चीन को लाल आँखें दिखाने की याद दिलाओ तो पाकिस्तान से पंगा!

 

बिलावल ने जो कहा वह यूं ही नहीं है, भारत चाहे ‘कड़ी निन्दा’ करे, खबर तो वही है!

 

भक्त स्कूल के बच्चों और व्हाट्सऐप्प विश्वविद्यालय के छात्रों को याद दिलाया जाए कि चीन को लाल आंखें दिखाने की जरूरत और सलाह का क्या हुआ तो वे याद दिलाते हैं कि नेहरू जी ने भारत की कितनी जमीन चीन को दे दी थी। ऐसे जैसे नेहरू जी ने दी थी तो बाद वालों को भी हक है (बीच के कइयों ने नहीं दी तब भी)। आप जानते हैं कि सच्चाई यह है कि 1947 में भारत आजाद हुआ था उसमें नेहरू जी की जो भूमिका थी और 1962 में चीन ने युद्ध छेड़ दिया तो भारत किस स्थिति में था या रहा होगा। बेशक, हम वह युद्ध हार गए थे और चीन ने जो लिया वह निश्चत रूप से छीनकर। दिया नहीं गया था, हम युद्ध में हार गए थे। बाद के समय में इसे छिपाया नहीं गया और यह सर्वविदित है। 

पाकिस्तान से भारत को अगर दिक्कत थी, वह कुछ ज्यादाती कर रहा था तो उसे सबक सिखाया गया और 1971 के युद्ध में पाकिस्तान हार गया। उसके दो हिस्से हो गए। ऐसे में यह स्थापित है कि हम पाकिस्तान को हरा चुके हैं और अगर वह अभी भी आतंकवाद को प्रश्रय देता है तो उसे रोकने की व्यवस्था करनी है, की जानी चाहिए। सच यह भी है कि 50 वर्षों (8 साल समेत) में नहीं की जा सकी है। पर चीन से हार को, भारत की जीत को और पाकिस्तान के शत्रुतापूर्ण व्यवहार को (जो 1971 के कारण भी हो सकता है) कैसे देखा और  दिखाया जाता है, वह गौरतलब है। खासकर 2014 के बाद और उसमें नौकरशाह से अब मंत्री बना दिए गए विदेश मंत्री एस जयशंकर का रुख भी। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने इसकी भी खबर ली है। 

कुल मिलाकर राजनीति यह है कि पाकिस्तान से भिड़े रहो, चीन से डरो और दबे रहो। विपक्ष की सरकार हो तो उसे लाल आंखें दिखाने के लिए कहो और खुद झूला झुलाओ। इस बीच, चुनाव से ठीक पहले एक चौकी पर चीन का हमला हो जाए और यह संयोग ही रहा होगा कि हमले का शिकार बिहार रेजिमेंट हुआ और बिहार में ही चुनाव होने थे। भले मरने वालों में दूसरे राज्यों के लोग भी थे। 2014 में बदले भारत के प्रति चीन का यह रुख और लाल आंख दिखाने की सलाह देने वाले का हमले से संबंधित मशहूर बयान है, “न वहां कोई हमारी सीमा में घुसा हुआ है, न ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्जे में है।” आप जानते हैं कि जो घुसा नहीं वह कई बार वापस गया, मैं तो गिनती संभाल नहीं पाया। लेकिन प्रधानमंत्री ने यह भी कहा था, “लद्दाख में हमारे 20 जांबाज शहीद हुए, लेकिन जिन्होंने भारत माता की तरफ आँख उठाकर देखा था, उन्हें वो सबक सिखाकर गए।” मरकर सबक सिखाना कोई गुजरात दंगे में मरने वालों से भी सीख सकता है क्या? लाल आंख दिखाने की बात अब नहीं होती है और याद दिलाओ तो वही चीन से हार। 

ऐसे में सरकारी नीति पाकिस्तान से पंगा लेते रहने की लगती है। अभी कुछ दिन पहले मैंने सीमा पर झंडा युद्ध के बारे में लिखा था, जो मेरी समझ से बिल्कुल बेमतलब है। लेकिन चल रहा है और अखबार उसका एक पक्ष ही बताते हैं। ऐसे में पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने जो कहा उसपर हंगामा भी राजनीति ही है। आज के अखबारों की खबर भी उसी तरह छपी है जिससे सत्तारूढ़ पार्टी को राजनीतिक फायदा हो। इनमें सबसे पहले तो अखबारों की प्रस्तुति और शीर्षक ही गौरतलब है। भारत, दरअसल सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी का पक्ष तो आप जान ही चुके हैं। उसपर आने से पहले यह जानना समझना जरूरी है कि कल जो सब हुआ वह कैसे हुआ। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट से पता चलता है कि किसी मामले की निष्पक्ष रिपोर्ट कैसे की जाती है। 

कल इस मामले में जो सब हुआ उसकी खबर दूसरे (मेरे पांच में से चार) में कैसे छपी है उसपर आने से पहले बताऊं कि द टेलीग्राफ में इसका फ्लैग शीर्षक है (अनुवाद मेरा), “बिलावल ने अपनी असभ्य टिप्पणी से कमजोर नस दबा दी।” मुख्य शीर्षक है, “मुंहतोड़ जवाब में बुचर ऑफ गुजरात कहने पर ग़ुस्सा।” मैं इस मामले को कल से ही देख सुन रहा हूं और मुझे समझ में आ गया था कि बिलावल ने अगर गुजरात के कसाई को याद किया तो यूं ही नहीं किया होगा। उन्हें, “मौत का सौदागर” भी कहा जा चुका है और इससे नाराजगी चाहे जितनी हुई हो आरोप निराधार नहीं है। पर अभी मुद्दा यह है कि पाकिस्तान के साथ धींगामुश्ती जारी रखनी है, चीन पर मुंह नहीं खोलना है। मुझे लगता है यह सब जान बूझकर किया जाता है और चूंकि अखबार पूरी तरह सेवा में हैं इसलिए सही बात सामने नहीं आती है।

आज के अखबारों में बुचर ऑफ गुजरात कहने के लिए हंगामा भले बिलावल के खिलाफ है लेकिन सच यह भी है कि तृणमूल कांग्रेस ने 2014 में ही ऐसा कहा था। डेरेक ओ ब्रायन ने ट्वीट किया था, (अनुवाद) गुजरात के कसाई को ऊपर-ऊपर बंगाल पहुंचा दिया गया है। बंगाल के विकास मॉडल का उनके पास कोई जवाब नहीं है इसलिए वे निजी हमले कर रहे हैं। इससे संबंधित खबरें भी छपी थीं। आज जब इसी मुद्दे को लेकर विवाद की खबरें छपी हैं तो आम भारतीय अखबारों की खबरों से मामले को समझने की बजाय द टेलीग्राफ की खबर देखें तो मामले का दूसरा पक्ष भी समझ में आता है। अनिता जोशुआ की बाईलाइन खबर हिन्दी में होती तो कुछ इस प्रकार होती। पेश है फटाफट किया गया अनुवाद – पाकिस्तान शुक्रवार को ओसामा बिन लादेन को शरण देने का आरोप लगाने के लिए भारत पर जमकर बरसा। 

विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो-जरदारी ने संयुक्त राष्ट्र में मीडिया को बताया, “ओसामा बिन लादेन तो मारा गया लेकिन गुजरात का कसाई जीवित है और, वह भारत के प्रधान मंत्री हैं (ऐसी टिप्पणी छापना मजबूरी है क्योंकि हुई है और यूं ही नहीं हुई है।)। भारत ने इस “असभ्य” टिप्पणी की निंदा करते हुए एक लंबा बयान जारी किया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा: “ये टिप्पणियां पाकिस्तान के लिए भी एक नई नीचता स्तर हैं।” इसमें बागची ने (उस समय के) पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार को याद किया, जिसके कारण 1971 में बांग्लादेश का निर्माण हुआ और दुनिया भर के शहरों में आतंकवादी हमले हुए, जिनमें पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी समूहों के शामिल होने के सबूत थे और कहा कि किसी अन्य देश में संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादी नहीं थे जितने पाकिस्तान में थे। 

संयुक्त राष्ट्र में एक प्रेस कांफ्रेंस में, बिलावल से भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर की टिप्पणी के बारे में पूछा गया था। इसमें वे बिन लादेन को उठा लाये थे। उसे अमेरिकी विशेष बलों द्वारा पाकिस्तान की प्रमुख सैन्य प्रशिक्षण अकादमी के पास एक गुप्त अभियान में मारे जाने के बाद इस्लामाबाद मुश्किल स्थिति में था और उसे अपना बचाव करना पड़ा था। जवाब में बिलावल ने गुजरात में 2002 के दंगों के बाद नरेंद्र मोदी पर लगाए गए अमेरिकी वीजा प्रतिबंध का जिक्र करते हुए कहा कि 2014 के चुनावों में भाजपा के जीतने के बाद प्रतिबंध हटा था। बिलावल ने कहा: “उनके प्रधान मंत्री बनने तक इस देश में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।” उन्होंने कहा: “यह आरएसएस के प्रधान मंत्री और आरएसएस के विदेश मंत्री हैं। आरएसएस क्या है? आरएसएस हिटलर के एसएस से प्रेरणा लेता है। (एसएस – नाजी जर्मनी में हिटलर और नाजी पार्टी का एक अर्धसैनिक संगठन जो बाद में जर्मन अधिकृत यूरोप में फैल गया था)  

गांधी संदर्भ

इसके बाद बिलावल ने जयशंकर द्वारा न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में महात्मा गांधी की एक प्रतिमा के अनावरण का मुद्दा उठाया। “अगर भारत के विदेश मंत्री ईमानदार थे, तो वह भी जानते हैं और मैं भी जानता हूं कि आरएसएस गांधी में, गांधी की विचारधारा में, गांधी के घोषणापत्र में विश्वास नहीं करता है। वे इस व्यक्ति को भारत के संस्थापक के रूप में नहीं देखते हैं। वे गांधी की हत्या करने वाले आतंकवादी की नायक-पूजा करते हैं। बिलावल ने गुजरात चुनाव से पहले बिलकिस बानो मामले में बलात्कारी-हत्यारों को दी गई माफी का भी मुद्दा उठाया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यह नहीं कहा कि आरोप गलत है या निराधार हैं या अनुचित हैं बल्कि यह कहा कि पाकिस्तान ऐसे आरोप नहीं लगा सकता है। उन्होंने कहा कि बिलावल का गुस्सा “आतंकवादियों और उनके प्रतिनिधियों का उपयोग करने में पाकिस्तान की बढ़ती अक्षमता का परिणाम लगता है” क्योंकि आतंकवादियों को प्रायोजित करने में उनके देश की भूमिका “जांच के दायरे में है”। असामान्य रूप से लंबी प्रतिक्रिया में, भारत ने कहा कि न्यूयॉर्क, मुंबई, पुलवामा, पठानकोट और लंदन उन कई शहरों में हैं, जो पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित, समर्थित और प्रेरित आतंकवाद के निशान हैं।

बागची ने कहा, ‘मेक इन पाकिस्तानयानी पाकिस्तान में बने आतंकवाद को रोकना होगा। भारत ने कहा कि पाकिस्तान ने ओसामा को एक शहीद के रूप में महिमामंडित किया और लखवी, हाफिज सईद, मसूद अजहर, साजिद मीर और दाऊद इब्राहिम जैसे आतंकवादियों को शरण दी। भाजपा ने बिलावल की टिप्पणी को “शर्मनाक और अपमानजनक” बताया और कहा कि वह शनिवार को विरोध प्रदर्शन करेगी। भाजपा ने पूछा, “क्या बिलावल भुट्टो के पास हमारे माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के बारे में टिप्पणी करने का कद भी है जो एक सच्चे राजनेता और अत्यधिक सम्मानित वैश्विक नेता हैं?” इस खबर और इन तथ्यों के आलोक में बाकी अखबारों के शीर्षक देखिए तो यही लगेगा कि चीन को जवाब नहीं देने का मुकाबला तो व्हाट्सऐप्प में होता है और अखबारों के लिए ऐसे मुद्दों को हवा देकर पक्षप्रचार किया जाता है दूसरों की साख खराब की जाती है। 

आज के अन्य अखबारों के शीर्षक इस प्रकार हैं

1.हिन्दुस्तान टाइम्स 

गर्मा-गर्म विवाद में भारत ने पाकिस्तान पर जवाबी हमले किए 

इसके साथ बॉक्स में भारत के मुंतोड़ जवाब 1-6 दिए गए हैं। 

लेकिन पत्रकारीय नैतिकता यह होती कि आरोप भी समान महत्व से छापे जाते। पत्रकारिता देशभक्ति नहीं है, पाठकों की सेवा है सरकार के बारे में निर्णय करने के लिए। किसी एक पार्टी को देशभक्त बताना नहीं है। लेकिन कारोबारियों के अखबार से आप ऐसी उम्मीद कर भी नहीं सकते और मुझे लगता है कि देश में मीडिया संस्थानों की स्वायत्तता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और लोकतंत्र को बचाना तथा निष्पक्ष चुनाव कराना हो तो इसपर गैर सरकारी स्तर पर काम किया जाना चाहिए। 

2.  इंडियन एक्सप्रेस

मुख्य शीर्षक – जयशंकर ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को जोरदार घेरा : दुनिया मूर्ख नहीं है, पिछवाड़े के सांप काट सकते हैं 

उपशीर्षक – बिलावल ने 2002 के दंगों के लिए मोदी पर निशाना साधा; विदेश मंत्रालय ने कहा, असभ्य …. पाकिस्तान के लिए भी नई नीचता।

3.द हिन्दू 

मोदी पर बिलावल की टिप्पणी असभ्य : भारत 

उपशीर्षक – विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, ये टिप्पणियां पाकिस्तान के लिए भी नया निचला स्तर है (सीधे नीचता कहने से बचते हुए, शायद भाषा की मजबूरी हो) …. 26/11 हमले के अपराधियों के साथ 1993 के मुंबई ब्लास्ट के मास्टरमाइंड सब उस देश में आजाद हैं।

4.टाइम्स ऑफ इंडिया

मेरे पांच अखबारों में अकेले इस अखबार ने इस खबर को लीड नहीं बनाया है और शीर्षक लगभग वही है जो हिन्दू में है और यहां भी विदेश मंत्रालय के बयान को दूसरी प्रमुखता मिली है। अखबार ने इस खबर को लीड के बराबर में छापा जरूर है पर लगता नहीं है कि बहुत अधिक महत्व दिया है।

पांच में से चार अखबारों में इस खबर और शीर्षक के जरिए भारत के हितों को ऊपर रखा गया है लेकिन भारत का हित इस तथ्य को बताने में भी है यहां आतंकवाद की आरोपी को सांसद बना दिया गया और जो बरी हुए हैं उनके मामले में जांच के खिलाफ अदालत की सख्त टिप्पणी है पर ना ऊपरी अदालत में अपील की गई ना जांच फिर से कराई गई। लेकिन कथित अर्बन नक्सलियों को जमानत मिलने पर रिहा होने से पहले सरकार ऊंची अदालत पहुंच जाती है। यह तथ्य हर वोटर को मालूम होना चाहिए और तभी वह अपने लिए सही सरकार चुन पाएगा। यह अखबार की स्वतंत्रता की ही तरह जरूरी है। तथ्यों को जानना हर वोटर का अधिकार है। अभी स्थिति यह है कि भारत में भारत के लोग तो छोड़िये विदेशी भी अपने मन की बात नहीं कर सकते हैं। अखबारों में छपना तो बहुत दूर। ऐसे में किसी विदेशी ने कहा तो वह खबर है, भले भारत सरकार उसी जैसी और जितनी कड़ी निन्दा करे।  

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।

 

 

 

 

 

 

 

First Published on:
Exit mobile version