इस्लामोफ़ोबिया से पुलिस को छुटकारा दिलाइये मी लार्ड!

सीजेआई का दखल कहाँ तक कारगर होगा? सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज, मानवाधिकार के जाने-माने पक्षधर, मदन लोकूर का सुझाव है कि कानून की ओर से आँख मूंदने वाले ऐसे पुलिस अधिकारियों को आपराधिक जवाबदेही के दायरे में लाया जाए और उनसे भारी हर्जाना भी वसूला जाए। हो सकता है सीजेआई भी इस दिशा में न्यायिक पहल करें । लेकिन सारा ठीकरा पुलिस के सर पर फोड़ने का चलन नया नहीं है और इससे पीड़ितों की ही ठोकरें बढ़ेंगी। जरूरत है कि स्थानीय न्यायपालिका को एफआईआर, गिरफ्तारी, जमानत, चालान, चार्ज शीट, जैसे हर मुकाम पर अपनी निगरानी और छानबीन की भूमिका सही रूप से निभाने के प्रति जवाबदेह किया जाए। यह पूरी तरह सीजेआई के अधिकार क्षेत्र का विषय है ।

सीजेआई यानी देश के सर्वोच्च पदस्थ न्यायाधीश की घोर न्यायिक हताशा को समझना होगा । इस्लामोफोबिया यानी ‘राष्ट्र/हिन्दू को इस्लाम/मुसलमान से खतरा’ से डराने का समीकरण, जो भाजपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा होता है, रोजमर्रा की पुलिसिंग को भी पंगु किये दे रहा है । मुस्लिम अपराधी/आतंकी के स्टीरियोटाइप को मजबूत करने के लिए पुलिस को इस कदर झूठ गढ़ना पड़ रहा है कि उसे आँख मूँद कर भी पकड़ा जा सकता है । क्या इसके पीछे सिर्फ प्रशासनिक असमर्थता है या न्यायपालिका की अपनी विफलता भी? स्वयं सीजेआई के इस दिशा में सक्रिय होने पर तमाम हाई कोर्ट ही नहीं बल्कि जिला स्तर पर जज और मजिस्ट्रेट की निगरानी भूमिका भी बेहद निर्णायक सिद्ध हो सकती है। दिल्ली के एक एडिशनल सेशंस जज ने जंतर-मंतर पर इस्लामोफोबिया फैलाने वाले सरगना की अग्रिम जमानत इस आधार पर अस्वीकृत कर दी कि संविधान से चलने वाले भारत में तालिबान संस्कृति के लिए जगह नहीं है।

लेकिन फिलहाल यह होना अपवादस्वरूप लगता है। इंदौर में बहुप्रचारित इस्लामोफोबिक मॉब लिंचिंग के शिकार मुस्लिम चूड़ीवाले युवक को एक दिन बाद जालसाजी और नाबालिग से छेड़छाड़ का आरोपी बनाकर हिसाब बराबर कर लिया गया। कानपुर में दो पड़ोसी झुग्गीवालों की आपसी तनातनी में बजरंग दल के मुस्टंडों ने मुस्लिम फकीर को उसकी तीन वर्षीय बेटी के सामने, पुलिस की उपस्थिति में, बुरी तरह पीट कर धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में हवालात भिजवा दिया। सोशल मीडिया में रोती-लिपटती बेटी की छवि के तूल पकड़ने पर वह इस शिकंजे से छूट सका। सीधे शब्दों में इसका मतलब हुआ कि पुलिस सत्ता पक्ष की विचारधारा की एजेंट बन कर रह गयी है न कि कानून और संविधान की ।

सीजेआई रमना की सर्वोच्च अदालत में की गयी इस टिप्पणी ने किसी रहस्य से पर्दा नहीं उठाया है कि कुछ पुलिस वाले सत्ताधारी दल से मिलकर काम करते हैं। जग जाहिर है कि जब तक पुलिस वालों की नकेल राजनीतिक आकाओं के हाथ में रहेगी वे हमेशा कानून के दायरे में काम करें इसकी गारंटी संभव नहीं। ऐसे पुलिसवाले कानून को तोड़-मरोड़ कर आकाओं का उल्लू तो सीधा करते ही हैं, लगे हाथ अपना भी। इसलिये, कई भाजपा शासित राज्यों में पुलिस, सत्ताधारियों के राजनीतिक एजेंडा के चलते, इस्लामोफोबिया से बुरी तरह ग्रस्त नजर आती है। एनआरसी दौर और सांप्रदायिक तनाव की स्थितियों में यह रुझान और तीखा होकर सामने आया है ।

दिल्ली पुलिस सीधे केंद्र की मोदी सरकार के नीचे काम करती है। दिल्ली दंगों में पुलिस को डेढ़ साल लग गए अपने उन इस्लामोफोबिक जवानों की शिनाख्त तक करने में जो दंगे के शिकार घायल मुसलमानों को सरे आम कोसते-पीटते एक वीडियो में नजर आ रहे थे। पिटने वालों में एक की दो दिन बाद अस्पताल में मौत भी हो गयी। जेएनयू के छात्र उमर खालिद के सनसनीखेज मामले में अब अदालत के सामने खुलासा हुआ है कि उन्हें बिना जमानत यूपा में जानते-बूझते एक एडिटेड वीडियो के आधार पर बंद किया हुआ है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निशाने पर आये डॉक्टर कफील को फर्जी मुकदमों में जमानत मिलते ही रासुका में गिरफ्तार कर लिया गया महीनों जेल में सड़ने के बाद वे हाईकोर्ट के दखल से छूट सके। वहां दंगे या आन्दोलन का अलिखित नियम है कि पुलिस मुस्लिम पक्ष का ही चालान करे।

सीजेआई का दखल कहाँ तक कारगर होगा? सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज, मानवाधिकार के जाने-माने पक्षधर, मदन लोकूर का सुझाव है कि कानून की ओर से आँख मूंदने वाले ऐसे पुलिस अधिकारियों को आपराधिक जवाबदेही के दायरे में लाया जाए और उनसे भारी हर्जाना भी वसूला जाए। हो सकता है सीजेआई भी इस दिशा में न्यायिक पहल करें । लेकिन सारा ठीकरा पुलिस के सर पर फोड़ने का चलन नया नहीं है और इससे पीड़ितों की ही ठोकरें बढ़ेंगी। जरूरत है कि स्थानीय न्यायपालिका को एफआईआर, गिरफ्तारी, जमानत, चालान, चार्ज शीट, जैसे हर मुकाम पर अपनी निगरानी और छानबीन की भूमिका सही रूप से निभाने के प्रति जवाबदेह किया जाए। यह पूरी तरह सीजेआई के अधिकार क्षेत्र का विषय है ।

इस्लामोफोबिक दायरे में काम करती पुलिस कभी भी तटस्थता से कानून लागू नहीं कर पाएगी। न उसे सभी वर्गों का विश्वास और सहयोग मिल पायेगा। यानी अपराध नियंत्रण में वह असफल ही रहेगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने हाल में दावा किया कि दिल्ली में प्रति वर्ग किलोमीटर पर जितने सीसीटीवी कैमरे हैं उतने तो लंदन और न्यूयॉर्क तक में नहीं। ये कैमरे मुख्यतः स्त्री सुरक्षा के नाम पर लगाए गए थे, लेकिन स्त्री तो अब भी उतनी ही असुरक्षित है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने दावा किया कि योगी के चार वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने 3300 ‘लंगड़ा’ एनकाउंटर किये हैं। यानी ऐसे एनकाउंटर जिनमें अपराधी को पैर में गोली मार कर लंगड़ा कर दिया जाता है। उन्हें इतने एनकाउंटर क्यों करने पड़ रहे हैं? जाहिर है, इसीलिए, क्योंकि व्यापक जन-विश्वास/सहयोग के अभाव में उनकी कानून-व्यवस्था निरंतर दबाव में रही है।

कोरोना की दूसरी लहर में कई राज्यों में पुलिस की तटस्थ मानवतावादी भूमिका को सराहना मिली है। महामारी के मोर्चे पर बहुत से ऐसे प्रयासों को स्वयं पुलिस ने डॉक्यूमेंट कर प्रकाशित भी किया है। क्यों न अपराध के विरुद्ध मानवाधिकार के मोर्चे पर भी पुलिस की ऐसी ही सराहना हो? भारत जैसे बहुलतावादी देश में कानून व्यवस्था की एजेंसी के पास इस्लामोफोबिया को कूड़े के ढेर में गहरे दफन करने का ही विकल्प होना चाहिए।

विकास नारायण राय, अवकाश प्राप्त आईपीएस हैं, हरियाणा के डीजीपी और नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के निदेशक रह चुके हैं।

 

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