मनुष्य के फैलाये अंधकार के बीच पृथ्वी दिवस !

इस कोरोना काल में आकाश स्वच्छ है और हवा में भी प्रदूषण न के बराबर है। पंछियों का कलरव बीच शहर भी गूंज रहा है। यह सब इसलिए हुआ है कि क़ुदरत ने मानव प्रजाति को घरों में बंद रहने को मजबूर कर दिया है। यानी मनुष्य का कार्य-व्यापार जीव-जंतुओं ही नहीं, नदी, जल और वायु को भी नष्ट कर रहा है। 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस पर पढ़िये आनंद मालवीय का यह लेख जो बताता है कि हमने यानी मनुष्यों ने विकास के नाम पर धरती का क्या हाल किया हुआ है- संपादक

यूं तो सभ्यता की शुरुआत के साथ ही प्रकृति के साथ छेड़छाड़ शुरू हो गई थी । किंतु प्राकृतिक संतुलन में दिखाई पड़ने लायक परिवर्तन औद्योगिक क्रांति के बाद सामने आए । डीन इंज नाम के एक लेखक ने घोषणा की कि सताई गई प्रकृति अपने तरीके से बदला लेती है । वास्तव में प्रकृति बदला नहीं लेती, प्रकृति तो अपना काम बदस्तूर करती रहती ,है मनुष्य उसके रास्ते में आ जाता है और ऐसा लगता है कि प्रकृति दंडित कर रही है ।

कुछ विचारशील लोग हमेशा से औद्योगिक विकास का प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने का प्रयास करते रहे हैं।  1969 में सेन फ्रांसिस्को में यूनेस्को के एक सम्मेलन में शांतिवादी कार्यकर्ता मैक कोलेन ने पृथ्वी के सम्मान में एक दिन निर्धारित किए जाने का प्रस्ताव किया जिसे मान लिया गया । अगले वर्ष 21 मार्च (जब दिन और रात बराबर होते हैं ) को पहली बार पृथ्वी दिवस मनाया गया । लेकिन एक माह बाद 22 अप्रैल 1970 को अमेरिकी सीनेटर गेलार्डनेल्सन ने अलग से पृथ्वी दिवस मनाया ।  अमेरिका में इसी पृथ्वी दिवस को मान्यता दी गई ।

1992 में ब्राजील के रियो डि जेनेरियो नगर में पहली बार पृथ्वी शिखर सम्मेलन हुआ जिसमें पर्यावरण और विकास को अन्योन्याश्रित माना गया । इस सम्मेलन में पृथ्वी के पर्यावरण की सुरक्षा के सभी आयामों पर समग्र रूप से चर्चा की गई । किंतु बाद के सारे शिखर सम्मेलन (कुछ अपवादों को छोड़कर)केवल ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने तक सिमट कर रह गए हैं । विकसित देश सारी जिम्मेदारी विकासशील देशों पर डालना चाहते हैं और विकासशील देश विकसित देशों पर दबाव डालते हैं और जो जिम्मेदारी तय की जाती है उसका भी पूरा निर्वाह नहीं किया जाता ।

ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना आवश्यक है।  लेकिन यह पर्यावरण के प्रति एकांगी दृष्टिकोण है।  ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए सकारात्मक कदम यथा वृक्षों को लगाने और संरक्षण के प्रयास क्यों नहीं किए जाते? हाल में अमेजन वनों के लगातार जलते रहने के प्रति ब्राजील (जहां यह वन जल रहे हैं ) सहित बड़े देशों का उदासीन रुख मानवता के लिए अत्यंत निराशाजनक रहा है । पर्यावरण संतुलन से संबंधित दूसरे पहलुओं जैसे जल संरक्षण और जैव विविधता को बचाने की बातों की चर्चा क्यों नहीं की जाती?

पिछले वर्ष एक रिपोर्ट आई जिसमें बताया गया कि धरती में 3434 स्तनधारी जैविक प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं जिनमें 93 केवल भारत की हैं। क्योंकि स्तनधारी जैविक प्रजातियां ऐसी हैं जिनकी उपस्थिति-अनुपस्थिति को नोटिस किया जा सकता है इसलिए इनकी गिनती अपेक्षाकृत आसान है। पक्षियों और रेंगने वाले जंतुओं का अनुमान लगाना तो अत्यंत मुश्किल होगा ।यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि भारत में चीता बिल्कुल विलुप्त हो चुका है। जी हाँ, वही चीता जिसे सबसे तेज धावक होने का गौरव प्राप्त है।  प्रकृति ने ‘जीवो जीवस्य भोजनम’ द्वारा जीवों की संख्या सीमित कर रखी है और चीते के विलुप्त होने और भेड़ियों की संख्या कम हो जाने के कारण नील गायों की उपस्थिति अधिक उग्र हो गई है।

पिछले वर्ष ही विश्व के 34 नदी विशेषज्ञों ने दुनिया की बड़ी नदियों का अध्ययन किया और उन्होंने पाया कि दुनिया भर की बड़ी नदियों में से 37% नदियां अविरल नहीं हैं अर्थात उन्हें बांध बनाकर उनका बहाव कम किया गया है। इस 37 प्रतिशत में हमारे देश की सभी बड़ी नदियां शामिल हैं। नदी की अविरलता के समाप्त होने से कई तरह का नुकसान होता है। कई तरह के जलचर होते हैं जो बहते जल में ही रह सकते हैं और कई तरह के जलचर होते हैं जो निश्चित गहराई में ही रह सकते हैं ।बिना अविरलता के नदियों की स्वच्छता की कल्पना भी नहीं की जा सकती । नदी में समुचित बहाव बना रहे तो आधा जैविक प्रदूषण नदी स्वयं ठीक कर लेती है । एक तरफ हम नदियों को बांध बनाकर रोक रहे हैं और दूसरी दूसरी तरफ अपने गांव और बस्तियों के तालाबों को पाट रहे हैं। तालाब पशुओं के पानी पीने के अलावा एक महत्वपूर्ण काम हमारे भूगर्भ जल के स्तर को बनाए रखने का करते हैं । तालाबों के ना होने से वर्षा का जल बह जाता है और भूगर्भ में नहीं पहुंच पाता । अन्य कई तरह की भूमिका के अलावा वृक्ष भी भूगर्भ जल को संरक्षित करते हैं। अपने पर्यावरण की रक्षा में जनसामान्य की सबसे आसान भूमिका वृक्षारोपण और तालाब के संरक्षण में ही हो सकती है । यहां यह बताना जरूरी है कि पिछले वर्ष नीति आयोग का एक सर्वे आया था जिसमें इस वर्ष के लिए बताया गया था कि 21 बड़े नगरों में भूगर्भ जल में भारी कमी होगी या बिल्कुल समाप्ति हो जाएगी।

हमारी रहन-सहन की प्रणाली और और बाजार प्राकृतिक असंतुलन का सबसे बड़ा कारण है। डिस्पोजेबल प्लास्टिक को जटिल पैकेजिंग बड़े पैमाने पर कचरा बढ़ाते हैं। एक नई तरह की कचरे ई- कचरे से भी हमें दो चार होना पड़ रहा है। और अंततोगत्वा यह सारा कचरा समुद्र में जाता है और इस प्रकार हम अपने समुद्रों को  कचरा घरों में तब्दील करते जा रहे हैं । यह अत्यंत गंभीर स्थिति है और मानवता के अस्तित्व के लिए हमें इसके बारे में सोचना पड़ेगा।


आनंद मालवीय

जार्ज टाउन, इलाहाबाद
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