क्वारंटीन सेंटर में मुस्लिमों से अमानवीय व्यवहार पर एक ‘हिंदू’ हृदय का बयान

(यह नरेला क्वारंटीन सेंटर में ड्यूटी दे रहे एक शिक्षक का अनुभव है। यह बताना थोड़ा ख़राब लग रहा है लेकिन आजके परिप्रेक्ष्य में ज़रूरी है कि शिक्षक ‘हिन्दू’ हैं। वैसे तो वे ‘हिन्दू-मुस्लिम’ से परे एक शानदार इंसान हैं।)

आजकल कोरोना वायरस के कहर से पूरी दुनिया कराह रही है। पर हम हिंदुस्तानी एक साथ दो वायरसों की गिरफ्त में एक साथ आते जा रहे हैं। इनमें से कोरोना वायरस एक वैश्विक आपदा के रूप में अब आया है, लेकिन नफरत वाला वायरस तो वर्षों से कभी सुसुप्त तो कभी सक्रिय रूप में हममें जमा हुआ है। हालाँकि हाल के वर्षों में इसमें तीव्र उछाल आया है और अब इसने कोरोना से भी मिलकर जुगलबंदी करनी शुरू कर दी है। निजामुद्दीन मरकज से मिले सैकड़ों कोरोना पाॅजीटिव और कोरेन्टीन किए गये जमात के मुस्लिमों के बहाने आज बहुसंख्यकवादी साम्प्रदायिकता नफरत का प्रचंड रूप धरे हाजिर है। मीडिया और दूसरी पंक्ति के नेताओं के बयान न केवल इसमें घी डाल रहे हैं बल्कि आग भी खुद ही लगा रहे हैं। पूरा मुस्लिम समुदाय कुछ अज्ञानियों और धार्मिक रूढ़िवादियों की वजह से निशाने पर है।

खैर इस जहरीले वातावरण से मेरा सीधा वास्ता हाल ही में पड़ा जब नरेला के क्वारंटीन सेंटर में विभाग की तरफ से मेरी भी ड्यूटी लगाई गई। तमाम आशंकाओं के बीच मुझे इस बात का संतोष था कि इसी बहाने आपदा काल में मुझे देश, समाज और मानवता की सेवा का मौका मिला। पत्नी और माँ जहाँ सरकार को यह कहकर कोस रहीं थीं कि ‘कहीं तुम डाॅक्टर या मेडिकल स्टाफ हूँ जो वहाँ बुलाया जा रहा है? डिपार्टमेंट को तुम्हीं मिले? कोई बहाना नहीं बना सकते क्या? और लोगों को क्यों नहीं बुलाया?’ वहीं मुझे कोई ऐसी शिकायत नहीं थी।

पर मेरा उत्साह जल्दी ही ठंडा पड़ गया जब में पहले ही दिन क्वारंटीन सेंटर पहुँचा। यहाँ जमात के ही लगभग 1000 लोग क्वारंटीन किए गये थे। मेरी ड्यूटी यहाँ के एक कंट्रोल रूम में थी, जहाँ आसपास की दो बिल्डिंग में क्वारंटीन किए गये लोगों को सुविधा पहुँचाने, शिकायत या माँग नोट करने, उसे आगे हेड क्वार्टर तक पहुँचाने, जरूरी सूचना अनाउंस करने और सामान वितरण में लगे लड़कों को निर्देश देने जैसे कार्यों को करने की जिम्मेदारी थी। हमारे सेंटर पर आठ लोगों में छः तो सरकारी विद्यालयों के शिक्षक थे, दो शायद एमसीडी के कर्मचारी थे। हमारी टीम को एक फोन, एक माइक और एक वायरलेस दिया गया था जिससे हम सूचनाओं और निर्देशों का आदान-प्रदान कर पाएँ। फोन पर ज्यादातर क्वारंटीन किए गये लोग अपनी जरूरतों, स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों या शिकायतों को नोट कराते थे जिसे हमें नोट कर आगे बताकर उसकी व्यवस्था करनी होती थी। यहाँ तीन टीमें इस काम में लगी थीं जो 12-12 घंटे काम करके 24 घंटे के बाद अदल-बदल कर ड्यूटी पर आते थे।

मैंने नोट किया कि हमारी टीम के सदस्यों में ही नहीं बल्कि यहाँ लगे पुलिस वालों, साफ-सफाई वालों, अंदर तक खाना-सामान पहुँचाने वालों में इन क्वारंटीन किये गये लोगों के प्रति अजीब सी नफरत और घृणा भरी हुई है। इनकी जाँच के लिए कुछ-कुछ अंतराल पर आ रही मेडिकल टीम के लिए तो मैं ऐसा दावा नहीं कर सकता क्योंकि हमारा सीधा वास्ता इनके काम से नहीं था और न ही कोई ज्यादा बातचीत। वे बस हमें लिस्ट सौंप जाते कि किन-किन यात्रियों को अस्पताल भेजना है और कितनी एंबुलेंस बुलानी है। (यहाँ क्वारंटीन किए गये लोगों को कोरोना संभावित या मरीज के बजाय यात्री कहा जाता था, जो मुझे सकारात्मक लगा।) यहाँ सुविधा प्रदाता के रूप में लगा स्टाॅफ पूरी तरह से मीडिया द्वारा फैलाए जा रहे प्रोपेगेन्डा के वशीभूत दिखा। ये सब देश में कोरोना का एकमात्र जिम्मेदार इन्हें ही मानते हुए इन्हें कोसते हुए दिखे। जबकि 1200 से ज्यादा कोरोना पॉजीटिव लोग पहले ही देश में मिल चुके थे। इस घटना ने भले ही आंकड़ा बढ़ा दिया हो पर जिम्मेदार तो नहीं कहा जा सकता। पर इस नीर-क्षीर विवेक की इनसे उम्मीद करना बेमानी थी।

अब आता हूँ उस शब्दावली, भाषा और व्यवहार पर जो यहाँ लोगों द्वारा बार-बार दुहराया जा रहा था। समूह का एक टीचर इन सब बातों की अगुवाई कर रहा था। मेरे ही विभाग का होने के कारण सेमिनार आदि में उससे मेरी मुलाकात होती रहती है सो मैं उसके बारे में पहले से ही कुछ जानता था (खासकर उसके साम्प्रदायिक मानस के बारे में) और वो मुझे भी। वह बार-बार आपसी बातचीत में इन्हें कटुवे, मुल्ले, आतंकी, देशद्रोही और न जाने क्या-क्या कहता। वह सरकार द्वारा इन्हें क्वारंटीन किए जाने, इलाज देने को गलत मानते हुए जान से मार देने, मस्जिद (शायद मरकज़ की जगह वह ये शब्द बोलता था) में ही बंद कर जहरीली गैस छोड़ देने, पुलिस द्वारा इनका इनकाउंटर करने, इनकी ढंग से ठुकाई करने की इच्छा जाहिर करता। साथ ही वह ये भी कहता कि सरकार तो ऐसा चाहती ही है पर ये वामी, मानवाधिकार वाले और विपक्ष के देशद्रोही ऐसा नहीं होने देते। जब मेडिकल टीम द्वारा कुछ लोगों को चिन्हित करके अस्पताल भेजा जाता तब वह बहुत खुश होता और कहता कि ‘अब ये गया हूरों के पास, इन्हें तो एंबुलेंस में ही जहर दे दो, और इनके बीच विपक्ष के नेताओं (वह दो-तीन नेताओं के नाम लेकर मेरी ओर देखता जैसे मुझे चिढ़ा रहा हो) को बैठा कर ले जाओ जिससे वो भी मरें।’ वह फोन अटैंड करने को भी ज्यादा ही उत्सुक रहता। फोन पर यात्रियों से डायरेक्ट तो वह यह नफरत व्यक्त नहीं कर पाता पर उन्हें रूखे तरीके से जवाब देकर, मांगी गई चीज उपलब्ध होने पर भी मना करके, मिस गाइड करके अपनी भड़ास निकालता। फोन रखकर फिर समूह में भौकाल जमाता कि देखो कैसे मैंने इन्हें पागल बनाया। चूँकि कमोबेश इसी मानसिकता के अन्य भी थे तो वो भी खूब मजे लेते बल्कि अपनी बात भी उसमें जोड़ते।

समूह का एक दूसरा सदस्य जो बोलने और व्यवहार में बड़ा धीर-गम्भीर था, वह भी इनके प्रति जहर बुझा हुआ था। वो मुझसे ही कहने लगा, ‘सर ये सारे जन्म से ही देश को मिटाने और नुकसान पहुंचाने के लिए ट्रेंड किए जाते हैं। इनके मदरसों में हम काफिर लोगों से दूर रहने और दुश्मनी रखने को कहा जाता है।’ वह अपने ज्ञान को विस्तार देते हुए कहता कि, ‘वह दिन दूर नहीं जब इनकी आबादी हमसे ज्यादा हो जाएगी और ये हमें ही भगा देंगे हमारे देश से। इस रणनीति पर चलकर जहाँ ये अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं वहीं हिन्दुओं के दलितों को तोड़ रहे हैं। देखा नहीं अब एस.सी इनका कितना पक्ष लेते हैं। अपना भाई समझ के राम-राम करो तो नमो बुद्धाय कहते हैं। इन सालों को भी बाद में समझ आएगा।’ कुछ देर तक चूँकि मैं इसको ठीक समझ रहा था तो मैंने इसे टोका। मैंने कहा कि इस मूर्खतापूर्ण घटना को इतना महत्त्व देने की कोई जरूरत नहीं। अब तो इन बेचारों की जान खुद ही अटक रही होगी और पछता रहे होंगे कि क्यों इकट्ठा हुए ऐसे समय और डर रहे होंगे कि कहीं कोरोना न हो जाए। वह फिर बोल पड़ा नहीं सर ये तो जानबूझकर इन्होंने कोरोना लिया है खुद में, हिंदुओं में फैलाने और देश बर्बाद करने के लिए। ये मरकज़ में इकट्ठा ही ये सब करने के लिए होते हैं। मैंने उसे थोड़ा अलग हटकर सोचने को प्रेरित करते हुए कहा, ‘नहीं इसके पीछे धार्मिक अंधता होती है और वो हर जगह होती है। देखो पकड़े गये बालात्कारी बाबाओं के आश्रम में हमारे घरों के लोग विशेषकर महिलाएं कितनी बड़ी संख्या में जाती थीं और गिरफ्तारी के विरुद्ध लोगों ने कितना दंगा किया था।’ वह कुछ सहमत होते हुए बोला, ‘फिर भी हमारे में सिर्फ कुछ बहकने वाले ऐसा करते हैं पर इनमें सारे ही ऐसे होते हैं।’ मैंने आगे बात करना उचित ही नहीं समझा आखिर पत्थर पर क्या सर मारता?

हमारे समूह का एक सबसे जवान लड़का कम ही बोलता। पर वह शायद सबसे जरूरी काम करता इनके लिए। वह ढूँढ-ढूँढ कर मोबाइल पर ऐसे वीडियो निकालता जो मुसलमानों से नफरत को बढ़ाते थे। ‘मेडिकल स्टाॅफ पर जमात के कोरोना संभावित व्यक्ति ने थूक दिया’, ‘इंदौर में मुसलमानों ने मेडिकल टीम पर हमला किया’ जैसी खबरें और वीडियो निकालकर वह दिखाता और सदस्यों को आगे और ऐसी बातचीत के लिए उकसाता। यह सब देखकर वे और घृणा प्रदर्शित करते। जमातियों से होते हुए वे कब सभी मुसलमानों तक पहुँच जाते इसका उन्हें कोई भान न रहता।

बाकी बचे दो-तीन सदस्य भी इनकी हाँ में हाँ मिलाते, हंसते, एक से बढ़कर एक क्रूर तरीके सबक सिखाने के लिए सुझाते जिसे सुन हिटलर भी इनसे इर्ष्या करता। वैसे इनकी नफरत को मैं जब मीडिया में चल रही खबरों के प्रकाश में देखता तो समझ आता कि खबरें कैसे हमारे सोचने को तय करती है। ‘एक कोरोना संभावित या पॉजिटिव ने मेडिकल स्टाॅफ पर थूक दिया है’ वाली खबर ऐसी इन सबके जेहन में थी कि छज्जे/बालकनी पर खड़ा दिखता हर यात्री इन्हें थूकता हुआ दिखता। जैसे ही कोई बालकनी में खड़ा होता सारे माइक पर उन्हें अंदर जाने को कहते और धमकाते। पुलिस वाले तो कहते कि ‘अरे थूक क्यों रहे हो?’ जबकि ऐसा कुछ होता भी नहीं। इतनी बात माइक में कहने के बाद वे माइक बंद कर गालियाँ बकते और भड़ास निकालते। महिला पुलिस तो बदतमीज़ी में पुरुषों का भी कान काटतीं। एक तो कहती, ‘अगर मुझे छूट मिले तो मैं इन सारों को गोली मार आऊँ भले खुद मर जाऊंं।’ नफरत की यह पराकाष्ठा देख मैं खुद भी डर जाता। विरोध करने के बजाय अंदर ही कुढ़ता। यहाँ कुएँ में भाँग पड़ी थी, आखिर किस-किस से उलझता? ऐसे लोगों से सकारात्मक रूप से पेश आने और इसी बहाने इन अति धार्मिक लोगों से संवाद बढ़ाकर अंतर-धार्मिक विश्वास बढ़ाने का जिसे मौका समझ रहा था वह चौपट हो गया था। मैं सिर्फ कुछ काॅल अटैंड करके ही बस अपनी सकारात्मकता रख सका। खाना देने जाने वालों से भी ये लोग कहते कि ‘ये चलते फिरते बम हैं, बचकर रहना, चिपट जाएंगे।’

सबसे बुरा मुझे इस बात का लग रहा था कि फेसिलिटेटर टीम मांगे जाने पर वो सामान देने में भी आनाकानी क्यों कर रही है जो उपलब्ध है। आखिर सरकार ने यह इनके लिए ही तो भेजा था। एक-एक सामान को तरसाया जाता, बार-बार दौड़ाया जाता। एक मौलाना साहब तीन-चार बार पाँच मंजिला उतरकर सिर्फ़ इसलिए आए कि थोड़ा नमक उन्हें चाहिए था। पर वह उपलब्ध न हो सका। वैसे उस समय नमक था नहीं, पर उन्हें परेशान देख इन लोगों की मौज रही। जब मैंने घर पर यह वाकया सुनाया तो मेरी माँ बोली, ‘बेटा कल तू नमक का पैकेट ले जाकर दे दियो।’ मैंने हंस कर कहा ‘मां अब तक या तो उन्हें मिल गया होगा या अब उन्हें खुद ही नहीं चाहिए होगा।’

वैसे मुझे सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सुविधाओं से कोई शिकायत नहीं। नाश्ते से लेकर खाने-पीने, साबुन से लेकर मास्क तक इन यात्रियों के लिए भरपूर सप्लाई किया गया है। पर इन कर्मचारियों को संवेदनशील किए जाने की बहुत जरूरत थी। वैसे अधिकतर शिक्षकीय पेशे से जुड़े हैं तो पहले से ही उनके ऐसा होने की अधिक उम्मीद की गई होगी। सोचता हूँ इतनी नफरत लेकर वो कक्षा में कैसे न्याय करते होंगे? एक बात और जेहन में आती रही कि ये जो जमात के कोरोना संभावित लोगों पर मेडिकल स्टाॅफ, नर्सों, पुलिस वालों के साथ सही से पेश न आने की सच्ची-झूठी खबरें आ रही हैं कहीं वो सब ऐसी मनोवृत्ति का परिणाम तो नहीं। हो सकता है कुछ लोगों ने ऐसा व्यवहार किया हो, पर क्या उनसे डील करने वाले नफरत से भरे ये लोग अपने व्यवहार और टिप्पणियों से ऐसा करने को मजबूर या प्रेरित नहीं करते होंगे? अब मीडिया जब एक पक्ष को विलेन मानकर ही चल रहा हो तो भला उनका पक्ष कैसे दिखाए? खबरें भी तो इसी प्रचलित मानस की झाँकी हैं।

दूसरे दिन रात में ड्यूटी थी। पहुँचते ही प्रशासन का मानवीय और दूरदर्शी रूप के दर्शन हुए। इससे कुछ संतोष भी हुआ। मैंने सोचा कि ‘काश यही तरीका मुख्य रूप से अपनाया जाए।’ सभी यात्रियों को नीचे बुलाकर, दूर-दूर खड़ा कर पुलिस-प्रशासन और एस.एच.ओ साहब उन्हें काफी गरिमामयी तरीके से समझा रहे थे। वे फिज़िकल डिस्टेंसिग के फायदे, तरीके, खाली समय में ईश्वर की आराधना करने, देश के लिए दुआ माँगने, पूरे प्रशासन के उनकी सेवा और सहयोग में होने के आश्वासन जैसी बात दुहरा रहे थे। अपने साथ वे जमात के किसी मौलाना को लेकर आए थे जो काफी समझदारी से उन्हें सबसे अच्छे से पेश आने, सहयोग करने, निर्देश मानने और इन सब अपेक्षित व्यवहारों को धर्म-सम्मत बताने जैसे निर्देश दे रहे थे। उनकी बातों का असर भी हो रहा था। उन्होंने देश की संस्कृति और बहुसंख्यकों के सहयोग की खुले दिल से प्रशंसा की जो वहाँ लगे कर्मचारियों को बहुत अच्छा लगा। उनसे यात्रियों ने अपने साथ कर्मचारियों के रूखे व्यवहार की बात बताई तो उन्होंने ऐसा न करने की मार्मिक अपील भी स्टाॅफ से की। वैसे मैंने इसका कुछ असर भी देखा। आज उस तरह की बातें कम हुईं जो नफरत और घृणा भरी हों। हालाँकि यह एक झटके में तो बदल नहीं सकता था। मौलाना जी ने हमारे समूह से कुछ देर बात की। उन्होंने बताया कि वे अनाथ बच्चों के लिए मदरसा चलाते हैं साथ ही कुछ बिमारियों के घरेलू उपाय भी बताए। जाते-जाते मैंने उन्हें शुक्रिया कहा और उनके आने को सफल बताया। मैंने उनसे कहा कि, ‘आपसे संवाद करके सिर्फ़ यात्री ही नहीं हम भी लाभान्वित हुए।ऐसे संवाद समाज में बड़े पैमाने पर हों तो शायद ये नफरत का वायरस तो खत्म ही हो जाए।’ कोरोना को तो वैसे भी खत्म होना ही है।

(मेरे एक दोस्त जिनकी ड्यूटी नरेला क्वारंटाइन सेंटर पर लगी हुई है, यह कड़वी सच्चाई उन्होंने बयां की है, उनकी नौकरी ख़तरे में न पड़े इसलिए उनका नाम इस रपट में नहीं है।)


आलोक शर्मा की फ़ेसबुक दीवार  से साभार।

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