द टेलीग्राफ़ ने अडानी पीड़ित पत्रकार से बात की, उन्होंने कहा- मैं खुश हूँ!

द टेलीग्राफ की आज की एक खबर के अनुसार हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट में भारतीय पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता का नाम प्रमुखता से आया है। अहमदाबाद की एक अदालत ने उन्हें अडानी समूह के खिलाफ कुछ भी लिखने-बोलने से प्रतिबंधित कर रखा है। द टेलीग्राफ ने उनसे बात की और भारतीय मीडिया ने यह मामूली सा काम भी अभी तक नहीं किया था या करने का जोखिम नहीं उठाया। उल्लेखनीय है कि अडनी पर ठाकुरता की पहली एक्सक्लूसिव खबर 2016 में तब आई थी जब वे इकनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) के संपादक थे। 

द टेलीग्राफ से उन्होंने कहा है, मैंने ईपीडब्ल्यू में कई लेख लिखे, इनमें बिजली के मूल्य निर्धारण और समूह के तराशे तथा पॉलिश किए गए हीरा व्यवसाय द्वारा लाभ के दुरुपयोग के आरोप शामिल हैं। जून 2017 में ईपीडब्ल्यू के लिए मैंने जो आखिरी लेख लिखा था, वह एसईजेड (विशेष आर्थिक क्षेत्र) में बिजली परियोजनाओं से जुड़े नियमों में बदलाव से संबंधित था …. इसमें इस बात की भी चर्चा की गई थी कि कैसे सरकार – वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय – 500 करोड़ रुपये से अधिक के सीमा शुल्क की वापसी के लिए एक आवेदन पर कार्रवाई कर रहे थे। पहले यह जांचे बगैर कि शुल्क का भुगतान किया गया था या नहीं। मामला संसद तक पहुंचा। पेश है बातचीत के अंश  

प्रश्न: इसके तुरंत बाद आपने ईपीडब्ल्यू से इस्तीफा दे दिया था? 

गुहा ठाकुरता: जैसा कि आप जानते हैं, मैंने जुलाई 2017 में ईपीडब्ल्यू के ट्रस्टी बोर्ड के कहने पर इस्तीफा दे दिया था। उनका कहना था कि मुझे अपने नाम से लेख नहीं लिखना चाहिए क्योंकि मेरे पहले वालों ने ऐसा नहीं किया था। या लेख नहीं लिखे थे। मुझे बताया गया था कि वे एक सह-संपादक नियुक्त करने के बारे में सोच रहे थे; मैंने एक प्रतिष्ठित प्रकाशन के लोकाचार को नष्ट कर दिया है जो एक संस्थान की तरह है। मुझे बताया गया था कि प्रकाशक, मुद्रक, लेखक और लेख के संपादक को कानूनी नोटिस का जवाब देने के लिए नि:शुल्क वकील की सेवा लेकर मैंने गंभीर अनैतिकता का कार्य किया है। और अंत में, मुझे उस आलेख को हटा देने के लिए कहा गया और जब तक ऐसा नहीं किया जाए कमरे से बाहर न निकलूं। अंत में मैंने अपने एक सहयोगी को बुलाया, लेख को हटाया और कागज का एक टुकड़ा लेकर अपना इस्तीफा लिख दिया। 

प्रश्न: लेकिन आपने अडानी समूह पर लिखना जारी रखा? 

गुहा ठाकुरता: ईपीडब्ल्यू ने जिस लेख को हटा दिया उसे द वायर (समाचार पोर्टल) ने प्रकाशित किया था। प्रोफेसर अमर्त्य सेन और प्रसिद्ध विद्वान नोम चॉम्स्की सहित कई लोग मेरे समर्थन में सामने आए। बाद में, अडानी समूह पर मेरे लेख कुल मिलाकर अन्य प्रकाशनों, विशेष रूप से न्यूज क्लिक में छपे। मैं मई 2018 में न्यूज़क्लिक का सलाहकार बना। 

प्रश्न: क्या आपके खिलाफ गैग (प्रतिबंध आदेश) ऑर्डर नहीं है? 

गुहा ठकुरता: मैं भारत का अकेला नागरिक हूं जिसके खिलाफ गौतम अडानी की अगुआई वाली कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने मानहानि के छह मामले दायर किए हैं जो वर्तमान में कानून की अदालतों में लंबित हैं। इनमें से दो मामले गुजरात के मुंद्रा में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष हैं, दो अहमदाबाद, गुजरात की अदालतों में, एक राजस्थान के बारां जिले में और एक दिल्ली में है।

सितंबर 2020 में, अहमदाबाद की अदालत ने मुझ पर, मेरे सह-लेखक अबीर दासगुप्ता और न्यूज़क्लिक के प्रमुख प्रबीर पुरकायस्थ पर एक गैग आदेश जारी किया कि हम गौतम अडानी और उनके समूह के हितों के खिलाफ कुछ भी बोल या लिख नहीं सकते हैं। एक लेख था जिसे मानहानिकारक माना जाता था – लेकिन लेख की सामग्री को चुनौती नहीं दी गई थी। शीर्षक मानहानिकारक माना गया… यह तीन लेखों की श्रृंखला का अंतिम था।    

मुझ पर, मेरे सहयोगियों और न्यूज़क्लिक पर यह आरोप था कि हमने जनता की नज़र में न्यायपालिका के सम्मान को कम किया है। मामला फिलहाल लंबित है और मैं इस पर और कुछ नहीं कह सकता। हाल ही में राजस्थान के मामले में, हम में से कई बारां जिले के ग्रामीण न्यायालय में मजिस्ट्रेट के सामने जमानत बांड और जमानत के लिए स्योरिटी देने के लिए उपस्थित हुए थे। 

ईपीडब्ल्यू द्वारा हटाये गए लेख को अडानी समूह ने यह कहते हुए चुनौती दी कि यह मानहानिकारक है। द वायर को चलाने वाली संस्थाओं, मेरे सह-लेखकों और मेरे खिलाफ मामले दायर किए गए थे। यह भुज में एक सिविल कोर्ट और मुंद्रा में एक आपराधिक अदालत में गया। लेकिन अब दोनों मुंद्रा में हैं। 

प्रश्न: जैसा कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है, क्या आपको गिरफ्तार करने का कोई प्रयास किया गया था? क्या आप जेल गए थे? 

गुहा ठाकुरता: जनवरी 2021 में, जब महामारी जारी थी, मुंद्रा में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा मेरे खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया था। मेरे वकील ने तर्क दिया कि यह गैर-जमानती वारंट कानून की दृष्टि से खराब था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का जिक्र किया जिनमें लिखा था कि अगर कोई शख्स कोर्ट में पेश नहीं होता है तो आप जमानती वारंट जारी कर सकते हैं। अगर वह व्यक्ति फिर भी हाजिर नहीं होता है तो कोर्ट गैर जमानती वारंट जारी कर सकता है। यह मामला ईपीडब्ल्यू से हटाए गए लेख और बाद में द वायर द्वारा प्रकाशित लेख से संबंधित है। 

मई 2019 में, लोकसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने से पहले, अडानी समूह ने सभी के खिलाफ मामले वापस ले लिए – द वायर, मेरे तीन सह-लेखक लेकिन मैं एकमात्र व्यक्ति हूं जिसके खिलाफ मामला जारी है। आपके प्रश्न का उत्तर दूं तो कहना होगा कि, मुझे कभी गिरफ्तार नहीं किया गया। 

प्रश्न: क्या आपने हिंडनबर्ग रिसर्च के साथ सहयोग किया? 

गुहा ठाकुरता: रिपोर्ट आने से पहले मैंने इसके बारे में कभी नहीं सुना था।  हालाँकि, रिपोर्ट में 32,000 शब्द हैं और अगर इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाए तो यह 150 पेज की किताब होगी। इसमें मेरे और अबीर दासगुप्ता जैसे स्वतंत्र पत्रकार, जिनके साथ मैंने सहयोग किया, द्वारा किए गए कार्यों का कई बार संदर्भ दिया गया है। लेकिन उन्होंने उन सामग्रियों को ऐक्सेस किया होगा जो पब्लिक डोमेन में हैं। 

प्रश्न: हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट आने के बाद क्या आज आप अच्छा महसूस कर रहे हैं? 

गुहा ठाकुरता: हाँ, बिल्कुल। अच्छा लग रहा हैं। 

प्रश्न: क्या आप गौतम अडानी से मिले हैं? 

गुहा ठाकुरता: मैं गौतम अडानी से दो बार मिला – मई 2017 में मुंबई में, और फिर फरवरी 2021 में। हाल ही में मेरी उनसे टेलीफोन पर लंबी बातचीत हुई। लेकिन इनमें से प्रत्येक अवसर पर मैं उनसे इस शर्त पर मिला कि यह ऑफ द रिकॉर्ड होगा। मैंने उन वार्तालापों को रिकॉर्ड नहीं किया। प्रत्येक बातचीत के दौरान, टेलीफोन कॉल को छोड़कर, मेरे साथ कुछ लोग थे। एक पूर्व सहयोगी 2017 में मेरे साथ था और 2021 में कमरे में हम पांच थे, जिनमें गौतम अडानी और मेरी पत्नी शामिल हैं। पहली बैठक लगभग एक घंटे तक चली, जबकि दूसरी एक घंटे और 55 मिनट तक चली थी। फोन कॉल करीब 15 मिनट तक चली। 

प्रश्न: क्या आपने बातचीत की शुरुआत की? 

गुहा ठाकुरता: पहली मुलाकात मेरे कहने पर हुई थी। दूसरा मेरे वकील आनंद याग्निक का था जिन्होंने इसे इस उम्मीद के साथ व्यवस्थित किया था कि अदालत के बाहर समझौता हो सकता है। लेकिन वैसा नहीं हुआ। आखिरी फोन कॉल मेरी ओर से मामलों को वापस लेने का अनुरोध था।

प्रश्न: उनकी प्रतिक्रिया क्या थी? 

गुहा ठाकुरता: उन्होंने कोई वादा नहीं किया। जैसा हम कहते हैं मामले अभी भी लंबित हैं। 

प्रश्न: आपने शीर्ष कंपनियों और कॉरपोरेट्स के खिलाफ कई लेख लिखे हैं, क्या आपने पहले अदालती मामलों का सामना किया है? 

गुहा ठाकुरता: कई कॉरपोरेट्स ने कानूनी नोटिस भेजे हैं लेकिन वास्तव में कोई भी मुझे अदालत में नहीं ले गया है। कानूनी नोटिस दोनों अंबानी भाइयों के नेतृत्व वाली कॉर्पोरेट संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों द्वारा भेजे गए थे। सहारा के सुब्रत रॉय भी मुझे कभी अदालत में नहीं ले गए। 

प्रश्न: इन मामलों का आप पर प्रभाव पड़ा होगा? 

गुहा ठाकुरता: हां, इन मामलों का मुझ पर और मेरी जिंदगी पर असर पड़ता है। समय लगता है और खर्च भी होता है। लेकिन अगर आप मुझसे पूछें कि क्या मैं कुछ अलग करता, तो मैं कहूंगा, नहीं।

 

परंजय गुहा ठाकुरता ने रवि नायर के साथ मिलकर रफाल सौदे पर फ्लाइंग लाइज (उड़ते झूठ) नाम से एक पुस्तक लिखी है और इसे खुद प्रकाशित किया है। यह भी लंबे अनुसंधान का नतीजा है और 500 पेज से ऊपर की किताब है। मीडिया विजिल में आप इस बारे में पढ़ चुके हैं।

 

इस इंटरव्यू का अनुवाद संजय कुमार सिंह ने किया है जो वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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