रक्षित सिंह ने इस्तीफ़ा एक चैनल से नहीं गोदी मीडिया के वातावरण से दिया है- रवीश कुमार

ABP न्यूज़ चैनल के रक्षित सिंह के इस्तीफ़े को लेकर कल से लगातार सोच रहा हूं। रक्षित मेरठ में हो रही किसान पंचायत को कवर करने गए थे। उसी के मंच पर जाकर उन्होंने अपना इस्तीफ़ा दे दिया। इस्तीफ़े के साथ-साथ कुछ बातें भी कहीं। इस्तीफ़ा देना साधारण बात तो नहीं है। कई बार दफ़्तर में वरिष्ठ किसी के लिए घुटन की परिस्थिति बना देते हैं और कई बार कोई इस्तीफ़े को अलग रंग भी दे देता है किसी ख़ास मौक़े का लाभ उठाने के लिए। किसान आंदोलन में इस्तीफ़ा देकर रक्षित को क्या लाभ होगा? यह आंदोलन सत्ता का तो नहीं है। न ही आंदोलन की सरकार बनेगी जिसमें रक्षित कोई मंत्री बन जाएंगे। न ही आंदोलन के पास कोई न्यूज़ चैनल है जिसमें रक्षित को संपादक बना दिया जाएगा। न ही आंदोलन के पास इतने पैसे है कि वह रक्षित के परिवार का भार उठा लेगा। ज़ाहिर है रक्षित ने कुछ मिलने की लालच में इस्तीफ़ा नहीं दिया। मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि रक्षित के इस्तीफ़े में ईमानदारी है।

“मुझे इस फैसले तक पहुंचने में डेढ़ महीने लग गए. रोज़ ख़ुद से पूछता, अपनी पत्नी से पूछता- घर कैसे चलेगा, हमारा आगे क्या होगा, बच्चे का क्या होगा ? लेकिन फाइनली सोचा कि जब कुछ नहीं होगा तो झोली फैलाकर गांव-गांव घूमकर लोगों से मागूंगा लेकिन अब ये नौकरी नहीं।”

मैंने रक्षित का वीडियो कई बार सुना। उसकी बातों में कई सारे रक्षित दिखाई दे रहे थे। उनकी बातों से मन दुखी हो गया कि एक पत्रकार को आज के दौर में कितना अपमान झेलना पड़ रहा है। रक्षित ने मंच पर किसानों को अपनी ख़बरों का पुलिंदा भी लहरा कर दिखाया कि उनके काम पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। अपनी पत्रकारिता को इस तरह समेट कर पब्लिक में रख देना, यह दृश्य रुला देना वाला था। जब रक्षित ने कहा कि उन्होंने कभी दलाली नहीं की। यह सुनकर धक से लग गया। चैनलों के गोदी मीडिया बन जाने से उन पत्रकारों को भी ग्लानि का भार ढोना पड़ता है जो दलाली नहीं करते हैं। आप ईमानदार हैं मगर मालिक और एंकर के कारण दलाल की तरह देखे जा रहे हैं। एक आम ईमानदार पत्रकार पत्रकारिता न कर पाने से बेचैन तो है ही, चैनल के गोदी हो जाने के कारण दलाल की तरह देखे जाने से भी नज़रें बचा कर जी रहा है। काश ऐसी ही ग्लानि उन पाठकों और दर्शकों को भी होती जो गोदी मीडिया के अखबार और चैनलों के लिए पैसे देते हैं। दलाली देखने के पैसे देते हैं।

वीडियो में रक्षित उन बातों को लेकर मुक्त आवाज़ से बोले जा रहे थे जिनसे वे परेशान हो चले थे। चैनलों के कमरे में बैठकर सत्ता की खुशामद में किसानों को आतंकवादी कहा गया। हालत यह हो गई है कि किसान अपने ही गांव में लोगों को बता रहे हैं कि वे आतंकवादी नहीं हैं। हमें नहीं पता था कि चैनलों के भीतर रक्षित जैसे पत्रकार भी हैं जो इस बात को लेकर परेशान हैं। उसकी तकलीफ से मैं द्रवित हो उठा। उसका कसूर क्या था। क्या यही कि रक्षित जैसे पत्रकार जैसा है वैसा दिखाना चाहते हैं? क्या इस साधारण से फैसले के लिए उन्हें इतना अपमानित होना पड़े कि तीन तीन महीने तक दिन रात कोई खुद से उलझ जाए कि यह झूठ अब बर्दाश्त नहीं होता है। अपना जीवन ही दांव पर लगाना होगा।

मैं रक्षित के फैसले का न तो महिमामंडन कर रहा हूं और न उसे कमतर बता रहा हूं। मैं चाहता हूं कि आप सभी रक्षित सिंह के फैसले पर ठहर कर सोचें। सिर्फ आज नहीं बल्कि आने वाले दिनों में भी जब रक्षित को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा और यह लड़ाई उनके अकेले की होगी। उनकी पत्नी कितनी परेशान होंगी। मैं यह सब सोच कर एक पत्रकार के अकेले पड़ जाने से बेचैन हो रहा हूं। रक्षित को ख़ूब सारा प्यार। रक्षित ने इस्तीफा देकर वह कह दिया है जो उनके और अन्य सभी चैनलों के न्यूज़ रूम में हर दिन कहा जा रहा है। आज अवसाद से घिरे पत्रकारों की फौज देख कर दिल टूटता है। आख़िर ग़ुलामी कर आप ख़ुश नहीं रह सकते। कहां तो पत्रकार हर दिन गर्व करने के लिए एक नई ख़बर खोजता था आज हर दिन वह अपनी ही लिखी हुई ख़बर पर शर्म करता है। ग्लानि से भर जाता है।

रक्षित सिंह ने ट्विट किया है कि “आज मेरे ऊपर भारी दवाब था कि @jayantrld की किसान पंचायत की समय से पहले वीडियो बनाकर फ्लॉप दिखाया जाएं। मीडिया चैनल के मालिक पूंजीपति है और पूंजीपतियों की सरकार है। किस तरह ईमानदार पत्रकारों को झूठ बोलने/दिखाने के लिए मजबूर किया जाता है।” ऐसा नहीं है कि रक्षित के लिए नौकरियां रखी हुई हैं। जो गोदी मीडिया नहीं हुए हैं उनकी भी हालत खराब है। आर्थिक कारण तो है ही उनके यहां भी अब पत्रकारिता का सामान समेटा जा रहा है। इनके यहां भी ख़बरों की क्वालिटी देख कर समझा जा सकता है कि अर्ध गोदीकरण के रास्ते पर हैं जो एक दिन पूर्ण गोदीकरण में ढल जाएंगे। कई मीडिया संस्थानों की ख़बरों का पेज देखकर आप आसानी से समझ सकते हैं।

रक्षित को सुनते ही लगा कि विनोद कुमार शुक्ल का कोई किरदार नौकर की कमीज़ सबके सामने फाड़ रहा है। वह उस कमीज़ से नौकर होने को आज़ाद करा रहा है। नौकर होना ग़ुलामी नहीं है। चैनलों में जो कमीज़ पहनाई जा रही है वह ग़ुलामी है। रक्षित सबके सामने अपना सब छोड़ रहे हैं। सबके सामने ही तो पत्रकार होने की सामाजिक प्रतिष्ठा चली गई है। पत्रकार को दफ्तर में प्रतिष्ठा नहीं मिलती है। दफ्तर में तो वह अनगिनत तरीकों से अपमानित होता है। प्रतिष्ठा मिलती है समाज में। बहुत से चैनल इस भ्रम में रहते हैं कि वो जिसे चाहें पत्रकार बना दें। कहते भी पाए जाएंगे कि हमने आपको बनाया। इससे बड़ा झूठ कुछ और नहीं हो सकता। चैनलों की भूमिका होती है लेकिन इतनी नहीं कि किसी को बनाने का श्रेय ले ले। कोई पत्रकार बनता है अपने भीतर की आवाज़ से। अगर चैनल पत्रकार बनाते तो उस चैनल में एक नहीं कई सारे पत्रकार नज़र आते। ऐसा तो होता नहीं है। चैनल और अख़बार के मालिक सैलरी देने की अपनी क्षमता पर कुछ ज़्यादा ही अहंकार कर जाते हैं। पत्रकार भी कुछ अति विनम्रता में अपनी सारी मेहनत और जोखिम का श्रेय संस्थान को दे आते हैं। लेकिन इसे सिर्फ सामाजिक और व्यावसायिक औपचारिकता के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। इससे ज़्यादा कुछ नहीं। एक पत्रकार के पत्रकार बनने की यात्रा उसकी होती है। उसके सहयोगियों की होती है। कंपनी इतना ही उपलब्ध कराती है। तभी तो कई सारे एंकर निकाले जाने के बाद भी यू ट्यूब में पत्रकारिता ही कर रहे हैं। लेकिन वो चैनल नहीं कर रहा है। तो पत्रकारिता का इम्तहान पत्रकार देता है। हत्या भी पत्रकार की होती है।

रक्षित ने एक चैनल से इस्तीफ़ा नहीं दिया है। उसने एक ऐसे वातावरण से इस्तीफ़ा दिया है जिसमें रह कर हर दूसरे पत्रकार का दम घुट रहा है। जिसका निर्माण 2014 के बाद से सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक सुविधा के लिए किया गया है। अख़बार, चैनल से लेकर सोशल मीडिया पर असली ख़बरों की हत्या का जो वातावरण बनाया गया है उसमें ऐसे हर पत्रकार का दम घुट रहा है जो 2014 से पहले पत्रकारिता करने आया था। 2014 के बाद जो लोग चैनलों और अख़बारों से जुड़े हैं उन्हें कम से कम पता है कि पत्रकारिता ख़त्म हो चुकी है। वह केवल नौकरी के लिए आए हैं। लेकिन पहले आ चुके थे उनके लिए संकट इतना एकतरफा नहीं था। वह पहले भी दबाव का सामना कर रहा था लेकिन फिर भी महीने में आठ-दस अच्छी ख़बरें कर अपने जीने लायक संतोष जमा कर लेता था। सरकार से सवाल करने वाली बहुत ख़बरें छप जाती थीं। मगर 2014 के बाद से कम होती गईं और बंद हो गईं। जब ऐसी ख़बरें बंद हो गईं तब उसके बाद आप सरकार के मंत्रियों को कहते सुनेंगे कि हम प्रेस की आज़ादी के समर्थक हैं। उन्हें पता है कि यह प्रेस अब आज़ादी की किसी शर्त को पूरी नहीं करता है इसलिए इसका सार्वजनिक समर्थन करना चाहिए। मंत्रियों के प्रेस की आज़ादी के समर्थन वाली बात का यही मतलब है कि प्रेस गु़लाम होने के लिए पूरी तरह आज़ाद है। वह पूरी आज़ादी से हमारी दी हुई ग़ुलामी जी सकता है यानी भांड बन कर नाच सकता है।

रक्षित जैसे कई पत्रकार हर दिन अपने बर्दाश्त की सीमा का विस्तार करते हैं। निजी बातचीत में मानने लगे हैं। ख़ुद को कोसने लगे हैं। किसी भी अच्छे पत्रकार के व्यक्तित्व में एक ख़ास किस्म की स्वायत्तता बन जाती है। इस स्वायत्तता का बनना उसके लिए ही नहीं, इस पेशे के लिए भी ज़रूरी होता है। अब जब भी किसी पत्रकार से मिलता हूं लगता है उसकी स्वायत्तता छीन ली गई है। पत्रकारों के व्यक्तित्व में अपने-अपने न्यूज़ रूम में मन मार कर जा रहे हैं। डेस्क पर बैठे कई लोग अपनी नौकरी को बचाने के लिए मन मार रहे हैं। उन्हें जब भी लिखना है सरकार की वाहवाही में लिखना है। यह आप ख़ुद से भी देख  सकते हैं। जो भी पत्रकार जहां है वह घुटन से बेचैन है। अब वह सिस्टम ही पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है जहां कोई पत्रकार किसी न किसी तरह अपनी ख़बरों के लिए हां करवा ही लेता था। वह न्यूज़ रूम की इस लड़ाई को अपने काम का स्वाभाविक हिस्सा मानता रहा है। कई बार इस प्रक्रिया में अच्छी ख़बरें दबा दी गईं तो कई बार इसी प्रक्रिया में बहुत सी ख़बरें और अच्छी हो गई हैं। संदेह का लाभ रिपोर्टर और ख़बर गिराने वाले दोनों को मिलता रहा है। अब तो उस संदेह की गुज़ाइश ही खत्म हो गई। केवल फरमान है। हुज़ुर के लिए बिगुल बजानी है। सुबह से लेकर रात तक बिगुल बजानी है।

आप ज़िला से लेकर राजधानी दिल्ली तक में पत्रकारिता कर रहे किसी पत्रकार से पूछ लीजिए। आपको रक्षित की तरह बेचैन नज़र आएगा। गोदी मीडिया में पत्रकारों की कमाई बढ़ गई हो ऐसा भी नहीं है। दो चार एंकरों की सैलरी होगी अच्छी, वो भी उन्हें ही पता होगा कि सात साल में कितनी बढ़ी है। लेकिन उनके भांडगिरी के फार्मेट के कारण रिपोर्टर की सैलरी खत्म हो गई। ज़िलों में स्ट्रिंगर की कमाई ख़त्म हो गई क्योंकि अब तो रिपोर्टर की ज़रूरत नहीं है। रिपोर्टर जब मैदान में जाएगा तो कुछ न कुछ ग़लत दिखेगा। लेकिन अब तो कुछ भी ग़लत दिखाना ही नहीं है क्योंकि भारत में अवतार हुआ है। कोरोना महामारी के दौरान गोदी मीडिया से भी लोग निकाल दिए गए। इसलिए गोदी होकर कोई आर्थिक तरक्की आई हो, ऐसा भी नहीं है। पंद्रह साल का अनुभव रखने वाले रक्षित की सैलरी एक लाख रुपये हैं। कोई ख़ास नहीं है। वैसे 2014 के बाद से दूसरे सेक्टर के लोग भी हिसाब कर सकते हैं कि उनकी कमाई कितनी बढ़ी है।

मैं गोदी चैनलों और अख़बारों के हर पत्रकार से कहता हूँ कि हर दिन की डायरी लिखें। ख़बरों के मारे जाने के निर्देश की तस्वीर लेकर फ़्रेम कराएँ। अपने घर में लगाएँ। आने वाले समय के लिए दस्तावेज़ छोड़ कर जाएँ, दस्तावेज़ जमा करें कि कैसे भारत जैसे स्वाभिमानी देश में पत्रकारिता का स्वाभिमान कुचल दिया गया। आप सब केवल ग्लानि नहीं सह रहे हैं। आप उस इतिहास को अपनी आँखों से गुज़रता हुआ देख रहे हैं जो अलग अलग दौर में गुज़र चुका है। रक्षित के फ़ैसले ने ज़ी न्यूज़ से इस्तीफ़ा देने वाले विश्वदीपक की याद दिला दी है।

रक्षित सिंह आपको सलाम है। आपका फैसला ठीक उसी तरह से है जब अंग्रेज़ों की अफ़सरी को लोग ग़ुलामी समझने लगे और इस्तीफ़ा देकर सड़क पर आने लगे।आपने अपने इस्तीफ़े से हर उस आवाज़ को आवाज़ दी है जो सिसक रही है। बेशक बहुत से लोग इस्तीफा नहीं दे पाएंगे। आपने सबके बदले इस्तीफ़ा दिया है। मैं आपकी ज़िंदगी में आने वाली तकलीफों के कम होने की दुआ करता हूं। मेरी तरफ से अपने बच्चों को प्यार दीजिएगा। कहिएगा कि उनके बाप ने बड़ा काम किया है।

किसान महापंचायत के मंच से दिया गया रक्षित का भाषण सुनिए…


रवीश कुमार, जाने-माने टीवी पत्रकार हैं। संप्रति एनडीटीवी इंडिया के मैनेजिंग एडिटर हैं। यह लेख उनके फेसबुक पेज से लिया गया है।

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