क्या युवा सोचेंगे कि ‘मोदी रोज़गार दो’ ट्रेंड होकर भी ढेर क्यों हो गया?

बेशक युवाओं ने ट्विटर पर रोज़गार को ट्रेंड कराया। इसके पहले भी कराया है। लेकिन हासिल क्या हुआ? नेता जानता है कि यह केवल युवाओं का समूह नहीं है। इसमें जाति और धर्म का भी समूह है। उसकी राजनीतिक प्राथमिकता धर्म की पहचान से बनी है। आरक्षण को लेकर आधी-अधूरी समझ से बनी है। वे लाख बता लें कि सब छोड़कर एकजुट हैं नेता कभी यक़ीन नहीं करेगा। युवाओं के इस समूह को पहले नागरिक की तरह सोचना होगा। फिर आर्थिक नीतियों और विकास के फटीचर नारों की राजनीति को समझना होगा जहां रोज़गार के नाम पर चंद अमीरों को और अमीर किया जाता है और बाक़ी को गरीब। करोड़ों लोग बेरोज़गार हुए। क्या उनकी पीड़ा इस आंदोलन में झलकती है।

जिन नौजवानों ने धर्म के गौरव की फ़र्ज़ी समझ के फेर में इस देश की राजनीति से रोज़गार के मुद्दे को ख़त्म कर दिया वही नौजवान ट्विटर पर रोज़गार को मुद्दा बना रहे हैं। मैं ट्विटर पर देख रहा था कि रोज़गार को लेकर युवा क्या लिख रहे हैं। एक भी ट्विट ऐसा नहीं मिला जो रोज़गार के सवाल पर सरकार की नीतियों की गंभीर आलोचना करता हो। राजनीति को व्यापक संदर्भ देता हो। बेशक ट्विटर वो माध्यम नहीं है लेकिन फिर भी युवाओं से उम्मीद की जाती है कि वे इस मुद्दे को गंभीरता और अनिवार्यता प्रदान करें। बहुत से युवाओं ने विपक्ष के नेताओं को टैग दिया है लेकिन फिर भी विपक्ष के क़रीब जाने को लेकर उत्साह नहीं दिखता। इसका मतलब है गोदी मीडिया के प्रोपेगैंडा में फँस कर इन्हें विपक्ष क़रीब जाने के लायक़ नहीं लगता। क्या रोज़गार का मुद्दा सिर्फ़ सरकार और युवाओं के बीच का मुद्दा है? अफ़सोस, ना के बराबर ऐसे ट्विट दिखे हैं जिसमें 89 दिनों से आंदोलन कर रहे किसानों के प्रति हमदर्दी जताई गई हो और उनके प्रति सरकार के बेरुख़ेपन को लेकर नाराज़गी।

रोज़गार के प्रति राजनीतिक समझ अनिवार्य है। इस बार के ट्रेंड में भी उसकी कमी खिली। 17 सितंबर 2020 के ट्रेंड में भी दिखी। यह गोदी मीडिया का ही प्रभाव है कि युवाओं के बीच विपक्ष को लेकर झिझक है। सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकारों से लेकर दिशा रवि की गिरफ़्तारी को नोटिस नहीं करते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि आप तमाम नाइंसाफ़ी से मुँह मोड़े रहें और अपनी नाइंसाफ़ी के लिए समाज से साथ माँगे। सरकार से ध्यान माँगे। जब तक युवा खुद को तमाम मुद्दों से नहीं जोड़ेंगे तब तक उनका मुद्दा व्यापक नहीं हो सकता। वे अपने मुद्दे को परीक्षा और नियुक्ति पत्र तक सीमित रख कर उसे कमज़ोर ही करेंगे। युवाओं को नागरिक बन कर आवाज़ उठाना होगी जिससे लगे कि देश का यह हिस्सा अन्य नाइंसाफियौं को भी नोट कर रहा है। इसकी घोर कमी लगी।

गोदी मीडिया की इतनी सी आलोचना है कि उसने ट्रेंड को कवर नहीं किया। मान लीजिए एक दिन के लिए कवर कर देता तो क्या गोदी मीडिया उनका हीरो हो जाता? गोदी मीडिया के एंकरों का मज़ाक़िया पोस्टर बना देना गोदी मीडिया की आलोचना नहीं है। युवाओं के ट्विट को देख कहीं नहीं लगा कि वे गोदी मीडिया के उपभोक्ता नहीं हैं। या वे गोदी मीडिया पर कितनी गंभीरता से नज़र रख रहे हैं। जब चौदह करोड़ कृषक परिवारों के आंदोलन को गोदी मीडिया आतंकवादी का आंदोलन बता रहा था तब इन युवाओं ने आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई ? क्या युवाओं की यही राजनीतिक समझ है और राजनीति में इतना ही हस्तक्षेप करना चाहते हैं ?

बेशक युवाओं ने ट्विटर पर रोज़गार को ट्रेंड कराया। इसके पहले भी कराया है। लेकिन हासिल क्या हुआ? नेता जानता है कि यह केवल युवाओं का समूह नहीं है। इसमें जाति और धर्म का भी समूह है। उसकी राजनीतिक प्राथमिकता धर्म की पहचान से बनी है। आरक्षण को लेकर आधी-अधूरी समझ से बनी है। वे लाख बता लें कि सब छोड़कर एकजुट हैं नेता कभी यक़ीन नहीं करेगा। युवाओं के इस समूह को पहले नागरिक की तरह सोचना होगा। फिर आर्थिक नीतियों और विकास के फटीचर नारों की राजनीति को समझना होगा जहां रोज़गार के नाम पर चंद अमीरों को और अमीर किया जाता है और बाक़ी को गरीब। करोड़ों लोग बेरोज़गार हुए। क्या उनकी पीड़ा इस आंदोलन में झलकती है।

हमारे युवाओं को कठोर प्रश्नों का सामना करना होगा। जब तक वे इन प्रश्नों से भागते रहेंगे ट्रेंड? कराने से कुछ नहीं होगा। ये बात वे भी जानते हैं। ज़ाहिर है बेरोज़गारी ने उन्हें हताश कर दिया है। उनकी उम्र जा रही है। उनकी हालत देखकर कष्ट होता है। आज तबीयत ख़राब है फिर भी लिख रहा हूँ क्योंकि उनकी हालत देखी नहीं जाती। जो लिख रहा हूँ वो भी पचासों बार लिख चुका हूँ। फिर भी घूम फिर कर वही बात कि टीवी पर दिखा दें। जानते हुए भी कि नौकरी सीरीज़ बंद कर चुका हूँ और इसी पेज पर सभी कारण विस्तार से लिखा चुका हूँ। युवा परेशान हैं। वे करें भी तो क्या करें।

आज दिन भर मुझे हज़ारों मैसेज आए। दुख ही होता है कि सिर्फ़ टीवी पर कवरेज के लिए युवा हाथ जोड़ रहे हैं। युवाओं को किसानों से प्रेरणा लेनी चाहिए। गरीब किसानों ने मीडिया के आगे हाथ नहीं जोड़े। बल्कि हाथ जोड़कर कहा कि गोदी मीडिया हमें कवर मत करो। हम आंदोलन बिना मीडिया के चलाएँगे। लग नहीं रहा कि इतने धक्के खाकर हमारे युवा समझदार हुए हैं। कई लोग प्रधानमंत्री मोदी का मज़ाक़ उड़ा रहे थे। उन्हें याद रखना चाहिए कि सरकार बदलने से रोज़गार का मुद्दा ज़िंदा नहीं होगा। रोज़गार का मुद्दा तभी ज़िंदा होगा जब आर्थिक नीतियों के खेल को समझने और पकड़ने की समझ आएगी। नव उदारवाद का झाँसा समझ सकेंगे। मुझे दुख होता है यह कहते हुए कि हमारा युवा उस समझ से लाखों वर्ष दूर है।

फिर भी सरकार और समाज से यही कहूंगा कि किसानों की तरह ये युवा भी आपके हैं। अगर आपने इन्हें धर्म की राजनीति का नशा दिया है तो रोज़गार भी दे दीजिए। मैं नेता नहीं हूँ और न वोट माँगना है। न ही मैं युवाओं के बीच लोकप्रियता की चाह में लिखता हूँ। मुझे भारत के अधिकतर युवाओं से कोई उम्मीद नहीं है। सांप्रदायिकता इन युवाओं की ज़िंदगी लील जाएगी। लील चुकी है। यह सब लिख चुका हूँ फिर भी लिखता हूँ कि उनका दुख वास्तविक है। मेरे छोटे भाई बहन की तरह हैं। काश कोई इनके दुख को दूर करता।

#modi_rojgar_do


रवीश कुमार, जाने-माने टीवी पत्रकार हैं। संप्रति एनडीटीवी इंडिया के मैनेजिंग एडिटर हैं। यह पत्र उनके फेसबुक पेज से लिया गया है।

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