कोविड19 संक्रमण के हालात – ये मौत हैं कि हत्याएं और जनसंहार हैं?

सीन 1. 

दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल के बाहर, कुछ पत्रकार हैं – जो अपने चेहरे को दो मास्क लगाकर ढंके हैं, उनकी कुहनियों तक दस्ताने चढ़े हैं और फिर भी उनके चेहरे पर ख़ौफ़ साफ दिख रहा है कि संक्रमण शायद तब भी हो। वे लाइव ख़त्म करने के बाद फिर से सेनिटाइज़र निकाल कर – अपने दस्तानों पर मलते हैं। एक कैमरापर्सन सिगरेट पीना चाहता है और वह मास्क उतारने के ख़ौफ़ से इंतज़ार कर रहा है कि उसे कोई बिल्कुल अकेला कोना मिले और मास्क 5 मिनट के लिए हटा ले। सबके चेहरों पर पसीना साफ दिख रहा है, ये पसीना महज गर्मी से आया पसीना नहीं है।

 

सीन 2.

लखनऊ में एक 15-16 साल का लड़का, अपने पिता को स्ट्रेचर पर लाद कर, हाथ में ऑक्सीजन सिलिंडर खींचता हुआ एक पत्रकार को इशारा करता है कि वह ऑक्सीजन सिलिंडर खींचने में उसकी मदद करे। पत्रकार, अपने मास्क और ग्लव्स को सही करता हुआ, आगे आता है। लड़के और पत्रकार दोनों के चेहरे पर ख़ौफ़ साफ दिख रहा है। अस्पताल के बाहर, कम से कम 50 कोविड 19 पीड़ित हैं – जिनकी स्थिति खराब है और वे सभी 24 घंटे से लेकर 4 घंटे से वहीं बैठे हैं। एक शख़्स दूर से ही चिल्ली के कहता है, ‘अमां भाई, अंदर बेड नहीं है…’

सीन 3.

बनारस में एक अस्पताल के बाहर, दो महिलाएं दहाड़ें मारकर रो रही हैं। अंदर उनके परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य का कोरोना से देहांत हो गया है। एक तीसरी औरत, बिना संक्रमण की परवाह करते हुए – उनको ढांढस बंधाने की कोशिश कर रही है, पानी पिला रही है। तीसरी औरत, उनको नहीं जानती है – उसका पति भी अंदर कोविड वॉर्ड में है। दो महिला पुलिस कांस्टेबल, उनको पहले हटाने के लिए आगे बढ़ती हैं और फिर रुक जाती हैं और खड़ी हो कर उनको देखने लगती हैं।

 

सीन 4.

सूरत में एक अस्पताल में एक पत्रकार, बेहद गंभीर हालत में – अस्पताल के आईसीयू की ओर स्ट्रेचर पर ले जाया जा रहा है। उसको अस्पताल में जगह, पूरे 24 घंटे बाद मिल सकी है। हफ्ते भर पहले, वह इसी अस्पताल के बाहर खड़ा होकर, कोविड 19 की गंभीरता पर रिपोर्टिंग कर रहा था।

सीन 5.

एक नौजवान, अभी दिल्ली के एक निजी अस्पताल में बेहद खराब हालत में लाया गया है। उसकी सांस टूट रही है, ऑक्सीजन लेवल गिरता जा रहा है। ये नौजवान, पिछले 15 दिन से लगातार लोगों को किसी भी तरह बेड, ऑक्सीजन और दवाईयां मुहैया कराने में वालंटियर के तौर पर लगा था। संभवतः इसका इसी दौरान कोविड 19 वायरस के प्रति एक्सपोज़र हुआ और टेस्ट समय पर नहीं हो पाया। टेस्ट होने के बाद, रिपोर्ट आने में 5 दिन और लग गए और इस बीच इसकी हालत, ऐसी हो गई है। उसके साथ उसके पिता आए हैं, वे हमेशा इस पर नाराज़ रहे…अभी रो रहे हैं।

ये सारे सीन, आप न पढ़ें…इनको देखें भी नहीं…बस ये मानें कि सरकार आपके लिए वो सब कर रही है, जो उसे करना चाहिए। वैसे भी ये सरकार की ज़िम्मेदारी है ही नहीं कि वो आपकी जान बचाए। आपको अपनी जान की परवाह ख़ुद करनी थी। सवारी, हमेशा अपने सामान की ज़िम्मेदार ख़ुद होती है। भले ही आपका सामान, सरकारी ख़ज़ाने में जमा हो। आप गए कुंभ में, आप गए चुनावी रैलियों में और आप गए वोट डालने…आपकी ही ज़िम्मेदारी है सब…सरकार का काम आपको बस पहले आगाह करना है और बाद में ये बताना है कि आपसे ग़लती कहां हुई। हां, दुख और संवेदना जताना – ये ज़रूर सरकार का काम है, क्योंकि समय पर लोगों की मदद न करने के बाद – केवल यही किया जा सकता है।

तो क्या इन सारी बातों का मक़सद आपको कोविड के गुरूवार के आंकड़ों के बारे में बताना है। आप मान भी लें तो, गुरूवार को 24 घंटे के अंदर कोविड 19 संक्रमण के 3,32, 320 नए मामले सामने आए हैं। इनमें से महाराष्ट्र में तो हर दिन की तरह सर्वाधिक मामले हैं ही, लेकिन उत्तर प्रदेश में नए मामलों की संख्या 34,254 है। दिल्ली में 26,169 नए मामले हैं और बाकी सारे राज्यों का हाल भी बेहतर होता नहीं दिख रहा है।

इसी बीच, कोविड वैक्सीन के दाम तय हो गए हैं, राज्यों के लिए वैक्सीन की कीमत ज़्यादा रखी गई है और इसके लिए कोई कारण नहीं समझाया गया है। लोग ऑक्सीजन से लेकर, दवाओं के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। अस्पताल में बिस्तर खाली होते हैं पर तुरंत भर जाते हैं – फिर भी ज़्यादातर मरीज़ों को बिस्तर नहीं मिल पाता है। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मलीवाल के नाना को नोएडा के एक अस्पताल में बेड नहीं मिला और उन्होंने दम तोड़ दिया। आम आदमी की हालत का आप बस अंदाज़ लगा सकते हैं।

हाईकोर्ट से लेकर, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर तीखी टिप्पणियां कर दी हैं। लेकिन जिनको भी ऑक्सीजन या दवाएं मिल पा रही हैं – वो ग़ैर सरकारी संगठनों, वालंटियर्स बल्कि गुरुद्वारों तक से मिल रही हैं पर सरकार से…

हम और ज़्यादा कुछ नहीं लिखना चाहते हैं, हम बस बताना चाहते हैं कि हालात क़ाबू से न केवल बाहर जा रहे हैं…केंद्र सरकार के आंसू गिरते हैं और बंगाल की चुनावी रैली में सूख जाते हैं…केंद्रीय गृह मंत्री अभी भी रैलियों में लगे हैं…वो भी आमतौर पर बिना मास्क। रैली में बिना मास्क दिखने वाले पीएम, टीवी पर मास्क लगा लेते हैं। सत्ताधारी पार्टी के समर्थक, आपको बता रहे हैं कि सरकार आख़िर महामारी में कर भी क्या सकती है…न्यूज़ चैनल सिखा रहे हैं कि सकरात्मक कैसे हुआ जाए…और आप चाहें तो इन अच्छे दिनों पर मुग्ध हो कर, ये कह सकते हैं कि देश का बहुत नाम हो रहा है।

आपको अभी भी ये जनसंहार नहीं लगता? तो फिर क्या लगता है…

 

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