पहला पन्ना: सकारात्मकता पर RSS सुप्रीमो के ‘भाषण’ के बाद प्रचार में डूबे अख़बार!

 

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संघ द्वारा आयोजित एक समारोह में सकारत्मकता पर भाषण दिया और कई अखबार प्रचार में लग गए दिख रहे हैं। आज पहले पन्नों पर प्रचारात्मक खबरों की बाढ़ आई हुई है। भागवत का भाषण इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस ने ही यह खबर भी दी है कि प्रधानमंत्री विरोधी पोस्टर के लिए गिरफ्तार लोगों में दिहाड़ी मजदूर, मुद्रक (प्रेस मालिक) और पोस्टर ढोने वाले ऑटो वाले भी हैं। द हिन्दू की खबर के अनुसार इनकी संख्या 24 हो गई है। पाकिस्तान को घुसकर मारने के आश्वासन पर चुनाव जीतने वाले किसी ऑटो वाले से इतना डर जाएंगे यह शायद उसने सोचा ही नहीं होगा। कल यह खबर एक्सप्रेस के अलावा किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं थी, इसलिए आज उसका फॉलो अप होना चाहिए था। पर सकारात्मक पत्रकारिता का आदेश जो है। हालांकि, द टेलीग्राफ में यह खबर है

 


इंडियन एक्सप्रेस की सकारात्मक खबरें  

“प्रधानमंत्री ने राज्यों से कहा : (संक्रमितों की) संख्या पारदर्शिता से बताएं”। उपशीर्षक है, ग्रामीण क्षेत्रों में जांच, संसाधन पर फोकस, केंद्र के वेंटीलेटर के ऑडिट के लिए भी कहा। खबर बताती है कि प्रधानमंत्री शनिवार को कोविड पर उच्च स्तर की बैठक संबोधित कर रहे थे। इससे पहले चुनाव प्रचार अचानक छोड़कर बैठक की थी जिसमें अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी का मुद्दा उठाया था पर देश भर में यह अभी तक नहीं निपटा है। डबल इंजन वाले गोवा में लगातार कई दिनों में 75 लोगों की मौत की खबर कल ही थी। इस संबंध में आज इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, गोवा ने पुनर्विचार किया : मौतों को ऑक्सीजन से नहीं जोड़ सकते।” टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है, गोवा मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन संकट जारी, 8 और मरे कहने की जरूरत नहीं है कि एक्सप्रेस की यह खबर लीपा-पोती की कोशिश के अलावा कुछ नहीं है। 

इंडियन एक्सप्रेस में एक और अच्छी खबर है, सिरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के आदार पूनावाला के पिता सायरस पूनावाला अपने बेटे के पास लंदन पहुंच गए हैं। पूरा मामला अच्छी कमाई होने के बाद परिवार का लंदन बस जाने का है और इसीलिए कोई यह नहीं मान रहा है कि वे देश छोड़कर भाग गए हैं। मुझे भी लगता है कि ऐसा कुछ नहीं है और कमाई हो तो कौन नहीं चाहेगा कि सपरिवार लंदन शिफ्ट हो जाया जाए। इसका मतलब भागना होता भी नहीं है। वैसे भी, बड़ी कंपनियां कोई खुद थोड़े चलाता है। एक और सकारात्मक शीर्षक है, चुनौतियां 70 के दशक जैसी हैं …. ज्यादातर जजों पर दबाव नहीं डाला जा सकता है”। गए महीने इलाहाबाद हाईकोर्ट से रिटायर होने वाले जज गोविन्द माथुर ने आईडिया एक्सचेंज में अपने जोधपुर घर से यह बात कही है। लोयालुहान देश में ऐसा कहना साधारण नहीं है और उसके प्रचारित करने पर तो कोई रोक भी नहीं है।  

 


टाइम्स ऑफ इंडिया 

राज्यों में वेंटीलेटर अनुपयुक्त पड़े होने की खबरों के बाद प्रधानमंत्री ने ऑडिट के आदेश दिए। आप जानते हैं कि पीएम केयर्स का गठन गए साल 28 मार्च को हुआ था। वेंटीलेटर खरीदना (हालांकि बाद में पता चला कि ऑक्सीजन सिलेंडर या कनसनट्रेटर ज्यादा जरूरी थे) उसके प्राथमिक कामों में था और कितने कैसे खरीदे गए, कहां लगे यह सब आरटीआई से पता नहीं चला क्योंकि पीएम केयर्स सरकारी नहीं है। इस बीच खबरें आती रहीं कि जो वेंटीलेटर खरीदे गए (या अस्पतालों में पहुंचे) खराब हैं, काम नहीं कर रहे, घटिया क्वालिटी के हैं। इसलिए अलग रख दिए गए। वेंटीलेटर खरीदने-देने की इस पूरी कवायद में साल भर से भी ज्यादा खर्च होने के बाद अब उसके ऑडिट का आदेश दिया गया है तो निश्चित रूप से से बड़ी खबर है। लेकिन है तो सरकार का प्रचार ही। वैसे, स्थिति यही है कि सरकार ने जो चंदे के पैसे से खरीदकर वेंटीलेटर बांटे, खराब हैं और लोग ऑक्सीजन की कमी से मर रहे हैं। 

 

 

हिन्दुस्तान टाइम्स 

प्रधानमंत्री ने स्थानीय स्तर पर रोकथाम, जांच पर जोर दिया – लीड है। दूसरी सकारात्मक खबर है, दिल्ली के मामले घटकर 6430 रह गए, मुख्यमंत्री ने सतर्क रहने की अपील की। तीसरी खबर है, सरकार ने कहा, स्थिति स्थिर हो रही है पर ब्लैक फंगस के मामले में गंभीरता दिखाई। 

ये तो हुई सकारात्मक खबरें। द हिन्दू और द टेलीग्राफ के हवाले से अब आपको बताता हूं कि पहले पन्ने की कौन सी खबरें इन अखबारों में नहीं छपीं। देश भर के कई राज्यों में कोविड से मरने वालों की आधिकारिक संख्या बहुत कम बताये जाने का आरोप है। यहां तक कि जारी किए गए मृत्यु प्रमाणपत्र की संख्या मरने वालों की बताई गई संख्या से कई गुना ज्यादा है। द हिन्दू ने राज्यों की खबर के साथ बताया है कि दिल्ली में यह अंतर 4500 से ज्यादा का है। अखबार ने बताया है कोविड-19 नियमों के तहत अंत्येष्टि की संख्या सरकार ने मरने वालों की जो संख्या बताई उससे ज्यादा है। कांग्रेस नेताओं ने इस मामले की न्यायिक जांच कराने की मांग की है पर यह खबर द टेलीग्राफ में ही पहले पन्ने पर  दिखी। द हिन्दू की दूसरी खबर है, कोविड-19 से मुकाबले में मारे गए बिहार के 119 डॉक्टर्स के परिवार को कोई मुआवजा नहीं मिला है। कुल 120 में से सिर्फ एक के परिवार को मुआवजा मिला है। 

द हिन्दू में तीसरी महत्वपूर्ण खबर है, उन्नाव यानी उत्तर प्रदेश की। यह देश का इकलौता ऐसा राज्य है जहां सब कुछ ठीक होने का दावा किया गया और गलत रिपोर्टिंग करने के आरोप में कार्रवाई भी हुई। इसमें किसी को बख्शा नहीं गया। आज की खबर का शीर्षक है, उन्नाव के गरीब अंतिम संस्कार करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।” खबर के अनुसार, गंगा में शव मिलने से शवों को दफनाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अखबार ने उमर रशीद की बाईलाइन वाली खबर छापी है कि परसंदा के बच्चू लाल अपनी भतीजी का शव लेकर 30 किलोमीटर दूर पहुंचे तो उन्हें पता चला कि वे शव को दफना नहीं सकते हैं। उनके यहां अविवाहित लड़कियों को दफनाने का रिवाज है और पिछले ही महीने वे वहीं, किसी और रिश्तेदार को दफना गए थे पर तब ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं था। 

द टेलीग्राफ ने इलाहाबाद की एक तस्वीर छापी है जो ऊंचाई से ली गई है और नीचे नदी किनारे रेत में शव जैसी कई आकृतियां बड़ी मात्रा में हैं। पीटीआई की इस खबर का कैप्शन है, कोविड-19 के दूसरे दौर में इलाहाबाद में गंगा के किनारे रेत में दबे शव जैसा शनिवार को देखा गया। अखबार ने इसकी तुलना 2 अप्रैल 1984 की घटना से की है जब इंदिरा गांधी ने अंतरिक्ष यात्री राकेश सर्मा से पूछा था, अंतरिक्ष से भारत कैसा लगता है। इसपर उन्होंने कहा था, सारे जहां से अच्छा। अखबार ने लिखा है कि 15 मई 2021 को कोई प्रधानमंत्री मोदी से पूछता आपके बसेरे से भारत कैसा लगता है तो वे कहते, आपको याद होगा गंधारी ने कुरुक्षेत्र में क्या कहा था : जहां कहीं मैं देखती हूं, हर दिशा में अनगिनत लाशें पड़ी हुई हैं …. । यह पीटीआई की तस्वीर है। बहुतों के पास गई होगी। लेकिन आपके अखबार में नहीं हो तो सोचिए क्यों नहीं है

द हिन्दू में आज एक छोटी सी खबर है, नए जिले को लेकर आदित्यनाथ, अमरिन्दर सिंह भिड़े। यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक खबर है लेकिन मेरे किसी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं दिखी। एनडीटीवी की एक खबर के अनुसार, “यूपी के मुख्यमंत्री ने पंजाब के मुस्लिम बहुल इलाके मलेरकोटला को नया जिला बनाने को लेकर अमरिंदर सरकार पर हमला बोला है।” योगी आदित्यनाथ ने इसे कांग्रेस की विभाजनकारी नीति बताया। अमरिंदर सिंह ने जवाब देने में देर नहीं लगाई। ट्वीट कर कहा, “योगी आदित्यनाथ का बयान, बीजेपी की विभाजनकारी नीतियों की कवायद के तौर पर शांतिपूर्ण पंजाब में सांप्रदायिक घृणा पैदा करने का प्रयास है।” आप जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया था। यही नहीं, आजतक की एक खबर के अनुसार नाम बदलने के बाद अब अयोध्या में सरकार शराब और मीट पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। यह 2018 की खबर है और मुझे नहीं पता कि प्रतिबंध लगा कि नहीं। यह भी  नहीं याद है कि तब अमरिन्दर सिंह ने कोई टिप्पणी की थी। 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मशहूर अनुवादक हैं।

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