पीएम केयर्स पर सुप्रीम फ़ैसला: क़ानूनी और नैतिक का फ़र्क़ भूले अख़बार!

 

एक ही सूचना को प्रस्तुत करने का प्रचारक और पत्रकारीय अंदाज

 

पीएम केयर्स फंड से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसले की खबर आज कई अखबारों में प्रमुखता से छपी है। खबरों से जो  बात निकलकर आ रही है उनमें कुछ गौरतलब है और दिलचस्प। यह फैसले पर टिप्पणी नहीं है। खबरों से मिली सूचना पर सवाल या शंका है। कायदे से इन सवालों का जवाब भी मांगा जाना चाहिए। पता नहीं मांगा गया या नहीं या दिया गया है कि नहीं। अखबारों का काम था इसे स्पष्ट करना जो सरसरी तौर पर अखबार पढ़ने से नहीं हो रहा है। आइए एक-एक कर कुछ अखबारों के हाइलाइट्स की चर्चा करूं।

द हिन्दू

खबर के साथ प्वायंट्स ऑफ व्यू (नजरिए की बातें) है। इसके अनुसार पीएम केयर्स फंड एक लोकोपकारी ट्रस्ट है। इसमें धन स्वेच्छा से दिए जाते हैं। दान देने वाले राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष में भी दान दे सकते हैं। यहां मुद्दा यही है कि प्रधानमंत्री राहत कोष पहले से था, आपदा की स्थिति में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष बनना चाहिए या है तो पीएम केयर्स फंड की जरूरत क्यों? भले ही पीएम केयर्स फंड सही हो, लेकिन उसकी जरूरत और प्रधानमंत्री कार्यालय तथा मंत्रियों का इस काम में लगना क्या सही है? आरटीआई के एक जवाब में कहा गया था कि संसाधनों का गैर आनुपातिक बंटवारा होगा। पर केंद्रीय मंत्रियों का काम नहीं है कि वे लोकोपकार करें। खासकर पूजीतियों से धन मांगकर। कहने के लिए दान स्वैच्छिक है पर प्रधानमंत्री या किसी मंत्री के दान मांगने का मतलब है और देने वाले की स्वेच्छा का भी। अगर वह स्वेच्छा से देता तो दूसरे दो कोष में भी दे सकता था, जो दिया वह तीनों में बराबर दे सकता था या पीएम केयर्स को छोड़कर बाकी दो में भी स्वेच्छा से दे सकता था। पर तीनों में प्राप्त धन अलग हैं और पीएम केयर्स में तुलानात्मक रूप से अगर ज्यादा है तो निश्चित रूप से प्रधानमंत्री और मंत्रियों के जुड़े होने के कारण है। देने वाले की स्वेच्छा कम महत्वपूर्ण है। कानूनन यह गलत न हो अनैतिक तो है ही।

मुझे लगता है, मजबूरी की स्वेच्छा है। सीएसआऱ का धन इसमें दिया और लिया जाना किसकी स्वेच्छा है? सीएसआर का पैसा दरअसल कॉरपोरेट का प्लांट जहां है उसके आस-पास खर्च किया जाना चाहिए। वह कंपनी का नहीं है कि कंपनी उसपर निर्णय करे या कंपनी का निर्णय हो भी तो प्लांट के आस-पास के लोगों की सहमति से होना चाहिए। कारपोरेट की सामाजिक जिम्मेदारी पहले उस पिछड़े इलाके में है, जहां वह काम करता है या जहां से धन कमाता है या जहां उसके कर्मचारी और उनका परिवार रहता है। दिल्ली या मुंबई में नहीं, जहां के लोग पहले ही ज्यादा धन कमाते हैं ज्यादा टैक्स देते हैं। इसलिए सीएसआर का पैसा कहां खर्च किया जाए यह कानूनन भले गलत न हो नैतिक रूप से है। औरबात उसपर भी होनी चाहिए। सीएजी के ऑडिट की जरूरत नहीं है यह बात तो समझ में आती है पर शीर्षक है, नो नीड टू ऑडिट या ऑडिट की ही जरूरत नहीं है। जनता का पैसा ऑडिट न हो यह गलत है। जब कॉरपोरेट को अपने पैसों का ऑडिट कराने का नियम है। मुझे लगता है यह चूक है।

टाइम्स ऑफ इंडिया

(मुंबई) शीर्षक है, “पीएम केयर्स : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धन को एनडीआरएफ में स्थानांतरित करने की जरूरत नहीं।” हिन्दू का उपशीर्षक है, “खंडपीठ ने धन को एनडीआरएफ में स्थानांतरित करने का निर्देश देने से मना किया, कहा दोनों पृथक पहचान है।” कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों शीर्षक अलग आभास देते हैं। यहां जो बात हाईलाइट है वह यह कि एनडीआरएफ को दान न जाए उसके लिए सरकार ने नियम बदले हैं। अंग्रेजी में ट्वीक शब्द का इस्तेमाल किया गया है वह असल में बदलना नहीं छेड़ना है और छेड़ना भी विस्तृत अर्थ में। टीओआई की खबर के अनुसार अदालत ने याचिकाकर्ता को इसके लिए फटकार लगाई। इसके अलावा जो बातें छपी हैं उससे मुझे वास्तविक स्थिति नहीं समझ में आ रही है। और अदालत ने कहा है तो उसपर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकता हूं। पर मुझे लगता है कि मामला नियम बदलने का नहीं, स्थिति बदलने का है। जब नाम पीएम केयर्स है, प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री चंदा मांग रहे हैं तो कोई कहीं और चंदा क्यों देगा? अगर ऐसा नहीं भी हो तो मामला प्राथमिकता का है और निश्चित रूप से पीएम केयर्स को प्राथमिकता मिली होगी और यह उसमें प्राप्त धन से पता चला जाएगा। दोनों की आज की स्थिति किसी अखबार में नहीं दिखी इसलिए मैं उसपर टिप्पणी नहीं कर सकता।

इंडियन एक्सप्रेस

यह खबर पांच कॉलम में दो लाइन के शीर्षक और लाल फ्लैग हेडिंग के साथ बहुत ही प्रमुखता है छपी है। असल में खबर का जो शीर्षक होता है उसी से उसकी प्लेसमेंट या ट्रीटमेंट तय होता है। ऊपर हिन्दू का शीर्षक भले मुझे गलत लग रहा है पर जो है वह एक बड़ी सूचना है और उस लिहाज से उसे चार कॉलम में एक लाइन के शीर्षक से छापा गया है। इसी तरह, टाइम्स  ऑफ इंडिया में बहुत सामान्य सी सूचना को शीर्षक बनाया गया है तो वह दो कलम में है। शीर्षक भले तीन लाइन में है। इंडियन एक्सप्रेस जो सूचना दे रहा है वह लाल रंग के फ्लैग शीर्षक में है, याचिका खारिज, अदालत ने कहा फंड कोविड की सहायता के लिए बनाया गया। मुख्य शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने पीएम केयर्स को क्लीयर किया, आपदा कोष में धन स्थानांतरित नहीं होगा, ट्रस्ट है इसलिए सीएजी का ऑडिट नहीं होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि यह शीर्षक पीएम केयर्स के विरोधियों को संबोधित लगता है। या सूचना प्रचार के अंदाज में है। या ऐसा, जैसे जो कहा जा रहा था वही सुप्रीम कोर्ट ने कहा। मेरा मानना है कि कानूनन सही होने और नैतिक रूप से सही होने में फर्क है। ऊपर मैं इस बारे में लिख चुका हूं। यह वैसे ही है कि सड़क पर कोई घायल पड़ा हो और आप छोड़कर चले जाएं या उसे अस्पताल ले जाएं। छोड़कर चले जाने कानूनन गलत नहीं है। और अस्पताल ले जाना भी जरूरी नहीं है। यह अलग बात है कि पुलिस लपेटने पर आई तो लपेट लेगी और आपको गवाह बनाकर भी परेशान कर सकती है। और सूचना देने की नैतिक जिम्मेदारी का ऐसा पाठ पढ़ाया जाए कि जीवन भर याद रहे। पर वह अलग मुद्दा है।

इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर के साथ प्रमुखता से यही बताया है कि पीएम केयर्स और एनडीआरएफ दो अलग कोष हैं और दोनों का मकसद अलग है। यह मुख्य शीर्षक के तहत पहली खबर का शीर्षक है। पर यहां मुद्दा यह है कि क्या प्रधानमंत्री को यह सब करने की जरूरत है या नौकरी पर रहते हुए ऐसे काम करने का अधिकार है। निश्चित रूप से अदालत में यह मामला नहीं होगा पर प्रधानमंत्री अगर चंदा इकट्ठा करें और उस धन से उनका दल सेवा करे जो यह कानूनन भले गलत न हो और जरूरी सेवा भी हो जाए पर अनैतिक और प्रचार का मामला तो है ही। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब आज भले न बताया जाता,अखबारों का काम है कि बताया जाता रहे। इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर बताया है कि आरटीआई से पता चला कि 38 सार्वजनिक उपक्रमों ने पीएम केयर्स को 2105 करोड़ रुपए दिए और 31 मार्च को इसमें 3076.62 करोड़ रुपए थे। हिन्दू ने बताया है कि पांच दिन में 3076 करोड़ रुपए मिले। यह एक ही सूचना को प्रस्तुत करने का प्रचारक और पत्रकारीय अंदाज है।

हिन्दुस्तान टाइम्स

शीर्षक है, सुप्रीमकोर्ट ने पीएम केयर्स को डिजास्टर फंड में ट्रांसफर करने से मना किया। यह तीन कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ किसी रूटीन खबर की ही तरह है। इससे लगता है कि ऐसी कोई मांग रही होगी जिससे सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया। और इसीलिए यह सामान्य खबर की तरह है। लेकिन इसी खबर को एक्सप्रेस ने ऐसे प्रस्तुत किया है जैसे बहुत बड़ा नीतिगत फैसला हो।

द टेलीग्राफ

तीन कॉलम में प्रधानमंत्री की सिंगल कॉलम फोटो के साथ है। दो लाइन का शीर्षक है, पीएम केयर्स फंड की वैधता को शीर्ष अदालत ने सही ठहराया। रूटीन खबर की तरह है और कुछ हाईलाइट नहीं है इसलिए मैं सिर्फ पहले पैरे का अनुवाद पेश कर रहा हूं- “सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पीएम केयर्स फंड की वैधता को यह कहते हुए सही ठहराया कि किसी ट्रस्ट का कामकाज प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी जैसे ट्रस्टियों में निहित है सिर्फ इसलिए उसका सार्वजनिक (लोकोपकारी) चरित्र खत्म नहीं हो जाएगा और इस उद्देश्य के लिए बजट में कोई आवंटन नहीं किया गया है क्योंकि यह पूरी तरह स्वैच्छिक है।”
मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई नई सूचना है (जैसी एक्सप्रेस की खबर में है) इसके अलावा कि कल यह बात सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कही। खबर में बताया गया है कि प्रधानमंत्री इस फंड के पदेन अध्यक्ष हैं जबकि रक्षा, गृह और वित्त मंत्री इसके पदेन ट्रस्टी हैं। इससे पता चल रहा है कि याचिका क्या रही होगी और अदालत ने जो मामले निपटाए हैं वो क्या हैं। ऊपर चर्चित सभी खबरों से मिलने वाली सूचना एक जैसी नहीं है।



लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।



 

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