पहला पन्ना: लोग मर रहे हैं, सरकार ने राज्यपाल बना दिए, मंत्रिमंडल विस्तार होगा!

यह हेडलाइन मैनेजमेंट है। नहीं तो स्टेनस्वामी को शहीद कहे जाने की खबर साधारण नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था, हाईकमीशन फॉर ह्युमन राइट्स ने मांग की है कि भीमा कोरेगांव मामले के सभी अभियुक्तों को रिहा किया जाए। 10 राजनीतिक दलों के नेताओं ने राष्ट्रपति से इस मामले में दखल देने की मांग की है। मालवेयर से कंप्यूटर में फर्जी सबूत डालकर गिरफ्तार करने का एक और मामला सामने आया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘प्रेस की स्वतंत्रता का शिकारी’ कहा गया है।

 

यह हेडलाइन मैनेजमेंट है। नहीं तो स्टेनस्वामी को शहीद कहे जाने की खबर साधारण नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था, हाईकमीशन फॉर ह्युमन राइट्स ने मांग की है कि भीमा कोरेगांव मामले के सभी अभियुक्तों को रिहा किया जाए। 10 राजनीतिक दलों के नेताओं ने राष्ट्रपति से इस मामले में दखल देने की मांग की है। मालवेयर से कंप्यूटर में फर्जी सबूत डालकर गिरफ्तार करने का एक और मामला सामने आया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता का शिकारी कहा गया है। आठ महीने के लगातार प्रचार के बाद जून में पहली बार जीएसटी वसूली एक लाख करोड़ रुपए से कम रही है, यह भी आज की बड़ी खबर है। लेकिन लीड राज्यपाल और मंत्रिमंडल विस्तार की खबर ही है। 

आज के अखबारों में यही दो खबरें प्रमुखता से हैं – राज्यपाल बदल दिए गए और केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार होगा। यहां शीर्षक में लोग मर रहे हैं मैंने अपनी तरफ से जोड़ा है क्योंकि उससे संबंधित खबरें छिट-पुट हैं। मुझे लगता है कि आदिवासी आधिकारों के लिए काम करने वाले स्टेन स्वामी की हिरासत में मौत के बाद जो लोग जेलों में बंद हैं उनके मामले प्राथमिकता से निपटाए जाने चाहिए। कम से कम उनके, जिनके मामले में गिरफ्तारी गलत है, विवादों में हैगैर जरूरी है, जो बीमार हैं या जिनकी उम्र ज्यादा है। लेकिन सरकार की प्राथमिकता में यह नहीं है, मांग के बावजूद नहीं है और जो मांग है वह भी पहले पन्ने पर प्रमुखता से नहीं है। आज ऐसी कई खबरें हैं और अगर सबको मिलाकर उसे प्राथमिकता दी जाती तो सरकार पर दबाव बनता और वह सांसद को राज्यपाल बनाकर एक देश एक चुनाव का नारा और उपचुनाव की स्थिति खुद बनाने जैसे काम नहीं करती। यही नहीं, प्रधानमंत्री को प्रेस की आजादी का दुश्मन (शिकारी) कहा गया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका नाम किम जोंग, इमरान खान और शी जिनपिंग के साथ रखा गया है वह भी खबर नहीं है। द टेलीग्राफ ने इसपर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया जाननी चाही तो नहीं मिली। पर ये सब खबरें दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है।

पहली बार राज्यपाल बनाए गए लोगों में एक, मिजोरम के कंभापति हरिबाबू विशाखापत्तनम से लोकसभा के सदस्य (हैं) थे और विकिपीडिया पर उन्हें राज्यपाल तो बताया जा रहा है साथ ही यह भी कि वे (पहली बार) 2014 में सांसद बने थे। 68 साल के हैं। मैं राज्यपाल बनाने की उनकी योग्यता पर टिप्पणी नहीं कर रहा लेकिन सांसद को राज्यपाल बनाने का सीधा मतलब है कि वहां लोकसभा के उपचुनाव करवाने होंगे जो सिस्टम पर फालतू का खर्च है और यह सब देखने वाले देश के चौकीदारों को इसका ख्याल रखना चाहिए। पर चौकीदार ने खुद ही सीट लपक ली या उसे सौंप दी गई। वह भी तब जब एक देश एक चुनाव का नारा उसी का है। एक और राज्यपाल हैं, केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत। कर्नाटक के राज्यपाल बनाए गए हैं। 73 साल के गहलोत का विकीपीडिया पेज भी अपडेट हो गया है। वे राज्यसभा के सदस्य थे। विकीपीडिया के अनुसार वे तीन अप्रैल 12 से 7 जुलाई 2021 तक राज्य सभा के सदस्य रहे। कार्यकाल छह वर्षों का होता है। इस लिहाज से उनका दूसरा कार्यकाल चल रहा है और अभी आधा कार्यकाल बाकी था। राज्य सभा की इस सीट के लिए भी उपचुनाव होंगे। 

खबरों (हिदुस्तान टाइम्स) में  यह भी लिखा है कि दो राज्यपालों, झारखंड की द्रौपदी मुर्मू और कर्नाटक के वजुभाई वाला को कोई नई भूमिका नहीं दी गई है। अगर योग्य उम्मीदवारों की कमी थी तो सांसदों को राज्यपाल बनाए जाने की बजाय इन्हें भी फिर से राज्यपाल बनाया जा सकता था और अगर राज्यपाल के रूप में इनका प्रदर्शन ठीक अथवा संतोषजनक नहीं था तो क्या जनता को यह जानने का हक नहीं है कि पैमाना क्या है? या सिर्फ विवेक का मामला है और अगर ऐसा है ही तो विवेक से फैसला करने वाला क्या ठीक कर रहा है। यह सब चर्चा पहले अखबारों में होती थी अब नहीं होती है। जो होता है, वह बता भर दिया जाता है। अगर योग्यता और प्रतिभा के आधार पर राज्यपाल बनाया जाता और एक प्रेस कांफ्रेंस में इसकी घोषणा होती। कुछ सवाल जवाब होते तो कितनी पारदर्शिता लगती? पर इसकी जरूरत ही नहीं रह गई है, यह सबसे महत्वपूर्ण है। 

इस तरह, एक तरफ तो सरकार ऐसे काम में समय और श्रम लगा रही है। राज्यपालों को वैसे ही बदला जा रहा है जैसे पहले बदला जाता था। पर कोई सवाल नहीं है कि आप नया क्या कर रहे हैं। जो दावे किए थे उनका क्या हुआ। और ऐसा नहीं है कि कोई दूसरा जनहित का काम बाकी ही नहीं है, शौचालय बनवाने का धुंआधार प्रचार हुआ पर जेलों में शौंचालय कम हैं और सरकार जेल में भी लोगों को कोरोना से नहीं बचा पा रही है लेकिन किसी को भी जेल में बंद कर देने का (फर्जी आरोपों पर भी) शौक नहीं छोड़ रही है। कंप्यूटर में मालवेयर डालकर सबूत प्लांट करने और फिर गिरफ्तार करने का पहला मामला अदालत में लंबित था ही अब दूसरा मामला भी सामने आया है। उसपर आने से पहले बता दूं कि मुथरा की अदालत ने पत्रकार सि्ददीक कप्पन की जमानत याचिका फिर खारिज कर दी है। उसपर समाज में शत्रुता फैलाने का आरोप है। कप्पन का पक्ष जाने बगैर उसपर लगे अन्य आरोप मैं नहीं दोहराना चाहता लेकिन उम्मीद है कि वह कुछ दिन बाद छूट जाएगा, आरोप साबित नहीं होंगे और सिस्टम का कुछ नहीं बिगड़ेगा। 

 

 

कप्पन सिददीक को जमानत नहीं

मौजूदा सरकार से इसी सिस्टम को ठीक करने की अपेक्षा थी पर प्रज्ञा ठाकुर और सिद्दीक कप्पन के साथ अलग व्यवहार हो रहा है और सिद्दीक ही क्यों डॉ. कफील खान के साथ भी। लेकिन सरकार राज्यपाल और मंत्रीपद इनाम में बांटकर अपनी लोकप्रियता बनाए रखने की कोशिश में है और असली काम नहीं हो रहा है। अफसोस यह है कि मीडिया को भी नहीं दिख रहा है। यही नहीं, फादर स्टेन स्वामी की मौत को भी अखबारों ने एक दिन में ही भुला दिया। उनके अंतिम संस्कार की खबर आज पहले पन्ने पर नहीं है। अकले द टेलीग्राफ ने इस ने पहले पन्ने पर खबर को लीड बनाया है और साथ ही बताया है कि फादर के लिए शहीद का एक असामान्य संदर्भ था। अखबार ने इसके बराबर में प्रधानमंत्री को स्वतंत्र प्रेस का शिकारी बताने वाली खबर छापी है। और पहले ही पन्ने पर कप्पन को जमानत नहीं मिलने की खबर है। यह हिन्दू में भी पहले पन्ने पर है।     

 

स्वामी के निधन के बाद स्थिति 

आज के अखबारों में एक खबर है, स्टेन स्वामी के निधन के बाद 10 विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर मांग की है कि भीमा कोरेगांव के अभियुक्तों और अन्य राजनीतिक कैदियों को रिहा किया जाए। इस पर सरकार की प्रतिक्रिया तो नहीं मालूम है लेकिन यह खबर राज्यपाल बदलने और मंत्रिमंडल बदलने की खबरों से दब गई है जबकि राज्यपालों का विकीपीडिया पेज अपडेट हो चुका है। ऐसे में अगर इस मांग को लीड बनाया जाता तो क्या गलत होता? इंडियन एक्सप्रेस ने स्टेन स्वामी के समर्थन में एक खबर टॉप पर छापी है लेकिन उसके साथ बताया है कि यूपीए ने यूएपीए का बचाव किया था। मुझे लगता है कि यह गैर जरूरी खबर है क्योंकि यूएपीए कानून कांग्रेस का ही बनाया हुआ है और सबको पता है कि वह उसका बचाव करता रहा है। फिर भी गलत तो गलत है और नरेन्द्र मोदी अगर उसका विरोध करती थी या उसका दुरुपयोग करती है तो यह बताने का कोई मतलब नहीं है कि कांग्रेस ने उसका समर्थन किया था। और किया था तो हार गई ना? अब मोदी जी उस कानून का दुरुपयोग क्यों कर रहे हैं। यह सही है तो अखबार यही क्यों नहीं लिख रहा है? और बताए कि कैसे सही है और क्यों जरूरी है। 

 

कानून के दुरुपयोग के दो मामले 

यह सब तब छपा है जब टाइम्स ऑफ इंडिया में आज कानून के कथित (या संदिग्ध) दुरुपयोग के दो मामले हैं। कायदे से अखबारों को जनहित में इन्हें प्राथमिकता देना चाहिए तो वे सरकार सेवा में लगे हैं। सुधा भारद्वाज के मामले में एलगार परिषद के केस में बांबे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से 2018 के पुणे ट्रायल की अदालत की कार्यवाही पेश की जाए। सुधा भारद्वाज का मामला यह है कि ट्रायल कोर्ट के जज स्पेशल कोर्ट के डेजिगनेटेड जज नहीं हैं इसलिए उनका आदेश वैध नहीं है और वे कानूनन डिफॉल्ट बेल की हकदार हैं। मुझे लगता है कि ऐसे आरोपों की स्थिति में त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए और गलत होने पर भले आरोप लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो पर सच होने की स्थिति में भी आवश्यक कार्रवाई होनी चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है और ना अभी ऐसी मांग है। दूसरा मामला, सुरेन्द्र गैडलिंग का है। उनके कंप्यूटर में भी रोना विल्सन की ही तरह मालवेयर के जरिए सबूत प्लांट किया गाया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह पर्याप्त गंभीर मामला है और भारत में अभियोजन  के काम काज पर गंभीर सवाल है। लेकिन किसी और अखबार में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। रोना विल्सन के मामले में चार महीने कोई कार्रवाई नहीं हुई और हिरासत में इलाज बिना स्टेन स्वामी की मौत अभी हाल ही में हुई है।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

 

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