राष्ट्रवाद, पहचान और हंस की गोष्ठी उर्फ़ संघी सीकिया पहलवान से हेवीवेट वामपंथी लहूलुहान

विष्णुपुराण में अखंड भारत का दिग्दर्शन करता वापमंथी पुरुषोत्तम

 

इस देश में राष्ट्रवाद को देखना हो तो भीमा कोरेगाँव के नजरिये से देखना चाहिए. एक राष्ट्र वह है जहाँ पेशवा प्रतिष्ठित है और पेशवा की पराजय को इतिहासकार भारत की पराजय की तरह देखते हैं और एक राष्ट्र वह है जहाँ कोरेगाँव युद्ध में पेशवा की पराजय सुनिश्चित करने वाले अंग्रेजी सेना के महार सिपाहियों के शौर्य से परिभाषित होता है. पेशवा की पराजय से इस राष्ट्र को सुकून मिलता है. और देखना हो तो घासीराम कोतवाल के नजरिये से देख लो-राष्ट्रवादी नायक नाना साहेब का बियाह याद है, याद है वो गीत? या कैथरीन मेयो की किताब ‘मदर इण्डिया’ के नजरिये से भी. ऐसे ही अनेक राष्ट्र हैं इस देश में यहाँ संघ की परिकल्पना का कोई अखंड भारत नहीं है- उनका समरस अखंड भारत चातुर्वर्ण की प्रतिष्ठा के साथ खड़ा होता है-दलितों-बहुजनों के दैन्य और स्त्रियों की दासता से संपुष्ट होता है.

हंस की कल की प्रेमचन्द जयन्ती पर आयोजित गोष्ठी में ‘राष्ट्र की पहेली और पहचान का सवाल विषय पर वक्ताओं का मुख्य ध्यान हिन्दू-मुस्लिम पहचान पर ही केन्द्रित रहा. और देश के भीतर विभिन्न बल्कि प्रबल पहचानों पर शायद ही किसी ने बात की. मुस्लिम को भी एक इकाई में देखने की परम्परा अभी भी कायम है. हालांकि वक्ताओं में हरतोष सिंह बल ने पंजाबी अस्मिता, सिक्ख अस्मिता की बात जरूर की और भारत राष्ट्र की किसी संकल्पना पर सवाल खड़ा किया, लेकिन सिक्ख अस्मिता से बना सिक्ख राष्ट्र भी कितना राष्ट्र है यह जरूर सवाल है. जाति-विरोधी सिक्ख आन्दोलन में जाति ने कई राष्ट्रों को जन्म जरूर दिया है.

गोष्ठी में सबसे बेहतर वक्तव्य कंटेंट और शैली के लिहाज से फैजान मुस्तफा साहब का रहा बल्कि यह कहें कि हरतोष सिंह बल के एक हद तक अच्छे प्रास्ताविक भाषण के अलावा फैजान साहब ही प्रभावित कर पाये. संचालक प्रियदर्शन जी ने प्रस्तावना जरूर की लेकिन वह उसका असर गांधीवादी दायरे तक ही रख सके-यह उनकी योजना भी हो सकती है और सीमा भी. उन्होंने टैगोर के अंतरराष्ट्रवाद की जरूर चर्चा की लेकिन वह गोष्ठी का सीधा विषय तो नहीं ही बन पाया. सारे वक्ता हिन्दू-मुस्लिम, मॉब लिंचिंग पर लगभग केन्द्रित रहे-सामने मोदी शाह की शक्ल की बॉक्सिंग बैग थी-बस. कोई एक बार मॉब लिंचिंग पर बात करते हुए एनआरसी और रोहिंग्या पर भी कर लेता तो शायद टैगोर का प्रसंग भी व्याख्यायित हो जाता.

अनन्या वाजपेयी प्रभावित नहीं कर सकीं. वे अपने गाइड और प्रोफेसर की किताब से बहुसंख्यकों के परभक्षी बनने को अनुवाद के जरिये समझती रहीं.हालाँकि वे बाबा साहेब पर किताब लिख रही हैं जैसा कि संचालक ने बताया लेकिन वे शायद बाबा साहेब को अभी और समझेंगी तो देख पाएंगी कि कैसे यहाँ अल्पसंख्यक ब्राह्मणों और सवर्णों ने अपने राष्ट्रवाद का वर्चस्व बना रखा है और एक बहुजनवाद का कांसेप्ट यहाँ भी है जो समावेशी है. शायद ही किसी ने ब्राह्मणवाद जैसा शब्द भी बोला हो. अब कोई यह न समझाए कि यह बोल देने से क्या होता. बोलने को तो संविधान पर बात करते हुए एक बार भी डा. अम्बेडकर का भी नाम नहीं लिया किसी ने. फैजान साहब ने भी नहीं.

एक शख्स थे मकरंद परांजपे. हालाँकि हंस की गोष्ठियों में दक्षिणपंथी प्रतिनिधित्व के लिए गोविंदाचार्य, तरुण विजय जैसे ठीक-ठाक लोग भी रहे हैं लेकिन इस बार एक संघी सीकिया पहलवान को बुला लिया गया. वह पूरे सत्र के दौरान अपने कंप्यूटर में लगे रहे. शायद ही कभी सिर उठाकर किसी वक्ता को सुना-संघी सुनते नहीं अनुसन्धान करते हैं. पोस्टकार्ड आदि वेबसाईट का, व्हाट्सएप ज्ञान का अथवा ट्वीटर उपदेश का. हालांकि उस निष्प्रभावी संघी वक्तव्य में मूर्खता की बातें पर्याप्त थीं कि यदि कोई उसे संबोधित कर, उसका खिल्ली उड़ाकर अपनी बौद्धिकता का लोहा मनवाना चाहे तो मनवा सकता है. वे श्रोताओं द्वारा मौखिक लिंच भी हुए लेकिन आख़िरी वक्ता पुरुषोत्तम अग्रवाल के लिए अपना खिल्ली उड़ाने का पर्याप्त सामग्री दे गये-अग्रवाल साहब के हिस्से में विट ऑफ़ ह्यूमर की तालियाँ थोड़ी ज्यादा आ गयीं इससे.

अग्रवाल साहेब को तो हमलोग जानते ही जानते हैं. मानते भी हैं. जानने और मानने के अनुरूप उनके सामने कोट के लिए विष्णुपुराण के भीतर राष्ट्रवाद और नेहरू का समावेशी राष्ट्रवाद ही हो सकता था. हालांकि वे संघी सीकिया पहलवान पर हेवीवेट की तरह टूटे. विष्णुपुराण वैष्णव-ब्राह्मण राष्ट्र के वर्चस्ववादी दर्शन और कर्म का महाग्रंथ है.

जरूरी होता है वक्ताओं के पैनल को भी समावेशी स्वरूप दिया जाये. कांचा आयलैया, गोपाल गुरू आदि में से कोई होता तो शायद डिस्कशन का स्वरूप कुछ और होता.


संजीव चंदन की फेसबुक दीवार से साभार

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