“हम मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों के गवाह बन रहे हैं!”

भारत की हालत पर हमें कुछ याद दिलाते हुए अरुंधति रॉय लिखती हैं- उन्होंने भीड़ को उकसाया. “गांव में अगर कब्रिस्तान बनता है तो गांव में श्मशान भी बनना चाहिए,” उन्होंने कहा. “श्मशान! श्मशान!” मंत्रमुग्ध, भक्त भीड़ में से जवाबी गूंज उठी. शायद वे अब खुश हों कि भारत के श्मशानों से सामूहिक अंतिम संस्कारों से उठती लपटों की तकलीफदेह तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्ने पर आ रही हैं. और कि उनके देश के सारे कब्रिस्तान और श्मशान ढंग से काम कर रहे हैं, अपनी-अपनी आबादियों के सीधे अनुपात में, और अपनी क्षमताओं से कहीं ज्यादा. नीचे पढ़िये द गार्जियन में छपे लेख का अनुवाद-

कुछ दिन पहले लंदन के मशहूर द गार्जियन में भारत की प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय का यह महत्वपूर्ण लेख छपा था। पेश है इसका हिंदी अनुवाद-  संपादक

 

उत्तर प्रदेश में 2017 में सांप्रदायिक रूप से एक बहुत ही बंटे हुए चुनावी अभियान के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब मैदान में उतरे तो हालात की उत्तेजना और बढ़ गई. एक सार्वजनिक मंच से उन्होंने राज्य सरकार पर – जो एक विपक्षी दल के हाथ में थी – आरोप लगाया कि वह श्मशानों की तुलना में कब्रिस्तानों पर अधिक खर्च करके मुसलमानों को खुश कर रही है. अपने हमेशा के हिकारत भरे अंदाज में, जिसमें हरेक ताना और चुभती हुई बात एक डरावनी गूंज पर खत्म होने से पहले, वाक्य के बीच तक आते-आते एक चरम सुर पर पहुंच जाती है. उन्होंने भीड़ को उकसाया. “गांव में अगर कब्रिस्तान बनता है तो गांव में श्मशान भी बनना चाहिए,” उन्होंने कहा.

“श्मशान! श्मशान!” मंत्रमुग्ध, भक्त भीड़ में से जवाबी गूंज उठी.

शायद वे अब खुश हों कि भारत के श्मशानों से सामूहिक अंतिम संस्कारों से उठती लपटों की तकलीफदेह तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्ने पर आ रही हैं. और कि उनके देश के सारे कब्रिस्तान और श्मशान ढंग से काम कर रहे हैं, अपनी-अपनी आबादियों के सीधे अनुपात में, और अपनी क्षमताओं से कहीं ज्यादा.

“क्या 1.3 अरब आबादी वाले भारत को अलग-थलग किया जा सकता है?” यह रेटरिकनुमा सवाल वाशिंगटन पोस्ट ने हाल में अपने एक संपादकीय में किया, जो भारत की फैलती जा रही तबाही और नए, तेजी से फैलने वाले कोविड वेरिएंट को राष्ट्रीय सीमाओं में सीमित करने की मुश्किलों के बारे में था. “आसानी से नहीं,” इसका जवाब था. इसकी बहुत कम संभावना है कि यह सवाल ठीक इसी रूप में पूछा गया होता जब कोरोनावायरस महज कुछ महीनों पहले ब्रिटेन और यूरोप में तबाही मचा रहा था. लेकिन भारत में हम लोगों को इसका बुरा मानने का अधिकार बहुत कम है, इसकी वजह हैं इस साल विश्व आर्थिक फोरम में कहे गए हमारे प्रधानमंत्री के शब्द.

मोदी ने एक ऐसे समय भाषण दिया था जब यूरोप और संरा अमेरिका के लोग वैश्विक महामारी की दूसरी लहर के चरम (पीक) की तकलीफ से गुजर रहे थे. प्रधानमंत्री के पास कहने के लिए हमदर्दी का एक शब्द नहीं था, सिर्फ भारत के आधारभूत ढांचे और कोविड संबंधी तैयारियों के बारे में एक लंबी, शेखी से भरी हुई आत्म-संतुष्टि थी. मैंने भाषण को डाउनलोड कर लिया, क्योंकि मुझे डर है कि जब मोदी हुकूमत इतिहास को फिर से लिखेगी, जो जल्दी ही होगा, तो यह भाषण गायब हो सकता है या इसको खोजना मुश्किल हो जाएगा. ये रहीं कुछ बेशकीमती झलकियां:

“साथियो तमाम आशंकाओं के बीच आज मैं आप सभी के सामने 1.3 बिलियन से ज्यादा भारतीयों की तरफ से दुनिया के लिए विश्वास, सकारात्मकता और उम्मीद का संदेश लेकर के आया हूं…भविष्यवाणी की गई थी कि पूरी दुनिया में कोरोना से सबसे प्रभावित देश भारत होगा. कहा गया कि भारत में कोरोना संक्रमण की सुनामी आएगी, किसी ने 700-800 मिलियन भारतीयों को कोरोना होने की बात कही तो किसी ने 2 मिलियन से ज्यादा लोगों की मृत्यु का अंदेशा जताया था.”

“साथियो भारत की सफलता को किसी एक देश की सफलता से आंकना उचित नहीं होगा. जिस देश में विश्व की 18% आबादी रहती हो उस देश ने कोरोना पर प्रभावी नियंत्रण करके पूरी दुनिया को मानवता को बड़ी त्रासदी से भी बचाया है.”

जादूगर मोदी ने कोरोनावायरस पर प्रभावी नियंत्रण करते हुए मानवता को बचाने के लिए तारीफें बटोरीं. अब जब यह पता चला है कि वे उसे नियंत्रित नहीं कर पाए, तो क्या हम इसकी शिकायत कर सकते हैं कि क्यों हमें ऐसे देखा जा रहा है मानो हम रेडियोएक्टिव हों? कि दूसरे देशों ने सीमाएं बंद कर दी हैं और फ्लाइटें रद्द की जा रही हैं? कि हमें अपने वायरस और अपने प्रधानमंत्री के साथ सीलबंद किया जा रहा है, सारी बीमारी, सारे विज्ञान विरोध, नफरत और बेवकूफी के साथ जिसकी वे, उनकी पार्टी और इस किस्म की राजनीति नुमाइंदगी करती है?

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पिछले साल जब पहली बार कोविड भारत आया और शांत पड़ गया, तब सरकार और इसके हिमायती जुमलेबाज कामयाबी का जश्न बन रहे थे. “भारत में पिकनिक नहीं हो रही है,” शेखर गुप्ता ने ट्वीट किया था, जो ऑनलाइन समाचार वेबसाइट प्रिंट के प्रधान संपादक हैं. “लेकिन हमारी नालियां लाशों से भरी हुई नहीं हैं, अस्पतालों में बिस्तरों की कमी नहीं है, न ही श्मशानों और कब्रिस्तानों में लकड़ी और जगह की कमी है. यकीन नहीं होता? अगर नहीं मानते तो डाटा ले आइए. सिवाय इसके कि आप सोचते हों कि आप भगवान हैं.” इसकी संवेदनहीन, अशिष्ट ज़ुबान को जाने दें – क्या हमें यह बताने के लिए एक भगवान की जरूरत है कि ज्यादातर महामारियों की एक दूसरी लहर होती है? इस लहर का पूर्वानुमान लगाया गया था, हालांकि इसकी तेज़ी ने वैज्ञानिकों और वायरस विज्ञानियों तक को हैरान कर दिया है. तो कहां है वह कोविड-संबंधी बुनियादी ढांचा और वायरस के खिलाफ “जनता के आंदोलन” जिनकी शेखी मोदी ने अपने भाषण में बघारी थी? अस्पताल में बेड उपलब्ध नहीं हैं. डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ पस्त होने की कगार पर हैं. दोस्त फोन करके ऐसे वार्डों की दास्तान सुनाते हैं जहां कोई स्टाफ नहीं है और जहां जिंदा मरीजों से ज्यादा मुर्दा हैं. लोग अस्पताल के गलियारों में, सड़कों पर या अपने घरों में मर रहे हैं. दिल्ली में श्मशानों के पास लकड़ी खत्म हो गई है. वन विभाग को शहर के पेड़ों को काटने के लिए विशेष अनुमति देनी पड़ी है. हताश-परेशान लोग जो कुछ भी मिल रहा है उससे लाशें जला रहे हैं. पार्कों और कार पार्कों को श्मशान भूमि में तब्दील किया जा रहा है. ऐसा है मानो एक अदृश्य उड़नतश्तरी हमारे आसमान में खड़ी है, और हमारे फेफड़ों की हवा खींच रही है. इस किस्म का एक हवाई हमला जिसको हम कभी नहीं जानते थे.

भारत में बीमारी के एक नए शेयर बाजार में ऑक्सीजन एक नई करेंसी है. वरिष्ठ राजनेता, पत्रकार, वकील – भारत के अभिजात लोग – ट्विटर पर अस्पतालों के बेड और ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए फरियाद कर रहे हैं. सिलिंडरों का एक छुपा हुआ बाजार फल-फूल रहा है. ऑक्सीजन सैचुरेशन मशीनें और दवाएं मिलनी मुश्किल हैं.

बाजार कुछ और चीजों का भी है. मुक्त बाजार की तलहटी में, अपने प्रियजन की एक आखिरी झलक के लिए रिश्वत, जिन्हें अस्पताल के मुर्दाघर में लपेट कर और जमा करके रखा गया है. एक पुरोहित की बढ़ी हुई दक्षिणा जो अंतिम रस्मों के लिए राजी हुआ है. ऑनलाइन मेडिकल सलाहें, जिसमें परेशान परिवारों को बेरहम डॉक्टरों द्वारा लूटा जा रहा है. ऊपरी सिरे की तरफ, एक निजी अस्पताल में इलाज के लिए आपको अपनी जमीन, अपना घर तक बेचना पड़ सकता है, अपने आखिरी रुपए तक इसमें लगाने पड़ सकते हैं. आपको भर्ती करने पर उनके राजी होने से भी पहले, सिर्फ डिपॉजिट की रकम जुटाने भर में आपका परिवार पीढ़ियों तक पीछे धकेल दिया जा सकता है.

और यह सब उस सदमे, अफरातफरी, और सबसे बढ़ कर उस तौहीनी को पूरा-पूरा बयान नहीं करता है, जिसको लोग भुगत रहे हैं. मेरे एक नौजवान दोस्त टी के साथ जो हुआ वह दिल्ली की सैकड़ों और शायद हजारों ऐसी दास्तानों में से एक है. टी जो अपनी उम्र के तीसरे दशक में हैं, अपने मां-पिता के साथ दिल्ली के बाहर गाजियाबाद में एक छोटे से फ्लैट में रहते हैं. ये तीनों टेस्ट में कोविड पॉजिटिव पाए गए. उनकी मां गंभीर रूप से बीमार थीं. चूंकि अभी यह शुरुआती दिनों की बात थी, तो किस्मत से उनकी मां के लिए अस्पताल में एक बेड मिल गया. उनके पिता, जिनमें गंभीर बाइपोलर डिप्रेशन पाया गया है, हिंसक होने लगे और उन्होंने खुद को नुकसान पहुंचाना शुरू किया. उन्होंने सोना बंद कर दिया. वे खुद को गंदा कर लेते. उनकी मनोचिकित्सक उनकी ऑनलाइन मदद करने की कोशिश कर रही थीं, हालांकि वो भी कभी-कभी टूट जातीं क्योंकि उनके पति अभी-अभी कोविड से गुज़रे थे. उन्होंने कहा कि टी के पिता को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत थी, लेकिन चूंकि वे कोविड पॉजिटिव थे तो इसकी कोई संभावना ही नहीं थी. तो टी रात दर रात जागते हुए अपने पिता को शांत करते, गीले कपड़े से उनका शरीर पोंछते, साफ करते. हर बार जब मैंने उनसे बात की मुझे अपनी सांस लड़खड़ाती हुई लगी. आखिर में, मैसेज आया: “पिता गुजर गए.” वे कोविड से नहीं, बल्कि ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ जाने से मरे, जो भारी बेबसी के चलते पैदा हुए मानसिक उथलपुथल का नतीजा था.

उनकी देह का क्या किया जाए? मैंने हताशा में अपने हरेक जानने वाले को कॉल किया. जवाब देने वालों में एक अनिर्बाण भट्टाचार्य थे, जो जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर के साथ काम करते हैं. भट्टाचार्य 2016 में अपने विश्वविद्यालय कैंपस में एक विरोध कार्यक्रम के आयोजन में मदद करने के लिए राजद्रोह के एक आरोप में मुकदमे का सामना करने वाले हैं. पिछले साल के गंभीर कोविड संक्रमण से अभी पूरी तरह नहीं उबरे मंदर पर भी गिरफ्तारी का खतरा है और उनका अनाथालय बंद करा दिए जाने की आशंका है, जो वे तब से चलाते हैं जब उन्होंने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) और दिसंबर 2019 में पास किए गए सिटिज़नशिप संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ लोगों को एकजुट किया था. ये दोनों मुसलमानों के साथ खुलेआम भेदभाव करने वाले सरकारी कदम हैं. मंदर और भट्टाचार्य उन अनेक नागरिकों में से हैं, जिन्होंने किसी भी किस्म के शासन की गैरमौजूदगी में, हेल्पलाइनें और आपातकालीन मदद कायम की है, और एम्बुलेन्सों का इंतजाम, अंतिम संस्कारों की व्यवस्था और लाशों को लाने-ले जाने के काम में खुद को बेहाल कर लिया है. अपनी मर्जी से इस काम में लगे हुए ये लोग जो कर रहे हैं, वह उनके लिए सुरक्षित नहीं है. महामारी की इस लहर की चपेट में आने वालों में नौजवान लोग हैं, जो इन्टेन्सिव केयर यूनिटों में भरते जा रहे हैं. जब नौजवान लोग मरते हैं तो हममें से बुजुर्ग लोग जीने की ख्वाहिश ज़रा सी खो बैठते हैं.

टी के पिता का अंतिम संस्कार हुआ. टी और उनकी मां बीमारी से उबर रहे हैं.

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चीजें आखिरकार शांत होंगी. बेशक, वे होंगी. लेकिन हम नहीं जानते कि उस दिन को देखने के लिए हममें से कौन बचा रहेगा. अमीर आसानी से सांस लेंगे. गरीब नहीं ले पाएंगे. फिलहाल बीमार और मरने वाले लोगों में लोकतंत्र के निशान दिखते हैं. इसकी चपेट में आने वालों में अमीर भी हैं. अस्पताल ऑक्सीजन के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं. कुछ ने योजना शुरू की है कि अपना ऑक्सीजन खुद ले आएं. ऑक्सीजन संकट के नतीजे में राज्यों के बीच एक तीखी और गंदी लड़ाई शुरू हुई है, जब सियासी दल अपने ऊपर से इल्जाम हटाने की कोशिशें कर रहे हैं.

दिल्ली के सबसे बड़े निजी अस्पतालों में से एक सर गंगा राम अस्पताल में 22 अप्रैल की रात, हाई-फ्लो ऑक्सीजन पर रखे जा रहे गंभीर रूप से बीमार 25 कोरोनावायरस मरीज मर गए. अस्पताल ने अपनी ऑक्सीजन सप्लाई को फिर से भरने के लिए हताशा में भरे अनेक आपात संदेश भेजे. एक दिन के बाद, अस्पताल बोर्ड के अध्यक्ष हड़बड़ी में मामले को साफ करने आए: “हम यह नहीं कह सकते कि वे ऑक्सीजन सपोर्ट की कमी के चलते मरे हैं.” 24 अप्रैल को 20 और मरीजों की मौत हो गई, जब दिल्ली के एक और बड़े अस्पताल जयपुर गोल्डेन में ऑक्सीजन की सप्लाई खत्म हो गई. उसी दिन, दिल्ली उच्च न्यायालय में भारत के महाधिवक्ता तुषार मेहता ने भारत सरकार की तरफ से बोलते हुए कहा: “रोंदू बच्चा बनने से बचें…अब तक हमने यह सुनिश्चित किया है कि देश में कोई भी बिना ऑक्सीजन के नहीं था.”

उत्तर प्रदेश के भगवाधारी मुख्यमंत्री अजय मोहन बिष्ट ने, जो योगी आदित्यनाथ के नाम से जाने जाते हैं, ऐलान किया है कि उनके राज्य में किसी अस्पताल में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है और अफवाह फैलाने वालों को राष्ट्र सुरक्षा अधिनियम के तहत बिना जमानत गिरफ्तार किया जाएगा और उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी.

योगी आदित्यनाथ कोई बात हल्के में नहीं कहते. केरल के एक मुसलमान पत्रकार सिद्दीक कप्पन उत्तर प्रदेश में महीनों से जेल में बंद हैं, जब वे और दो दूसरे लोग हाथरस जिले में एक दलित लड़की के सामूहिक बलात्कार और हत्या की खबर देने वहां गए थे. कप्पन गंभीर रूप से बीमार हैं और कोविड पॉजिटिव पाए गए हैं. उनकी पत्नी ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास अपनी एक हताशा भरी याचिका में बताया है कि उनके पति को मथुरा में मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल में एक हॉस्पीटल बेड से “जानवरों की तरह” जंजीरों में बांध कर रखा गया है. (सर्वोच्च न्यायालय ने अब उत्तर प्रदेश सरकार को उन्हें दिल्ली में एक अस्पताल में ले आने का आदेश दिया है.) तो अगर आप उत्तर प्रदेश में रहते हैं, तो लगता है कि संदेश यह है कि अपने पर मेहरबानी करें और बिना शिकायत किए मर जाएं.

शिकायत करने वालों को खतरा उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है. फासीवादी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) – मोदी और उनके कई मंत्री जिसके सदस्य हैं और जो अपना खुद का हथियारबंद मिलिशिया चलाता है – के एक प्रवक्ता ने चेतावनी दी है कि “भारत-विरोधी ताकतें” इस संकट का उपयोग “नकारात्मकता” और “अविश्वास” की आग भड़काने में करेंगी और मीडिया से मांग की है कि वह “सकारात्मक माहौल” कायम करने में मदद करे. ट्विटर ने उनकी मदद करते हुए सरकार के प्रति आलोचनात्मक रुख रखने वाले अकाउंटों को डिएक्टिवेट कर दिया है.

दिलासा पाने के लिए हम किसी तरफ देखेंगे? विज्ञान के लिए? क्या हम आंकड़ों के भरोसे रहेंगे? कितनी मौतें? कितने ठीक हुए? कितने संक्रमित हुए? चरम (पीक) कब आएगा? 27 अप्रैल को 323,144 नए मामलों, 2,771 मौतों की खबर थी. आंकड़ों की यह सटीकता कुछ-कुछ भरोसा देती है. फर्क बस यह है – हमें कैसे पता? दिल्ली तक में टेस्ट करवा पाना बहुत मुश्किल है. कस्बों और शहरों में कब्रिस्तानों और श्मशानों में कोविड-प्रोटोकॉल के तहत होने वाले अंतिम संस्कारों की संख्या बताती है कि मौत के आंकड़े आधिकारिक गिनती से 30 गुना ज्यादा हैं. महानगरों के बाहर काम करने वाले डॉक्टर बता सकते हैं कि हालात कैसे हैं.

अगर दिल्ली टूट रही है, तो हमें कैसे कल्पना करनी चाहिए कि बिहार में, उत्तर प्रदेश में, मध्य प्रदेश में गांवों में क्या हो रहा है? जहां शहरों से करोड़ों मजदूर अपने साथ वायरस लिए हुए अपने परिवारों के पास अपने घर लौट रहे हैं, उनके जेहन में 2020 में मोदी के राष्ट्रीय लॉकडाउन की यादों का आतंक है. यह दुनिया का सबसे कठोर लॉकडाउन था, जिसको महज चार घंटों की सूचना पर लागू कर दिया गया था. इससे प्रवासी मजदूर बिना रोजगार के, रहने का किराया देने लायक पैसे के बिना, भोजन और यातायात के बिना, शहरों में फंस गए थे. कइयों को अपने दूर-दराज के गांवों में अपने घर पहुंचने के लिए सैकड़ों मील चलना पड़ा. सैकड़ों रास्ते में मर गए.

इस बार, हालांकि कोई राष्ट्रीय लॉकडाउन नहीं है, मजदूर अभी से चल पड़े हैं, जब यातायात अभी भी उपलब्ध है, जब ट्रेनें और बसें अभी भी चल रही हैं. वे चल पड़े हैं क्योंकि वे जानते हैं कि भले ही वे इस विशाल मुल्क की अर्थव्यवस्था का इंजन हैं, जब कोई संकट आता है तो इस प्रशासन की निगाहों में उनका कोई वजूद नहीं होता. इस साल के पलायन के नतीजे में एक अलग किस्म की गड़बड़ी हुई है: अपने गांवों के घरों में दाखिल होने से पहले उनके क्वारंटीन में रहने के लिए कोई सेंटर नहीं है. शहरों में फैले वायरस से गांवों को बचाने की कोशिश करने तक का कोई दिखावा तक नहीं किया जा रहा है.

ये वो गांव हैं जहां लोग आसानी से इलाज हो सकने वाली डायरिया और टीबी जैसी बीमारियों से मर जाते हैं. वे कोविड का सामना कैसे करेंगे? क्या उनके पास कोविड टेस्ट उपलब्ध है? क्या अस्पताल हैं? क्या वहां ऑक्सीजन है? उससे बढ़ कर, क्या प्यार है? प्यार को भूल जाइए, कोई चिंता भी है? नहीं है. क्योंकि जहां भारत का सार्वजनिक दिल होना चाहिए, वहां एक दिलनुमा एक खोखल है जिसमें एक सर्द बेपरवाही भरी हुई है.

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आज 28 अप्रैल को सुबह सवेरे खबर आई कि हमारे दोस्त प्रभुभाई नहीं रहे. मौत से पहले उनमें कोविड के जाने-पहचाने लक्षण दिखे थे. लेकिन उनकी मौत कोविड की आधिकारिक गिनती में दर्ज नहीं होगी क्योंकि बिना टेस्ट या इलाज के अपने घर पर उनकी मौत हुई.

प्रभुभाई नर्मदा घाटी में बांध विरोधी आंदोलन के दिग्गज थे. मैं केवड़िया में उनके घर पर कई बार रही हूं, जहां दशकों पहले आदिवासी लोगों के पहले समूह को उनकी जमीनों से उजाड़ दिया गया था ताकि वहां बांध-निर्माताओं और अफसरों की कॉलोनियां बसाई जा सकें. प्रभुभाई के परिवार जैसे उजड़े हुए परिवार अभी भी उस कॉलोनी के किनारे रहते हैं, बदहाल और अनिश्चित ज़िंदगी, उसी जमीन पर गैरकानूनी बाशिंदे जो कभी उनकी हुआ करती थी.

केवड़िया में कोई अस्पताल नहीं है. सिर्फ स्टेच्यू ऑफ यूनिटी है, जो स्वाधीनता सेनानी और भारत के पहले उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की है, जिनके नाम पर बांध का नाम रखा गया है. 182 मीटर ऊंची यह मूर्ति दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति है जिसकी लागत 42.2 करोड़ अमेरिकी डॉलर है. इसके भीतर लगी तेज रफ्तार लिफ्ट सरदार पटेल के सीने की उंचाई पर से नर्मदा बांध का नजारा कराने के लिए सैलानियों को ऊपर ले जाती है. बेशक आप नदी घाटी सभ्यता को नहीं देख सकते जो इस विशाल रिजर्वायर की गहराइयों में तबाह और डूबी हुई पड़ी है, या उन लोगों की कहानियां नहीं सुन सकते जिन्होंने दुनिया की जानकारी में सबसे खूबसूरत और गहन संघर्ष खड़ा किया – सिर्फ एक बांध के खिलाफ नहीं, बल्कि सभ्यता, खुशहाली और तरक्की के स्वीकृत विचारों के खिलाफ. मूर्ति मोदी की चहेती परियोजना थी. उन्होंने अक्बूतर 2018 में इसका उद्घाटन किया.

जिस दोस्त ने प्रभुभाई के बारे में मैसेज किया था, उसने नर्मदा घाटी में एक बांध विरोधी कार्यकर्ता के रूप में बरसों बिताए हैं. उसने लिखा: “यह लिखते हुए मेरे हाथ कांप रहे हैं. केवड़िया कॉलोनी में और आसपास कोविड के हालात भयानक हैं.”

भारत में कोविड का ग्राफ जिन सटीक आंकड़ों से बनता है, वे उस दीवार की तरह हैं जिसे अहमदाबाद की झुग्गियों को छुपाने के लिए बनाया गया था. इसलिए कि फरवरी 2020 में डोनॉल्ड ट्रंप उस रास्ते से होकर “नमस्ते ट्रंप” आयोजन में जाने वाले थे, जिसकी मेजबानी मोदी ने उनके लिए की थी. वे आंकड़े भयानक हैं, वे आपको उसकी तस्वीर दिखाते हैं कि भारत में किसकी अहमियत है, लेकिन यकीनी रूप में वे यह नहीं दिखाते कि भारत हकीकत में क्या है. भारत जो हकीकत में है, उसमें लोगों से उम्मीद की जाती है कि वे हिंदू के रूप में वोट डालें, लेकिन किसी नाचीज़ की तरह मर जाएं.

रोंदू बच्चा बनने से बचें.”

इस पर ध्यान देने से बचें कि अप्रैल 2020 में ही, और फिर नवंबर में खुद सरकार द्वारा बनाई गई एक समिति द्वारा ऑक्सीजन की खतरनाक कमी की संभावना जताई गई थी. इस पर सोचने से बचें कि दिल्ली के सबसे बड़े अस्पतालों के पास भी अपना ऑक्सीजन-जेनरेशन प्लांट क्यों नहीं है. इस पर सोचने से बचें कि क्यों पीएम केयर्स फंड – वह अपारदर्शी संगठन जिसने हाल में अधिक सार्वजनिक प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष की जगह ले ली और जो सार्वजनिक धन और सरकारी ढांचे का उपयोग करता है लेकिन किसी निजी ट्रस्ट की तरह काम करता है जिसकी कोई सार्वजनिक जवाबदेही नहीं है – अब एकाएक ऑक्सीजन संकट से निबटने क्यों आया है. क्या मोदी हमारी हवा की सप्लाई में भी शेयरों के मालिक होंगे?

रोंदू बच्चा बनने से बचें.”

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समझिए कि सुलझाने के लिए मोदी सरकार के पास कहीं जरूरी कई सारी समस्याएं थीं और हैं. लोकतंत्र के आखिरी अवशेषों का खात्मा, गैर-हिंदू अल्पसंख्यकों को सताना और हिंदू राष्ट्र की बुनियादों को मजबूत करने का काम एक अथक व्यस्तता का काम है. मिसाल के लिए असम में उन बीस लाख लोगों के लिए विशाल जेल परिसरों का निर्माण फौरन जरूरी है जो पीढ़ियों से वहां रहे हैं और अचानक उनसे उनकी नागरिकता छीन ली गई है. (इस मामले में, हमारा स्वतंत्र सर्वोच्च न्यायालय सख्ती से सरकार के पक्ष में रहा और नरमी से बदमाशों के पक्ष में.)

ऐसे सैकड़ों छात्र और कार्यकर्ता और नौजवान मुसलमान हैं जिन पर मुसलमान विरोधी कत्लेआम में मुख्य आरोपी के रूप में मुकदमा चलाया जाना है. यह कत्लेआम पिछले मार्च में पूर्वोत्तर दिल्ली में खुद उनके समुदाय के खिलाफ ही हुआ था. अगर आप भारत में एक मुसलमान हैं तो मार दिया जाना आपका अपना ही एक अपराध है. आपके अपने लोग इसकी कीमत चुकाएंगे. अयोध्या में नए राम मंदिर का उद्घाटन का काम था, जिसे उस मसजिद की जगह बनाया जा रहा है जिसे हिंदू बदमाशों ने वरिष्ठ भाजपा नेताओं की निगहबानी में तोड़ दिया था. (इस मामले में, हमारा स्वतंत्र सर्वोच्च न्यायालय सख्ती से सरकार और बदमाशों के पक्ष में रहा.) खेती को कॉरपोरेट कंपनियों के हाथों में देने के लिए विवादास्पद नए कृषि विधेयकों को पास कराना था. जब वे विरोध में सड़कों पर उतरे तो लाखों किसानों को पीटना था और उनपर आंसू गैस छोड़नी थी. फिर नई दिल्ली के औपनिवेशिक केंद्र की फीकी पड़ती भव्यता को फिर से खड़ी करने के लिए हज़ारों करोड़ रुपयों की योजना है, जिसको फौरी तौर पर देखना था. आखिरकार नए हिंदू भारत की सरकार पुरानी इमारतों में कैसे रह सकती है? जबकि महामारी से बदहाल दिल्ली में लॉकडाउन है, “सेंट्रल विस्टा” परियोजना का निर्माण शुरू हो चुका है, जिसे आवश्यक सेवा घोषित किया गया है. मजदूरों को ले आया जा रहा है. मुमकिन है योजना में बदलाव लाते हुए इसमें एक श्मशान भी जोड़ दिया जाए.

कुंभ मेले का आयोजन भी करना था, ताकि लाखों हिंदू तीर्थयात्री एक छोटे से शहर में भीड़ लगा सकें, गंगा में नहाने के लिए और धन्य और शुद्ध होकर अपने घरों को लौटते हुए देश भर में समान रूप से वायरस को फैलाने के लिए. कुंभ धूमधाम से चल रहा है, हालांकि मोदी ने धीरे से सुझाया कि पवित्र स्नान को “प्रतीकात्मक” रखा जा सकता है – अब इसका मतलब जो भी हो. (पिछले साल इस्लामी संगठन तबलीगी जमात के जलसे में शामिल होने वालों के साथ जो हुआ था, उसके उलट, मीडिया ने उन्हें “कोरोना जिहादी” कहते हुए, या उन पर मानवता के खिलाफ अपराध करने का आरोप लगाते हुए अभियान नहीं चलाया है.) कुछेक हजार रोहिंग्या शरणार्थी भी थे जिनको एक तख्तापलट के बीच में फौरी तौर पर म्यांमार के नस्ली सफाए वाली हुकूमत के पास वापस भेजना था जिससे वे भागे थे. (एक बार फिर, हमारे सर्वोच्च न्यायालय के पास इस मामले की याचिका पहुंची थी, यह सरकार के नजरिए से सहमत हुआ.)

तो, जैसा कि आप देख सकते हैं, सरकार बहुत, बहुत, बहुत व्यस्त थी.

इस फौरी गतिविधि में सबसे ऊपर एक चुनाव है जिसे पश्चिम बंगाल में जीता जाना है. इसमें हमारे गृहमंत्री, मोदी के आदमी अमित शाह के लिए कमोबेश अपनी कैबिनेट जिम्मेदारियों को छोड़ कर महीनों तक बंगाल पर ध्यान देना जरूरी था, अपनी पार्टी के हत्यारे प्रचार को फैलाने के लिए, हरेक छोटे कस्बों और गांवों में इंसानों के खिलाफ इंसानों को उकसाने के लिए. पश्चिम बंगाल एक छोटा राज्य है. चुनाव एक अकेले दिन में हो सकते थे, और अतीत में ऐसा हो चुका है. लेकिन क्योंकि यह भाजपा के लिए नया इलाका है, इसलिए पार्टी को वोटिंग का कामकाज देखने के लिए अपने कैडरों को, जिनमें से अनेक बंगाल से नहीं हैं, क्षेत्र दर क्षेत्र लाने-ले जाने का समय चाहिए था. चुनाव को आठ चरणों में बांटा गया, जो एक महीने से अधिक चल कर 29 अप्रैल को खत्म हो रहा है. ज्यों-ज्यों कोरोना संक्रमण की गिनती बढ़ने लगी, राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग से चुनाव की तारीखों पर दोबारा विचार करने की फरियाद की. आयोग ने इन्कार कर दिया और सख्ती से भाजपा के साथ रहा, और अभियान चलता रहा. भाजपा के स्टार प्रचारक, खुद प्रधानमंत्री का विजेताओं की तरह और बिना मास्क पहने, बिना मास्क वाली भीड़ के सामने भाषण देते हुए, लोगों को अभूतपूर्व तादाद में आने के लिए धन्यवाद देते हुए वीडियो किसने नहीं देखा? वह 17 अप्रैल की बात थी, जब रोजाना संक्रमण के आधिकारिक आंकड़े 200,000 की तरफ बढ़ रहे थे.

अब, जब वोटिंग खत्म हो रही है, बंगाल अब कोरोना का नया केंद्र बनने को तैयार है, एक नए ट्रिपल म्यूटेंट स्ट्रेन के साथ जिसका नाम है – अंदाजा लगाइए – “बंगाल स्ट्रेन”.

अखबार खबर देते हैं कि राज्य की राजधानी कोलकाता में टेस्ट किया जा रहा हर दूसरा शख्स कोविड पॉज़िटिव पाया जाता है. भाजपा ने ऐलान कर दिया है कि अगर यह बंगाल जीतती है, तो यह सुनिश्चित करेगी कि लोगों को मुफ्त वैक्सीन मिले. और अगर यह नहीं जीतती?

रोंदू बच्चा बनने से बचें.”

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बहरहाल, वैक्सीन का हाल क्या है? यकीनन वे हमें बचा लेंगे? क्या भारत वैक्सीन का पावरहाउस नहीं है? असल में भारत सरकार दो निर्माताओं पर पूरी तरह निर्भर है, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) और भारत बायोटेक. दोनों को दुनिया के सबसे महंगे वैक्सीनों में से दो को, दुनिया के सबसे गरीब लोगों को उपलब्ध कराने की इजाजत दे दी गई है. इस हफ्ते उन्होंने ऐलान किया कि वे निजी अस्पतालों को थोड़ी बढ़ी हुई कीमत पर बेचेंगे, और राज्य सरकारों को थोड़ी कम कीमत पर. मोटे हिसाब दिखाते हैं कि वैक्सीन कंपनियों के घिनौने रूप में अथाह मुनाफा कमाने की संभावना है.

मोदी की हुकूमत में, भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया गया है, करोड़ों लोग जो पहले से ही एक संकटपूर्ण जिंदगी जी रहे थे उन्हें भयानक गरीबी में धकेल दिया गया है. एक भारी संख्या अब अपने गुजर के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) से मिलने वाली मामूली कमाई पर निर्भर है, जिसे 2005 में लागू किया गया था जब कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी. यह उम्मीद करना असंभव है कि भुखमरी की कगार पर रहने वाले परिवार अपने महीने की ज्यादातर कमाई का भुगतान टीका लगवाने के लिए करेंगे. ब्रिटेन में टीका मुफ्त है और एक मौलिक अधिकार है. अपनी बारी तोड़ कर टीका लेने की कोशिश करने वालों पर मुकदमा चल सकता है. भारत में टीकाकरण अभियान के पीछे सारी प्रेरणा कॉरपोरेट मुनाफे की दिखाई देती है.

जब यह भयावह पैमाने की तबाही हमारे मोदी-परस्त भारतीय टीवी चैनलों पर दिखाई जाती है, तो आप गौर करेंगे कि वे सब कैसे एक सिखाई हुई आवाज में बोलते हैं. “व्यवस्था” बैठ गई है, वे बार बार यह कहते हैं. वायरस भारत की स्वास्थ्य सेवा “व्यवस्था” पर हावी हो गया है.

व्यवस्था बैठ नहीं गई है. “व्यवस्था” बस नाम के लिए ही थी. सरकार ने – इस सरकार ने और कांग्रेस सरकार ने जो इसके पहले थी – जान बूझ कर जो भी मेडिकल का थोड़ा बहुत बुनियादी ढांचा था उसको तबाह कर दिया. करीब-करीब एक नदारद सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था वाले देश में जब एक महामारी फैलती है तो यही होता है. भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का करीब 1.25% स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जो दुनिया में ज्यादातर देशों से कहीं कम है, सबसे गरीब देशों से भी कम. यह भी माना जाता है कि यह आंकड़ा भी बढ़ाया हुआ है, क्योंकि उन चीजों को भी इसमें घुसा दिया गया है जो महत्वपूर्ण हैं लेकिन ठीक-ठीक स्वास्थ्य देखरेख में नहीं आतीं. तो वास्तविक आंकड़ा 0.34% होने का अंदाजा है. त्रासदी यह है कि इस भयानक रूप से गरीब मुल्क में, शहरी इलाकों में 78% और ग्रामीण इलाकों में 71% स्वास्थ्य देख रेख निजी सेक्टर के पास है, जैसा कि 2016 में लैन्सेट के एक अध्ययन में दिखाया गया है. सार्वजनिक सेक्टर में बचे हुए संसाधनों को व्यवस्थित रूप से निजी सेक्टर के हवाले किया जा रहा है, जिसके पीछे भ्रष्ट प्रशासकों और मेडिकल सेवाकर्मियों, भ्रष्ट रेफरल और बीमा रैकेटों का एक गठजोड़ है.

स्वास्थ्य की देखरेख एक मौलिक अधिकार है. निजी सेक्टर भुखमरी के शिकार, बीमार, मर रहे लोगों की सेवा नहीं करेगा जिनके पास कोई पैसा नहीं है. भारत की स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण एक अपराध है.

व्यवस्था नहीं बैठी है. सरकार नाकाम रही है. शायद “नाकाम” एक अनुचित शब्द है, क्योंकि जो हमारी नजरों के सामने हो रहा वह आपराधिक अनदेखी नहीं है, बल्कि ठीक-ठीक मानवता के खिलाफ एक अपराध है. वायरस विज्ञानियों का अंदाजा है कि भारत में मामलों की संख्या बेतहाशा बढ़ कर रोजाना 500,000 से अधिक तक हो जाएगी. वे आने वाले महीनों में कई लाख लोगों की मौतों की भविष्यवाणी करते हैं, शायद उससे भी ज्यादा. मेरे दोस्तों और मैंने रोज एक दूसरे को फोन करने का फैसला किया है, ताकि अपनी मौजूदगी को दर्ज करा सकें, अपने स्कूल क्लासरूम में हाजिरी की तरह. हम जिन्हें प्यार करते हैं उनसे नम आंखों के साथ बातें करते हैं, कांपते हुए, नहीं जानते हुए कि हम एक दूसरे को कभी देख भी पाएंगे. हम लिखते हैं, हम काम करते हैं, नहीं जानते हुए कि हमने जो शुरू किया था उसे पूरा करने के लिए जिंदा भी रह पाएंगे. नहीं जानते हुए कि कैसी दहशत और अपमान हमारे इंतजार में है. इन सबसे महसूस होने वाली जलालत. यही वह चीज है तो हमें तोड़ देती है.

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सोशल मीडिया पर हैशटैग #ModiMustResign ट्रेंड कर रहा है. कुछ मीम्स और इलस्ट्रेशंस में मोदी की दाढ़ी के पीछे से झांकते हुए कंकाल दिखाए गए हैं. मसीहा मोदी लाशों की एक रैली में भाषण दे रहे हैं. गिद्धों के रूप में मोदी और अमित शाह, क्षितिज पर लाशों के लिए नजरें गड़ाए हैं जिनसे वोट की फसलें काटी जानी हैं. लेकिन यह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है. दूसरा पहलू है कि भावनाओं से खाली एक आदमी, खाली आंखों और अनमनी मुस्कान वाला एक आदमी, अतीत के इतने सारे तानाशाहों की तरह, दूसरों में उग्र भावनाएं जगा सकता है. उसकी बीमारी संक्रामक है. और यही है जो उसे अलग बनाता है. उत्तर भारत में, जहां उनका सबसे बड़ा वोटिंग जनाधार है, और जो अपनी शुद्ध संख्या के बूते, मुल्क की राजनीतिक किस्मत का फैसला करता रहता है, वहां उनके द्वारा दिया गया दर्द एक अजीबोगरीब आनंद में तब्दील होता हुआ दिखता है.

फ्रेडरिक डगलस ने सही कहा था: “तानाशाहों की सीमाएं उन लोगों की सहनशीलता से तय होती हैं, जिनपर वे जुल्म करते हैं.” भारत में हम सहनशीलता की अपनी काबिलियत पर कितना गर्व करते हैं. कितनी खूबसूरती से हमने अपने गुस्से से मुक्ति पाने की खातिर ध्यान लगाने और एकाग्र होने के लिए, और बराबरी को अपनाने में अपनी नाकाबिलियत को सही ठहराने के लिए खुद को प्रशिक्षित किया है. कितनी बेबसी से हम अपनी तौहीनी को गले लगा लेते हैं.

जब उन्होंने 2001 में गुजरात के नए मुख्यमंत्री के रूप में अपने सियासी सफर की शुरुआत की थी, तो उस घटना के बाद मोदी ने भावी पीढ़ियों के लिए अपनी जगह पक्की बना ली थी, जिसे 2002 गुजरात कत्लेआम के नाम से जाना जाता है. कुछेक दिनों के भीतर, हत्यारी हिंदू भीड़ ने, गुजरात पुलिस की आंखों के सामने और कभी-कभी सक्रिय मदद के साथ, हजारों मुसलमानों की हत्या की, बलात्कार किया, जिंदा जलाया. यह सब एक ट्रेन पर आगजनी के एक भयानक हमले के “बदले” के रूप में किया गया, जिसमें 50 से अधिक हिंदू तीर्थयात्री जिंदा जल गए थे. एक बार हिंसा थमने के बाद, मोदी ने, जो उस समय तक अपनी पार्टी की तरफ से एक मनोनीत मुख्यमंत्री थे, समय से पहले चुनावों की घोषणा कर दी. उन्हें हिंदू हृदय सम्राट के रूप में पेश करने वाले अभियान ने उन्हें एक भारी जीत दिलाई. तब से लेकर मोदी ने एक भी चुनाव नहीं हारा है.

गुजरात कत्लेआम के अनेक हत्यारे बाद में इस बात की शेखी बघारते हुए पत्रकार आशीष खेतान द्वारा कैमरे पर रेकॉर्ड किए गए, कि उन्होंने कैसे लोगों को गोद-गोद कर मार डाला, गर्भवती औरतों का पेट चीर कर खोल दिया और नवजात बच्चों का सिर पत्थर पर पटक कर तोड़ दिया. उन्होंने कहा कि उन्होंने जो कुछ किया, वह सिर्फ इसलिए कर सके क्योंकि मोदी मुख्यमंत्री थे. वे टेप राष्ट्रीय टीवी पर दिखाए गए. जहां मोदी सत्ता में बने रहे, वहीं खेतान, जिनके टेपों को अदालतों को सौंपा गया और जिनकी फोरेंसिक जांच हुई, अनेक मौकों पर गवाह के रूप में हाजिर हुए हैं. समय गुजरने के साथ, कुछ हत्यारे गिरफ्तार किए गए, जेल में रहे, लेकिन अनेक को छोड़ दिया गया. अपनी हालिया किताब अंडरकवर: माई जर्नी इंटू डार्कनेस ऑफ हिंदुत्वा में खेतान बताते हैं कि कैसे मुख्यमंत्री के रूप में मोदी की हुकूमत के दौरान, गुजरात पुलिस, जज, वकील, अभियोजनकर्ता और जांच समितियों सबने मिल कर सबूतों के साथ छेड़-छाड़ की, गवाहों को धमकाया और जजों का तबादला किया.

यह सब जानने के बावजूद, भारत के अनेक तथाकथित जनबुद्धिजीवी, यहां की बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के सीईओ और उनके मालिकाने वाले मीडिया घरानों ने कड़ी मेहनत करते हुए मोदी के प्रधानमंत्री बनने की राह तैयार की. हममें से जो लोग अपनी आलोचना पर कायम रहे उनको उन्होंने जलील किया और चुप कराने की कोशिश की. “आगे बढ़ो,” उनका मंत्र था. यहां तक कि आज भी, जब वे मोदी के लिए कुछ कड़े शब्द कहते हैं तो उसकी धार को कुंद करने के लिए  वे उनकी भाषण कला और उनकी “कड़ी मेहनत” की तारीफें करना नहीं भूलते. कहीं अधिक सख्ती से वे विपक्षी दलों के राजनेताओं की निंदा करते हैं और उन पर धौंस दिखा कर उन्हें अपमानित करते हैं. अपनी खास नफरत को वे कांग्रेस पार्टी के राहुल गांधी के लिए बचा कर रखते हैं, जो ऐसे अकेले राजनेता हैं जिन्होंने आने वाले कोविड संकट की लगातार चेतावनी दी और बार-बार सरकार से मांग की कि वह जितना संभव हो सकता था वह खुद को इसके लिए तैयार करे. सभी विपक्षी दलों को बर्बाद करने के इसके अभियान में सत्ताधारी दल की मदद करना लोकतंत्र को बर्बाद करने में मिलीभगत के बराबर है.

तो अब हम यहां हैं, सामूहिक रूप से उनके बनाए हुए जहन्नुम में, जहां एक लोकतंत्र के कामकाज के लिए बुनियादी रूप से जरूरी हरेक स्वतंत्र संस्थान को संकट में डाल कर, खोखला बना दिया गया है, और जहां एक वायरस है जो बेकाबू है.

संकट पैदा करने वाली यह मशीन जिसे हम अपनी सरकार कहते हैं हमें इस तबाही से निकाल पाने के काबिल नहीं है. खास कर इसलिए कि इस सरकार में एक आदमी अकेले फैसले करता है और वह आदमी खतरनाक है – और बहुत समझदार नहीं है. यह वायरस एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है. इससे निबटने के लिए, कम से कम महामारी के नियंत्रण और प्रशासन के लिए, फैसले लेने का काम एक किस्म की गैर दलगत संस्था के हाथों में जाना होगा जिसमें सत्ताधारी दल के सदस्य, विपक्ष के सदस्य और स्वास्थ्य और सार्वजनिक नीतियों के विशेषज्ञ शामिल हों.

जहां तक मोदी की बात है, क्या अपने अपराधों से इस्तीफा देना एक मुमकिन गुंजाइश है? शायद वे बस उनसे एक मोहलत ही ले लें – अपनी कड़ी मेहनत से एक मोहलत. उनके लिए एक 56.4 करोड़ डॉलर का एक बोईंग 777, एयर इंडिया वन का जहाज एक वीवीआईपी सफर के लिए, असल में उनके लिए, तैयार है और फिलहाल रनवे पर बेकार खड़ा है. वे और उनके आदमी बस छोड़ कर चले जा सकते हैं. बाकी के हम लोग उनकी गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए जो कुछ हो सकेगा करेंगे.

नहीं, भारत को अलग-थलग नहीं किया जा सकता. हमें मदद की ज़रूरत है.

 

(अनुवाद: रेयाज़ुल हक़)

 

 

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