत विधानसभा चुनाव क्षेत्र से की गई है। पर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में होने वाले चुनावों के संबंध में इसमें कोई चर्चा नहीं है।

खबर आगे कहती है, “राज्य चुनाव आयुक्त जेएस सहरिया ने कहा कि वे नोटा की सहायता से चुनाव प्रक्रिया को बेहतर करने की उम्मीद कर रहे हैं और ऐसा मतदाताओं की बढ़ी हुई भागीदारी से होगा। नोटा राजनीतिक दलों को अच्छे उम्मीदवार उतारने के लिए मजबूर करेगा। …. हमलोगों ने तय किया कि इसे बदला जाए और नोटा को ज्यादा प्रभावी बनाया जाए। चुनाव अधिकारियों ने कहा कि संशोधित नोटा नियम अलगे साल के लोक सभा और राज्य विधानसभा चुनावों के लिए भी प्रभावी हो सकते हैं बशर्ते भारतीय चुनाव आयोग इस तरह का संशोधन करे। अभी तक की स्थिति के अनुसार नोटा नियम स्थानीय चुनावों के लिए लागू हैं क्योंकि हमलोगों ने धारा 243 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए परिवर्तन कर दिए हैं। चुनाव आयोग धारा 324 के तहत ऐसे बदलाव कर सकता है।”

कहने की जरूरत नहीं है कि महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव के लिए बदले गए नियम को सोशल मीडिया में नियम बदल दिया जाना घोषित कर दिया गया है जबकि अभी ऐसी कोई बात ही नहीं है। चुनाव से पहले खबरों को लेकर ऐसे खेल खूब होने की संभावना है। पाठकों को चाहिए कि वे सतर्क रहें। किसी भी खबर पर आंख मूंदकर ना यकीन करें और ना उसके हवाले से किसी को बताएं। पर खुद जांच करें और तभी उसपर यकीन करें। सबसे बड़ी बात है कि ऐसी सूचनाएं सही होंगी तो कई जगह होंगी। किसी एक अखबार या पोस्ट में नहीं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।



 

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