बहसतलब: गलवान के बावजूद चीन से सहयोग बढ़ाने में ही भारत का हित

 

प्रकाश के रे

जम्मू-कश्मीर में प्रशासनिक संरचना में बदलाव और जैशे-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को सुरक्षा परिषद द्वारा प्रतिबंधित करने के मसलों पर भारत और चीन के बीच गंभीर मतभेदों के बावजूद पिछले साल दोनों देशों के बीच परस्पर सहयोग में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई थी. अक्टूबर में महाबलीपुरम में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शिखर वार्ता के बाद कई स्तरों पर द्विपक्षीय संबंधों को लेकर उम्मीदें भी बढ़ी थी. उस बैठक में 2020 को भारत-चीन सांस्कृतिक संबंध एवं परस्पर जन संपर्क का वर्ष घोषित किया गया था. इसके तहत दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों के सात दशक पूरा होने के अवसर पर सत्तर कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनी थी. लेकिन पहले कोरोना वायरस के व्यापक संक्रमण और अब गलवान घाटी में हिंसक तनाव ने इन आयोजनों के होने पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है. सिक्किम और पूर्वी लद्दाख की तनातनी ने दोनों पड़ोसी देशों के बेहतर होते संबंधों को बड़ा झटका दे दिया है.

स्वाभाविक रूप से गलवान को लेकर भारत में रोष है और चीन से कूटनीतिक व व्यापारिक संबंधों को लेकर ठोस नीतिगत समझ एवं व्यवहार के लिए भारत सरकार पर दबाव भी बढ़ा है. वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन के अपने-अपने दावे हैं, जिन्हें लेकर स्थानीय स्तर पर दोनों देशों की सैन्य टुकड़ियों के बीच हाथापाई भी होती रही है तथा दोनों देश एक-दूसरे के ऊपर अतिक्रमण का आरोप भी लगाते रहते हैं. इसके बावजूद बीते कई सालों से व्यापारिक संबंध भी मजबूत हुए हैं तथा ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन के माध्यम से कूटनीतिक निकटता भी बढ़ी है. इतना ही नहीं, विश्व व्यापार संगठन और जलवायु सम्मेलनों में दोनों देशों ने प्रभावशाली ढंग से और आपसी सहयोग से विकासशील व अविकासित देशों को नेतृत्व भी दिया है. दोनों देशों ने आपसी समझौतों के तहत सीमा विवाद व तनातनी को स्थानीय तथा ऊपरी स्तर पर भी सफलतापूर्वक नियंत्रित भी रखा है. लेकिन गलवान के घटनाक्रम ने स्थिति को संतुलन को बड़ा झटका दिया है तथा नेतृत्व के संयम के बावजूद देश में उफान ले रहीं राष्ट्रवादी भावनाएँ, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तेज़ बदलाव और चीन द्वारा अपने आर्थिक प्रभाव क्षेत्र के विस्तार की कोशिशें दोनों देशों के आपसी समीकरण को बदल सकती हैं. यह दोनों देशों के नेतृत्व पर निर्भर करता है, जिनके बीच आगामी दिनों में अनेक बैठकों और मुलाक़ातों का सिलसिला शुरू होनेवाला है.

बहरहाल, यह वह मौक़ा भी है कि हम कुछ ठहरकर चीन के बरक्स भारतीय कूटनीति को टटोलने की कोशिश करें. पिछले साल सितंबर में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने काउंसिल ऑफ़ फ़ॉरेन रिलेशंस के आयोजन में कुछ अहम बातें कही थीं, जिनसे हम समझ सकते हैं कि कुछ दशकों से चीन को लेकर भारतीय कूटनीति की क्या सोच रही है. जयशंकर ने कहा था कि यह वास्तविकता से परे है कि इस दुनिया में आप सिर्फ़ उन्हीं लोगों से संबंध रखेंगे, जो आपकी तरह हैं. ऐसा न तो बाज़ार में होता है, न सड़क पर और न ही वैश्विक मामलों में. उन्होंने आगे कहा कि चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और भारत का सबसे बड़ा पड़ोसी भी, जिसके साथ भारत के बहुत पुराने संबंधों का इतिहास है. चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार भी है. जयशंकर ने यह भी रेखांकित किया कि यह तथ्य है कि चीन का प्रभाव बीते कई सालों में बढ़ा है. सबसे अहम बात जो विदेश मंत्री ने कही, वह यह है कि दोनों देशों के बीच एक स्थिर और परिपक्व संबंध है तथा विवादों को सुलझाने के लिए प्रणाली तो है ही, उसके कुछ मूल्य भी हैं. उनकी यह बात भी अहम है कि दोनों देशों के संबंधों ने कई सालों से दुनिया को किसी तरह की चिंता में नहीं डाला है. उन्होंने व्यापार और निवेश के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के साथ समझदारी को भी रेखांकित किया था, जिसका संकेत ऊपर दिया गया है.

इस साल जनवरी में नयी दिल्ली में एक आयोजन में विदेश मंत्री ने मोदी सरकार द्वारा नागरिकता, 370, अयोध्या आदि लंबे समय से चली आ रही समस्याओं पर की गयी पहल की चर्चा करते हुए चीन की नीतिगत सोच का हवाला दिया था. उन्होंने कहा था कि भारत के लिए चीन एक उदाहरण हो सकता है, जो अपनी समस्याओं का समाधान कर एक महाशक्ति बन गया है. जयशंकर का मानना है कि चीन की तरह भारत भी एक सभ्यतागत समाज से एक आधुनिक राज्य बनने की ओर अग्रसर है, लेकिन दोनों में यह अंतर है कि वे समस्या की पहचान कर उसके समाधान में लग जाते हैं, जबकि भारत दशकों तक समस्याओं से परेशान होता रहता है.

विदेश मंत्री की बातों से दोनों देशों के संबंधों के महत्व और उनकी बेहतरी की ज़रूरत का पता तो चलता ही है, इससे यह भी इंगित होता है कि भारतीय कूटनीति की नज़र में चीन की स्थिति क्या है. लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि इस समझदारी के बावजूद भारत न तो चीन से अपेक्षित निवेश हासिल कर सका है, न ही व्यापार घाटे को ठीक से कम कर सका है और क्षेत्रीय स्तर पर वह चीन के बढ़ते वर्चस्व को स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से चुनौती दे सका है.

भारत डॉ मनमोहन सिंह की सरकार के समय से चीन समेत 16 देशों के बीच ठोस व्यापारिक समझौते की बातचीत का हिस्सा रहा था. पर भारत ने अंतिम क्षणों में समझौते में शामिल होने से मना कर दिया. इस समझौते में शामिल नहीं होने के पीछे भारत की ठोस चिंताएँ थीं, किंतु सवाल यह उठता है कि 2012 से चली आ रही बातचीत में उन चिंताओं को प्रभावी और स्पष्ट ढंग से क्यों नहीं रखा जा सका. इसी तरह से चीन से 50-60 अरब डॉलर के सालाना व्यापार घाटे को निवेश के माध्यम से कुछ हद तक संतुलित करने में क़ामयाबी नहीं मिली, जबकि प्रधानमंत्री समेत शीर्ष नेतृत्व इसके लिए लगातार प्रयासरत रहा. इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि न तो मेक इन इंडिया के तहत और न ही अन्य योजनाओं में ऐसी प्रगति हुई कि देश दीर्घकालिक विदेशी निवेश को ठीक से आकर्षित कर पाता. यहाँ एक उदाहरण देना पर्याप्त होगा कि चीन जहाँ भारत को औद्योगिक, टेक्नीकल, टेलीकॉम, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल आदि उत्पादों को निर्यात कर रहा है, वहीं भारत जो चीज़ें चीन भेजता हैं उनमें हीरा, ताँबा, कपास और ज़िंक मुख्य हैं.

मोदी सरकार ने क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाने के लिए दो महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण की घोषणा की थी- एक्ट ईस्ट पॉलिसी और नेबरहुड फ़र्स्ट. नेबरहुड फ़र्स्ट का तो कुछ हुआ नहीं, पर भारत और पाकिस्तान की खींचतान में सार्क जैसे महत्वपूर्ण मंच की बलि दे दी गयी. इसके बरक्स और बिना पाकिस्तान क्षेत्रीय सहयोग को धार देने के लिए 1997 से शुरू हुई, पर निष्क्रिय हो चुकी पहल बिम्सटेक को सक्रिय करने की क़वायद शुरू हुई. इसमें बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल और श्रीलंका जैसे सार्क देशों के साथ आसियान के दो देश- म्यांमार और थाईलैंड भी हैं. इस पहल से चीन को भी जोड़ा गया. गाजे-बाजे के साथ बैठकें और शिखर सम्मेलन हुए तथा बड़ी परियोजनाओं की घोषणा हुई, और फिर सब मामला ठंडे बस्ते में चला गया. अब भारत में शोर यह है कि पड़ोसी देशों में चीन का वर्चस्व बढ़ रहा है तथा चीन भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है. चीन ने इन देशों को अपनी वृहत बेल्ट-रोड परियोजना से जोड़ने में भी सफल रहा है.

बेल्ट-रोड परियोजना की बात चली है, तो यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि भारत भले ही आधिकारिक रूप से इस परियोजना में शामिल नहीं है, लेकिन परोक्ष रूप वह इस पहल का हिस्सा है. राजनीतिक या कूटनीतिक रूप से इस सच को स्वीकार नहीं करने के उचित कारण हैं क्योंकि इस परियोजना का विस्तार पाकिस्तान में है और आर्थिक गलियारे के हिस्से के तौर पर बड़े पैमाने पर पाक-अधिकृत कश्मीर में भी निर्माण हो रहे हैं. तिब्बत और चीन के बीच यातायात इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित किया गया है, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा के नज़दीक है. लेकिन इस परियोजना से गहरे जुड़े संस्थाओं में भारत की भागीदारी है. यह ठीक भी है क्योंकि इससे निवेश और निर्यात में मदद मिलती है. ब्रिक्स और शंघाई सहयोग का भारत सदस्य है ही. बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारा भी इसी परियोजना का हिस्सा है. दोनों देश श्रीलंकाई परियोजनाओं में आपसी सहमति से सहयोग बढ़ा सकते हैं. अब कोशिश होनी चाहिए कि अपने हितों को देखते हुए इस परियोजना में आधिकारिक भागीदारी की संभावना पर विचार हो.

इस संबंध में ईरान के चाबहार बंदरगाह का उल्लेख ज़रूरी है. भारत के सहयोग से शुरू हुई यह परियोजना अमेरिकी पांबंदियों तथा भारतीय निवेश की कमी से अधर में लटकी है. उस पर भारत को ध्यान देना चाहिए. चीन की नज़र इस परियोजना पर है और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने ईरान और चीन की नज़दीकी बढ़ायी है. यदि चाबाहार से भारत किनारे होता है, जैसा कि अभी है, तो इसमें भागीदारी कर चीन ग्वादर बंदरगाह के साथ बड़ी रणनीतिक बढ़त ले लेगा और अफ़ग़ानिस्तान व मध्य एशिया में पहुंचाने की भारतीय आकांक्षाओं को बहुत नुक़सान होगा. इस बंदरगाह से एक बड़ा गलियारा भी जुड़ता है, जिससे ईरान के अलावा आर्मेनिया, रूस, अफ़ग़ानिस्तान और यूरोप का रास्ता बनता है. मुंबई से चाबाहार की दूरी 15 सौ किलोमीटर से भी कम है. यह अनुमान लगाना बहुत आसान है कि उस बंदरगाह के माध्यम से भारत अपने व्यापार को बड़ी ऊँचाई दे सकता है. सवाल यह है कि अमेरिका के मोहपाश से निकलकर भारत फिर से चाबाहार को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करेगा या नहीं. अमेरिकी पाबंदियों के चलते ईरान से तेल आयात रोक कर भारत ने अपना बहुत नुक़सान कर लिया है. कूटनीतिक रूप से भी यह बड़ा झटका है. संक्षेप में कहें, तो भारत अपनी नीतिगत कमज़ोरी की वजह से कई मोर्चों पर चीन के लिए ख़ुद ही जगह छोड़ता जा रहा है और दूसरी ओर वह चीन से संबंध भी रखना चाहता है.

गलवान की घटना भयानक है और भारत को अपनी शिकायत को कड़ाई से चीन के सामने रखना चाहिए, लेकिन इस घटना के आधार पर चीन से दूरी बनाना अपने दीर्घकालिक हितों पर कुठाराघात करना होगा. विवादों के बावजूद कई क्षेत्रों में बड़े सहयोग की गुंजाइशें हैं, अनेक परियोजनाओं पर या तो सहमति बन चुकी है या उस दिशा में बातचीत आगे बढ़ी है. दोनों देशों को उनके ऊपर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. मौजूदा दुनिया में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के साथ अर्थापूर्ण सहयोग से दोनों देश अपने प्रभाव का विस्तार कर सकते हैं. लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? आधुनिक चीनी इतिहास के अध्येता अरुणाभ घोष ने एक ताज़ा साक्षात्कार में एक महत्वपूर्ण बात का रेखांकन किया है. उनका कहना है कि ‘राष्ट्रीय हित’ पर संकीर्ण प्राथमिकता ने भारतीय सोच पर राज्य के एजेंडे और नौकरशाही के व्यवहार को हावी कर दिया है. घोष ने उचित ही कहा है कि चीन के बारे में ठोस अध्ययन के अभाव, ख़ासकर 1962 की लड़ाई के बाद, में सरकारी दृष्टि प्राथमिक बन गयी है. इसका परिणाम यह हुआ है कि हम चीन को लेकर बहुत कम जानते और समझते हैं तथा जो जानते और समझते हैं, वह मुख्य रूप से अंग्रेज़ीभाषी दुनिया की सोच से निर्धारित होता है. जिस तरह से गलवान पर चर्चा हुई है और हो रही है, उसे देखते हुए हम घोष की चिंता को आसानी से समझ सकते हैं.



 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कूटनीतिक मामलों के जानकार हैं।

 



 

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