‘सर्जिकल नहीं फ़र्जिकल स्ट्राइक थी! मोदी के पास एक ही ट्रिक-हिंदू-मुसलमान लड़ाओ’ -शौरी

 

प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान पर हुई सर्जिकल स्ट्राइक को अपने मज़बूत इरादों की तरह पेश करते रहे हैं और बीजेपी समर्थक भी इसका ढोल बजाते रहते हैं, लेकिन बीजेपी नेता और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे वरिष्ठ पत्रकार अरुण शौरी इसे फ़र्जीवाड़ा क़रार दे रहे हैं। उन्होंने कल दिल्ली में कांग्रेस नेता सैफ़ुद्दीन सोज़ की किताब के विमोचन के दौरान इसे फ़र्ज़िकल स्ट्राइक क़रार दिया।

अरुण शौरी ने कहा कि मोदी सरकार सिर्फ हिन्दू मुसलमान के बीच दूरी पैदा करके राजनीतिक फ़ायदा हासिल करने की कोशिश कर रही है। जिसे सर्जिकल स्ट्राइक कहा जा रहा है,वह दरअसल फ़र्जिकल स्ट्राइक है। ऐसी न जाने कितनी स्ट्राइक सेना पहले भी करती रही है। ज़रूरत है कि इतिहास का बोझा उठाकर एक तरफ़ रखा जाए और कश्मीर मसले का हल निकाला जाए। अफ़सोस की बात है कि मोदी सरकार के पास पाकिस्तान, चीन यहाँ तक कि बैंकों के लिए भी कोई स्पष्ट नीति नहीं है। उसे सिर्फ़ एक ट्रिक आती है- हिंदू-मुसलमानों को लड़ाओ।

अरुण शौरी ने सैफ़ुद्दीन सोज़ की किताब के विमोचन समारोह से दूरी बनाने के लिए कांग्रेस की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह समझ में नहीं आ रहा कि मुख्य विपक्षी पार्टी ने यह कदम क्यों उठाया.

दरअसल, काँग्रेस नेता सोज़ ने अपनी किताब  ‘कश्मीर: ग्लिंपसेस ऑफ़ हिस्ट्री ऐंड द स्टोरी ऑफ़ स्ट्र्गल’ में पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ़ के हवाले से लिखा है कि कश्मीर के लोग आज़ाद होना चाहते हैं। हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह नामुमकिन है और भारतीय संविधान के तहत ही कश्मीर समस्या का हल खोजना होगा। लेकिन बीजेपी ने इसे मुद्दा बना लिया जिसकी वजह से काँग्रेस नेताओं ने इससे दूरी बना ली वरना इसका विमोचन पूर्व केंद्रीय मंत्री पी.चिदंबरम को करना था। लेकिन आयोजन में न चिदंबरम आए और न पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। कांग्रेस नेता जयराम रमेश अलबत्ता श्रोताओं के बीच बैठे नज़र आए।

सोज़ ने कहा कि उनकी किताब में उनके निजी विचार हैं, इसका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने नेहरू और पटेल को भारत के महाने बेटों के रूप में याद करते हुए दावा किया कि पटेल बेहद व्यावहारिक थे और हैदराबाद के बदले कश्मीर को पाकिस्तान को देने के लिए तैयार थे। पार्टीशन काउंसिल में पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान के सामने पटेल ने यह प्रस्ताव रखा था।

सैफ़ुद्दीन सोज ने कहा कि कश्मीर की ‘आज़ादी’ संभव नहीं है। भारतीय संविधान को कश्मीर को अपने में समाहित करना होगा. उन्होंने कहा कि कश्मीर भारत को पहचानने की प्रयोगशाला है और हिंसा से कोई समाधान नहीं निकलेगा।  बातचीत ही एकमात्र उम्मीद है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री सोज़ ने यह भी कहा कि कश्मीर मुद्दे के समाधान के दो मौके चूके गए. पहला मौका अटल बिहारी वाजपेयी के समय और दूसरा मौका मनमोहन सिंह के समय था। सोज़ ने कहा, ‘मैं मुशर्रफ के विचार का समर्थन नहीं करता. मीडिया ने बेवजह विवाद पैदा कर दिया. मुशर्रफ ने खुद अपने जनरल से कहा था कि कश्मीर की आजादी संभव नहीं’

सोज़ ने यह भी दावा किया कि कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में नेहरू नहीं, बल्कि लॉर्ड माउंटबेटन ले गए थे। इस मौक़े पर मौजूद वरिष्ठ पत्रकार और प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के प्रेस अफ़सर रहे कुलदीप नैयर ने बताया कि ‘शास्त्री जी ने कहा था कि अगर चीन युद्ध के समय पाकिस्तान भारत की मदद करता, हमारे तथा उनके सिपाहियों का ख़ून एक साथ बहता और बाद में पाकिस्तान कश्मीर की माँग करता, तो इंकार करना मुश्किल होता।’

 



 

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