जब देशद्रोही ही ढूंढ़ने हैं तो विपक्ष और विरोधी ही क्यों? अख़बार और मीडिया से क्यों नहीं?

 आइए, देखिये, पढ़िये और बताइए यह देशद्रोह नहीं है? 

मीडिया का हाल यह है कि गुजराती ठग के दिल्ली के पते की पुष्टि या खंडन नहीं है 

 

आज के मेरे सभी अखबारों में पंजाब में सरकारी कार्रवाई को प्रमुखता से छापा गया है जबकि कश्मीर में गुजराती ठग का मामला सिर्फ द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। द टेलीग्राफ के अनुसार, कांग्रेस ने पूछा है कि ठगमामला चूक है साजिश। अंग्रेजी के इस शीर्षक में ठग के लिए कॉनमैन लिखा गया है और उसे इनवर्टेड कॉमा में रखा गया है। इसका मकसद अक्सर यह बताना होता है कि हम जिसकी बात कर रहे हैं वह असल में कॉनमैन यानी ठग नहीं भी हो सकता है। इस तरह, द टेलीग्राफ ने तो पहले पन्ने के लिए खबरों के चयन में इसे भी शामिल किया है जबकि दूसरे अखबारों में यह पहले पन्ने पर नहीं है। 

द टेलीग्राफ की आज की लीड अदानी पर है और गौतम अदानी की फोटो से शीर्षक में अदानी नहीं होने के बावजूद समझ में आ जाता है कि सरकार की कोशिश के बावजूद द टेलीग्राफ ने इस मुद्दे को नहीं छोड़ा है जबकि दूसरे अखबारों में इस मामले को प्रमुखता नहीं मिल रही है। लगभग वैसे ही जैसे सरकार विरोधी खबर को नहीं मिलती है। आज के अखबारों की खबरों और उनकी प्रस्तुति के जरिए मैं बताना चाहता हूं कि देश के अखबार ही जब देश हित में या यूं ही अपना काम ढंग से नहीं कर रहे हैं तो स्वयंभू देशभक्त पार्टी दूसरों को देशविरोधी कैसे कह सकती है। 

कहने की जरूरत नहीं है कि अदानी का मामला अखबार में छापना सरकार विरोध जरूर है देशविरोध नहीं है। इसी तरह, राहुल गांधी का मामला सरकार या सत्तारूढ़ दल और उसके समर्थकों ने भले देश विरोधी प्रचारित कर रखा हो पर ऐसा है नहीं। इसलिए राहुल विरोधी या सरकार समर्थक अखबार में भी राहुल गांधी की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। सरकार कुछ करेगी या संसद में कुछ होगा तो फिर भले पहले पन्ने पर चला आये। कायदे से अखबारों को अभी तक बता देना चाहिए था कि राहुल गांधी ने लंदन में क्या कहा या वह नहीं कहा जो प्रचारित किया जा रहा है। खबरों का ऐसा बुरा हाल पहले कभी नहीं हुआ। इमरजेंसी में भी बता दिया जाता था कि यहां की खबर सेंसर हो गई।  

सोशल मीडिया पर मुझे तवलीन सिंह के लिखे में से इस आशय का एक अंश जरूर दिखा पर वह अखबारों में प्रमुखता से नहीं है। इतनी प्रमुखता से तो नहीं ही कि सोमवार को राहुल गांधी मुद्दा नहीं रहेंगे। यह सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी जिस ढंग से काम कर रही है उसमें राहुल गांधी का मुद्दा खत्म होते ही अदानी का मुद्दा सामने आ जाएगा और ऐसा शायद कोई चाहता नहीं है इसलिए ज्यादातर अखबारों में ना तो राहुल गांधी के समर्थन में खबर है और न अदानी या सरकार के विरोध में। मीडिया का काम निष्पक्ष (अब संतुलित कहा जाता है) रहकर खबरें छापना है पर मीडिया अपना काम ठीक से नहीं कर रहा है। आइए बताता हूं कि कैसे और यह भी कि ऐसा क्यों जरूरी है।  

अखबारों में जो छपा है उससे यह स्पष्ट है कि गौतम अदानी का मामला मोटा मोटी यही है कि सरकार ने उनका भरपूर साथ दिया, इससे उनकी पूंजी काफी बढ़ गई थी और वे अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार से भारी राशि जुटाना चाहते थे। ऐन मौके पर हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट आ गई जिसमें सरकारी सहायता से की गई गड़बड़ियों की चर्चा है और इससे अदानी समूह के शेयरों में भारी कमी आई। विदेशी बाजार से पूंजी जुटाने की कोशिश को रोकना पड़ा और अडानी की संपत्ति काफी कम हो गई है। सरकार को बिना मांगे स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए थी लेकिन मांग करने पर भी जेपीसी की जांच नहीं बैठाई जा रही है। 

सुप्रीम कोर्ट ने जरूर जांच के आदेश दिए हैं। उससे संबंधित सरकार की चाल को द टेलीग्राफ ने आज छापा है पर दूसरे अखबारों (के पहले पन्ने) से यह मामला गायब है। अखबारों यानी मीडिया का काम (विज्ञापन लेकर भी) सिर्फ सरकार का प्रचार करना नहीं है। उसे सरकार की आलोचना भी करनी है, खामिया भी बतानी है ताकि जनता अपने लिए अच्छी सरकार या जनप्रतिनिधियों का चयन कर सके। अगर मीडिया ऐसा नहीं कर रहा है, तो सरकार के साथ जनता का काम है कि वह इस स्थिति को दुरुस्त करे, इसकी मांग करे। पर सरकार है कि अपने विरोधियों को एक-एक करके निपटाने में लगी हुई है और उसका भी विरोध नहीं हो रहा है। विरोध तो छोड़िये सच भी नहीं बताया जा रहा है। 

उदाहरण के लिए, द टेलीग्राफ ने आज बताया है कि गृहमंत्री अमित शाह की कोशिशों को कांग्रेस ढंकने-पोतने की कोशिश के रूप में देखती है और अदानी मामले की जांच कराने की सुप्रीम कोर्ट की कोशिश या उसके विस्तार पर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कहा है। वास्तविकता जब यह है कि सरकार राहुल गांधी पर झूठा आरोप लगाकर संसद नहीं चलने दे रही है, उनसे माफी मांगने के लिए कह रही है लेकिन माइक बंद हो जा रहा है और उनका कथित आरोप इसी से साबित हो जा रहा है तो मीडिया का काम है कि देश को सच बतायें। लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे हैं और इसे सामान्य माना जा रहा है। क्योंकि बहुसंख्यक हिन्दुओं से भरे मीडिया संस्थान को हिन्दुत्व की समर्थक सरकार का समर्थन करना है। लेकिन खालिस्तान का समर्थन करने वालों का विरोध करना है या किया जाना चाहिए। अखबार ऐसा करें तो यह अपनी स्थिति का लाभ उठाना नहीं है? अपने काम से भटकना नहीं है? इसपर आने से पहले अदानी मामले में सरकार की स्थिति बता दूं।  

नई दिल्ली डेटलाइन से संजय के. झा की बाईलाइन वाली खबर इस प्रकार है : कांग्रेस ने गृह मंत्री अमित शाह पर भ्रामक धारणा बनाने का आरोप लगाया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति अदानी समूह के खिलाफ सभी आरोपों की जांच करेगी। पार्टी ने कहा है कि अदानी समूह के खिलाफ सभी आरोपों की जांच के लिहाज से समिति का काम और दायरा सीमित है और मुख्य चिंताएँ अलग रह गई हैं। शाह ने 17 मार्च 2023 को एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि अडानी समूह से संबंधित किसी भी गलत काम के सबूत के साथ कोई भी इसे शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र है। यह समिति 2 मार्च को बनाई गई थी।

कांग्रेस संचार प्रमुख जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री से पूछा है: “आपके करीबी राजनीतिक सहयोगी और गृह मंत्री भारत के लोगों को गुमराह क्यों कर रहे हैं? विशेषज्ञ समिति के काम की सीमा और दायरे को गलत तरीके से पेश करके, क्या आप दोनों लीपने-पोतने-ढंकने का आधार तैयार कर रहे हैं?” जयरमेश ने आगे कहा: “विशेषज्ञ समिति के दायरे में आपके (प्रधानमंत्री) खिलाफ मुख्य आरोप शामिल नहीं है: कि आपने किसी भी कीमत पर अपने करीबी और फाइनेंसर गौतम अडानी को अमीर बनाने की कोशिश की है; आपने नियामकों और जांच एजेंसियों पर अपने साथियों के घोर गलत काम पर आंख मूंदने के लिए दबाव डाला है।” इन कामों में शेल कंपनियों के माध्यम से मनी-लॉन्ड्रिंग और चीनी नागरिकों के साथ संदिग्ध संबंध, अन्य बातों के अलावा, चीन और पाकिस्तान-संबद्ध उत्तर कोरिया के साथ अवैध व्यापार आदि शामिल हैं। 

“और यह कि आपने उपभोक्ताओं और करदाताओं की कीमत पर बंदरगाहों, हवाई अड्डों, रक्षा और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में एकाधिकार देकर केंद्र, राज्य सरकारों तथा विदेशी सरकारों को भी व्यापार का मुंह अदानी समूह की ओर करने के लिए मजबूर किया है।” विशेषज्ञ समिति का काम है: हाल के दिनों में प्रतिभूति बाजार में अस्थिरता पैदा करने वाले प्रासंगिक कारकों सहित स्थिति का समग्र मूल्यांकन प्रदान करना; निवेशक जागरूकता को मजबूत करने के उपाय सुझाना; अदानी समूह या अन्य कंपनियों के संबंध में प्रतिभूति बाजार से संबंधित कानूनों के कथित उल्लंघन से निपटने में नियामक विफलता की जांच करने के लिए; (i) वैधानिक और/या नियामक ढांचे को मजबूत करना (ii) निवेशकों की सुरक्षा के लिए मौजूदा ढांचे का सुरक्षित अनुपालन। जयराम रमेश ने कहा है कि इस समिति का बाजार नियामक सेबी या किसी अन्य जांच एजेंसी की भूमिका पर जांच का कोई औपचारिक क्षेत्राधिकार नहीं है। 

जाहिर है, यह खबर अपने आप में मुकम्मल है और सरकार का विरोध नहीं करना हो या सरकार का समर्थन करना हो तभी इसे नहीं छापने का कोई कारण है। ऐसे में जाहिर है कि जिन अखबारों ने इस खबर को नहीं छापा है, पूरा नहीं छापा है और प्रमुखता नहीं दी है वे सरकार के काम और तरीके का समर्थन कर रहे हैं जो उनका काम नहीं है। यह देशहित में तो नहीं ही है सरकार हित में भले हो। और अगर कोई देश हित का अपना काम नहीं करे तो उसे देशद्रोही क्यों न कहा जाए या वह कैसे नहीं है। आप जानते हैं कि कोई सरकार से डरता है या समझदार नहीं है – यह कानून में बचने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं। बाकी आप तय कीजिए। मैं दूसरी खबर पर आता हूं। 

आज की दूसरी प्रमुख खबर है, अमृतपाल की इकाई पर पंजाब पुलिस की कार्रवाई, 78 गिरफ्तार (हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड के शीर्षक का अनुवाद)। टाइम्स ऑफ इंडिया में इसी खबर के शीर्षक का अनुवाद कुछ इस तरह होगा, अमृतपाल फरार, पंजाब पुलिस ने जोरदार ढंग से पीछा किया, चकमा देने में कामयाब। द हिन्दू का शीर्षक है, पंजाब पुलिस ने खालिस्तान समर्थक उपदेशक / प्रचारक अमृतपाल सिंह की तलाश शुरू की, 78 गिरफ्तार। इंडियन एक्सप्रेस में फ्लैग शीर्षक है, वारिस पंजाब दे पर हमला, मुख्य शीर्षक है, पुलिस अमृतपाल के करीब पहुंची तो पंजाब पर सुरक्षा कवच, 78 गिरफ्तार। द टेलीग्राफ में यही शीर्षक है, खालिस्तान (का) उपदेशक / प्रचारक पुलिस की पकड़ से भागनिकला। यहां उपदेशक / प्रचारक महत्वपूर्ण है और उपदेश देना या प्रचारक होना गैर कानूनी भी नहीं है।        

कहने की जरूरत नहीं है कि शीर्षक में विविधता शीर्षक लगाने की स्वतंत्रता, किसी एक व्यक्ति (या समूह) का निर्देश मानने की मजबूरी न होने या इस संबध में कोई आदेश न होने या शीर्षक लगाने के लिए कार्रवाई होने का डर नहीं होने के कारण ही है। इसकी अपनी अच्छाई या बुराई है। लेकिन मीडिया को आजादी है तो उसका काम देशहित क्यों न हो। लेकिन मीडिया जब गुलाम होने की हद तक सेवा कर रहा हो तो उससे देशहित की बात कौन करे और कब करें। अभी तो देशहित का मतलब घोषित रूप से भाजपा सरकार का समर्थन है और विरोध करने वाले मौका ढूंढ़ते हैं। ऐसे में शीर्षक और खबर लिखने की शैली भी प्रभावित या पूर्वग्रहपूर्ण हो सकती है। मेरा मानना है कि पूर्वग्रह उतना बुरा नहीं है जितना देशद्रोह। 

खालिस्तान का मामला संवेदनशील है और हम जानते हैं कि समय पर नियंत्रित नहीं किया गया तो उसके क्या नुकसान हुए और यह नुकसान किसी व्यक्ति, पार्टी, संगठन, नीति या परिवार का नहीं, देश का ही था। अब जब वही ताकतें फिर सिर उठा रही लगती हैं तो उसे कायदे से नियंत्रित करने की जरूरत है और जाहिर है इसकी जरूरत समझने से ज्यादा इसके लिए योग्यता और कौशल की आवश्यकता है। मीडिया को सीख अगर दी जा सकती है तो दी जानी चाहिए कि इसमें देश विरोध न हो। लेकिन हिन्दुओं की बहुलता वाले इलाके को अगर हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग और कोशिश हो सकती है तो सिखों की बहुलता वाले इलाके को खालिस्तान घोषित करने की मांग उसका साइड इफेक्ट है। हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग करने वालों को या इस इलाज का चुनाव करने वालों को इस साइड इफे्क्ट का भी ख्याल रखना चाहिए। लेकिन डॉक्टर योग्य या सक्षम होता (या जरूरत होती) तो यह मामला 47 में क्यों चूकता औऱ चूक गया तो 70 साल क्यों लगते

इसलिए मेरा मानना है कि हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए जो इलाज चल रहा है उसके साइड इफेक्ट से निपटने की व्यवस्था नहीं है और इसे देशवासियों को देखना-समझना और डॉक्टर बदलना या इलाज बदलना है। फिलहाल यह तो तय है कि पुलिस कार्रवाई से मामला दबने वाला होता तो नई पीढ़ी फिर सिर क्यों उठाती। मैंने अरिदमन जीत सिंह और नयनी सिंह की किताब, ऐट वार फोर पिल्लर्स ऑफ फाल्सहुड एंड पबलिक ऑफ रिपबलिक का अनुवाद किया है और जानता हूं कि खालिस्तान आंदोलन को कैसे नियंत्रित किया गया था। लेखकों में एक, अरिदमन सिंह उस समय सीमा सुरक्षा बल में अधिकारी थे और बाद में नौकरी छोड़ दी। अब विदेश में रहते हैं। किताब का उल्लेख इसी लिए और इसके नाम के भाग, फोर पिल्लर्स ऑफ फाल्सहुड एंड पबलिक ऑफ रिपबलिक के लिए कर रहा हूं। हिन्दी में इसका मतलब हुआ छद्म या पाखंड के चार स्तंभ और गणराज्य की जनता। निश्चित रूप से यह भारत के बारे में है और इसकी कोई चर्चा नहीं है। 

किताब जो कहती है वह तो पढ़कर ही समझ में आएगा और यह पुरानी किताब अब शायद ही मिले पर मुद्दा यह है कि उस समय भी चारो स्तंभ छद्म या पाखंड के बताये गए थे और तभी वह हाल हुआ था। आपको लगे कि नियंत्रित हो गया पर नुकसान का आपको पता नहीं है। मामला इतना गंभीर है कि जो पीढ़ी नहीं जानती वह फिर मोर्चा लेने के लिए तैयार है। मुझे नहीं लगता कि इसे लाठी-डंडे से रोका जा सकता है। इस पर बातचीत-चर्चा होनी चाहिए जो मीडिया को करना है लेकिन किसे परवाह है और मेरे ख्याल से यह देशद्रोह है। जिसे अपनी कुर्सी की ही फिक्र है आबादी के एक बड़े वर्ग की चिन्ता नहीं है वह देशद्रोही है। सबको इस दिशा में अपना काम करना चाहिए। जिसे करवाना है उसे भी सक्रिय होना चाहिए पर ऐसा है नहीं और यह गंभीर बात है।

अब संक्षेप में एक तीसरी बड़ी खबर की चर्चा करके इस टिप्पणी को समाप्त करूंगा। तीसरी खबर कश्मीर में गुजराती ठग का मामला है। यह खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से आई ही नहीं जबकि पहले दिन सिर्फ इसलिए आनी चाहिए थी कि गिरफ्तारी के बाद कई दिनों तक मीडिया को हवा नहीं लगी। जाहिर है, सरकार ने बताया नहीं और मीडिया को पूछना चाहिए था कि इतना बड़ा मामला बताया क्यों नहीं और नहीं बताया तो लो अब सब पहले पन्ने पर। लेकिन इतनी हिम्मत आज के संपादकों-मालिकों-एंकरों को नहीं है। उन्हें भी बेटे की शादी में राजा-महाराजा के आने से खुशी होती है और समाज को बताना होता है कि दलाल हूं तो क्या हुआ तुमसे बेहतर हूं। 

आलम यह है कि इस गंभीर मामले में जो व्यक्ति के पूरी तरह ठग होने का नहीं लगता है – कोई एक्सक्लूसिव खबर नहीं है जो दिल्ली से ही होनी है। एक्सक्लूसिव तो छोड़िये, कांग्रेस ने पूछा है कि ठग का मामला चूक है या साजिश – यह भी किसी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है जबकि कश्मीर पुलिस और व्यवस्था की साख बनाए रखने के लिए यह बताया जाना चाहिए कि चूक कहां, कैसे और क्यों हुई। जिसकी जिम्मेदारी थी उसके खिलाफ कार्रवाई हो गई और अब ऐसा नहीं हो इसके लिए व्यवस्था कर ली गई है लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। दूसरी ओर, अशोक स्तंभ के साथ किरण पटेल के विजिटिंग कार्ड में लुटियन की दिल्ली का जो पता लिखा है वह सही है कि नहीं – अभी तक कंफर्म नहीं है, वह घर है कि नहीं से लेकर किसका है, वह वहां रहता है कि नहीं, पते से लगता है (बहुत संभावना है) कि वह घर सरकारी होगा, अगर नहीं है तो सरकारी स्तर पर तुरंत खंडन कर दिया जाना चाहिए, अगर वहां रहता ही नहीं था तो इसे जांचना और बताना कोई मुश्किल नहीं है और इससे किरण पटेल के ठग होने की आशंका बढ़ती पर सरकार का प्रचार करने वालों ने सरकार के पक्ष में इतना भी नहीं किया है। 

इसके दो कारण हो सकते हैं – 1) घर सरकारी हो और आवंटन उसी के नाम पर हो 2) ऐसे मामलों में कुछ भी लिखने बोलने की आजादी नहीं होना। इस मामले में छिपुट खबरें तो हैं लेकिन सरकारी बयान या उसके आधार पर कोई खबर नहीं मिल रही है। मुझे नहीं पता मामला क्या है और कितना गहरा। लेकिन समझ यही है कि यह बता देना कि कार्ड में उल्लिखित 30 मीना बाग, नई दिल्ली का फ्लैट सरकारी नहीं है, किरण पटेल वहां नहीं रहता था, पता गलत है आदि इस मामले से संबंधित बहुत सारे रहस्य खोल देगा और इसे जांचना बहुत आसान है पर वह भी नहीं किया गया है। वैसे तो यह काम फोन पर भी हो सकता है लेकिन जो हालत है उसमें किसी ने दो चार फोन मिलाए और पुलिस (सीबीआई) यही पूछने आ गई कि किस लिए फोन कर रहे थे, आपको जानने की क्या जरूरत है और फिर ईडी ने कह दिया कि खबर है कि आपने उससे पैसे लिए हैं और रिश्तेदारों के यहां छापे पड़ने लगे तो डराने का काम तो हो ही जाएगा। 

इसलिए कोई और यह काम करेगा नहीं, मीडिया वाले नहीं कर रहे हैं तो देशद्रोह नहीं है? ऐसे में जो पत्रकारिता हो रही है वह देशद्रोह भले न हो चौकीदार का चोर होना या चौकीदारी के लिए रखे गए कुत्ते का भूंकना बंद कर देना तो है ही। इलाज जरूरी है। 

  

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

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