पहला पन्ना: ख़बर या सरकारी प्रचार, टेलीग्राफ़ से कुछ सीख रे अख़बार!

आज द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर विज्ञापन नहीं है और चार बड़ी खबरें, एक फोटो तथा सिंगल कॉलम में कुछ नियमित कॉलम के अलावा तीन छोटी-छोटी खबरें ये बताने के लिए हैं कि विस्तार अंदर है। चार बड़ी या विस्तृत खबरों में एक टाइम्स ऑफ इंडिया में है। यहां इसकी शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट सरकार से : राजद्रोह के खिलाफ अपील पर स्टैंड स्पष्ट करें।” द टेलीग्राफ में इस खबर का शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट राजद्रोह कानून की चुनौती पर विचार करेगा।” मुझे लगता है कि दोनों शीर्षक से सूचना की गंभीरता में काफी अंतर आ गया है। पर यह मीडिया के खेल का छोटा हिस्सा है। इसी तरह, इंडियन एक्सप्रेस में भी द टेलीग्राफ की चार खबरों में से एक है। इनमें एक असम के नए मवेशी विधेयक वाली खबर है। शीर्षक है – हिन्दू, सिख, जैन मोहल्लों में या मंदिर के पांच किलोमीटर के घेरे में गो मांस नहीं बेचा जा सकेगा।

द टेलीग्राफ में यह खबर टॉप पर सात कॉलम में है। यहां इसका शीर्षक है, “गोहत्या रोकने की असम की कोशिश।” इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, “कुछ क्षेत्रों में गोमांस की बिक्री प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव, विधेयक में अन्य मवेशियों की हत्या का जुर्माना बढ़ाया गया।” कहने की जरूरत नहीं है कि इसी खबर का इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक जितना बताता है उससे ज्यादा सवाल उठते हैं। फिर भी यह ‘खबर’ है। एक स्थापित और प्रतिष्ठित अखबार में पहले पन्ने पर। मुझे लगता है कि इंडियन एक्सप्रेस और द टेलीग्राफ के शीर्षक का अंतर सामान्य नहीं है और रेखांकित करने योग्य है।

द टेलीग्राफ की जो दो अन्य खबरें दूसरे अखबारों में पहले पन्ने से पूरी तरह गायब हैं उनमें एक का शीर्षक है, स्टैन (स्वामी) की मृत्यु के मामले में न्यायिक जांच की मांग। अखबार ने इस खबर को पांच कॉलम में छापा है और स्टेन स्वामी के निधन के बाद से उनसे संबंधित कोई ना कोई खबर रोज पहले पन्ने पर रही है। तब भी आज इस खबर को इतनी प्रमुखता दी गई है जबकि बाकी अखबारों ने मृत्यु की खबर के बाद कोई खबर पहले पन्ने पर तो नहीं छापी है। दूसरी खबर का शीर्षक है, “चीन ने भारत पर नजर रखने के लिए कंक्रीट टावर बनाए”। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, एलएसी पर निर्माण चिन्ता का कारण है, जैसे को तैसा की कार्रवाई शुरू हुई।

यह खबर कितनी महत्वपूर्ण है, बताने की जरूरत नहीं है लेकिन, ‘सब चंगा सी’ के दावों के बीच यकीन करने लायक नहीं है। यह दिलचस्प है कि ईरान अहमद सिद्दीक की बाईलाइन वाली इस खबर की डेटलाइन नई दिल्ली है और दिल्ली के अखबारों के संवाददाताओं को यह खबर नहीं मिली या मिली तो अखबारों ने उसे पहले पन्ने पर नहीं रखा। यह खबर सुरक्षा प्रतिष्ठानों ने दी है और वैसी ही है जैसी अक्सर ‘सूत्र’ देते हैं। यह अलग बात है कि सूत्रों की खबरें गलत और हास्यास्पद साबित हो चुकी है। द टेलीग्राफ में इन चार खबरों के अलावा एक रंगीन तस्वीर पांच कॉलम में छापी है जो वार्षिक रथयात्रा की शुरुआत की है। मुझे लगता है कि यह फोटो भी कम महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन यह किसी भी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है।

रोज की तरह आज भी कुछ खबरें हैं जो दूसरे अखबारों में नहीं हैं और जो हैं वो सबमें हैं। उदाहरण के लिए, डोमिनिका की कोर्ट ने मेहुल चोकसी को जमानत दी और वह एंटीगुआ जाएगा, जहां का वह नागरिक है। मुझे लगता है कि यह बहुत सामान्य फैसला है और यही होना था या होना चाहिए था। ऐसे में जल्दबाजी में जेट लेकर पहुंच जाना गलत निर्णय था लेकिन उस पर सवाल कोई नहीं है। ना तब हुआ था ना अब होगा। वैसे भी मेहुल चोकसी को यहां वापस ले आने से क्या होगा? पैसे तो मिलने से रहे या वह एंटीगुआ पहुंच चुका है। अगर वह वहां कमाकर वापस कर दे तो भला ही है। यहां लाकर जेल में रखने से क्या मिलेगा? मुझे लगता है कि यह सरकार को ‘सक्रिय’ दिखाने के अलावा कुछ नहीं है। दूसरी ओर, मेहुल चोकसी ने जो आरोप सरकार पर लगाए हैं वैसी कोशिश सरकार या सरकारी बैंकों को करनी भी नहीं चाहिए।

यह खबर आज इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया तीनों में पहले पन्ने पर है। एचटी में नई दिल्ली डेटलाइन से प्रकाशित इस खबर का स्रोत नहीं बताया गया है। इंडियन एक्सप्रेस में यह बाईलाइन वाली स्टोरी है और एंटीगुआ के अखबारों में छपी खबरों के हवाले से है। टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर का विस्तार अंदर होने की सूचना है। पहले पन्ने पर ना डेटलाइन है और ना स्रोत। वैसे भी, एक भोगड़े को किसी और मामले में किसी और देश में किसी और देश जाने के लिए जमानत मिलने की खबर (वह भी प्लांटेड) पहले पन्ने पर क्यों है? ऐसी ही एक खबर ट्वीटर की है। केंद्र में नए मंत्री बने राजीव चंद्रशेखर का ब्लूटिक वाला हैंडल था, राजीव अंडरस्कोर एमपी।

केंद्रीय मंत्री बनने के बाद उन्होंने उसे राजीव अंडरस्कोर जीओआई (यानी भारत सरकार) कर दिया। यह एमपी साब के सरकार बनने की कहानी है। मुझे लगता है कि उन्हें दूसरा हैंडल बनाना था या उसी को उपयोग करते रह सकते थे। एमपी यानी सांसद तो वे अब भी हैं। फिर भी उन्होंने पुराने का ही हैंडल बदलने की कोशिश की उसमें ब्लूटिक हटना स्वाभाविक है। और जब बताया गया तो मिल भी गया। मुझे लगता है कि बताकर नए वाले के लिए अलग से या दोनों ब्लूटिक वाले हैंडल भी रखे जा सकते थे। इस लिहाज से यह कोई बड़ा मामला नहीं है लेकिन संपादक ही तय करता है कि कोई खबर किस पन्ने पर रखी जाए और टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सरकार की फोटो के साथ है।

 

खबरें जो प्रचार नहीं हैं

बेशक, आज के अखबारों में भी कुछेक खबरें ऐसी हैं जो दूसरे अखबारों में नहीं हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड का शीर्षक है, ईंधन, खाद्य पदार्थों की कीमत ज्यादा होने से मुद्रास्फीति ज्यादा है, 6.26 प्रतिशत। जीडीपी जब गड्डे में है और मुद्रास्फीति आसमान पर तो इससे बेहतर खबर क्या हो सकती थी। यहां तो इसका कारण भी बताया गया है। लेकिन यह खबर आज के मेरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। द हिन्दू में सेकेंड लीड जरूर है पर छोटी सी और सामान्य खबर की तरह जो यह सूचना दे रही है कि मुद्रास्फीति छह प्रतिशत से ज्यादा है। इसी तरह, दिल्ली जलबोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से अवमानना कार्रवाई शुरू करने के लिए कहा है। पर दिल्ली के अखबारों में ही यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है या छोटी सी है। द हिन्दू ने इसे पहले पहले पर दो कॉलम में छापा है।

आज की तीसरी प्रमुख खबर जो प्रचार नहीं है वह है, राजग के सहयोगी नीतिश ने जनसंख्या नियंत्रण कानून का विरोध किया। राजग में पहले लोग हिन्दुओं को चार-चार और 10-10 बच्चे पैदा करने की सलाह देते रहे हैं, कई नेताओं के कई भाई बहन है और कइयों के कई बच्चे हैं और जिनके नहीं हैं उनकी शादी नहीं हुई है या पत्नी साथ नहीं रहती है। ऐसे लोग जनसंख्या पर कानून बना रहे हैं तो उसमें किसकी दिलचस्पी नहीं होगी और उसमें एक प्रदेश के मुख्यमंत्री अगर इसके खिलाफ हैं तो निश्चित रूप से यह महत्वपूर्ण खबर है लेकिन ज्यादातर अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है।

 

खबरें जो प्रचार लगती हैं

आइए अब उन खबरों की भी चर्चा कर लूं जो पहले पन्ने पर हैं लेकिन प्रचार लगते हैं। बुलेट ट्रेन की देरी नए मंत्री के रडार पर (अधपन्ने पर) और कांवड़ यात्रा को लेकर टकराव से तीसरी लहर का डर फैला (हिन्दुस्तान टाइम्स)। उत्तर पूर्व में कोविड के मामले ज्यादा; प्रधानमंत्री मुख्यमंत्रियों से मिलेंगे (अधपन्ने पर) यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। निश्चित रूप से यह खबर भले सुनने में खबर लगती है लेकिन हेडलाइन मैनेजेंट के जमाने में प्रधानमंत्री मुख्यमंत्रियों से मिलेंगे, हेडलाइन मैनेजमेंट हो सकता है और शायद इसीलिए दूसरे अखबारों में नहीं है। इस खबर का दूसरे अखबारों में प्रमुखता से नहीं होना भी खबर है।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

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