अमेरिकी आयोग ने RSS पर प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश की

अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने हाल ही में अपनी 2026 साल की रिपोर्ट में भारत पर बड़ी सिफारिशें की हैं। रिपोर्ट मार्च 2026 में जारी हुई, जिसमें 2025 साल की स्थिति का जायजा लिया गया है। इसमें पहली बार आरएसएस पर साफ तौर पर टारगेटेड सैंक्शंस (प्रतिबंध या रोक) लगाने की बात कही गई है। साथ ही भारत कोकंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न’ (सीपीसी) की लिस्ट में डालने की सिफारिश सातवीं बार दोहराई गई है। यह रिपोर्ट अमेरिका की एक स्वतंत्र सरकारी सलाहकार संस्था द्वारा बनाई जाती है। इसका मकसद दुनिया भर में धार्मिक आजादी की निगरानी करना है। 

USCIRF ने साफ सिफारिश की है कि अमेरिकी सरकार आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) और भारत की खुफिया एजेंसी RAW पर टारगेटेड सैंक्शंस लगाये जायें। इसमें एसेट फ्रीज (संपत्ति जब्त करना) और अमेरिका में एंट्री बैन (दाखिले पर रोक) शामिल हो सकता है। रिपोर्ट में लिखा है: “इंपोज टारगेटेड सैंक्शंस ऑन इंडिविजुअल्स एंड एंटिटीज़, सच ऐज़ इंडियास रिसर्च एंड एनालिसिस विंग एंड द राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), फॉर देयर रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड टॉलरेंस ऑफ सीवियर वायलेशंस ऑफ रिलिजियस फ्रीडम।

यह पहली बार है जब आरएसएस का नाम सीधे लिया गया। पहले रिपोर्टों में सिर्फ कुछ अधिकारियों या RAW का जिक्र था। आयोग का तर्क है कि आरएसएस धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार है। रिपोर्ट कहती है कि 2025 में हिंदू राष्ट्रवादी भीड़ों (हिंदू नेशनलिस्ट मोब्स) ने मुसलमानों और ईसाइयों पर हमले किए। पुलिस ने अक्सर हस्तक्षेप नहीं किया। उदाहरण:

आयोग का कहना है कि बीजेपी सरकार ( जिसकी वैचारिक प्रेरणा आरएसएस है) ने ऐसे कानून बनाए और लागू किये जो अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हैं। जैसे एंटीकन्वर्शन कानून (धर्मांतरण रोकने वाले), गौहत्या कानून, वक्फ बिल 2025, विदेशी योगदान विनियमन कानून (FCRA) और UAPA। इनसे मुसलमानों, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों पर दबाव बढ़ा। रिपोर्ट कहती है कि आरएसएसबीजेपी का गठजोड़ इन कानूनों को बनाने और लागू करने में मदद करता है, जिससे अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े।

आयोग ने भारत को सीपीसी बनाने की सिफारिश की। साथ ही कहा है:

ये सिफारिशें अमेरिकी राष्ट्रपति, स्टेट डिपार्टमेंट और कांग्रेस को दी गई हैं।

सीपीसी का मतलब हैकंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न। अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता कानून (IRFA) 1998 के तहत यह वो देश हैं जहां सरकार खुद या सहन करके धार्मिक आजादी कासिस्टेमैटिक, ऑनगोइंग और एग्रेजियसउल्लंघन करती है। जैसे टॉर्चर, बिना मुकदमे लंबी जेल या जीवन की सुरक्षा छीनना।

अगर कोई देश सीपीसी बनता है तो अमेरिकी सरकार 15 तरह के कदम उठा सकती है। जैसे:

लेकिन यह स्वचालित नहीं है। राष्ट्रपति राष्ट्रीय हित में माफ भी कर सकते हैं। अक्सर इसका इस्तेमाल दबाव बनाने या बातचीत के लिए किया जाता है। भारत अभी तक कभी सीपीसी नहीं बना, हालांकि USCIRF ने सिफारिश की है। यह सातवीं बार लगातार है। 2020 की रिपोर्ट से शुरू होकर हर साल 2021, 2022, 2023, 2024, 2025 और अब 2026 तक। पहले 2002-2004 में भी सिफारिश हुई थी, लेकिन उसके बाद लंबे समय तक नहीं। 2018 में टियर-2 (दूसरे स्तर) पर रखा गया था।

यह USCIRF की सलाह है। यह अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश मंत्रालय), राष्ट्रपति और कांग्रेस को दी जाती है। स्टेट डिपार्टमेंट फैसला लेता है कि सीपीसी बने या नहीं। कांग्रेस कानून बना सकती है। अगर अमेरिका सीपीसी बनाता है तो:

लेकिन वास्तव में नतीजा सीमित रह सकता है। भारत और अमेरिका के रणनीतिक संबंध मजबूत हैं (क्वाड, व्यापार, रक्षा)। पिछले सालों में USCIRF की सिफारिशों को अमेरिका ने नहीं माना। भारत हर बार इसेबायस्ड और पॉलिटिकली मोटिवेटेडकहकर खारिज कर देता है। विदेश मंत्रालय ने अब तक 2026 रिपोर्ट पर कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया, लेकिन पुरानी रिपोर्टों पर यही रुख रहा।

बहरहाल, इसमें शक़ नहीं कि ऐसी रिपोर्ट से भारत की सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में प्रतिष्ठा कमज़ोर होती है। अमेरिका और पश्चिमी देशों में भारत की छविसबका साथ, सबका विकासवाली लोकतांत्रिक देश की बजाय अल्पसंख्यकों पर दबाव वाला देश बन सकती है। मानवाधिकार संगठन, ईसाई और मुस्लिम डायस्पोरा इसे हथियार बनाकर इस्तेमाल कर सकते हैं। रिपोर्ट में वक्फ बिल, एंटीकन्वर्शन कानून और भीड़ हमलों का जिक्र होने से भारत कीधर्मनिरपेक्षतापर सवाल उठते हैं।

USCIRF 29 देशों की निगरानी करती है। चीन, ईरान, पाकिस्तान जैसे देश भी सीपीसी में हैं। आयोग का काम धार्मिक आजादी की रक्षा करना है। रिपोर्ट में कहा गया कि 2025 में नए कानूनों से अल्पसंख्यक घरों, मस्जिदों और मदरसों पर असर पड़ा। रोहिंग्या शरणार्थियों और असम के बंगाली मुसलमानों कोघुसपैठिएकहकर निकाला गया।

नतीजा यह कि भारत को अब और ज्यादा अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना पड़ सकता है। कुल मिलाकर, USCIRF की यह रिपोर्ट एक चेतावनी है। आरएसएस पर सैंक्शंस की बात नया मोड़ है। भारत इसे गंभीरता से ले या खारिज करे, लेकिन धार्मिक सद्भाव बनाए रखना हर सरकार की जिम्मेदारी है। इससे न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय छवि बचेगी बल्कि देश की एकता भी मजबूत होगी।

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