बलात्कारी का ‘अच्छा व्यवहार’ और 90% विकलांग का हाल

खबरों के लिहाज से आज का दिन महत्वपूर्ण और दिलचस्प है। आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक हिन्दी में होता तो कुछ इस तरह होता – फ्लैग शीर्षक, लाल स्याही से, सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार का शपथपत्र। मुख्य शीर्षक (तीन कॉलम तीन लाइन में), बिलकिस मामले के अभियुक्तों की रिहाई केंद्र सरकार ने क्लीयर की, सीबीआई और अदालत ने विरोध किया : गुजरात। मुझे लगता है कि पूरा मामला यही है और इसे आम जानता को जानना चाहिए और यह केंद्र सरकार की घोषित नीतियों के अनुकूल है फिर भी बड़ी खबर है और स्पष्ट है। इंडियन एक्सप्रेस में आधे पन्ने से ज्यादा विज्ञापन होने के बावजूद यह खबर लीड है तो कई खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं। और ऐसी खबरों में एक, टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर है। 

टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे लीड के साथ टॉप पर दो कॉलम में छापा है। देश के अगले मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है, सभी वादियों को यह अहसास कराने की कोशिश करूंगा कि उन्हें न्याय मिला है। बिलकिस बानो के अभियुक्तों को रिहा किया जाना अपने आप में बहुत बड़ा मामला है। खासकर तब जब वीडियो होने के बावजूद नंगे होकर तेल मालिश कराने वाले भाजपा के एक पूर्व मंत्री को सजा नहीं हुई या बचा लिया गया और नारा बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ है। केंद्र सरकार ने जब बिलकिस बानो के बलात्कारियों को अदालत और सीबीआई के विरोध के बावजूद रिहा कर दिया है तो अगले मुख्य न्यायाधीश का यह बयान खास मायने रखता है। पर क्या दूसरे अखबारों ने इसे वैसी ही प्रमुखता दी है। मुझे तो नहीं लगता है। आप अपना अखबार देखिए। 

टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर के साथ जिस खबर को लीड बनाया है वह भी बहुत महत्वपूर्ण और दिलचस्प है। दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने आरोप लगाया है कि सीबीआई ने उनपर दबाव डाला कि वे आम आदमी पार्टी छोड़ दें। वरना उन्हें यूं ही परेशान किया जाता रहेगा। सीबीआई ने भले इस आरोप से इनकार किया है और टाइम्स ने उसे भी प्रमुखता से शीर्षक में जोड़ दिया है। फिर भी यह आरोप निराधार नहीं लग रहा है। इन दिनों केंद्र सरकार सीबीआई का जो उपयोग या दुरुपयोग कर रही है उससे इस आरोप में दम लगता है। दूसरी ओर, मनीष सिसोदिया, अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी ने कल पूरा ड्रामा किया। सहानुभूति बटोरने के पूरे उपाय किए और संभव है, इसीलिए गिरफ्तार नहीं गए। पर वह अलग मामला है। 

इस तरह आम आदमी पार्टी या मनीष सिसोदिया केंद्र सरकार से मुकाबले में आगे चल रहे हैं और ऐसे समय में उप मुख्य मंत्री जेल जाने से बच गए। पर आप के विरोधियो ने पहले ही यह कहना शुरू कर दिया कि आम आदमी पार्टी उम्मीद से आगे निकल गई। कहने की जरूरत नहीं है लोग इसका भी विरोध कर रहे हैं और कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी ने बिना मतलब ड्रामा किया। सरकार जो बिना मतलब पूछताछ और जेल में रखने का काम कर रही है उसका विरोध नहीं होने के बाद यह हाल है पर अभी उसे छोड़िए। राहुल गांधी का विरोध किया जाता है कि वह सरकार में आने या सरकार बनाने के लिए नरेन्द्र मोदी जैसा नहीं करते हैं और केजरीवाल या आम आदमी पार्टी पर आरोप लगाया है जाता है कि वो भाजपा की बी टीम है। 

मेरा मानना है कि आम आदमी पार्टी भाजपा को हराने के लिए लड़ती है। राहुल गांधी भाजपा की राजनीति को कोसने के लिए लड़ते हैं या मैदान में हैं। लड़ तो वो रहे ही नहीं हैं। उन्होंने साफ कह दिया है कि उनकी यात्रा 2024 के लिए नहीं है भले अखबारों ने आपको न बताया हो। लोकतंत्र में अखबारों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है और अखबार जिस तरह से न सिर्फ सरकार का समर्थन कर रहे हैं बल्कि विपक्ष का विरोध भी कर रहे हैं उसमें चुनाव और लेवल प्लेइंग फील्ड का कोई मतलब ही नहीं है। हालांकि वह अलग मुद्दा है। मैं आज की खबरों पर वापस आता हूं। 

मुख्य रूप से दक्षिण भारत के अखबार, द हिन्दू के दिल्ली एडिशन में आज की लीड बताती है कि केरल के गवर्नर, आरिफ मोहम्मद खान ने कहा है कि वे (अपने राज्य के) ‘गुमराह’ मंत्रियों को बर्खास्त कर सकते हैं। अखबार ने उपशीर्षक से बताया है कि राज्यपाल के ऑफिस का सम्मान कम करने वाले (राज्य) कैबिनेट के सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई होगी। उन्होंने विश्वविद्यालय कानून विधेयक पर दस्तखत करने से मना करने पर उच्च शिक्षा मंत्री आर बिन्दु की टिप्पणी पर यह चेतावनी दी है। कहने की जरूरत नहीं है कि विपक्षी सरकार वाले राज्यों में राज्यपाल का काम केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करना ही रह गया लगता है और जब जगदीप धनखड़ को तरक्की मिल चुकी है और योग्य होने के बावजूद आरिफ मोहम्मद खान को राष्ट्रपति नहीं बनाया गया तो उनके इस विरोध को इसी आलोक में देखना चाहिए। 

जहां तक हिन्दू की खबर और शीर्षक की बात है, मनीष सिसोदिया वाली खबर यहां टाइम्स ऑफ इंडिया की तरह नहीं, बिल्कुल रूटीन अंदाज में है – एक्साइज मामले में सिसोदिया से सीबीआई ने नौ घंटे पूछताछ की। इन दिनों सीबीआई जिस तरह से विपक्षी नेताओं से पूछताछ कर रही है उसमें यह खबर इतनी बड़ी नहीं है जितना यह आरोप कि सीबीआई ने सिसोदिया पर आप छोड़ने के लिए आरोप डाला। यह आरोप निराधार भी होता तो सुर्खी बनने लायक है अभी तो आधार की कोई कमी नहीं है। कुल मिलाकर, आज के अखबारों से लग रहा है कि बिलकिस बानों मामले में अभियुकतों को उनके अच्छे व्यवहार के कारण 14 साल पूर्ण होने पर केंद्र सरकार ने छोड़ दिया। 

मेरे मन में सवाल है कि अगर किसी बलात्कारी को अच्छे व्यवहार के आधार पर छोड़ दिया जाएगा तो 90 प्रतिशत विकलांग प्रो जी.साइबाबा का व्यवहार जेल में खराब कैसे हो सकता है? और जेल में कैदियों के खराब व्यवहार के लिए अगर उन्हें मार भी दिया जाता है (कितने मामले हैं) तो अच्छे व्यवहार और सामान्य व्यवहार में क्या अंतर हो सकता है। और यह कैसे तय होगा कि किसी बलात्कारी का अच्छा व्यवहार जेल से छूटने के लिए नहीं है। अगर यह मुद्दा नहीं है तो उत्पाद शुल्क का घोटाला क्यों मुद्दा है? आप जानते हैं कि 2जी घोटाला एक लाख 76 हजार करोड़ का था और 5जी में क्या हुआ। पर वह मुद्दा बना ही नहीं। इनपर सवाल किससे पूछा जाए और प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने वाले की मन की बात सुनने का क्या मतलब है। 

सवाल तो कई हैं पर जवाब कौन देगा? जीएन साइबाबा आठ साल से जेल में हैं और बलात्कारी 14 साल में छूट जा रहा है। न्याय कहां है? और जब न्याय ही नहीं है तो बाकी सब का क्या मतलब। पंच परमेश्वर के देश में लग रहा है कि न्याय को भैंस की तरह लाठी वाले हांक ले जा रहे हैं। यह चिन्ता अखबारों की खबरों में नहीं दिखेगी तो जनता को आने वाले खतरे का पता कैसे चलेगा?  

वंशवाद के विरोध के इस दौर में 

आज के अखबारों में खबर है कि मुंबई के अंधेरी पूर्व विधानसभा क्षेत्र से भाजपा ने अपना उम्मीदवार वापस ले लिया और शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट की रुतुजा लटके निर्विरोध निर्वाचित हो जाएंगी। मुझे मामला समझ में नहीं आया कि भाजपा, शिवसेना और शिवसेना का दूसरा गुट किसी उम्मीदवार पर सहमत क्यों और कैसे है। बाकी दल तो हैं ही। हालांकि उनकी सहमति जीतने की कम उम्मीद और कार्यकाल कम होने के कारण हो सकती है पर शिवसेना का दूसरा गुट? 

पता चला कि यह उपचुनाव श्रीमती लटके के पति शिवसेना विधायक रमेश लटके के निधन के कारण हो रहा है और द हिन्दू की खबर के अनुसार, महाराष्ट्र भाजपा इकाई के प्रमुख चंद्रशेखर बवानकुले ने कहा है, अगर किसी विधायक का निधन होता है और उनके परिवार का सदस्य लड़ रहा हो तो महाराष्ट्र में परंपरा है कि उसे निर्विरोध चुना या जिताया जाए। मैं इस परंपरा पर कुछ नहीं कह रहा।  

पर सवाल है कि अगर ऐसी परंपरा है और उसका पालन किया जा रहा है तो वंशवाद का विरोध कैसा? और इस परंपरा को कानून क्यों नहीं बना दिया जाना चाहिए ताकि चुनाव की जरूरत ही न रहे। दूसरी ओर, वंशवाद के विरोध का नाटक सिर्फ राहुल गांधी के लिए है? कल कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ, सोनिया गांधी ने कहा है कि मैं इस दिन का इंतजार लंबे समय से कर रही थी। आपने चुनाव की खबर या सोनिया गांधी का यह बयान कहीं पढ़ा या सुना?

सबसे दुखद संकेत और सबसे अच्छी बात 

झूठ, पाखंड और लफ्फाजी के इस राजनीतिक दौर में आज द टेलीग्राफ की लीड सबसे अलग है। और अखबार ने इस दौर के दो सबसे महत्वपूर्ण संकतों को रेखांकित किया है। अखबार ने लिखा है कि इस समय का सबसे दुखद संकेत यह है कि क्रूरता को लेकर शिखर पर चुप्पी है और सबसे अच्छी बात यह है कि अभी भी कोई है जो नेहरू को लेकर भावुक हो जाता है। अखबार ने बताया है कि इतिहासकार, अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस में रिसर्च प्रोफेसर और महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी कल हिमाचल प्रदेश के कौसली में खुशवंत सिंह लिट्रेरी फेस्टिवल में अपनी पुस्तक, “इंडिया आफ्टर 1947 : रिफ्लेक्शन एंड रिकलेक्शंस” पर तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा से चर्चा कर रहे थे। इसी दौरान उपरोक्त बातें हुई जिसे अखबार ने आज लीड बनाया है। कहने की जरूरत नहीं है कि नेहरू को लेकर भावुक होने वाले और कोई नहीं, कम से कम एक भारतीय, राजमोहन गांधी तो हैं ही।     

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

 

First Published on:
Exit mobile version