छत्‍तीसगढ़ सीडी कांड: CBI ने चार्जशीट में विनोद वर्मा मामले में संपादकों को बनाया अपना गवाह

मीडियाविजिल प्रतिनिधि / रायपुर

साल भर पहले हुए विवादित छत्‍तीसगढ़ फर्जी सेक्‍स सीडी कांड में इस हफ्ते सीबीआइ ने जब अदालत में आखिरी चार्जशीट दायर करते हुए विनोद वर्मा सहित कुल छह को आरोपी करार दिया, तब किसी को यह गुमान नहीं था कि एजेंसी ने किन सबूतों और बयानात के आधार पर ऐसा किया होगा। दो दिन बाद जब चार्जशीट के कुछ अंश छत्‍तीसगढ़ के मीडिया के पास पहुंचे तो पत्रकार बिरादरी में गुपचुप चर्चाएं होने लगीं। इस चर्चा की वजह थी सीबीआइ के गवाहों की सूची में नामी गिरामी पत्रकारों और संपादकों का नाम शामिल किया जाना।

गौरतलब है कि पिछले साल अक्‍टूबर में छत्‍तीसगढ़ के मंत्री राजेश मुनत की एक फर्जी सेक्‍स सीडी के मामले में गाजियाबाद के इंदिरापुरम से वरिष्‍ठ पत्रकार विनोद वर्मा को छत्‍तीसगढ़ की पुलिस ने मुंह अंधेरे गिरफ्तार किया था जिसके बाद मीडिया में काफी बवाल मचा था। वर्मा को कुछ दिन जेल में रहना पड़ा था, जिसके बाद से वे जमानत पर चल रहे हैं। अब एक साल बाद सोमवार को सीबीआइ ने इस मामले में आखिरी आरोपपत्र दायर किया है, तो अपने गवाहों की सूची में कुछ बड़े पत्रकारों को शामिल कर लिया है।

न्‍यूज़18 में कार्यरत और बीबीसी हिंदी के पूर्व प्रभारी निधीश त्‍यागी का नाम गवाह संख्‍या 52 की जगह आता है। इसी तरह आरोपपत्र में वरिष्‍ठ पत्रकार चंदन नंदी का नाम है जो पहले क्विंट वेबसाइट में हुआ करते थे लेकिन अब उनकी प्रोफाइल के मुताबिक साउथ एशियन मॉनीटर के कार्यकारी संपादक हैं। एक और प्रतिष्ठित संपादक गवाहों की सूची में मौजूद हैं रुचिर गर्ग, जो रायपुर में नवभारत के संपादक हैं। बंबई स्थित क्विंट में प्रोडक्‍ट हेड तुषार बनर्जी का नाम भी सीबीआइ के गवाहों में आता है। उनके अलावा वन इंडिया के संपादक अखिलेश श्रीवास्‍तव में एक गवाह हैं जो पहले अमर उजाला में कार्यरत थे, जहां के वेब संपादक खुद विनोद वर्मा हुआ करते थे।

सीबीआइ के आरोपपत्र ने विनोद वर्मा सहित छत्‍तीसगढ़ राज्‍य कांग्रेस समिति के अध्‍यक्ष भूपेश बघेल, विजय पंड्या, विजय भाटिया, कैलाश मुरारका को आरोपी बनाया है। छठवां आरोपी रिंकू खनूजा अब इस दुनिया में नहीं है। जांच के दौरान ने सीबीआइ दफ्तर से छलांग लगाकर खुदकुशी कर ली थी। आरोपपत्र का कहना है कि कथित सेक्‍स वीडियो किसी अन्‍य सेक्‍स वीडियो को संपादित/मिश्रित कर के बनाया गया था। चार्जशीट के पैरा 15(1) के अनुसार प्रयोगशाला के विश्‍लेषण में यह बात सामने आई है कि कथित वीडियो जो रायपुर में वितरित किया गया और दिल्‍ली व गाजियाबाद में बरामद हुआ, दोनों एक ही स्रोत से तैयार किया गया था।

पिछले तीन-चार दिनों से ख़बर मीडिया में तैर रही है लेकिन किन्‍हीं कारणों से इसे सामने नहीं आने दिया जा रहा है कि सीबीआइ ने विनोद वर्मा मामले में खुद बड़े पत्रकारों को ही गवाह बना लिया है। इनमें कुछ तो वर्मा के करीबी भी हैं।’

दरअसल, सीबीआइ के गवाहों की सूची में दो तरह के नाम हैं। एक वे नाम हैं जिन्‍होंने अब तक अपना बयान दर्ज नहीं करवाया है, इसका पता इससे चलता है कि उनके नाम के आगे चार्जशीट में ब्रैकेट में लिखा है कि इनका बयान दर्ज नहीं हुआ। बाकी ऐसे नाम हैं जिनके आगे यह टिप्‍पणी नदारद है। जिन भी पत्रकारों के नाम गवाहों की सूची में शामिल हैं, उनके आगे कोई टिप्‍पणी नहीं लगी है जिससे पता लगता है कि सीबीआइ ने पहले ही इनके बयानात ले लिए होंगे।

मीडियाविजिल ने इसकी पुष्टि करने के लिए वरिष्‍ठ पत्रकार निधीश त्‍यागी को फोन लगाया, लेकिन सवाल पूछने पर उन्‍होंने कहा कि वे किसी कॉन्‍फ्रेंस में बैठे हैं और फोन काट दिया। इसकी पुष्टि नवभारत के संपादक रुचिर गर्ग ने फोन पर की। उन्‍होंने कहा, ‘सीबीआइ ने स्‍टेटमेंट लिया था। उस दिन मेरी बात हुई थी विनोद जी से। वे मेरे बचपन के मित्र हैं तो मेरी उनसे ऐसे भी बात होती रहती है। उस समय जब सीबीआइ ने रेड किया था, उसकी कॉल डीटेल में मेरे से बातचीत हुई थी, तो मैंने बताया था कि हां बात हुई थी। और विनोद ने कई लोगों से पूछा था कि आप इसका उपयोग करेंगे क्‍या, तो मैंने मना कर दिया था कि हम इसका उपयोग नहीं कर पाएंगे।’

उन्‍होंने कहा, ‘सीबीआइ ने मुझे अपना गवाह बनाया है ये मुझे अभी पता लगा, लेकिन मेरे से उन्‍होंने पूछा था तो मैंने कहा हां भाई, मैंने उनसे कह दिया था कि हम उपयोग नहीं कर पाएंगे। लेकिन सीबीआइ ने मेरा स्‍टेटमेंट लिया था और मुझे पढ़ कर भी सुनाया था।’ रुचिर गर्ग ने कहा कि उन्‍होंने सीबीआइ से साफ कह दिया था कि विनोद वर्मा ने उनसे जब पूछा कि क्‍या वे सीडी का उपयोग कर पाएंगे, तो गर्ग ने साफ मना कर दिया था। अब तक गर्ग के पास सीबीआइ या अदालत की ओर से कोई नोटिस नहीं आया है। मामले की अगली सुनवाई अक्‍टूबर में है।

सीबीआइ के आरोपपत्र को पढ़ने से पता लगता है कि विनोद वर्मा को आरोपी बनाए जाने का आधार क्‍या है और बड़े संपादकों को गवाह क्‍यों बनाया गया। पैरा 15(3) में एक डायरी के बरामद होने का जिक्र है जिसमें लिखा है ‘’रमन सिंह के चहेते मंत्री राजेश मुनत का कारनामा’ और ‘इसे संपादित कर के कई वेबसाइटों पर अपनलोड किया जाना है, यूट्यूब पर अपलोड किया जाना है, विधायकों, बीजेपी और संघ के शीर्ष नेताओं को भेजा जाना है, वॉट्सएप के माध्‍यम से मीडिया में जारी किया जाना है।’

इससे यह समझ में आता है कि विनोद वर्मा ने कुछ करीबी पत्रकार मित्रों को पूछा रहा होगा कि क्‍या वे कथित सेक्‍स वीडियो अपने यहां चला सकते हैं। किसने क्‍या जवाब दिया यह बाद की बात है, लेकिन उनकी कॉल डीटेल के आधार पर उन संपादकों से संपर्क कर के सीबीआइ ने उनके बयानात ले लिए और उन्‍हें अपना गवाह भी बना लिया। इन गवाहों की की सूची में रुचिरा चतुर्वेदी का भी नाम है जो दिल्‍ली में कांग्रेस की सोशल मीडिया प्रभारी हैं।

आरोपपत्र में साफ लिखा है आरोपी संख्‍या 4 विनोद वर्मा छत्‍तीसंगढ़ कांग्रेस के लिए मीडिया सलाहकार का काम कर रहे थे और वे 24 अक्‍टूबर 2017 को एक होटल में भूपेश बघेल व विजय भाटिया से मिलने गए थे, जिसके बाद राजेश मुनत की फर्जी सीडी तैयार की गई। विनोद वर्मा पर आरोप है कि उन्‍होंने अपना लैपटॉप और पेनड्राइव इस्‍तेमाल करते हुए पटपड़गंज, दिल्‍ली की स्‍मार्अ रेप्लिेशन दुकान पर मास्‍टर सीडी बनाई और एक भूरे कार्अन में 500 सीडी लेकर होटल पहुंचाया, जिसे बाद में 27 अक्‍टूबर 2017 को बघेल ने रायपुर में जारी किया। बाकी की 500 सीडी लेकर वर्मा 26 अक्‍टूबर को अपने घर आए। यही सीडी छत्‍तीसगढ़ पुलिस ने बरामदगी में दिखायी है।

चार्जशीट कहती है कि वर्मा ने टेलीग्राम और वॉट्सएप के माध्‍यम से दूसरी व्‍यक्तियों को वीडियो क्लिप भेजी। इस समेत अन्‍य आरोपों में वर्मा व अन्‍य चार पर आइपीसी की धाराओं 120-बी, 469, 471 व आइटी कानून 2000 की धारा 67ए के तहत मुकदमा कायम किया गया है।

मीडियाविजिल ने तुषार बनर्जी से भी बंबई में बात करने की कोशिश की लेकिन उनका फोन नहीं लगा।

 



 

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