नया सर्कुलर, नयी सिक्‍योरिटी कंपनी और छावनी बनाने की नयी ‘साजिश’!

जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय इन दिनों फिर से चर्चा में है, लेकिन मुद्दा छात्रसंघ चुनाव का नहीं है जिसके परिणामों पर लगी अदालती रोक अब हटा ली गयी है और वाम संगठनों ने एक बार फिर से जेएनयूएसयू पर कब्‍ज़ा कर लिया है। चर्चा का नया मुद्दा है परिसर को सुरक्षा देने के लिए एक नयी सिक्‍योरिटी कंपनी सीएसएएस (साइक्‍लॉप्‍स सिक्‍योरिटी एंड अलाइड सर्विसेज़़ प्राइवेट लिमिटेड) की तैनाती।

दिल्‍ली की स्‍थानीय कंपनी सीएसएएस के यहां चार्ज लेने के बाद वर्षों से काम कर रही बहुराष्‍ट्रीय कंपनी G4S (ग्रुप4 सिक्‍योरिटी) की छुट्टी हो गयी है और इस कंपनी में काम कर रहे सुरक्षाकर्मियों की स्थिति को लेकर छात्र चिंतित हैं। छात्रों के बीच चर्चा है कि यहां वर्षों से तैनात रहे G4S के सुरक्षाकर्मी अब बेरोज़गार हो जाएंगे। इस चर्चा से ज्‍यादा अहम हालांकि चिंता का एक और विषय है। परिसर में नयी कंपनी सीएसएएस के आते ही सुरक्षा विभाग ने छात्रों के लिए नया सर्कुलर जारी कर दिया है। चीफ़ सिक्योरिटी ऑफिसर के इस सर्कुलर में साफ़ लिखा है कि जब कभी गार्ड छात्रों और उनके वाहनों की जांच करना चाहें तो छात्र इसमें उनका सहयोग करें। इसके अलावा छात्रों को कैंपस में हमेशा आइडेंटिटी कार्ड साथ रखने का भी निर्देश भी दिया गया है। इस सर्कुलर के आते ही नवनिर्वाचित छात्रसंघ ने इसका विरोध किया है।

छात्रसंघ की तरफ़ से कहा गया है, “हम चीफ़ सिक्योरिटी ऑफिसर को चेतावनी देते हैं कि छात्रों की हरकत पर निगरानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी”। छात्रसंघ ने छात्रों से यह भी अपील की है कि अगर कोई छात्र इस तरह की दिक्कतों का सामना करता है तो वह छात्रसंघ पदाधिकारियों से इसकी शिकायत कर सकता है। छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष ने फेसबुक पर लिखा है कि कैंपस को सुरक्षित बनाने के नाम पर इसे जेल में बदलने की कोशिश की जा रही है।

नयी सुरक्षा कंपनी को परिसर में तैनात किए जाने की प्रक्रिया पर भी छात्र सवाल उठा रहे हैं। निवर्तमान छात्रसंघ ने इस मामले में सूचना के अधिकार के तहत टेंडर प्रक्रिया की जानकारी मांगी है। छात्रसंघ के नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष साकेत मून ने इस बारे में बताया, ”सरकारी संस्था में टेंडर निकालने की एक प्रक्रिया होती है जो पूरी तरह से पारदर्शी होती है लेकिन यहां टेंडर सार्वजनिक रूप से निकाला ही नहीं गया और अंदर ही अंदर किसी एक पार्टी को ठेका दे दिया गया। यह अपने आप में एक बड़ा स्कैम है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि नए टेंडर में पैसे ज़्यादा दिये जा रहे हैं जबकि गार्डों की संख्या पहले के मुकाबले बहुत कम है। नया और महंगा टेंडर देने से पहले इस बारे में थोड़ा भी नहीं सोचा गया कि 450 गार्ड जिनके पास और कोई विकल्प नहीं है, उनका क्या होगा। छात्रों में चर्चा है कि यहां काम कर रहे 450 से ज़्यादा गार्ड अब बेरोजगार हो चुके हैं। यह बात कितनी सही है इसकी पुष्टि करना मुश्किल है क्‍योंकि आम तौर से सुरक्षा कंपनियों में काम करने वाले गार्ड ठेकेदारी पर होते हैं, कंपनी के कर्मचारी नहीं। उन्‍हें एक से दूसरे परिसर में तैनात किए जाने का चलन है।

कुछ पूर्व गार्डों से बात करने पर हालांकि तस्‍वीर साफ़ होती है। परिसर से विदा होने से पहले नाम न छापने की शर्त पर G4S के कुछ सुरक्षाकर्मियों ने बताया था कि अब तक उन्हें किसी दूसरे परिसर में तैनाती के निर्देश नहीं मिले हैं। उन्होंने बताया कि यहां से हटाये गये करीब 25-30 लोगों को किसी मॉल में शिफ़्ट कर दिया गया है लेकिन बाकी की तस्‍वीर धुंधली है। लिहाजा बेरोजगारी की बातें अभी अपुष्‍ट हैं लेकिन ये गार्ड एक दूसरे कारण से निराश हैं। उन्‍होंने बताया कि अगर एक महीना और बचा होता तो उन्हें दिवाली का बोनस मिल जाता लेकिन यहां से जाने के बाद उनका कुछ पक्‍का नहीं है।

सवाल उठता है कि गार्ड इस कंपनी का हो या उस कंपनी का, छात्रों से उसका क्‍या लेना-देना? जेएनयू इसी मामले में विशिष्‍ट हो जाता है क्‍योंकि यहां के छात्रों के बीच परिसर में काम करने वाले दूसरे तबके के कमज़ोर कर्मचारियों के साथ एकजुटता जताने की एक परंपरा रही है। निर्माण मजदूरों के समर्थन में आज से दस साल पहले जेएनयू के छात्रों का संघर्ष उच्‍च शिक्षा परिसरों के इतिहास में एक सुनहरी लकीर है। छात्रों का G4S के गार्डों के साथ भी कुछ ऐसा ही संवेदना का रिश्‍ता था।

यही कारण है कि जेएनयूएसयू चुनाव में G4S के गार्डों का मुद्दा सभी छात्र संगठनों ने मिलकर उठाया था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अध्यक्ष पद के उम्मीदवार रहे मनीष जांगिड़ ने कई बार कहा था कि अगर वे यूनियन में चुनकर आते हैं तो उनके लिए लड़ाई लड़ेंगे। हमने उनसे बात कि तो उन्होंने बताया कि उनकी इस मामले में प्रशासन से बातचीत चल रही है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि छात्र प्रतिनिधियों ने G4S के गार्डों का मुद्दा कभी अपनी प्राथमिकता में नहीं रखा। वामपंथी छात्र संगठनों, बापसा व छात्र राजद ने भी इसे अपने एजेंडे में शामिल किया था। चुनाव की सरगर्मी बढ़ी तो इस मुद्दे पर कोई साझा प्रतिरोध देखने को नहीं मिला। अब जबकि नई यूनियन आ गयी है तो एक बार फिर इस छूटे हुए सिरे को थामने की कोशिशें ताज़ा हो गयी हैं।

कई छात्रों ने पुराने गार्डों के साथ अपने अनुभव हमसे साझा किये। यहां समाजशास्त्र से एमए की छात्रा मान्या दीक्षित कहती हैं कि जब उनकी बातचीत उनके हॉस्टल में तैनात महिला गार्ड्स से हुई तो उन्होंने बताया था कि तब तक दूसरी जगह उनकी तैनाती की कोई सूचना नहीं थी। मान्‍या से उन्‍होंने आशंका जाहिर की थी कि यहां से जाने के बाद वे बेरोजगार हो जाएंगी।

यहां पढ़ रहे शशिभूषण पांडे बताते हैं, ”G4S के गार्ड्स से हमारे अलग ही संबंध थे। पुराने लोग थे जो यहां के कल्चर और छात्रों की परेशानियों को समझते थे। उनके पास ज़्यादा सुविधाएं नहीं थीं इसलिये हमारी ज़रूरतों को भी वे समझ पाते थे। अब गार्डों की संख्या कम कर के यूनिवर्सिटी को मिलिट्री छावनी बनाया जा रहा है जिसका असर यहां की शिक्षा पर पड़ सकता है। अब फैकल्टी के रीडिंग रूम्स ये कहकर नहीं खोले जाएंगे कि हमारे पास इतने गार्ड नहीं हैं। जिन लोगों को पैसे की ज़रूरत थी उन्हें नौकरी से निकालकर पेंशन और ज़्यादा सुविधाएं पा रहे रिटायर्ड आर्मीमैन को लाकर यह साबित किया जा रहा है कि यहां के छात्र देशद्रोही हैं, जो कि अक्सर वे कहते रहते हैं।”

नई कंपनी को बिना किसी पारदर्शिता के ठेका मिलना सवाल तो खड़े करता है लेकिन कई और सवालों के जवाब छात्रों के पास नहीं हैं। मसलन, ऐसी कंपनी को ठेका क्‍यों दिया गया जिसे रिटायर्ड फौजी और पुलिसवाले चलाते हों। सीएसएएस की वेबसाइट देखने से पता चलता है कि इसके प्रबंधकीय और सलाहकार बोर्ड में एक कर्नल, एक मेजर और एक फौजी जनरल शामिल हैं जबकि चौथा पुरुष सदस्‍य आइपीएस है। दिल्‍ली में 2009 में पंजीकृत साइक्‍लॉप्‍स सिक्‍योरिटी एंड अलाइड सर्विसेज़ रिटायर्ड कर्नल कृष्‍ण पाल राणा सिंह की कंपनी है जिसके तीन अन्‍य निदेशकों में पूनम राणा, देशराज और बिजेंदर नाम के व्‍यक्ति शामिल हैं।

सीएसएएस के मालिक कर्नल राणा प्राइवेट सिक्‍योरिटी इंडस्‍ट्री के केंद्रीय संघ की दिल्‍ली कार्यकारिणी में उपाध्‍यक्ष हैं और कुलभूषण जाधव की फांसी का विरोध पाकिस्‍तान की एम्‍बैसी के सामने कर चुके हैं। इसके अलावा फौज में भर्ती होने की परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए एक कोचिंग भी चलाते हैं। सिक्‍योरिटी कंपनी सीएसएएस के महावीर एंक्‍लेव, दिल्‍ली वाले पते से ही चलायी जा रही कोचिंग सारथी इंस्टिट्यूट ऑफ करियर एक्सिलेंस के बोर्ड में चार रिटायर्ड फौजी अफसर हैं।

छात्रसंघ की पूर्व उपाध्यक्ष सारिका चौधरी कहती हैं कि G4S गार्डों के यहां होने पर मजदूर और छात्र वाली एकता दिखती थी जो कुलपति को रास नहीं आ रहा था। वे बताती हैं, ”G4S के गार्डों ने कभी भी प्रशासन के दबाव में आकर काम नहीं किया इसलिये बिना किसी अग्रिम नोटिस के उनका कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया। जिस एक्स सर्विसमैन को उन्होंने कैंपस के भीतर लाया है आज भी वन पेंशन की उनकी मांग को सरकार ने लटकाकर रखा है।”

सारिका ने कहा, ”इस पूरी प्रक्रिया में जो धांधली हुई है उसे लेकर पुराने छात्रसंघ ने एक आरटीआइ लगायी है। जानकारी आने के बाद नवनिर्वाचित छात्रसंघ और जेएनयू के छात्र उस पर आगे कार्रवाई करेंगे।”


लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं। मीडियाविजिल पर छपी उनकी पिछली रिपोर्ट नीचे पढ़ें

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