मुकुल शिवपुत्र ! कभी मिलो, तुम्हें जी भरकर देखूं तो सही !

विवेकानन्द जिसे रामकृष्ण नहीं मिले 


मनीष वाजपेयी

मुझे कुमार गन्धर्व विशेष पसन्द हैं। मेरे देखे कुमार गन्धर्व कबीर का ही गुनगुनाता और गाता हुआ बिम्ब हैं। उनका जीवन भी उतना ही सामान्य और पीड़ित रहा जैसा कबीर का था। कुमार गन्धर्व कुछ दूसरे महान संगीत साधकों की तरह ५ सितारा संस्कृति के पैरोकार नहीं रहे और न ही उस चमक-धमक को अपना पाए। वो जन्मजात गायक थे और अपने चमत्कारिक गायन और प्रतिभा के कारण ‘कुमार गन्धर्व’ नाम ही पा गए। उनका वास्तविक नाम शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमकाली है।

उनकी पत्नी भानुमती जैसे उनकी शक्ति बनकर ही आयी थी। गन्धर्व उस समय की लाईलाज बीमारी टी.बी. से पीड़ित हो गए थे। भानुमति जो स्वयं एक गायिका थी, ने देवास के एक स्कूल में पढ़ा कर टी.बी. से पीड़ित गायक पति का इलाज कराया और घर चलाया। आप अंदाज़ लगा सकते हैं आर्थिक स्थिति का। भानुमति जितनी सुन्दर थीं उतनी ही कुशल गृहणी नर्स थीं। कुमार जी स्वस्थ होकर फिर से नई तरह का गायन कर सके इसका श्रेय भानुमति जी को ही दिया जाना चाहिए।

इसी अति विशिष्ठ महान संगीत साधक दम्पत्ति की संतान हैं ग्वालियर घराने के महान शास्त्रीय गायक मुकुल शिवपुत्र। अद्भुत पिता के विलक्षण पुत्र पंडित मुकुल शिवपुत्र कहाँ हैं, कैसे हैं कुछ पता नहीं। हम नकली चमकते काँच के टुकड़ों को प्रतिष्ठित करने वाले लोग हीरों को कुचलते ही रहे हैं।

कहते हैं मुकुल शिवपुत्र अवसादग्रस्त हैं और जितने भी नशे हो सकते हैं लगभग सभी नशे करते रहे हैं। वर्षों पहले भोपाल में एक मंदिर के बाहर भीख मांगते मिले थे (संलग्न पहला चित्र उसी क्षण का है) अपने पिता के साथ इन्होंने बहुत गहन संगीत साधना की है। और ये भी स्पष्ट है कि अवसाद की चपेट में ये बहुत छोटी उम्र में ही आ गए थे। पिता से उनके सम्बन्ध कुछ अजीब से रहे।

 

अपनी प्रिय पत्नी के देहान्त के बाद पंडित जी ने घर छोड़ दिया तब उनके पिता कुमार गन्धर्व जीवित ही थे,लगभग आधी सदी से ये यायावर भटक ही रहा है। कभी इंदौर, कभी होशंगाबाद के रेलवे प्लेटफार्म पर सो जाना, कभी किसी मित्र के घर रुक लेना, कभी नर्मदा किनारे नेमावर में लम्बे समय तक साधू वेश में कुटिया बनाकर रहना, चिलम पीते रहना और जब तब गाते रहना। कविताएं लिखना।

मुझे बहुत अपने से लगने वाले पंडित मुकुल शिवपुत्र की दुनिया वो स्वयं, एक छोटा सा झोला और उनका गाना ही रही। कभी एक जगह वो टिकते ही नहीं। मैं उनके सम्पर्क के लोगों से मिलता रहा हूँ , पीछा करने पर भी कभी उनसे व्यक्तिगत रूप से नहीं मिल पाया। आज Syed Mohd Irfan ji ने पंडित जी का पता पूछा तो बहुत कुछ याद आता रहा।

उनके चाहने वालों की कमी नहीं बस वो सुरक्षित रहें। उनकी व्यथा को कोई चिकित्सक क्या समझेगा।

मेरी दृष्टि में पंडित जी के रूप में एक नरेन्द्र भटक रहा है और कोई रामकृष्ण देव मिल नहीं पाए। अभी और भटको, और टूटो और बिखरो यायावर फ़क़ीर , तुम्हारी मुक्ति का समय आया नहीं….कभी मिलो तुम्हें जी भरकर देखूं तो सही !

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