जितना बड़ा जनतंत्र उतना ही खोखला!

प्राचीन भारत से ही राजे रजवाड़ों की शासन व्यवस्था रही है। कोई कहे कि जनतंत्र प्राचीन समय से आ रहा है वह झूठ है। इसके विपरीत ग्रीक और रोम का स्पष्ट इतिहास है, जहां जनतंत्र बहुत मजबूत था। सुकरात के विद्रोह का मुकदमा संसद में चला और 120 के मुकाबले 180 मत खिलाफ पड़े और तब जाकर मौत की सजा सुनाई गई। रोम साम्रज्य में तो सीनेट इतना शक्तिशाली हुआ करता था कि राजा के न रहने पर भी शासन व्ययस्था चलती रहती थी। प्रायः शासक और सीनेट में टकराव होता था। लिपि के अभाव में हमारे यहां क्या व्यवस्था थी बहुत स्पष्ट नहीं है। रोम, मिश्र, चीन व सिंधु सभ्यता में विकसित लिपि थी जिसके कारण उस समय के समाज का इतिहास मिलता है। कोली और शाक्य के बीच झगड़ा जातीय आधार पर था और वह मुख्य कारण हुआ कि गौतम बुद्ध ने गृह त्याग किया। उस समय भी जातीय भेदभाव चरम पर था और उसी के खिलाफ़ उनका अभियान था। चंद्र गुप्त मौर्य, गुप्त युग से लेकर हर्षवर्धन तक कहीं देखने को नहीं मिलता कि संसद या विधायिका के द्वारा शासन का निर्धारण हुआ हो। सामंत और राजा के दरबारी और सलाहकार हुए और वे राज-काज चलाने में सहयोग किया करते थे।

भारत में जितने भी अक्रांता आए आसानी से सफल होते रहे। एक जाति की जिम्मेदारी थी लड़ने और प्रशासन की और ऐसे में शेष तमाशबीन बने रहते थे। वह समाज कभी तरक्की नहीं कर सकता जो गलतियों को न माने और न सीखे। भारत के समाज की यही सच्चाई है। कुछ लोग श्रुति के आधार पर कुछ भी बोलते हैं। प्लास्टिक सर्जरी भी हुआ करती थी यह भी दावा करते हैं। प्राचीन काल में मिसाइल का होना तो आम बात थी और पाताल को भी चीर दिया करती थी। हवा, जल और सूरज से बच्चे पैदा हुआ करते थे। दावा किया जाता है सारी खोज और ज्ञान यहीं से दूसरे देशों में गए। जबकि सच्चाई है कि सारी खोज बाहर के हैं जिनका उपयोग हम करते हैं। जो भी खोज बाहर हो जाता है, उसके बाद कहते हैं कि यह तो हमारे यहां हुआ करता था। जब पता है कि पूर्वजों का है तो क्यों नहीं पहले इजात कर लेते। जब इतने ज्ञानी और ताकतवर थे तो दूसरे छीन और चोरी कैसे कर ले गए? देश आजाद होने के पहले संसद भवन ही नही विधान सभाएं भी कार्यरत थीं। कुछ महीनों और वर्षों में ही जनतंत्र नहीं पैदा हो गया। अंग्रेजों की बड़ी भूमिका थी, भले ही उन्होने अपने हित में ही क्यों न किया हो ? करीब सारी संस्थाएं आजादी के पहले की हैं चाहे न्याय पालिका हो या कार्यपालिका। सेना, पुलिस, रेल आदि अंग्रेज छोड़ गए।

हमारे लोग जनतांत्रिक नहीं हैं, व्यक्ति पूजक हैं । अपने से कमज़ोर को इज्जत देने के बजाय दबाने की प्रवृत्ति रहती है। कांग्रेस अगर न होती तो शायद जनतंत्र स्थापित न हो पाता। गांधी जी और नेहरू जी को भारतीय जनतंत्र को मज़बूत करने का सबसे ज्यादा श्रेय जाता है। कांग्रेस पार्टी इतनी ताकतवर थी कि देश में एक पार्टी सिस्टम कायम कर सकती थी। विपक्ष को कांग्रेस ने पैदा किया और सींचा। कांग्रेस का जो विरोध करते थे उन्हें भी प्रथम मंत्रिमंडल में स्थान दिया गया, जैसे डॉ अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि। आजादी के समय में विपक्ष के रूप कम्युनिस्ट पार्टी हुआ करती थी और कुछ दल जरूर थे परंतु प्रभावहीन। आपातकाल एक अपवाद जरूर है। बीजेपी जिस तरह से जनतंत्र को ख़त्म कर रही है अगर कांग्रेस ने थोड़ा सा भी ऐसा किया होता तो अन्य दल पैदा ही नहीं होते। भारत चीन और रूस के रास्ते पर भी चल सकता था।

विपक्ष बहुत ही कमज़ोर था और धीरे धीरे पनपने का मौका मिलता गया। 2000 के पहले तक जो सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता जनता के सवालों को तहसील, थाना और सड़क पर उतरकर उठाते थे उन्हें जनता विधान सभा और संसद में पहुंचा देती थी, भले ही ये फटे हाल हुआ करते थे। कांग्रेस चाहती तो चुनाव को शुरू में महंगा कर देती और चुनाव आयोग में राजनैतिक नियुक्ति कर सकती थी या करती ही न। उस समय किसी की ताकत नहीं थी विरोध करने की और करते तो आवाज को दबाना मुश्किल नहीं था। इसको हम और बेहतर समझ सकते थे कि 2010 से ही मीडिया तत्कालीन केंद्र सरकार की एक तरफा खिलाफत करने लगी। विद्वान और कर्मशील मनमोहन सिंह को क्या-क्या नहीं कहा गया। उस समय के पीएम की खबर शायद छपती थी। 2012-13 में तो अखबार और टीवी पर खोजने से भी नहीं मिलता कि कांग्रेस के अच्छे कार्य को लिखा या दिखाया हो। जी टू स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले में इतना बदनाम किया कि हार हुई जबकि बाद में सिद्ध हुआ कि वो सब झूठ था। क्या इससे बड़ा कोई प्रमाण हो सकता है कि जिसकी केंद्र में सरकार और अनुभवी सांसद और मंत्री हों क्या मीडिया मैनेज नहीं कर सकते थे? मीडिया के मालिकों को लोग जानते नहीं थे और यहां तक कि सम्पादक और वरिष्ठ पत्रकार को भी नेता और मंत्री कम जानते थे और बीट देखने वाला पत्रकार ताकतवर हुआ करता था। आज संपादक की कोई अवकात नहीं रह गई और सीधे मालिक को हुकुम जाता है। कांग्रेस क्या यह कृत्य नहीं कर सकती थी ? बस नियत बदलने की आवश्यकता थी। आज भी कांग्रेस नेता राहुल गांधी महंगाई, बेरोजगारी और विकास के मुद्दे तक सीमित रहते हैं। धर्म का कार्ड कांग्रेस कभी खेली नहीं, लेकिन जाति का कार्ड आराम से खेलकर सत्ता में आ सकती है, परंतु वह भी नहीं किया।

जनतंत्र अंदर से खोखला हो गया है। जिसके पास पैसा न हो चुनाव लड़ने की सोचे भी न। जिसके के पास अथाह कालाधन हो वह मीडिया, चुनाव आयोग और वोट खरीद रहे हैं। क्या यह सब कांग्रेस नहीं कर सकती थी? कांग्रेस ने जनतंत्र को स्थापित किया है । कांग्रेस के शासन काल में विपक्ष के नेताओं की जितनी बात सुनी जाती थी उतना कई बार सत्ता पक्ष के लोगों की नहीं। आज विपक्ष की वाजिब बात सुनने की बात तो दूर की है बल्कि सरकार का काम हो गया कि जो सच भी बोले उसके मुंह को बंद कर दिया जाए । सरकारी संस्थाएं जनतंत्र की मजबूत दीवारें हुआ करती थीं लेकिन वे सत्ता की कठपुतली बनकर रह गई हैं।अब कोई कहे कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा जनतन्त्र है वह बीते जमाने की बात हो गई है। वर्तमान को देखकर यह कहना मुश्किल है कि क्या मीडिया मैनेज नही कर सकते थे? मीडिया के मालिकों को लोग जानते नही थे और यहां तक कि सम्पादक और वरिष्ठ पत्रकार को भी नेता और मंत्री कम जानते थे और बीट देखने वाला पत्रकार ताकतवर हुआ करता था। आज संपादक की कोई अवकात नही रह गई और सीधे मालिक को हुकुम जाता है। कांग्रेस क्या यह कृत्य नहीं कर सकती थी ? बस नियत बदलने की आवश्यकता थी। आज भी कांग्रेस नेता राहुल गांधी महंगाई, बेरोजगारी और विकास के मुद्दे तक सीमित रहते। धर्म का कार्ड कांग्रेस कभी खेली नही लेकिन जाति का कार्ड आराम से खेलकर सत्ता में आ सकती है, परंतु वो भी नही किया।

जनतंत्र अंदर से खोखला हो गया है। जिसके पास पैसा न हो चुनाव लडने की सोचे भी न। जिसके पास अथाह कालधन हो वह मीडिया, चुनाव आयोग और वोट खरीद रहे हैं। क्या ये सब कांग्रेस नही कर सकती थी? कांग्रेस ने जनतंत्र को स्थापित किया है । कांग्रेस के शासन काल में विपक्ष के नेताओं की जितनी बात सुनी जाती थी उतना कई बार सत्ता पक्ष के लोगों की नहीं। आज विपक्ष की वाजिब बात सुनने की बात तो दूर की है बल्कि सरकार का काम हो गया कि जो सच भी बोले उसके मुंह को बंद कर दिया जाए । सरकारी संस्थाएं जनतंत्र की मजबूत दीवारें हुआ करती थीं लेकिन वह सत्ता की कठपुतली बनकर रह गई हैं।अब कोई कहे कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा जनतन्त्र है, वह बीते जमाने की बात हो गई है। वर्तमान को देखकर यह कहना मुश्किल है कि आने वाले दिनों में क्या होगा?

– डॉ. उदित राज, पूर्व सांसद
राष्ट्रीय चेयरमैन, कामगार एवं कर्मचारी कांग्रेस (केकेसी) एवं अनुसूचित जाति/जन जाति संगठनों अखिल भारतीय परिसंघ
मो. 9899382211, 9899766882,9555519090
dr.uditraj@gmail.com

 

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