1984 दंगे में सज्जन को सज़ा से काँग्रेस पर तीर ! 2002 गुजरात के ज़िक़्र से ज़ख़्मी हुई बीजेपी !

ठीक इसी पैटर्न पर 1993 में मुंबई, 2002 में गुजरात, 2008 में कंधमाल और 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर आदि में हत्याएं की गईं।

‘अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना सामूहिक अपराध है जिसमें आक्रमण राजनीतिक नेताओं के इशारे पर होता है और क़ानून को लागू करने वाली एजेंसियाँ इसमें मदद करती हैं। न तो मानवता के ख़िलाफ़ अपराध और न ही नरसंहार ही अपराध संबंधी हमारे देशी क़ानून के तहत आता है। इस कमी को शीघ्र दूर करने की ज़रूरत है।’

1984 के सिख विरोधी दंगों के सिलसिले में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्र कैद की सज़ा सुनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस.मुरलीधर और विनोद गोयल ने आज जो कहा वह कांग्रेस के साथ-साथ सत्ताधारी बीजेपी को भी बुरी तरह जख़्मी कर गया है। सिख विरोधी दंगों की बात करते हुए माननीय न्यायाधीशों ने गुजरात से लेकर मुजफ्फरपुर तक की बात की जहाँ प्रशासन के सहयोग से नेताओं की शह पर अल्पसंख्यकों के जान-माल का नुकसान किया गया। खंडपीठ ने स्पष्ट कहा- “पीड़ितों को यह आश्वासन देना ज़रूरी है कि चुनौतियों के बावजूद, सच जीत की होगी।”

31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद भड़के दंगे में एक ही परिवार के पांच सिखों की जान लेने का आरोप सज्जन कुमार पर था, लेकिन निचली अदालत ने उसे बरी कर दिया था। सीबीआई की अपील पर हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा सुनाई। इसके अलावा तीन अन्य दोषियों- कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और  बलवान खोखर की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। बाकी दो दोषियों- पूर्व विधायक महेंद्र यादव और किशन खोखर की सजा तीन साल से बढ़ाकर 10 साल कर दी है।

पढ़िए, इस महत्वपूर्ण फ़ैसले के चुनिंदा अंश-

नवंबर 1984 में हुए दंगों में अकेले दिल्ली में 2,733 और देशभर में तक़रीबन 3,350 सिखों का क़त्लेआम हुआ।

जनसंहार का ये मामला ना तो पहला था और ना ही दुखद रूप से आख़िरी है।

बंटवारे के वक़्त पंजाब, दिल्ली समेत अन्य जगहों पर बेगुनाह सिखों की हत्याएं दर्दनाक याद जैसी हैं।

ठीक इसी पैटर्न पर 1993 में मुंबई,  2002 में गुजरात, 2008 में कंधमाल और 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर आदि में हत्याएं की गईं।

इन सभी मामलों में प्रभावशाली राजनीतिक लोगों ने अल्पसंख्यकों को टारगेट किया जिन्हें सरकारी एजेंसियों का साथ मिला था।

इन हमलों के लिए ज़िम्मेदार अपराधी राजनीतिक संरक्षण का फ़ायदा उठाने के साथ-साथ मुक़दमे और सज़ा से बचते रहे हैं।

ऐसे अपराधियों को सज़ा के मुहाने तक पहुंचा पाना हमारी क़ानूनी व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती है।

इन अपीलों से भी पता चलता है कि अपराधियों की जवाबदेही तय करने में दशकों लग गए।

यह चुनौती हमारी क़ानूनी व्यवस्था को मज़बूत बनाए जाने की मांग करती है।

हमारे क़ानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि जनसंहार और मानवता के विरुद्ध किए गए अपराध पर अंकुश लगाया जा सके।

इस ख़ामी पर तत्काल विचार किए जाने की ज़रूरत है।

ज़ाहिर है, आज के फ़ैसले ने सभी राजनीतिक दलों को आईना दिखाया है और देश में सांप्रदायिक और नस्ली हिंसा कानून पर बहस की नई पृष्ठभूमि तैयार कर दी है। लेकिन अफ़सोस राजनीतिक नेता अर्धसत्य की हँसिया लेकर राजनीति के खेत में उतर पड़े हैं। बीजेपी नेता 2002 में गुजरात में हुई हिंसा पर बात भी नहीं करना चाहते जबकि कांग्रेस नेताओं का ज़ोर 1984 की बात को हर हाल में वहीं पहुँचाना है।  

ज़ाहिर है, यह उम्मीद बेमानी ही है कि सांप्रदायिक हिंसा और नफ़रती प्रचार के जरिये वोट की फसाल काटने का आसान रास्ता पहचान चुके राजनीतिक दल इस मामले में कुछ करेंगे। वैसे भी प्रधानमंत्री पद पर माननीय नरेंद्र मोदी ही हैं जो 2002 में गुजरात के मुख्यमंत्री थे जब सरकारी साये में अल्पसंख्यकों का हत्याकांड रचाया गया था। आज के फ़ैसले की छींट उनके दामन तक भी पहुँच रही है।

बर्बरीक

सुबीर गोस्वामी का कार्टून, रागदेश.कॉम से साभार।

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