पहला पन्ना: बाइडन ने फोन किया तो ‘लीड’ और दुनिया में थू-थू पर शुतुर्मुर्ग!

कहने की जरूरत नहीं है कि इंडियन एक्सप्रेस की खबर प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी को महान प्रचारित करने की कोशिश है और इसमें कुछ गलत नहीं होता अगर एक्सप्रेस ने दि ऑस्ट्रेलियन की खबर और उसपर भारतीय उच्चायोग में तैनात भारतीय डिप्टी हाईकमिश्नर की चिट्ठी का जिक्र किया होता। जब यह आरोप आम है कि भारतीय मीडिया नरेन्द्र मोदी का प्रचारक बन गया है तब उनका प्रचार करने वाली खबर को लीड बना देना और विदेशी अखबार में छपी खबर का खंडन करके विदेशी अखबार को भी दबाव में लेने की कोशिश की खबर को कम महत्व देना वही साबित करता है जो मीडिया पर आरोप है।

आज कोई एक सर्वसम्मत लीड नहीं है और लीड के लिए चुनी गई खबर तथा उसका शीर्षक बहुत कुछ कहता है। इसलिए सबसे पहले बताता हूं कि किस अखबार में क्या लीड है और शीर्षक क्या है।

 

1. हिन्दुस्तान टाइम्स 

सरकार ने कहा, दिल्ली में सभी वयस्कों के लिए निशुल्क टीका

2. टाइम्स ऑफ इंडिया 

‘गैरजिम्मेदार’ चुनाव आयुक्त को हत्या के आरोपों का सामना करना चाहिए: मद्रास हाईकोर्ट 

3. इंडियन एक्सप्रेस  

टीके से संबंधित जानकारियों, प्रमुख आपूर्तियों पर बाइडन ने प्रधानमंत्री को समर्थन का वादा किया

4.द हिन्दू 

गृहमंत्रालय ने राज्यों को 14 दिन का स्थानीय लॉकडाउन लगाने की सलाह दी

5.द टेलीग्राफ 

कोविड की लहर के लिए चुनाव आयुक्त मुश्किल में (फ्लैग शीर्षक है,) गैर जिम्मेदार संस्थान, अकेले जिम्मेदार : हाईकोर्ट    

पांच में से तीन अखबारों ने चुनाव आयोग पर मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी को लीड बनाया है। कहने की जरूरत नहीं है कि आज के समय में यह एक महत्वपूर्ण खबर है और चूंकि हाईकोर्ट ने कहा है इसलिए उसे छापने से डरने की कोई जरूरत नहीं थी। न कोई यह कहता कि हाईकोर्ट की टिप्पणी लीड नहीं है। यह निर्णय संपादकों का होता है और मैं संपादकों का सेवा भाव ही बताना चाहता हूं। 

हिन्दुस्तान टाइम्स ने अगर दिल्ली की खबर या दिल्ली के मुख्यमंत्री के निर्णय को प्रचार दिया है तो बाकी के अखबारों ने नहीं दिया है या कम दिया है – यह भी मेरी चर्चा का विषय है। मुझे लगता है कि दिल्ली के लिए यह बड़ी खबर है और दिल्ली / एनसीआर के लिए छपने वाले संस्करण में पहले पन्ने पर होनी ही चाहिए। बेशक, इससे यह संदेश जाता है कि नरेन्द्र मोदी के मुकाबले अरविन्द केजरीवाल जल्दी फैसले करते हैं, जनहित पर सरकारी पैसे खर्च करने के लिए तैयार हैं। प्रधानमंत्री ने टीके की अलग कीमत स्वीकार कर ली है वह शायद दुनिया में अनूठा मामला है। इसलिए भी आज की यह खबर महत्वपूर्ण है।  

आज मैं यह नहीं बताउंगा कि कौन सी खबर किस अखबार में है और किसमें नहीं है। मैं सिर्फ यह बताउंगा कि खबर क्यों महत्वपूर्ण है या उसे पहले पन्ने पर प्राथमिकता या महत्व क्यों मिला। इस लिहाज से इंडियन एक्सप्रेस की लीड आज अनूठी है। इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर का फ्लैग शीर्षक लगाया है, चुप्पी के लिए आलोचना के बाद कॉल। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे और स्पष्ट करके लिखा है, अमेरिका कार्रवाई के लिए मजबूर हुआ, बाइडन ने मोदी को फोन किया। हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, फोन पर मोदी और बाइडन ने कोविड (से संबंधित) आपूर्तियों पर चर्चा की। इंडियन एक्सप्रेस ने (आज विज्ञापन नहीं है) इसके साथ बीजिंग ने सहायता की पेशकश की, चीनी दूत ने कहा कि मेडिकल सप्लाई में सहयोग करेंगे। और इसके साथ घर में भी मास्क लगाने के एक नए नियम की भी खबर है। 

कहने की जरूरत नहीं है कि इंडियन एक्सप्रेस की खबर प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी को महान प्रचारित करने की कोशिश है और इसमें कुछ गलत नहीं होता अगर एक्सप्रेस ने दि ऑस्ट्रेलियन की खबर और उसपर भारतीय उच्चायोग में तैनात भारतीय डिप्टी हाईकमिश्नर की चिट्ठी का जिक्र किया होता। जब यह आरोप आम है कि भारतीय मीडिया नरेन्द्र मोदी का प्रचारक बन गया है तब उनका प्रचार करने वाली खबर को लीड बना देना और विदेशी अखबार में छपी खबर का खंडन करके विदेशी अखबार को भी दबाव में लेने की कोशिश की खबर को कम महत्व देना वही साबित करता है जो मीडिया पर आरोप है। निष्पक्ष दिखने के लिए यह खबर अंदर के पन्ने पर हो तो बात नहीं बनती है। ऐसा बहुत कम होता है और यह निश्चित रूप से पहले पन्ने की खबर है। द टेलीग्राफ ने इसे प्रकाशित किया है। 

द टेलीग्राफ ने बताया है कि दि ऑस्ट्रेलियन ने क्या लिखा और भारतीय डिप्टी हाईकमिश्नर ने अखबार के संपादक को क्या लिखा। इसके अनुसार मोदी ने भारत को वायरल कयामत में पहुंचा दिया। अहंकार, अति राष्ट्रवाद और नौकरशाही की अक्षमता ने मिलकर भारत के लिए शीर्ष स्तर का संकट तैयार किया और भीड़ पसंद करने वाले प्रधानमंत्री उसका आनंद ले रहे हैं जबकि नागरिक घुट रहे हैं। इसपर भारत की ओर से दि ऑस्ट्रेलियन को लिखा गया है, आपके सम्मानित प्रकाशन ने पूरी तरह निराधार, संदिग्ध और अपमानजनक आलेख प्रकाशित किया है और भारत सरकार में किसी अधिकारी से तथ्यों की जांच करने की परवाह भी नहीं की ….. । यह खबर देते हुए अखबार ने लिखा है, शुतुर्मुर्ग अपना सिर रेत में नहीं छिपाते हैं, भारत सरकार ऐसा करती है। कहने की जरूरत नहीं है जि प्रधानमंत्री की योग्यता, क्षमता, कौशल का डंका दुनिया में बज रहा है उसकी चर्चा किए बगैर इंडियन एक्सप्रेस ने भारत में क्या हो रहा है सिर्फ उसे छापा है। बात सही-गलत होने की नहीं, प्रचारक की भूमिका स्वीकार कर लेने की है।  

द हिन्दू ने अपने लीड से यह बताने की कोशिश की है कि पिछले साल बिना सोचे-समझे और सलाह किए लॉक डाउन घोषित करने वाले प्रधानमंत्री के रहते इस बार गृहमंत्रालय राज्य सरकारों को यह सलाह दे रहा है कि वे स्थानीय स्तर पर 14 दिन का लॉकडाउन करें। पिछली बार प्रधानमंत्री तय करते थे कि कितने बजे कितनी देर तक ताली थाली और क्या बजाना है। या फिर यह भी तय किया था कि बत्ती बुझाकर दीया, टॉर्च और क्या-क्या जलाना है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह के आदेशों से देश में यह माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है कि इस बार की नाकामी राज्य सराकारों की है। हिन्दू ने इसे प्रमुखता से रेखांकित किया है। 

अकले कार में मास्क लगाने के सरकारी आदेश को अदालतों का भी समर्थन मिलने के बाद अब घर में भी मास्क पहनने की जरूरत बताई गई है और इंडियन एक्सप्रेस समेत कई अखबारों में यह पहले पन्ने पर है। यह उन लोगों के लिए चेतावनी है जिन्हें कार में मास्क लगाने के आदेश पर एतराज नहीं है। अगर कार में मास्क लगाना जरूरी है तो घर में भी होना ही चाहिए (हालांकि उसका कारण अलग बताया गया है) और नियम बन जाए तो उसका पालन भी कराया जाएगा, जांच भी होगी। वही सरकार करेगी जो अस्पतालों में और वैसे हाहाकार मचने के बाद हफ्ते भर से ज्यादा समय में ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं कर पाई है।

अब आज की कुछ ऐसी खबरें बताऊं जिन्हें प्रमुखता नहीं मिली। 

  1. राजधानी (दिल्ली में) कोविड के मरीजों के लिए आईसीयू बेड खत्म हुए 
  2. राज्यों ने संकेत दिया कि 18 साल से ऊपर के लोगों को टीके लगाना शुरू करने में देर हो सकती है  
  3. बंगाल में चुनाव प्रचार खत्म हुआ। सातवें चरण में 75 प्रतिशत मतदान। अंतिम चरण 29 को। 
  4. कोविड की वास्तविकता का असर आईपीएल की समानांतर दुनिया में, पांच खिलाड़ियों ने भाग लेने से मना किया  
  5. दिल्ली के अस्पतालों में जगह नहीं है, हाईकोर्ट ने अशोका होटल को अपने लिए कोविड केंद्र बनाया
  6. सहायता के लिए तैयार हूं, कोविड से लड़ने के लिए राजनीतिक सहमति चाहिए : सोनिया   
  7. बंद किए जाने के तीन साल बाद तमिलनाडु स्टरलाइट प्लांट को ऑक्सीजन के लिए फिर खोलेगा। 
  8. दीप सिद्धू को जमानत मिली, अदालत ने पुलिस की कार्रवाई को ‘शातिर और भयावह’ कहा।   
  9. दिल्ली दंगे के मामले में निगरानी की कमी के लिए अदालत ने पुलिस की खिंचाई की 
  10. आईआईटी मॉडल की भविष्यवाणी, 8 मई तक दैनिक मामले 4.4 लाख होने लगेंगे 

दिल्ली में ऑक्सीजन के मामले में अभी पूरी और पक्की व्यवस्था नहीं हुई है। आज हिसार में पांच लोगों की मौत की खबर द हिन्दू में है। इसके बावजूद दिल्ली में आईसीयू बेड की कमी कितने दिनों से है आप जानते हैं पर खबर लीड नहीं बनी। बंगाल में चुनाव बहुत घिसटा अब खत्म होने पर आया है। इससे संबंधित खबरें विशेष रूप से छपनी चाहिए। देश में कोविड का यह हाल है पर आईपीएल की अलग दुनिया है। उसमें भी कोविड का असर हो गया तो निश्चित रूप से यह भी बड़ी खबर है। जज साहिबानों ने अपने लिए व्यवस्था कर ली इसका तो कोई जवाब ही नहीं है। सोनिया गांधी की पेशकश साधारण नहीं है खासकर प्रचारकों के झूठे-सच्चे और निराधार आरोपों के बीच। लेकिन इसे भी महत्व नहीं मिला है जबकि सोनिया ने यह भी कहा है कि कोविड से मुकाबला विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर तीन साल से बंद कारखाने को ऑक्सीजन के लिए खोलना अलग तरह की मजबूरी है। सरकारी नीतियों और अनुपालन के लिहाज से यह भी साधारण खबर नहीं है। दीप सिद्धू और दिल्ली दंगे के मामले में दल्ली पुलिस की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी अब बहुत मायने नहीं रखती पर इसे महत्व नहीं देना दिल्ली पुलिस का उपयोग राजनीति के लिए करने वालों का साथ देना है। उससे दीप सिद्धू भी नहीं बचे तो यह अलग एंगल भी था। और अंतिम तो बेहद डरावना है। उत्तर प्रदेश में रहकर उसके बारे में मुझे और कुछ नहीं कहना। क्या पता उत्तर प्रदेश में डरने पर भी सजा घोषित हो गई हो।

 

आप समझ सकते हैं कि ये खबरें पहले पन्ने पर होने के बावजूद लीड क्यों नहीं है। मुझे जो कहना है वह शीर्षक के साथ खबर के पहले पन्ने पर होने या नहीं होने में ही है। आप देखिए कि आपके अखबार में खबर है कि नहीं और है तो शीर्षक क्या है। कहां है। बेशक, मैं सिर्फ पहले पन्ने की खबरों की बात करता हूं। और साफ है कि कुछ खबरें बढ़ा-चढ़ाकर दी जाती हैं और कुछ रद्दी की टोकरी में डाल दी जाती हैं। 

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

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